रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकथा सुनी है, उसी का वर्णन करूँगा । मूलकथा भगवान् सदाशिव ने रचकर अपने मन में रख छोड़ी थी । उसी का अवसर पाकर उन्होंने पार्वती से वर्णन किया था । जिन्होंने यह कथा पहले न सुनी हो उन्हें आश्चर्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि भगवान् राम के अनन्त जन्म, अनन्त नाम तथा कर्म हैं। कल्पभेद से भगवान् के विविध चरित्र हुए हैं। उनका अनेक प्रकार से मुनीशों ने इतिहासों, पुराणों तथा संहिताओं में वर्णन किया है। इस दृष्टि से उनकी रामकथा में वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, पुराणों, श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, संहिताओं कि बहुना आस्तिकसम्मत सम्पूर्ण साहित्य का सार-संकलन किया गया है । वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामसाहित्य सब एक दूसरे के पूरक हैं । वाल्मीकिरामायण भी २४ हजार श्लोकों का ही नहीं, किन्तु शतकोटिप्रविस्तर है जो कि अन्य लोकों में प्राप्त है। अतः कल्पभेद के अनुसार विविध कथाओं का समन्वय ही अभीष्ट है। तुलसीसाहित्य इस समन्वय का सर्वोत्तम प्रतीक है। तुलसीभिन्न हिन्दीसाहित्य में रामकथा तुलसी के पूर्व हिन्दी-साहित्य में रामानन्द के कुछ भक्तिविषयक पद सुरक्षित हैं। सूरदास ने सूरसागर में वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामकथा के अनेक स्थलों पर १५० पदों की रचना की है। इनमें केवट-वृत्तान्त रामचरितमानस की भाँति वनवास की कथा में रखा गया है। इसमें लक्ष्मण द्वारा कुटी के चारों ओर रेखा खींचने का उल्लेख है । पृथ्वीराजरासो के द्वितीय समय में दशावतार-कथा के अन्तर्गत रामकथाविषयक लगभग १०० छन्द मिलते हैं, जिनमें लङ्का-युद्ध के वर्णन को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। ईश्वरदास के भरतमिलाप में अयोध्याकाण्ड की कथावस्तु का दोहा और चौपाइयों में वर्णन है। इनके रामजन्म और अङ्गदपैज भी सुरक्षित हैं। तुलसीदास के समकालीन कवियों में अग्रदास एवं नाभादास प्रमुख हैं। अग्रदास के अष्टयाम में राम की रासक्रीड़ा का वर्णन है । इनकी पदावली तथा ध्यानमञ्जरी में मँजी हुई भाषा के भक्तिपूर्ण पद मिलते हैं । अग्रदास के शिष्य नाभादास ने भी सीता-रामचरित को लेकर अष्टयाम की रचना की है । सोढ़ी मेहरबान का आदिरामायण ( हिन्दीमिश्रित पंजाबी भाषा में ), लालदासकृत अवधविलास आदि ग्रन्थ भी मिलते हैं । राजस्थानी में विस्तृत जैनी राम-साहित्य मिलता है । समयसुन्दर की सीताराम चौपाई विशेषरूप से उल्लेखनीय है । जैनेतर रचनाओं में लक्ष्मणायण १६ वीं शती का है। नरहरिदास के अवतारचरित का रामावतार- विषयक अंश रामचरितमानस और रामचन्द्रिका पर निर्भर है। ३०० अनु : रीतिकाल का रामसाहित्य महत्त्वपूर्ण न होने पर भी भक्तिकाव्य की अपेक्षा अधिक विस्तृत है । उस साहित्य पर कृष्ण-काव्य की गहरी छाप है, शृङ्गार की व्यापकता है । उस समय वाल्मीकिरामायण, जैमिनिपुराण, रामाश्वमेध, अध्यात्मरामायण, योगवासिष्ठ आदि के अनुवाद भी हुए हैं । विश्वनाथसिंह, केशव कवि आदि ने हनुमद्भक्तिपरक रचनाएँ की हैं । वस्तुतः शृङ्गारकाव्य वेदों से ही प्रचलित हैं वृषाकपिसूक्त तथा अपाला- सूक्त प्रसिद्ध हैं । खड़ी बोली गद्य की प्राचीनतम प्रौढ़ रचनाओं में से तीन ग्रन्थ राम-साहित्य से सम्बन्ध रखते हैं—राम- प्रसाद निरञ्जनी का भाषा योगवासिष्ठ ( १७४१ ई० ), दौलतराम का पद्मपुराण (१६६१ ई० जैनी रामकथा) तथा सदल मिश्र का रामचरित (१८०७ ई०) अध्यात्मरामायण का अनुवाद) । रसिकविहारी का रामरसायन, रघुनाथदास का विश्रामसागर, रघुराजसिंह का रामस्वयंवर, बघेली कुँवरि का अवधविलास, बलदेव प्रसाद मिश्र का कोशल- ४२