रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
कथा सुनी है, उसी का वर्णन करूँगा । मूलकथा भगवान् सदाशिव ने रचकर अपने मन में रख छोड़ी थी । उसी का अवसर पाकर उन्होंने पार्वती से वर्णन किया था । जिन्होंने यह कथा पहले न सुनी हो उन्हें आश्चर्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि भगवान् राम के अनन्त जन्म, अनन्त नाम तथा कर्म हैं। कल्पभेद से भगवान् के विविध चरित्र हुए हैं। उनका अनेक प्रकार से मुनीशों ने इतिहासों, पुराणों तथा संहिताओं में वर्णन किया है। इस दृष्टि से उनकी रामकथा में वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, पुराणों, श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, संहिताओं कि बहुना आस्तिकसम्मत सम्पूर्ण साहित्य का सार-संकलन किया गया है । वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामसाहित्य सब एक दूसरे के पूरक हैं । वाल्मीकिरामायण भी २४ हजार श्लोकों का ही नहीं, किन्तु शतकोटिप्रविस्तर है जो कि अन्य लोकों में प्राप्त है। अतः कल्पभेद के अनुसार विविध कथाओं का समन्वय ही अभीष्ट है। तुलसीसाहित्य इस समन्वय का सर्वोत्तम प्रतीक है। तुलसीभिन्न हिन्दीसाहित्य में रामकथा तुलसी के पूर्व हिन्दी-साहित्य में रामानन्द के कुछ भक्तिविषयक पद सुरक्षित हैं। सूरदास ने सूरसागर में वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामकथा के अनेक स्थलों पर १५० पदों की रचना की है। इनमें केवट-वृत्तान्त रामचरितमानस की भाँति वनवास की कथा में रखा गया है। इसमें लक्ष्मण द्वारा कुटी के चारों ओर रेखा खींचने का उल्लेख है । पृथ्वीराजरासो के द्वितीय समय में दशावतार-कथा के अन्तर्गत रामकथाविषयक लगभग १०० छन्द मिलते हैं, जिनमें लङ्का-युद्ध के वर्णन को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। ईश्वरदास के भरतमिलाप में अयोध्याकाण्ड की कथावस्तु का दोहा और चौपाइयों में वर्णन है। इनके रामजन्म और अङ्गदपैज भी सुरक्षित हैं। तुलसीदास के समकालीन कवियों में अग्रदास एवं नाभादास प्रमुख हैं। अग्रदास के अष्टयाम में राम की रासक्रीड़ा का वर्णन है । इनकी पदावली तथा ध्यानमञ्जरी में मँजी हुई भाषा के भक्तिपूर्ण पद मिलते हैं । अग्रदास के शिष्य नाभादास ने भी सीता-रामचरित को लेकर अष्टयाम की रचना की है । सोढ़ी मेहरबान का आदिरामायण ( हिन्दीमिश्रित पंजाबी भाषा में ), लालदासकृत अवधविलास आदि ग्रन्थ भी मिलते हैं । राजस्थानी में विस्तृत जैनी राम-साहित्य मिलता है । समयसुन्दर की सीताराम चौपाई विशेषरूप से उल्लेखनीय है । जैनेतर रचनाओं में लक्ष्मणायण १६ वीं शती का है। नरहरिदास के अवतारचरित का रामावतार- विषयक अंश रामचरितमानस और रामचन्द्रिका पर निर्भर है। ३०० अनु : रीतिकाल का रामसाहित्य महत्त्वपूर्ण न होने पर भी भक्तिकाव्य की अपेक्षा अधिक विस्तृत है । उस साहित्य पर कृष्ण-काव्य की गहरी छाप है, शृङ्गार की व्यापकता है । उस समय वाल्मीकिरामायण, जैमिनिपुराण, रामाश्वमेध, अध्यात्मरामायण, योगवासिष्ठ आदि के अनुवाद भी हुए हैं । विश्वनाथसिंह, केशव कवि आदि ने हनुमद्भक्तिपरक रचनाएँ की हैं । वस्तुतः शृङ्गारकाव्य वेदों से ही प्रचलित हैं वृषाकपिसूक्त तथा अपाला- सूक्त प्रसिद्ध हैं । खड़ी बोली गद्य की प्राचीनतम प्रौढ़ रचनाओं में से तीन ग्रन्थ राम-साहित्य से सम्बन्ध रखते हैं—राम- प्रसाद निरञ्जनी का भाषा योगवासिष्ठ ( १७४१ ई० ), दौलतराम का पद्मपुराण (१६६१ ई० जैनी रामकथा) तथा सदल मिश्र का रामचरित (१८०७ ई०) अध्यात्मरामायण का अनुवाद) । रसिकविहारी का रामरसायन, रघुनाथदास का विश्रामसागर, रघुराजसिंह का रामस्वयंवर, बघेली कुँवरि का अवधविलास, बलदेव प्रसाद मिश्र का कोशल- ४२
३३० रामायणमीमांसा एकादश किशोर, मैथिली में चन्दा झा का रामायण । १९०० सन् के बाद शिवरत्न शुक्ल का रामावतार, वंशीधर शुक्ल का राममड़ैया, रामनाथ ज्योतिषी का श्रीरामचन्द्रोदय । रामचरित उपाध्याय का रामचरितचिन्तामणि, मैथिलीशरण गुप्त का साकेत ( १९२९ ई० ), हरिऔध का वैदेहीवनवास ( १९३९ ई० ), बलदेव प्रसाद मिश्र का साकेत-सन्त ( १९४६ ई० ), केदारनाथ मिश्र का कैकेयी ( १९५० ई० ), बालकृष्ण शर्मा नवीन का उर्मिला ( १९५७ ई० ) खड़ी बोली के समृद्ध साहित्य हैं। इनमें अवतारवाद को कम महत्त्व दिया गया है। शृङ्गारिकता के स्थान पर सामाजिक तथा राजनीतिक आदर्श तथा पूर्ववर्ती रामकाव्य के उपेक्षित अथवा कम विकसित पात्रों को नायक एवं नायिका बनाने को प्रवृत्ति है। वस्तुतः ऐसे काव्य लोक-निर्माण के लिए ही कल्पित किये जाते हैं। जनसमूह के श्रद्धास्पद होने के कारण ही प्राचीन ग्रन्थों एवं उनके पात्रों का इनमें उपयोग किया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन केशवदास की रामचन्द्रिका में सीता-स्वयंवर में बाणासुर तथा रावण के संवाद का उल्लेख है। मिथिला में परशुराम का तेजोभङ्ग वर्णित है। रावणवध के पश्चात् अयोध्या लौटने पर राम की विरक्ति तथा वसिष्ठ का समझाना उल्लिखित हैं। पद्मपुराण तथा जैमिनीयाश्वमेध के अनुसार सीता-त्याग, लव- कुश का जन्म और राम-सेना के साथ लव-कुश के युद्ध का वर्णन है। ३०३ अनु० : सिक्खों के दशवें गुरु गोविन्दसिंह ने १६९८ ई० में रामावतार-कथा लिखी है जो १९५३ ई० में गोविन्दरामायण के नाम से प्रकाशित हुई है। उसकी विशेषताएँ राम और सीता का पूर्वानुराग, अयोध्या में भी परशुराम का तेजोभङ्ग, लक्ष्मण द्वारा सीता की रक्षा के लिए रेखा खींचना, सीता का नाग-मन्त्र पढ़ कर राम और लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करना, लव-कुश-युद्ध के अन्त में सीता अपने सतीत्व की शपथ लेकर राम की सेना को जिला देती है और राम के साथ अयोध्या लौट आती है। रावण-चित्र के कारण राम को सीता पर सन्देह होता है। फलस्वरूप सीता शपथ पर भूमि में प्रवेश करती है। प्रायः प्रचलित विभिन्न रामायणों तथा पुराणों पर ही उक्त आख्यान निर्मित हुआ है। मराठीसाहित्य में रामकथा ३०४ अनु० : मराठी-साहित्य के भावार्थरामायण की रचना १६ वीं शती की है। इसका उत्तरकाण्ड एकनाथ के किसी शिष्य ने लिखा था। समालोचकों के अनुसार युद्धकाण्ड के अहिमहिऱावण-वृत्तान्त को छोड़कर युद्ध- काण्ड पर्यन्त सम्पूर्ण भावार्थरामायण एकनाथजी की ही रचना है। अहिमहिऱावण की कथा जयरामसुत द्वारा लिखी हुई है। उसका कथानक वाल्मीकिरामायण के ढाँचे पर निर्मित हुआ है। उसके आधार वाल्मीकिरामायण, अध्यात्म- रामायण तथा आनन्दरामायण हैं। उसमें भक्तिवातावरण का आधार अध्यात्म रामायण है। वाल्मीकिरामायण से भिन्न नवीन सामग्री का आधार आनन्दरामायण है। दशरथ-पुत्री शान्ता, तारा-शाप आदि का उल्लेख वाल्मीकि- रामायण के दाक्षिणात्य पाठ में नहीं मिलते किन्तु पश्चिमोत्तरीय पाठ में मिलते हैं। एकनाथ के कथानक पर आनन्दरामायण की गहरी छाप है। दशरथ-कौशल्या-विवाह आदि बहुत-सी नयी सामग्री आनन्दरामायण की ही है। भरत तथा शत्रुघ्न का कैकेयी की सन्तान के रूप में उल्लेख तीनों में नहीं मिलता। अन्य काण्डों की अपेक्षा उत्तर- काण्ड वाल्मीकिरामायण से अधिक साम्य रखता है । एकनाथ परम आस्तिक थे। उनकी दृष्टि में उक्त तीनों रामायण तथा अन्य रामायण तथा पुराण भी प्रमाण हैं, अतः उन्होंने भी तुलसीदासजी के समान ही सब का संकलन कर भावार्थरामायण ग्रन्थ लिखा है—उसमें मतभेद का समाधान कल्पभेद से किया जा सकता है। एकनाथजी ने शतकोटिप्रविस्तररामायण और शिवजी द्वारा तीनों लोकों के लिए उसका विभाग कहा है। तदनुसार ३३ कोटि ३३ लक्ष ३३ सहस्र ३ सौ ३३ श्लोक और १०
अक्षर एक एक लोक को मिले हैं। एक श्लोक में ३२ अक्षर होते हैं। उसमें से दस दस अक्षर बँट जाने पर दो अक्षर शेष रह गये। उनका बँटवारा नहीं हो सकता था। उन्हें सर्वसार समझ कर शिवजी ने ग्रहण किया था। इसमें रामायण के मुख्य वक्ता शिवजी और श्रोत्री पार्वतीजी कही गयी हैं। एक कथा में शिव वक्ता और राम श्रोता हैं। वह शिवरामायण है। श्वेतकेतुरामायण तथा आत्मरामायण राम द्वारा उक्त हैं। जैमिनिरामायण ओर अध्यात्मरामायण अनेक रामायणों के सार हैं—वे अपेक्षा कृत नवीन हैं। उनके अनुसार असंख्यात रामायण हैं। शिवरामायण, शैवरामायण, आगमपाञ्चरात्ररामायण, गुहागुह्यकरामायण, हनुमन्द्रामायणनाटक, इनके अनुसार हनुमन्नाटक हनुमत्कृत ही है। भक्त-कूर्म-वराह-रामायण, महाकालीरामायण, स्कन्दरामायण, अगस्ति-पौलस्ति- रामायण, पद्मपुराण, त्रिरामायण, अग्निवरुणरामायण, जटायुरामायण, महाभारतरामायण, महाभारतीरामायण तथा धर्मरामायण । अरण्यकाण्डभावार्थरामायण में राम को सच्चिदानन्द तथा लक्ष्मण को शेष कहा गया है। वैराग्य और ज्ञान का निरूपण करते हुए एकनाथ महाराज ने योगवासिष्ठ के अनेकों श्लोकों का उद्धरण किया है— न राघव तवास्त्यन्यज्ज्ञेयं ज्ञानवतांवर । स्वमेव सूक्ष्मया बुद्ध्या कवि विज्ञातवानसि ॥ भगवद्व्यासपुत्रस्य शुकस्येव मतिस्तव । विश्रान्तिमात्रमेवैतज्ज्ञानाज्ञानमपेक्षते ॥'' अर्थात् राघव, तुम्हारे लिए अन्य कुछ ज्ञातव्य नहीं है। अपनी सूक्ष्म बुद्धि से ही तुमने सब कुछ जान लिया है। भगवान् व्यास के पुत्र शुक की जैसी तुम्हारी प्रज्ञा है। केवलमात्र विश्रान्ति ही अपेक्षित है। भावार्थरामायण के अनुसार अहमात्मा ही दशरथ है, सद्विद्या कौशल्या है, शुद्ध मेधा सुमित्रा है, अविद्या कैकेयी है और कुविद्या मन्थरा है (बालकाण्ड अध्याय १)। सीता-स्वयंवर अन्य अनेक विद्वानों ने सीतास्वयंवर ग्रन्थों की रचनाएँ की थीं। संक्षेपरामायण, अहिमहिरावण-वध, समर्थ रामदास का लघुरामायण सुन्दरकाण्ड तथा युद्धकाण्ड, वेणाबाई का रामायण आदि भी सत्रहवीं शती की रचनाएँ हैं। १७०३ की श्रीधरकृत रामविजय सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है। इसमें अहल्या गौतम-विवाह की कथा ब्रह्मपुराण के अनुसार दी गयी है। मोरो पन्त के ७४ रामायण प्रकाशित हैं। कथानक वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही है। अमृतराव का शतमुखरामायण ग्रन्थ १९वीं शती की रचना है। वस्तुतः अपनी वाणी को सफल बनाने के लिए अनेक विद्वानों एवं सन्तों ने रामचरित्र का कीर्तन करने के उद्देश्य से रामकथाओं का संकलन किया है, पर आधुनिक पाश्चात्य लोग तो अश्रद्धा ही उत्पन्न करने की दृष्टि से इस ओर प्रयत्न करते हैं। गुजरातीसाहित्य में रामकथा ३०६ अनु० : रामलीला ना पदो (१४वीं शती), भालणकृत रामविवाह और रामबालचरित (१५वीं शती), मन्त्री कर्मणकृत सीता-हरण, भीमकृत रामलीला ना पदो (१५वीं शती), मांडण बंधारो का रामायण (१५वीं शती), लावण्यसमयकृत रावण-मन्दोदरी-संवाद (१६वीं शती) तथा उद्धवकृत सीता-हनुमान्संवाद, इसी प्रकार अन्य विद्वानों ने लवकुशाख्यान, रणयज्ञ, सीताविरह आदि रचनाएँ की हैं। १९वीं शती का गिरधरदास- कृत रामायण सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। आधुनिक काल में योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि का गुजराती अनुवाद हुआ है। रामायणनोसार १९वीं शती की रचना है।
३३२ रामायणमीमांसा एकादश उर्दू-फारसी-साहित्य में रामकथा ३०७ अनु० : सूरजनारायण मेहरु का रामायणमेहरु, मुन्शी जगन्नाथ खुस्तर का रामायणखुस्तर । इस सर्वोत्तम तथा सबसे लोकप्रिय उर्दूरामायण की रामायणखुस्तर रचना १८४८ ई० में हुई । मुन्शी शङ्करदयाल 'फर्हत' का रामायणमंजूम, बाकेविहारीलाल 'बहार' का रामायणबहार । ये चार उर्दूसाहित्य की रामकथा के उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं । उर्दू में रामायण पर अधिक रचनाओं का अभाव है । ३०८ अनु० : अकबर के आदेशानुसार अल बदायूनी ने १५८४-१५८९ ई० में वाल्मीकिरामायण का फारसी में पद्यानुवाद किया था । जहाँगीर के समय तुलसी के समकालिक गिरधरदास ने वाल्मीकिरामायण का संक्षिप्त पद्यानुवाद प्रस्तुत किया था । मुल्ला मसीह का रामायणमसीही, रामायणफैजी, गोपालकृत तर्जुमा-इ-रामायण १७वीं शती, बेदिल चन्द्रभान का वाल्मीकिरामायण-पद्यानुवाद, यह औरङ्गजेब के समय का है । लाला अमरसिंह का गद्यात्मक रामायणअमरप्रकाश १७०५ ई० । अमानत राय का वाल्मीकिरामायणपद्यानुवाद १६५४ ई० की रचना है । रामायणमसीही के निर्माता ईसाई थे, इसी लिए इसमें ईसा, मरियम आदि बाइबिल के पात्रों का उपमान के रूप में उल्लेख हुआ है । इसमें ५००० छन्द हैं । दशरथयज्ञ से लेकर सीता के भूमि-प्रवेश तक की समस्त रामकथा प्रस्तुत है । इसमें पाषाण-भूता अहल्या का उद्धार अरण्यकाण्ड में रखा गया है । विश्वामित्र सीता-जन्म की कथा सुनाते हैं । सीता मञ्जूषा में पायी गयी थी । रावण-वध के बाद स्वयं मन्दोदरी सीता को राम के पास ले आती है । राम की बहन सीता को दशमुख का चित्र अङ्कित करने के लिए प्रेरित करती है और वही राम से जाकर कहती है कि सीता उसी चित्र की पूजा करती रहती है । वाल्मीकि द्वारा सीता के एक पुत्र की सृष्टि, लवकुश-युद्ध में राम को भी पराजित तथा अचेत किया गया था, पर वाल्मीकि जल छिड़क कर राम को प्रबुद्ध करते हैं । प्राचीन लोग जान- बूझ कर किसी कथा को विकृत नहीं करते थे, उनको विभिन्न प्रमाणों से जैसी सामग्रियाँ मिलीं उसी रूप में उन्होंने रामकथा का संकलन किया । किन्तु आधुनिक बुल्के आदि तो अपना एक मत बना कर उसके आधार पर उसी के ढाँचे में रामायण का रूप निर्धारण करना चाहते हैं ।
द्वादश अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३१० अनु० : रामकथा की एक धारा उत्तर की ओर फैल गयी । इसका प्रमाण तिब्बती तथा खोतानी रामायणों में मिलता है। वह अपेक्षाकृत प्राचीन है। दूसरी धारा भारत से हिन्दोनेशिया, हिन्दचीन, श्याम आदि की ओर पहुँच गयी । तिब्बती रामायण ३११ अनु० : अनामकं जातकं तथा दशरथकथानम् का क्रमशः तीसरी और ५ वीं शती में चीनी अनुवाद हुआ था । रामकथा की तिब्बती भाषा में भी अनेक हस्तलिपियां मिलती हैं, जिनमें रावणचरित से लेकर सीता-त्याग और राम-सीतामिलन तक की समस्त कथा मिलती है जो सम्भवतः ७ वीं शती की है। इसमें विष्णु दशरथ के पुत्ररूप में अवतार लेने की प्रतिज्ञा करते हैं। इसके अनुसार दशरथ की दो पत्नियां थीं। विष्णु कनिष्ठा के गर्भ से जन्म लेते हैं और रामन कहलाते हैं। तीन दिन बाद विष्णु के पुत्र ज्येष्ठा से जन्म लेते हैं जिसका नाम लक्ष्मण रखा जाता है। इसमें सीता रावण की पुत्री मानी जाती हैं। इसके अनुसार इस राजपुत्री की जन्मपत्री में पिता का नाश करने का योग देख कर उसे समुद्र में फेंक दिया जाता है। वह भारत के कृषकों द्वारा पाली जाती है। इसका लीलावती तथा अन्य लिपियों में सीता नाम पड़ता है। दो पुत्रों में से किस को राज्य दिया जाय ? पिता के इस संशय के कारण रामन स्वेच्छा से ही तप करने आश्रम में चले जाते हैं। कृषकों के अनुरोध से रामन तप छोड़कर सीता से विवाह करते हैं। तिब्बती रामायण में सीता-हरण का वर्णन वनवास के बाद मिलता है। इसमें रावण सीता का स्पर्श नहीं करता तथा जटायु को रक्त से सने पत्थर खिला कर मार डालता है। वानरों से मैत्री, हनुमान् का प्रेषण, रावण-वध, रावण का मर्म-स्थान उसका अंगूठा बताया गया है। इस तरह यह जैनों के उत्तरपुराण, कथासरित्सागर आदि से प्रभावित कथा है। खोतानी रामायण ३१२ अनु० : खोतान (पूर्वी तुर्किस्तान) की उक्त रामायण ९वीं शती की रचना मानी जाती है। यह तिब्बती रामायण से मिलती है। फिर भी दोनों में से कोई एक दूसरे का आधार नहीं है। तिब्बती रामायण का उत्तरकाण्ड खोतानी रामायण में नहीं मिलता । अन्य कई वृत्तान्त खोतानी रामायण में मिलते हैं जिनका अस्तित्व तिब्बती में नहीं है। दोनों में निम्नोक्त तुल्यता है— (१) राम और लक्ष्मण, केवल दो भाइयों का उल्लेख । (२) सीता (दशग्रीव-पुत्री) की जन्म-कथा । (३) वनवास के समय सीता के विवाह का वृत्तान्त । (४) रावण द्वारा जटायु को रक्त मिश्रित पाषाण भक्षण कराना । (५) द्वन्द्वयुद्ध के समय वानर विजेता की पूंछ में दर्पण बाँधे जाने की कथा । (६) रावण के मर्म-स्थान का उल्लेख ।
३३४ रामायणमीमांसा द्वादश इसमें बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट है । (१) खोतानी रामायण में अवतार वाद का उल्लेख न होकर राम का बुद्ध तथा लक्ष्मण का मैत्रेय होना कहा गया है । (२) यहाँ आहत रावण का वध नहीं किया जाता है । (३) इसमें रावण के बाद अर्जुन कार्तवीर्य सहस्रबाहु तथा परशुराम की कथा मिलती है । (४) इसमें दाशरथि राम और परशुराम का मिश्रण है । (५) इसमें दशरथ-पुत्र सहस्रबाहु, परशुराम के पिता की धेनु चुराता है जिसके कारण परशुराम सहस्रबाहु को मारते हैं सहस्रबाहु के राम और लक्ष्मण दो पुत्र होते हैं । राम परशुराम का वध करते हैं । (६) राम और लक्ष्मण दोनों वनवास करते हैं । निर्वासन का कारण निर्दिष्ट नहीं है । दोनों सीता से विवाह करते हैं । सीता-हरण वृत्तान्त में रेखा खींची जाने का उल्लेख है । सेतुबन्ध आदि की कथाएँ भी इसमें हैं । वस्तुतः भारतीय संस्कृति और संस्कृत ग्रन्थों का ज्ञान उक्त ग्रन्थकार को नहीं था, इसलिए उसने खोतानी रामायण में अशुद्ध कथाओं का संकलन किया है । दशरथ का पुत्र सहस्रबाहु, सहस्रबाहु के पुत्र राम और लक्ष्मण को बताना सर्वथा भ्रान्तिपूर्ण ही है । वैदिक धर्म-विरोधी बौद्धों में भाई-बहन में शादी एवं एक स्त्री का अनेक पुरुष-सम्बन्ध दोष नहीं माना जाता । इसी लिए लेखक ने बौद्ध रामायणों में सीता को राम की भगिनी मानकर भी विवाह सम्बन्ध माना है । खोतानी में उसी प्रभाव के कारण राम और लक्ष्मण दोनों का ही सीता से विवाह मान लिया है । वस्तुतः वैदिक राम के चरित्र का विकृत रूप ही यह कथा है । हिन्दोनेशिया की प्राचीनतम राम-कथा हिन्दोनेशिया में नवीं शती के एक शिव-मन्दिर में पाषाण चित्रलिपि के आधार पर रामकथा प्रमाणित होती है । उसी आधार पर जावा में विस्तृत राम-साहित्य की रचना हुई है । जावा के प्राचीन रामायण का रूप वाल्मीकि- रामायण से मिलता है । अर्वाचीन रूप में भिन्नता है । जावा के प्राचीनतम रामायण के रचयिता शैव थे । विस्तृत चित्रलिपियाँ भी शिव-मन्दिर में ही हैं । ३१४ अनु० : हिन्दोनेशिया की प्राचीनतम रामकथा रामायण ककविन है ( १० वीं शती ) । उसका लेखक अज्ञात है । डच अनुवाद से विदित होता कि उसका आधार भट्टिकाव्य है । युद्ध का वर्णन विस्तृत है । अभिषेकनाटक तथा महानाटक का भी अंश इसमें है । इसमें सीता अभिज्ञानस्वरूप चूड़ामणि के अतिरिक्त एक पत्र भी हनुमान् को देती हैं । शबरी राम से अपनी कथा सुनाती हुई कहती है—विष्णु ने वराहावतार में मेरी माला खायी थी और वे मर गये थे, तो मैंने उनकी लाश खायी थी । इसी लिए मेरा मुँह काला हो गया है । वह राम से उसे शुद्ध कर देने का अनुरोध करती है । ककविन में त्रिजटा का स्थान महत्त्वपूर्ण है । शबरी की उक्त कथा, जिसे बुल्के विशे- षता कहते हैं, लेखक की कल्पना अपने संस्कारवशात् ही है । उसका वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है । विष्णु एवं उनके सभी अवतार नित्य हैं । उनके मरने का प्रश्न ही नहीं उठता— “सर्वे देहाः शाश्वताश्च नित्यास्तस्य महात्मनः । हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित् ॥” ( विष्णुपु० ) जावा में एक प्राचीन उत्तरकाण्ड मिलता है । वह गद्य में वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड का अनुवाद है । चरितरामायण में १०१ श्लोकों में रामायण के छहों काण्डों की कथा के साथ व्याकरण के उदाहरण दिये हैं, अतः इसपर भी भट्टिकाव्य का प्रभाव है । हिमांशुभूषण सरकार के अनुसार ११ वीं शती की रचना सुमनसान्तक
ककविन है। इसमें इन्दुमती का जन्म एवं अज से विवाह और दशरथ-जन्म वर्णित है। हरिश्रय ककविन में विष्णु द्वारा सुमाली तथा माल्यवान् का वध वर्णित है। अर्जुनविजय (१४ वीं शती) में सहस्रबाहु अर्जुन द्वारा रावण का पराजय वर्णित है। जावा का आधुनिक सेरतराम भी रामायण ककविन की तरह वाल्मीकिरामायण से मिलता है। वह पद्य में है। कवि का नाम यस० दि० पुरा है। ३१७ अनु० : मध्य जावा में परमबनन (परब्रह्म) नामक स्थान पर ९ वीं शती का एक शिवमन्दिर है। इस मन्दिर के चारों ओर की ऊँची दीवारों पर रामायण की समस्त घटनाओं का पाषाण चित्रलिपि में चित्रण किया गया है। इसमें वर्णित रामकथा वाल्मीकिरामायण-कथा से मिलती-जुलती है। परन्तु हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा की अधिकांश विशेषताओं का इसमें निर्देश नहीं मिलता। सेरीराम के अनुसार भरत सीता-हरण के बाद ही राम से मिलकर उनकी पादुकाएँ अयोध्या ले जाते हैं, किन्तु परमबनन में भरत-मिलाप का स्थान रामायण ककविन के अनुसार सीता-हरण के पूर्व ही माना गया है। वाल्मीकिरामायण से जो किंचित् भिन्नता इसमें है उसका प्रायः भारत में भी उल्लेख पाया जाता है। उदाहरणार्थ जटायु का राम को सीता की अँगूठी देने का वृत्तान्त महानाटक में है। मछलियों के द्वारा सेतु नष्ट करने की कथा सेतुबन्ध तथा बालरामायण में भी पायी जाती है। दशरथ की पुत्री (शान्ता) का उल्लेख रामायण के गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ, भवभूति के उत्तररामचरित आदि में किया गया है। लेकिन लक्ष्मण के तरकश में सुग्रीव के आँसुओं का पानी जमा होना तथा इस तरह सुग्रीव का पता लगाया जाना, यह वृत्तान्त किसी प्राचीन भारतीय रचना में नहीं मिलता। उपर्युक्त अधिकांश विशेषताएँ हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा में आ गयी हैं। ३१८ अनु० : पूर्व जावा के पनतरन नामक स्थान के १४ वीं शती पूर्वार्द्ध के एक मन्दिर में रामकथा पाषाण चित्रलिपि में अङ्कित है। यह कथा प्राचीन रामायण ककविन के कथानक से अभिन्न है। इससे ज्ञात होता है कि यद्यपि अर्वाचीन राम-कथा अधिक लोकप्रिय हुई फिर भी रामायण ककविन का भी कुछ महत्त्व माना जाता रहा है। हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा ३१९ वाँ अनु० : प्राचीन परम्परा को छोड़ कर हिन्देशिया में नवीन राम-कथा का रूप प्रचलित हुआ, जो अधिक लोकप्रिय है एवं जिसके अनुसार सुमात्रा तथा जावा में राम-कथा सम्बन्धी नाटकों का अभिनय होता है। जावा का नाटकसाहित्य प्रायः सेरतकाण्ड तथा राम केलिङ्ग पर आधारित है। बालीका 'वायांग वोंग' नामक नाटकों का पूरा वर्ग (जिसमें अभिनेता चेहरा नहीं पहनते) केवल रामायण के दृश्य ही प्रस्तुत करता है। रामकथा का यह अर्वाचीन रूप हिन्देशिया से हिन्दचीन, श्याम और ब्रह्मदेश तक फैल गया है। (ग्र) मलयन अर्वाचीन रामकथा हिकायत सेरीराम के तीन साहित्यिक पाठों के अनुसार उक्त नाटक होते हैं। इसके राफल्स मलय हस्तलिपि पाठ के अनुसार कई वस्तु अन्य पाठों में नहीं मिलती। इसके अनुसार राम के आज्ञानुसार लक्ष्मण शूर्पणखा से विवाह करते हैं और कथा सेरीराम पर निर्भर है। हिकायत महाराज रावण (ज० रा० ए० सो०, मलयन ब्रैञ्च, भाग ११) कथानक सेरीराम के अनुसार होते हुए भी इसमें एक विशेषता यह है कि रावण की पुत्री सोती हुई सीता के वक्षःस्थल पर रावण का एक चित्र रख देती है जिससे राम सीता को त्याग देते हैं।
३३६ रामायणमीमांसा द्वादश श्रीराम (डब्ल्यू० ई० मैक्सवेल द्वारा संपादित) में हनुमान् के जन्म से लेकर लङ्का में रामविजय तक की कथा सेरीराम के आधार पर दी गयी है। (ग्रा) जावा की अर्वाचीन राम-कथा हिकायत सेरीराम राम केलिङ्ग में भी मलयन सेरीराम से कोई महत्वपूर्ण विभिन्नता नहीं मिलती। सेरीराम की प्राचीन- तम लिपि १६३३ ई० की मिलती है। हिकायत सेरीराम ३२० वां अनु० : इसमें रावण-चरित से लेकर सीता-त्याग के बाद राम-सीता-मिलन तक की कथा वर्णित है। उसकी विशेषताएँ निम्नोक्त हैं। (१) रावण चरित—दुराचार के कारण रावण अपने पिता के द्वारा निर्वासित किया जाता है। सिंहलद्वीप पहुँच कर रावण तप करता है और अल्लाह से चार लोकों का अधिकार प्राप्त करता है। प्रत्येक लोक की किसी राजकुमारी से विवाह करता है। अनेकों पुत्र उत्पन्न करता है जो बाद में राजा बन जाते हैं। इन्द्रजित् देवलोक का राजा, महरायन (महिरावण) पाताल का राजा एवं गङ्गामहासूरी नागलोक का राजा। इसके बाद रावण पृथ्वी पर लौट कर लङ्कापुरी बसाता है। अपने भाइयों कुम्भकर्ण, विभीषण, शूर्पणखा के पति वर्गासींगा को क्रमशः सेनापति, ज्योतिषी तथा प्रधान गुप्तचर बनाता है। (२) राम का जन्म—दशरथ का मन्दूदारी तथा बलियादारी के साथ विवाहवर्णन के बाद उनके पुत्रेष्टियज्ञ का उल्लेख है जिसमें एक काक बलियादारी का पायस चुरा कर उसे लङ्का ले जाता है। अनन्तर अन्य मुनि के पुत्र का वध, राम, लक्ष्मण, वर्दन और चित्रदन चार पुत्रों तथा कीकवी नामक पुत्री का जन्म वर्णित है। (३) सीता का जन्म और विवाह—मन्दूदारी के सौन्दर्य का वर्णन सुनकर रावण उसे दशरथ से मांगता है तथा एक माया मन्दूदारी को लङ्का ले जाता है जिसके गर्भ से सीता उत्पन्न होती है। अशुभ जन्मपत्र के कारण सीता समुद्र में फेंक दी जाती हैं तथा महारेसि (महर्षि) कली द्वारा पाली जाती है। यहाँ सीता के स्वयंवर में रावण और अन्य राजाओं के असफल प्रयत्नों के पश्चात् राम परीक्षा में सफल होकर सीता से विवाह करते हैं। विश्वामित्र का आगमन और परशुराम-तेजोभङ्ग के वृत्तान्त भी दिये गये हैं। (४) राम का वनवास—बलियादारी के अनुरोध से दशरथ उसके पुत्र वर्दन को राज्य देने का निश्चय करते हैं। राजा के सोते समय बलियादारी राम को बुलाकर राजा के निर्णय का समाचार सुनाती है। सुनकर राम प्रसन्न होकर ऋषि बनने के लिए सीता और लक्ष्मण के साथ वन को प्रस्थान करते हैं। वन में पहुँच कर और कुटी बनाकर राम कुश-घास से सात लड़कियों तथा पाँच लड़कों की सृष्टि करते हैं। ये नौकर बन कर घर का काम करते हैं जिससे राम, लक्ष्मण और सीता निश्चिन्त होकर साधना कर सकते हैं। रावण द्वारा शूर्पणखा के पति बर्गासींगा के वध के बाद उसका पुत्र दर्सासींगा अलौकिक खङ्ग सिद्ध करने के लिए तपस्या करने जाता है। अनन्तर वालि-सुग्रीव-युद्ध और अङ्गद (मन्दोदरी के पुत्र) का जन्म वर्णित है। इसके बाद अञ्जनी और वालि-सुग्रीव की उत्पत्ति (तीनों गौतम की पत्नी की संतान हैं) तथा हनुमान् के जन्म का वर्णन किया है। इसके अनुसार हनुमान् राम के वीर्य से उत्पन्न हुए हैं। (५) सीता का हरण और खोज—किसी दिन लक्ष्मण तप करते हुए शूर्पणखा के पुत्र दर्सासींगा का संयोग से वध कर देते हैं। बाद में शूर्पणखा अपने पुत्र से मिलने आती है, लक्ष्मण द्वारा विरूपित होकर अपने
अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३३७ भाई रावण के पास जाती है। शेष कथा वाल्मीकिरामायण के अनुसार है। वाली के मित्र सम्बूरान की कथा हिन्द- चीन तथा श्याम में भी मिलती हैं। (६) युद्ध—यह प्रायः वाल्मीकिरामायण की कथा के अनुसार है। भस्मलोचन तथा महिरावण की कथा यहाँ भी है। इन्द्रजित् की पत्नी के सती होने का तथा रावण के मर्म स्थान (दाहने कान के पीछे उसका एक छोटा ११वां सिर) का भी उल्लेख है। युद्ध के बाद आहत रावण का शरीर सेरन्दीब पर्वत के तल में पड़ा रहता है और सारी सेना उसको देखने जाती है। विभीषण (जो राम के मन्त्री बन जाते हैं) राम की बहन कीकवी देवी से विवाह करते हैं। एक और विशेषता यह है कि कुम्भकर्ण-वध के बाद तथा इन्द्रजित्-वध के बाद भी युद्ध चालीस चालीस दिनों के लिए स्थगित किया जाता है। (७) सीता-त्याग और राम-सीता सम्मिलन—इस अन्तिम भाग में रावण के चित्र के कारण सीता-त्याग का वर्णन है। अनन्तर लव के जन्म तथा महर्षि कलि द्वारा कुश की सृष्टि की कथा दी गयी है। कुश-लव के लक्ष्मण से युद्ध के बाद राम-सीता सम्मिलन वर्णित है। अन्त में कुश और लव तथा वानर-सेना के अनेक सेनापतियों का राक्षसियों से विवाह करने का उल्लेख किया गया है। बुल्के कहते हैं: हिन्देशिया की प्राचीन रामकथा के आधार भट्टिकाव्य, महानाटक तथा अभिषेकनाटक स्पष्ट हैं, किन्तु सेरीराम का मूल स्रोत निर्धारित करना असम्भव प्रतीत होता है। फिर भी इतना स्पष्ट है कि वाल्मीकि- रामायण से भिन्न जो बहुसंख्यक प्रसङ्ग मिलते हैं उनका आधार भारतीय ही है। प्रमाणस्वरूप में उन्होंने रामकथा (अपनी पुस्तक) के अनेक अनुच्छेदों का उल्लेख किया है जिनमें जैनी, बंगाली, उड़िया, रङ्गनाथरामायण, कम्बरामायण, आनन्दरामायण, कथासरित्सागर, मैरावणचरित, तोरवेरामायण,मुसलमानी धर्म की चर्चा की है। वस्तुतः जैसे भारतीय भी अनेक राम-कथाग्रन्थों के कई अंश मौलिक या स्वतन्त्र कल्पना हैं वैसे ही मौलिकता के नाम पर स्वतन्त्र कल्पना यहाँ भी हो ही सकती है। पातानी रामकथा पातानी रामकथा में सेरीराम के अनेक पात्रों का महासिकु नामक तपस्वी में एकीकरण हुआ है। प्रारम्भ में उनकी पत्नी की चार सन्तानों का वर्णन है। एक पुत्री, वाली, सुग्रीव और बिलों। दूसरे भाग में महासिकु की दत्तक पुत्री मंदुदकी की कथा मिलती है। सीता के त्यक्त किये जाने पर महासिकु उसे पुत्रीस्वरूप ग्रहण करते हैं। उनका एक और सेरावी नामक (राम) दत्तक पुत्र है जिसको महासिकु सीता पर अनुरक्त होने के कारण घर से निकाल देते हैं। अनन्तर सीता स्वयंवर का वर्णन दिया गया है जिसमें रावण भी आया था। शेष कथानक सेरीराम के अनुसार है। लेकिन इसमें केवल रावण-वध तक की कथा मिलती है। वस्तुतः- विप्रकृष्ट देश-काल की घटनाओं में प्रत्यक्षादि प्रमाणों पर आधारित इतिहास या आर्षज्ञान (ऋतम्भरा प्रज्ञा) को छोड़कर और कोई भी प्रमाण नहीं होता है, कल्पना तो कल्पना ही है। उसके आधार पर तथ्य-निर्णय असम्भव ही है। वाल्मीकिरामायण तथा अन्यान्य रामायण, महाभारत, पुराण तथा आर्ष संहिताएं ही रामचरित में प्रमाण हैं। इन्हीं के आधार पर दूर-दूर देशों में रामकथा फैली थी। उनमें उत्तरोत्तर कल्पनाएं और किवदन्तियां जुड़ती गयीं। मूल की विकृति में अधिक विकारों की सम्भावना रहती है, इसलिए राम के वास्तविक आदर्शों का दर्शन इनमें दुर्लभ होता है। जावा का सेरतकाण्ड ३२२ अनु० : सेरतकाण्ड की रामकथा सेरीराम से बहुत भिन्न नहीं है। इसकी विशेषता निम्नोक्त है। इसमें विस्तृत भूमिका के साथ नबी अदम की कथा के बाद जावा के प्राचीन राजाओं की वंशावली तथा उसी में ४३
३३८ रामायणमीमांसा द्वादश. देवताओं की अनेक पौराणिक कथाएँ वर्णित हैं । रावण का वैश्रवणविजय तथा वैश्रवण-पुत्र के विल्मनरंज (विमान) का रावण का वाहन बन जाना वर्णित है । अनन्तर रावण विष्णु के अवतारों से युद्ध करता है । सेरतकाण्ड के अनुसार वासुकि तथा श्री अवतार लेने के उद्देश्य से पृथिवी की ओर प्रस्थान करते हैं । मार्ग में रावण उनसे युद्ध करता है । विष्णु तथा वासुकि भाग कर दशरथ के पुत्रों के रूप में प्रकट होते हैं । रावण के डर से श्री अपने को एक भेड़ के रूप में बदल देती है । रावण उसे खा जाता है । फलस्वरूप श्री मन्दोदरी के गर्भ से सीता के रूप में जन्म लेती है । अन्य कथा सेरीराम के समान है । सीता के पुत्र का नाम बुतुलव होता है । वह लक्ष्मण से युद्ध करता है । अनन्तर सीता और रोम के सम्मिलन के पश्चात् लव को राज्यभार सौंप कर राम सीता और लक्ष्मण के साथ तपस्या करके अग्नि में प्रवेश करते हैं । इस कथा में भी मूल वाल्मीकिरामायण की छायामात्र होने पर भी विकार अधिक हैं । हिन्दचीन, श्याम, ब्रह्मदेश ३२३ अनु० : बुल्के कहते हैं, “इतिहासज्ञों का अनुमान है कि पहली शती से लेकर भारतीय व्यापारी अपने यहाँ की संस्कृति का प्रचार हिन्दचीन में करने लगे थे । फलस्वरूप चम्पाराज्य की स्थापना हुई थी, जिसका सातवीं शताब्दी के शिलालेखों से पता चलता है कि वाल्मीकिरामायण का वहाँ पर्याप्त प्रचार हुआ होगा । राजा प्रकाशधर्म (६५३-६७८) के समय में एक वाल्मीकि-मन्दिर में वाल्मीकि की मूर्ति मिली है। इस मन्दिर के एक शिलालेख में श्लोकोत्पत्ति तथा वाल्मीकि के विष्णु-अवतार होने का उल्लेख किया गया है । “यस्य शोकात् समुत्पन्नं श्लोकं ब्रह्माभिपूजितम् । विष्णोः पुंसः पुराणस्य मानुषस्यात्मरूपिणः ॥” श्लोकार्थ यह है—जिसके शोक से ब्रह्मा से पूजित श्लोक उत्पन्न हुआ था, उस पुराण पुरुष मानुषरूपी विष्णु की यह मूर्ति है । उस समय का कोई साहित्य सुरक्षित नहीं है । अनाम में अठारहवीं शताब्दी की एक संक्षिप्त रामकथा का प्रचार था, जिसका कथानक वाल्मीकिरामायण से बहुत भिन्न नहीं है । अन्तर यह है कि दशानन का राज्य अनाम के दक्षिण भाग में तथा दशरथ का राज्य अनाम के उत्तरीय भाग में माना जाता है और रावण सेनासहित दशरथ के राज्य पर आक्रमण कर सीता को हर लेता है । छठीं शताब्दी ई० में एक सामन्त ने चम्पा के राजा के विरुद्ध विद्रोह कर कम्बोडिया (खूमेर) में एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था । वहाँ सैकड़ों मन्दिरों के खण्डहर मिलते हैं, जिनका काल नवी और तेरहवीं शताब्दी के बीच माना जाता है। प्राचीन राजधानी अंगकोरवाट के एक विशाल मन्दिर में रामायण, महाभारत तथा हरिवंश की कथाओं को लेकर बहुत से पाषाण-चित्र अङ्कित किये गये हैं जिन पर जावा की कला का प्रभाव स्पष्ट है । इस मन्दिर का समय ११वीं या १२वीं शती ई० है ।” वस्तुतः आधुनिक पाश्चात्य ईसाई इतिहासज्ञों को एक भयंकर रोग यह है कि वे ईसवी सन् से पहले की ओर बढ़ना ही नहीं चाहते, वे संसार के सर्वप्राचीन साहित्य वेद, रामायण तथा महाभारत को भी ईसा के आस- पास ही का सिद्ध करने के फेर में लगे रहते हैं । वे संसार की सभी सभ्यताओं एवं उनके इतिहासों को भी इसी दायरे में लाने का प्रयास करते हैं । अतः उनकी इतिहासकल्पना प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । अन्य देश के लोग भी उनकी इस कल्पना से प्रभावित हुए हैं। इस कथन में इतना ही तथ्य है कि हिन्दचीन में बहुत प्राचीन काल से वाल्मीकिरामायण का प्रचार था और वहाँ भी वाल्मीकि के शोक से आविर्भूत “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः” यह श्लोक माना जाता था । कम्बोडिया के मन्दिर खण्डगृहों और अंगकोरवाट के मन्दिर के
पाषाण-चित्रों, रामायण, महाभारत और हरिवंश की कथाओं से विदित होता है कि वहाँ अति प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति फैली थी और रामकथा का व्यापक प्रचार था। ३२४ अनु० : ख्मेर-साहित्य की सब से कलात्मक रचना रामकेर्ति है जिसका रचयिता तथा रचना-काल अज्ञात है। (रामकेर्ति का उच्चारण—रे आमकेर अथवा रियामके होता है।) इसकी प्राचीनतम हस्तलिपियाँ १७ वीं शताब्दी की हैं, किन्तु वे अपूर्ण हैं। विश्वामित्र के यज्ञ के वर्णन से प्रारम्भ होकर इन्द्रजित्-वध पर उसकी कथा रुक जाती है (सर्ग १-१०)। किन्तु रामकियेन (श्याम के रामायण) से तुलना करने पर अनुमान किया जा सकता है कि सर्ग ८० रामकेर्ति का अन्तिम सर्ग नहीं है। रामकेर्ति के फ्रेंच अनुवाद से इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ निर्धारित की जा सकती हैं। (१) लेखक कोई धार्मिक बौद्ध है जो नारायण का अवतार मानते हुए भी उनको बोधित्त्व की भी उपाधि देता है तथा कई स्थलों पर बौद्ध शब्दावली का प्रयोग करता है। (२) यद्यपि रामकेर्ति पर सेरीराम की गहरी छाप है, फिर भी लेखक ने वाल्मीकिरामायण तथा सेरीराम की कथाओं का समन्वय करने का प्रयत्न किया है। फलस्वरूप सेरीराम की अपेक्षा रामकेर्ति वाल्मीकीय रामायण के अधिक निकट है। सेरीराम में दशरथ की केवल दो रानियों का उल्लेख है, रामकेर्ति में तीनों के नाम वाल्मीकि के अनुसार ही दिये गये हैं। रामकेर्ति में रावण की सीता-स्वयंवर में उपस्थिति की ओर संकेत नहीं मिलता, सेरीराम के अनुसार रावण भी इसमें आया था। सेरीराम में राम स्वेच्छा से वन के लिए प्रस्थान करते हैं जब कि रामकेर्ति में कैकसी (कैकेयी) के अनुरोध से राम को निर्वासित किया जाता है। सेरीराम में लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के पुत्र के वध का वृत्तान्त मिलता है, जिसका उल्लेख रामकेर्ति में नहीं है। ख्मेररचना में सीता जनक की दत्तक पुत्री मानी जाती हैं तथा राम द्वारा परित्यक्त होने पर वाल्मीकि के आश्रम में निवास करती हैं। सेरीराम में सीता महारेसि कली की दत्तक पुत्री हैं तथा त्याग के बाद उनके यहाँ रहती हैं। सेरीराम में हनुमान् राम के पुत्र माने जाते हैं, किन्तु रामकेर्ति के अनुसार वह वायु और अञ्जना की सन्तान हैं। (३) मलयन सेरीराम में भी निम्नलिखित सामग्री मिलती है जिससे स्पष्ट है कि ख्मेररामायण तथा सेरीराम का गहरा सम्बन्ध है। —एक असुर, काकरूप धारण कर विश्वामित्र यज्ञभङ्ग करने का प्रयत्न करता है और विश्वामित्र उसे मारने के लिए राम तथा लक्ष्मण को धनुष-बाण देते हैं। —जटायु-रावण-युद्ध में सीता की अंगूठी का उल्लेख। —लक्ष्मण द्वारा १४ वर्ष तक नींद तथा भोजन का त्याग। —लक्ष्मण और हनुमान् का युद्ध। —सुग्रीव को अपनी सामर्थ्य का विश्वास दिलाने के लिए राम सात तालों का एक ही बाण से भेदन करते हैं। ये सात ताल महाराज नाग की पीठ पर स्थित हैं। —सम्बूरान का वृत्तान्त जिसे हनुमान् राम के पास ले आते हैं। —सेतु बाँधने के समय मछलियों का उत्पात। —रावण के चित्र के कारण सीता-त्याग। वाल्मीकि द्वारा सीता के एक पुत्र की सृष्टि। राम-सेना से सीता के पुत्रों का युद्ध। (४) कथा निर्वहण मौलिक है।
३४० रामायणमीमांसा द्वादश 'अप्रतिषिद्धमनुमतं भवति' न्याय के अनुसार प्रमाणभूत मूल ग्रन्थ से जो विरुद्ध नहीं है वह अनुमत समझा जाता है, अतः रामकेर्ति तथा अन्यान्य रामायणों की अविरुद्ध विशेषताएँ मान्य ही समझी जाती हैं। यह कहा ही जा चुका है कि महाभारत, पुराण और संहिताएँ भी आर्ष हैं। ऋषियों को विप्रकृष्ट देशकाल की वस्तुओं का भी ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा ज्ञान हो सकता है, अतः वे वाल्मीकिरामायण के पूरक समझे जाते हैं। श्याम ३२५ अनु० : श्यामदेश में राम-कथा रामकियेन (अर्थात् रामकीर्ति) के नाम से प्रसिद्ध है। अपेक्षाकृत प्राचीनकाल से वहाँ के नाटकों में राम-कथा का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। प्रारम्भिक नाटकों के दो वर्ग (कोन और रखम) का एकमात्र विषय राम-कथा ही था और एक तीसरा वर्ग (नंग अर्थात् छाया-नाटक) प्रधानतया राम-कथा के दृश्य प्रस्तुत करता था। १८वीं शताब्दी में नाटकों के एक नवीन रूप का प्रचलन हुआ (वेणुक रोंग) जिसकी कथावस्तु रामकियेन पर आधारित थी। १८वीं तथा १९वीं शताब्दी की हैं। इस रामायण के दो भिन्न संस्करण १८ वीं शताब्दी उत्तरार्द्ध में निकाले गये थे तथा इसका एक तीसरा संस्करण नाटक के रूप में १९वीं शती पूर्वार्द्ध में प्रकाशित हुआ था। बांकाक के बिरला ओरियण्टल सीरीज में रामकियेन का अंग्रेजी संक्षेप रामकीर्ति के नाम से प्रकाशित किया गया है। अगले अनुच्छेद में जो रामकियेन के कथानक का विश्लेषण किया गया है, वह उस रामकीर्ति के दूसरे संस्करण (सन् १९४१) पर निर्भर है। १७वीं शताब्दी की अनेक छोटी रचनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनकी कथावस्तु रामायण की किसी घटना से सम्बन्ध रखती है, उदाहरणार्थ वाली का सुग्रीव को उपदेश देना कि किस प्रकार राम के दरबार में व्यवहार करना चाहिए तथा दशरथ का राम को राजनीति तथा धर्म के विषय में शिक्षा देना। १८वीं तथा १९वीं शती में कई कवियों ने रामकियेन नामक महाकाव्यों की रचना की है। उदाहरणार्थ थोनबुरी, फुत्तायोत्फा (इनका रामकियेन सर्वाधिक विस्तृत है) तथा फुत्तालेउतला। ३२६ अनु० : रामकियेन का संक्षिप्त अंग्रेजी रूपान्तर ४५ अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम अध्याय में अयोध्या के राजवंश का परिचय मिलता है तथा द्वितीय अध्याय में राम तथा उनके भाइयों के जन्म का वर्णन दिया गया है। अनन्तर लङ्का का निर्माण, रावण के कृत्य तथा राम-कथा के अनेक पात्रों अर्थात् वाली, सुग्रीव, हनुमान्, अङ्गद और सीता की जन्मकथा मिलती है (अध्याय ३-११)। इसके बाद विश्वामित्र के यज्ञ से लेकर सीता-त्याग के पश्चात् राम-सीता सम्मिलन की समस्त कथा प्रस्तुत की गयी है (अध्याय १२-४५) रामकियेन के कथानक की निम्नलिखित विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं— (१) रामकियेन के पात्र सबके सब श्याम देश के निवासी हैं तथा रामायण का घटनास्थल श्याम में ही माना गया है। (२) इसका मुख्य आधार खमेर भाषा का रामकेर्ति है। दोनों में कथा का निर्वहण सदृश है। रामकेर्ति की भाँति रामकियेन भी सेरीराम की अपेक्षा वाल्मीकीय कथा के अधिक निकट है। रामकेर्ति तथा वाल्मीकिरामायण की तुलना करते हुए रामकेर्ति की जितनी विशेषताओं का उल्लेख हुआ है, वे प्रायः सब रामकियेन में भी विद्यमान हैं। अन्तर यह है कि रामकियेन में हनुमान् को अञ्जना तथा शिव का पुत्र माना गया है तथा लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के पुत्र का वध वर्णित है। रामकियेन का एक अन्य प्रसङ्ग राम-सीता का पूर्वानुराग, न वाल्मीकिरामायण में मिलता है और न रामकेर्ति में, किन्तु कुछ बातों में रामकियेन रामकेर्ति की अपेक्षा वाल्मीकीय कथा के अधिक निकट है। अयोमुखी का वृत्तान्त रामकेर्ति में नहीं है, किन्तु वह रामकियेन में विद्यमान है। रामकियेन के अनुसार सीता-स्वयंवर
अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४१ का धनुष ईश्वर ( शिव ) का है जब कि रामकेर्ति में जनक स्वयं इन्द्रजाल से बनाते हैं। रामकियेन में वाल्मीकीय कथा के अनुसार अगस्त्य राम को दिव्य अस्त्र प्रदान करते हैं, किन्तु इसका उल्लेख रामकेर्ति में नहीं हुआ है। उपर्युक्त विश्लेषण का निष्कर्ष यह है कि रामकेर्ति के अतिरिक्त रामकियेन पर वाल्मीकिरामायण का भी सीधा प्रभाव पड़ा है। ( ३ ) रामकेर्ति की भांति रामकियेन भी बहुत से अर्वाचीन वृत्तान्तों के लिए मलयन सेरीराम पर निर्भर है। वाल्मीकि से भिन्न जो सामग्री सामान्यरूप से रामकेर्ति तथा सेरीराम में मिलती है वह प्रायः सब रामकियेन में भी पायी जाती है। अन्तर यह है कि रामकियेन में सुग्रीव से मैत्री करने के पूर्व राम की किसी परीक्षा का उल्लेख नहीं है और लक्ष्मण के संयम का भी निर्देश नहीं मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रामकियेन पर सेरीराम का सीधा प्रभाव भी पड़ा है, क्योंकि निम्नलिखित सामग्री रामकेर्ति में नहीं हैं किन्तु वह रामकियेन तथा सेरीराम दोनों में विद्यमान हैं। महिरावण का राम को पाताल ले जाना। भस्मलोचन की कथा। वाली, सुग्रीव तथा अञ्जना का अहल्या की सन्तान के रूप में उल्लेख। अङ्गद की जन्मकथा जिसके अनुसार वह वाली तथा मन्दोदरी का पुत्र हैं। सीता का लङ्का में जन्म। हनुमान् तथा नल का कलह। रामकेर्ति, वाल्मीकिरामायण तथा सेरीराम के अतिरिक्त रामकियेन का और कोई आधार ग्रन्थ रहा होगा कि नहीं इस प्रश्न का निश्चयात्मक उत्तर तभी संभव होगा जब रामकेर्ति की कोई पूरी हस्तलिपि मिल जायगी। रामकियेन में विभीषण मन्दोदरी के विवाह का उल्लेख मिलता है। यह प्रसङ्ग सेरीराम अथवा रामकेर्ति में नहीं आया है, किन्तु वह अनेक भारतीय राम-कथाओं में उल्लिखित है। निम्नलिखित सामग्री श्याम देश को छोड़ कर अबतक और कहीं नहीं मिली है। सेतुबन्ध के पूर्व रावण का तपस्वी के रूप में राम के पास पहुँचना और युद्ध छोड़ देने के लिए उनसे अनुरोध करना। रावण के इस निष्फल प्रयत्न के अनन्तर बेंजकाया ( विभीषण की पुत्री ) का सीता का रूप धारण कर मृतवत् राम के शिविर के पास की नदी के ऊपर बह जाना। रावण का ब्रह्मा को बुला भेजना; लङ्का में ब्रह्मा का आगमन, रावण द्वारा राम पर अभियोग। ब्रह्मा का राम को बुलाना और बाद में सीता को भी। अन्त में ब्रह्मा का सीता को लौटाने की आज्ञा देना तथा रावण के अस्वीकार करने पर ब्रह्मा का रावण को शाप देना। रावण-वध तथा राम के अयोध्या में प्रत्यागमन के बाद रावण के एक पुत्र का विभीषण के विरुद्ध विद्रोह करना। भरत तथा शत्रुघ्न का रामसेना के साथ लङ्का की ओर प्रस्थान करना और रावण के 'पुत्र को पराजित कर विभीषण को पुनः राज्य दिलाना। इस युद्ध का विस्तृत वर्णन प्रथम युद्ध की पुनरावृत्तिमात्र है। यह प्रसङ्ग रामकेर्ति में तो नहीं मिलता, किन्तु सर्ग ७६ में इसकी ओर संकेत किया गया है। इसका आधार भारतीय है। समस्त युद्ध की इस पुनरावृत्ति के अतिरिक्त और बहुत से वृत्तान्त दुहराये गये हैं। इन्द्रजित् के यज्ञ-भङ्ग के अतिरिक्त रामकियेन में ऐसा वर्णन कुम्भकर्ण ( अध्याय २८ ), रावण ( अध्याय ३१ ) तथा मन्दोदरी ( अध्याय- ३४ ) के विषय में भी मिलता है।
३४२ रामायणमीमांसा द्वादश (५) रामकियेन की एक अन्तिम विशेषता यह भी है कि उसमें हनुमान् की बहुत सी प्रेमलीलाओं का वर्णन किया गया है। स्वयंप्रभा (अध्याय २३), बेंनजकाया (अध्याय २५), नागकन्या सुवर्णमच्छा (अध्याय २६), अप्सरा वानरी (अ० ३१) के अतिरिक्त मन्दोदरी के साथ भी वह क्रीड़ा करते हैं । मन्दोदरी के संजीवनयज्ञ को भङ्ग करने के लिए वह दशकण्ठ के रूप में मन्दोदरी के पास पहुँच कर उसका आलिङ्गन करते हैं (अध्याय ३४) । एक अन्य अवसर पर वह रावण के पास पहुँच कर राम की भर्त्सना करते हैं तथा रावण की ओर से युद्ध करने का प्रस्ताव करते हैं । वास्तव में वह एक दिन तक ऐसा करते हैं और पुरस्कारस्वरूप इन्द्रजित् की समस्त सम्पत्ति के अतिरिक्त मन्दोदरी को भी रावण से प्राप्त कर रातभर उसके साथ क्रीड़ा करते हैं (अध्याय ३५)। रामकियेन का अनुवाद हिन्दी में रामकीर्ति नाम से प्रकाशित है। यह स्वामी सत्यानन्द पुरी के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर सस्ता-साहित्यमण्डल नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित है। स्वामी सत्यानन्द पुरी के अनुसार जिन काव्य-रचनाओं ने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है उनमें रामायण महाकाव्य का स्थान सर्वोपरि है। धर्म और कथा के क्षेत्र में भी अपनी अमर लेखनी से एक विशिष्ट सम्प्रदाय का निर्माण किसी ने किया तो वह मानवता के आदि कवि संस्कृतकाव्य के जनक वाल्मीकि ही हैं। दूर-दूर देश के कवियों ने उनकी अनुकृति के असीम भण्डार से रत्न चुन-चुन कर अपने साहित्य को समृद्ध किया है। कलाकारों ने उनसे चिरस्थायी कला की प्रेरणा लेकर अपनी कलाकृति को अमर बनाया है। खेतों में काम करनेवाले किसान अथवा नाव चलानेवाले नाविक लोग भी उनसे अप्रभावित न रह सके—उनके गीतों को गुनगुनाते हुए अपनी थकावट भूल जाते हैं। उनकी लेखनी ने जिस सम्पूर्णता से प्रभाव डाला है वैसा और किसी ने नहीं डाला। स्वामी सत्यानन्दपुरी के अनुसार थाई देश के छठे राम राजा को ही यह श्रेय है कि उन्होंने रामकीर्ति के मूलरूप रामायण का पता लगाकर उसके रचयिता वाल्मीकि के बारे में जानकारी दी है। कोई लोकप्रिय गीत जब लोगों को अपने माधुर्य से मोह लेता है जब लोग उसके सम्मोहन में फँस जाते हैं तो धीरे-धीरे इस बात को भूल जाते हैं कि इसका रचयिता कौन है। वाल्मीकि के सम्बन्ध में भी ऐसा ही हुआ । थाई देश में रामायण का प्रभाव १३ वीं शती से ही है। फिर भी इस रामकीर्ति के सुन्दर काव्य का १७८१ ई० के प्रारम्भ में निर्माण हुआ। राम की महिमा का जैसा बखान थाई देश में पाया जाता है, उसपर रामायण का सीधा प्रभाव नहीं पड़ा' । रामकीर्ति में ऐसी कहानियों का समावेश है जो उत्तर भारत से लेकर मलाया तक अनेक देशों में लोकप्रिय हैं, अतः रामकथा अनेक देशों से होती हुई थाई देश में पहुँचती है। रामकीर्ति के अनुसार देवताओं में सबसे बड़े ईश्वर (शिव) हैं। राम उनके अनुग्राह्य हैं। इसमें राम, हनुमान् आदि कुछ नाम रामायण से बिलकुल मिलते हैं, परन्तु कुछ नये नाम हैं। उनमें मन्थरा का नाम कुच्ची लिखा गया है जो कुब्जा का बिगड़ा हुआ रूप है। शत्रुघ्न को शत्रुत, कुवेर को कुवेरन, लक्ष्मण को लक्षण तथा भरत को वरत कहा गया है। इसमें हिरण्याक्ष को हिरन्तयक्ष कहा गया है। ईश्वर से अपराजित होने का वरदान पाने के कारण वह अत्यन्त उद्धत होकर भूमि को जम्बूद्वीप, उत्तरकुरु अमर गोपाल की भूमि से काटकर चटायी की तरह बगल में दबा कर पाताल चला जाता है। उसकी उद्दण्डता से देवताओं का भी हृदय कम्पित हो जाता है। वे सब कैलास पर्वत पर ईश्वर की शरण लेते हैं। ईश्वर द्रवित होकर नारायण को बुलाकर कहते हैं तुरन्त जाकर संसार को हिरन्त के अत्याचार से मुक्त करो । फलतः नारायण ने सूकररूप से हिरन्त का वध किया। नारायण अपने स्थान क्षीरसमुद्र में वेद-ध्वनि में लवलीन हो गये। समुद्र के तल से एक कमल निकला जिसकी सुन्दर सुगन्धित पत्तियों से एक बच्चा निकला। उसे गोद में लेकर नारायण कैलास में ईश्वर के पास गये। ईश्वर की आज्ञा हुई इस बालक को संसार का सबसे पहला सम्राट् नियुक्त किया जाय। उसने संसार की रक्षा करने के लिए नारायण-वंश की नींव डाली। उसकी राजधानी द्वारावती या अयुध्या हुई । बालक का नाम अनोमान था। उसको नारायण का अवतार मानते थे। उसके अजपाल
नाम का पुत्र हुआ। उसके शासन से सब संतुष्ट थे। इसी समय असुर ब्रह्मनामक राक्षस हुआ जिसको ईश्वर ने वरदानरूप गदा दी। उसके प्रभाव से वह अत्याचारी हो गया। अजपाल ने मालीवग नामक अन्य देव की सहायता से उसको मारा उसके बाद दशरथ ने उस वंश-परम्परा को जारी रखा। अजपाल के बाद दशरथ गद्दी पर बैठा। उसकी कोसुरिया, समुद्रा और कौयकेशी तीन रानियाँ थीं। वह पुत्र न होने के कारण दुःखी था। वसिष्ठ, स्वमित्र, वज्जवग्ग और भारद्वाज के परामर्श से सिंगमुनि के पुत्र कलैकटी जो हरिणी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था, उसका शरीर मनुष्य जैसा था पर मुँह हरिण का सा था। उसका घोर तप था। उसके तेज से रोमवचन नामक देश में अकाल पड़ गया। उस देश के राजा ने अपनी कन्या को भेजा कि वह ऋषिपुत्र के तप को भङ्गकर ऋषि को गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराये। उसके लावण्य से मोहित होकर ऋषि ने तप छोड़ दिया। जिससे विपुल वृष्टि हुई। ऋषि-पुत्र जामाता के रूप में राजमहलों में रहने लगा। राजा दशरथ के निमन्त्रण से ऋषिपुत्र अयोध्या आया और पुत्रेष्टियज्ञ की तैयारी में लग गया। पूर्वोक्त चार ऋषियों को लेकर वह कैलास पर गया। उसी समय देवों के प्रताप से राक्षसों को विशेष वरदान मिले थे। उससे वे बड़े अन्याय करते थे। ऋषि कलैकटी ने ईश्वर से प्रार्थना की, आप नारायण को मृत्युलोक में भेजिये। वे दशरथ के पुत्र के रूप में अवतार लें और पृथ्वी को विपत्ति से मुक्त करायें। ईश्वर की प्रेरणा से नारायण राजी हो गये, परन्तु उनकी शर्त थी कि लक्ष्मी, अनन्त नाग, गदा, चक्र और शङ्ख भी अवतार लें। ईश्वर ने सब शर्त मान लीं। ईश्वर ने ऋषियों से कहा आप चल कर यज्ञ आरम्भ करें। यज्ञाग्नि से एक देवता का प्रादुर्भाव होगा। उनके सिर पर एक पात्र होगा। उसमें चार रोटियाँ होंगी। उसी समय एक कौवा उस पात्र पर झपट्टा मारेगा और आधी रोटी लेकर दक्षिण में भाग जायगा। शेष रोटियों को दशरथ की रानियों में बांट दिया जाय। रानियों को चार पुत्र होंगे। ईश्वर की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया गया। नारायण ने कोसुरिया के पुत्र के रूप में अवतार लिया। वह हरे वर्ण के थे। चक्र कौयकेशी के पेट से भरतरूप में उत्पन्न हुए। वह रक्त वर्ण के थे। नाग और शङ्ख दोनों ने संयुक्त रूप से जन्म लिया। समुद्रा के पेट से लक्ष्मण हुए वे पीत वर्ण के थे। गदा ने समुद्रा से जन्म लिया उनका नाम शत्रुद था। वे बेगनी वर्ण के थे। भविष्यवाणी के अनुसार कौआ भी प्रकट हुआ। उसके द्वारा अपहृत रोटी से सीता के रूप में लक्ष्मी की उत्पत्ति लङ्का में हुई। कौए को दशकण्ठ ने भेजा था। उस आधी रोटी को मण्डो ने खाया। उससे सीता का जन्म हुआ। पहले लङ्का का नाम रङ्गका था। नीलकाल पर्वत पर कौए का बहुत बड़ा घोंसला था। इसी लिए इसका नाम रङ्गका था। श्यामी भाषा में का का अर्थ कौआ और रङ्ग का अर्थ घोंसला है। ब्रह्मा ने इसको अपने एक भक्त सहमलिबन के लिए बसाया था। वही लङ्का का पहला राजा था, परन्तु नारायण के डर से वह राजधानी छोड़ कर पाताल चला गया। ब्रह्मा की आज्ञा से विश्वकर्मा ने नीलकाय पर्वत पर एक नया घोंसला बनाया और ब्रह्मा ने उसे अपने भक्त चतुर्वक्र को दे दिया। उसकी रानी मालिका थी। उसका पुत्र लस्तियन गद्दी पर बैठा। यह शक्तिशाली राक्षस था। उसकी पाँच रानियाँ थीं। सुनन्दा कुबेरन की माँ थी, चित्रमाली देवनासुर की, स्वर्णमाले अंशधन्वा की, वरप्रभा भारन की माँ थी। पाचवीं रानी का नाम रजटा था। उसके ६ पुत्र और एक पुत्री थी। उनके नाम दशकण्ठ, कुम्भकर्ण, विभेक, दुःखन, खर, त्रिशिरा और सुमनकवा था। लस्तियन की सहायता से पाताल के राजा कालनाग ने सहमलिबन पर चढ़ायी कर दी। उस समय सहमलिबन की लङ्का के राजा से मैत्री हो गयी थी। उसने लङ्काधिपति चतुर्वक्र की अधीनता भी स्वीकार कर ली थी। अतः इस समय उसने लस्तियन से सहायता माँगी। उनकी सहायता से कालनाग पराजित हो गया। उसके बाद कालनाग ने अपनी लड़की काल अग्गी लस्तियन को दे दी। लस्तियन ने उक्त लड़की का विवाह अपने लड़के दशकण्ठ से कर दिया। वृद्धावस्था में लस्तियन ने अपने राज्य को बाँट दिया। दशकण्ठ लङ्का का राजा हुआ। कुबेरन कालचक्र का अधिपति हुआ, पुष्पक भी उसी को मिला। देवनासुर के भाग में
३४४ रामायणमीमांसा द्वादश चक्रकाल का राज्य आया। अंशधन्वा वादकन का राजा हुआ। भारन सीलाश का, दवन रोमगल का, दुखन चारिक का ओर त्रिशिरा मक्षवारी का राजा हुआ। संुमनक्खा का विवाह राजा जिह्वा से कर दिया गया। दशकण्ठ सबसे अधिक प्रतापी हुआ। कैलास में एक नन्दक देव रहता था। वह ईश्वरदर्शनार्थ कैलास जानेवालों का पैर धोता था। सब उसे छेड़ते थे। उसके सिर पर चपत मारते थे। परिणामस्वरूप वह गंजा हो गया। उसने पीड़ित होकर ईश्वर की शरण ली और यह वरदान माँगा कि मैं जिसकी ओर संकेत कर दूँ वह वहीं गिरकर मृत्यु का ग्रास बन जाय। ईश्वर ने उसे वैसा ही वरदान दे दिया। फलस्वरूप बहुत से देवता मारे गये। इन्द्र ने ईश्वर से प्रार्थना की कि उससे वरदान वापस लिया जाय। ईश्वर ने नारायण को आदेश दिया कि वे नन्दक को पराजित करें। नारायण ने अप्सरा का रूप धारण कर नन्दक को मोह में फाँस लिया। उसने अप्सरा को प्राप्त करना चाहा। उसने कहा तुम पहले मेरे साथ नाचो, उसके बाद मैं विवाह करूँगी। उसने स्वीकार कर लिया; अप्सरा ने अपनी अंगुली अपने पैरों की ओर दिखायी नाच की धुन में नन्दक वरदान भूल गया, अतः उसने भी अपनी अंगुली अपने पैरों की ओर दिखायी, फलतः उसकी टांग टूट गयी। अप्सरा ने अपना असली रूप धारण किया और नन्दक को मारने दौड़े। नन्दक ने नारायण से कहा कि यह तो धोखा है, वीरोचित न्याय नहीं है। नारायण ने कहा आगे तुम दशकण्ठ २० भुजावाले होओगे। मैं एक सिर दो भुजा से ही तुम्हें मारूँगा। नन्दक दशकण्ठ और नारायण राम हुए। विभेक के पास एक चमत्कृत सीसा था जिससे वह भविष्य जान लेता था। इसलिए उसको दशकण्ठ के षड्यन्त्रों का पता लग जाता था। विभेक ने उसी के बल से रावण-नाश में राम की सहायता की। दशकंठ-मंडो-विवाह हिमालय में चार ऋषि तप करते थे। वे गायों का दूध पीते थे। गायें स्वयं आकर शीशे के पात्र में दूध डाल जाती थीं। ऋषि लोग बचे हुए दूध को निकट की एक मेढकी को दे देते थे। पाताललोक की एक नागकन्या बहुत कामुकी थी, वह अतृप्त हो मृत्युलोक में आकर एक साँप से रमण कर रही थी। ऋषियों ने उस कुकृत्य को देख कर उसकी पूँछ पर कुछ मार दिया वह लज्जित हो पाताल चली गयी। वह पुनः मृत्युलोक में आयी और ऋषियों के दुग्धपात्र में विष मिला दिया। मेढकी देख रही थी, वह ऋषियों की भक्त थी। ऋषियों को मृत्यु से बचाने के लिए वह दूध में कूद पड़ी और मर गयी। ऋषियों ने सोचा मेढकी दूध की लालच में फँस कर मर गयी। उन्होंने मन्त्रों से उसे जीवित कर दिया। उसने ऋषियों से सारा हाल बताया। ऋषियों ने उसपर प्रसन्न होकर उसे सुन्दरी कन्या बना दिया। वह मण्डो थी। ऋषियों ने उसे ईश्वर को सौंप दिया। वह उमा की सेवा करती थी। इधर किसी प्रसङ्ग से कैलास पर्वत का कोना धँस गया था। ईश्वर ने कहा जो उसे ठीक करेगा, उसे मुंह माँगा वरदान मिलेगा। बहुत से देवताओं ने प्रयत्न किया, पर वह टस से मस नहीं हुआ। दशकण्ठ ने उस पहाड़ को ठीक कर दिया और पुरस्कारस्वरूप में उसने उमा की माँग की। ईश्वर ने उमा को दे दिया। दशकण्ठ ने उमा को पकड़ लिया, परन्तु उसे अनुभव हुआ कि वह अग्नि के समान तप्त हो रही है। वह उमा को सिर पर लेकर लङ्कापुरी चला। देवता बड़े चिन्तित हुए। तब नारायण एक बूढ़े माली का रूप धारण कर बाग में एक वृक्ष को इस प्रकार लगाने लगे कि जिसका मूल ऊपर की ओर रहे। दशकण्ठ ने देखकर कहा मूर्ख क्या कर रहा है। मालीरूप नारायण ने कहा तू मुझसे भी मूर्ख है जो एक सन्तप्त स्त्री को, जिसका शरीर जल रहा है, कन्धे पर उठाये फिरता है। वह तेरे वंश का विध्वंस कर डालेगी। तुझे तो इससे अच्छी स्त्री माँगनी चाहिये थी। जैसी मण्डो है। यह सुनकर दशकण्ठ ने उमा को लौटा दिया और मण्डो को माँग लिया। इसी बीच खिदखिन (किष्किन्धा) के वाली ने उससे युद्ध कर मण्डो को छीन कर अपनी स्त्री बना लिया। अन्त में उसके गुरु अङ्गद के समझाने पर मण्डो दशकण्ठ को लौटा दी गयी।
अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४५ वाली-सुग्रीव की उत्पत्ति साकेत का राजा गौतम सन्तानहीन होने के कारण तप कर रहा था । उसकी जटा और दाढ़ी इतनी बढ़ी कि उसमें दो बया पक्षियों ने घोंसला बना लिया । एक दिन पक्षी किसी कमल-वन में रात भर कमल में बन्द रहा । सबेरे आया तो उसकी पत्नी ने उसकी देह सूंघ कर सोचा कि यह रात भर किसी दूसरी स्त्री के सम्पर्क में रहा है । पक्षी ने कसम खाते हुए कहा कि यदि मैंने ऐसा किया हो तो इस साधु का सारा पाप मुझे लगे । गौतम को बड़ा दुःख हुआ, क्योंकि वह समझता था कि उसमें कोई पाप नहीं है । पूछने पर चिड़िया ने कहा सन्तानहीन होना ही उसका पाप है । उसने तप छोड़कर यज्ञ किया । उससे एक सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई । उसका नाम काल अचना हुआ । गौतम ने उससे विवाह कर लिया । इससे एक लड़की हुई । उसका नाम स्वाहा रखा गया । इधर इन्द्र आदि देवता सोच रहे थे कि हम अपने कर्मों का बँटवारा कैसे करें जिससे कि मृत्युलोक में सैनिकों के रूप में जन्म लेकर लड़ाई में परस्पर सहायता कर सकें । उनकी दृष्टि अचना पर पड़ी । इन्द्र नीचे आया और अपनी दैवी शक्ति से उसको गर्भवती बनाया । उसको पुत्र हुआ, उसका नाम काकाश (वाली) हुआ । आदित्य भी ऊपर से निकले । उन्होंने भी उससे पुत्र उत्पन्न किया । उसका नाम सुग्रीव हुआ । गौतम ने दोनों को अपने पुत्र समझा । स्वाहा को अपनी माता के दुष्कृत्यों की जानकारी थी । एक दिन गौतम नहाने जा रहे थे, सुग्रीव गोद में था, काकाश कन्धे पर था और स्वाहा अंगुली पकड़े जा रही थी । स्वाहा के मन में डाह हुआ । गौतम को इस बात पर आश्चर्य हुआ। पूछने पर उसने पिता को सब बात बता दी । गौतम को यह विश्वास नहीं हुआ कि मेरी स्त्री अचरित्रा है । उसने सबको नदी में फेंक दिया और कहा जो मेरी सन्तान होगी मेरे पास लौट आयेगी जो दूसरे की होगी वह बन्दर बनकर जङ्गल में चली जायेगी । परिणामतः काकाश और सुग्रीव बन्दर बनकर बन में चले गये । घर लौटकर गौतम ने पत्नी को शाप दिया तू पत्थर बन जा । जब नारायण राक्षसों का संहार करने के लिए लङ्का पर चढ़ायी करेंगे तब तू सेतु बाँधने के काम में आयेगी और सदा समुद्र में डूबी रहेगी । अचना को लड़की पर बड़ा गुस्सा आया । उसने लड़की को शाप दिया तू एक टाँग पर खड़ी रहेगी, एक हाथ में वृक्ष की शाखा पकड़े रहेगी । जब तू एक अतुल बलधारी वानर को जन्म देगी तब शापमुक्त होगी । इन्द्र ने किष्किन्धा बना कर काकाश और सुग्रीव को दी और संसार के सभी बन्दरों को बुला कर आदेश दिया तुम लोग काकाश को राजा बना लो । देवता वसन्तोत्सव मना रहे थे । समुद्र की देवी मणिमेखला आनेवाली थी । उसके पास एक दैवी मणि थी । उसकी ख्याति विश्व में फैली थी । एक रामसुर नामक असुर उसके पीछे पड़ा । वह बहुत बली था । अपने पीछे बली असुर को दौड़ते देखकर मणिमेखला प्रसन्न होकर उसे चिढ़ा रही थी । वह बहुत दौड़ा परन्तु देवी और मणि उसके हाथ न आयी । वह असुर अपना क्रोध उतारने के लिए अर्जुन नामक देव से युद्ध कर ठण्डा हो गया । इधर ईश्वर ने देखा सुमेरु का कोना टेढ़ा हो गया है । उसे ठीक करने के लिए देवता बुलाये । उन्होंने सुमेरु को साँप से बाँध कर खोंचा पर सफलता न मिली । सुग्रीव ने साँप की नाभि को दबाया, साँप को गुदगुदी लगी । उसने अपने शरीर से सुमेरु को जकड़ लिया । काकाश ने एक ओर कन्धा दिया सुमेरु ठीक हो गया । ईश्वर दोनों पर प्रसन्न हुए । काकाश को त्रिशूल देकर वाली नाम रखा । सुग्रीव उपस्थित न था । उसके लिए रूपवती स्त्री उसके भाई को दे दी । वाली ने उसे हाँडी में रख दिया । नारायण को यह बुरा लगा; उन्होंने कहा किसी युवती का किसी युवक को देना वैसा है जैसे किसी भौंरे को कोई फूल देना । वाली ने आश्वासन दिया कि मैं अपने वचन का पालन करूँगा । यदि न करूँ तो राम के बाण से मारा जाऊँ । वाली आया तो तारा पर मुग्ध हो गया । अपने वचन को भूल गया । सुग्रीव को न देकर उसे अपने ही घर में रख लिया । ४४
३४६ रामायणमीमांसा द्वादश इधर स्वाहा की दशा देखकर ईश्वर को दया आयी, अतः राम की सहायता के लिए उन्होंने सब दैवी शस्त्रों की शक्ति को अलग कर दिया और वायु को आदेश दिया कि वह इन सब शक्तियों को उसके मुख में भर दे जिससे एक ऐसा पुत्र बन सके जिसमें सब शस्त्रों की शक्ति एकत्र हो जाय । गदा को उसकी रीढ़ की हड्डी बना दो जिससे वह आकाश में यात्रा कर सके । त्रिशूल से उसका शरीर तथा हाथ पैर बन जायँ । वह शस्त्र सदा उसकी छाती में चिपका रहे । चक्र से उसका सिर बने और वायु उसका पिता बने । वायु ने ईश्वर की आज्ञा का पालन किया । स्वाहा गर्भवती हो गयी । तीस मास के बाद एक सफेद बन्दर उत्पन्न हुआ जो सोलह साल के लड़के के समान था । परन्तु उसका जन्म माता के मुख से हुआ । वायु ने उसका नाम हनुमान् रखा । माता ने कहा तुम्हारे कानों में दो बालियाँ हैं, दो चमकदार दाँत हैं और एक श्वेत घुंघराला बाल है । इनको नारायण ही देख सकते हैं । जिसको ये चिह्न दिखायी दें उसको नारायण का अवतार समझ उसकी सेवा करना । इस पुत्र के जन्म से स्वाहा का शाप छूट गया । उमा के बाग में यह हनुमान् तोड़फोड़ कर रहे थे । उमा ने आधी शक्ति हो जाने का शाप दिया, परन्तु हनुमान् की प्रार्थना से वे प्रसन्न हो गयीं और वरदान दिया कि जिस दिन नारायण राम के रूप में स्पर्श करेंगे तुम्हारी पुरानी शक्ति ज्यों की त्यों फिर प्राप्त हो जायगी । वायु के साथ हनुमान् ईश्वर का दर्शन करने गया । ईश्वर ने उसे अन्तर्धान होने की विद्या दी ! अमर होने का वरदान भी दिया । हनुमान् वाली और सुग्रीव का भानजा था । ईश्वर ने ही वाली और सुग्रीव से उसका परिचय कराया । ईश्वर ने अपने चमड़े से वाली की सहायता के लिए एक बन्दर उत्पन्न किया । उसका नाम जम्बुवान था, जो बहुत अच्छा चिकित्सक भी था । जब वाली के पास से मण्डो दशकण्ठ के पास आयी तब वह गर्भवती थी । दशकण्ठ के गुरु अङ्गद ने उसके गर्भ को लेकर बकरी के गर्भाशय में रख दिया । जन्म के समय उस गर्भ को निकाल कर उसे अपना ही नाम देकर वाली को लौटा दिया । रावण अङ्गद के स्नान के समय केकड़े का रूप धारण कर उसे जल में डुबा देना चाहता था । सब बन्दर बचाने में असमर्थ रहे तब वाली आया उसको देखकर लङ्केश ने युद्ध किया और हार कर वाली का बन्दी हो गया । बन्दर उसकी हँसी उड़ाते थे । सात दिन बाद बाली ने उसे छोड़ दिया । दशकण्ठ का वरदान अपने गुरु अङ्गद की राय से रावण ने एक यज्ञ किया जिससे उसे ऐसी शक्ति मिल गयी कि वह अपनी आत्मा को शरीर से निकाल कर अन्यत्र सुरक्षित स्थान पर रख सकता था । इससे युद्ध में आहत होने पर भी मरता नहीं था । इस तरह अमरत्व के समान उसे चमत्कारिणी शक्ति मिल गयी । इससे उसका अत्याचार और बढ़ गया । उसने कुबेर पर चढ़ायी कर पुष्पक विमान छीन लिया । ईश्वर से उसकी शिकायत की गयी । ईश्वर ने उसकी छाती पर हाथी के दाँत से आक्रमण किया । रावण आहत होकर लङ्का को भागा और विश्वकर्मा को हाथी दाँत काटने का आदेश दिया । स्वस्थ होने पर उसने मछली का रूप धारण कर मछली से सहवास किया । उससे मत्स्यपरी उत्पन्न हुई । उसका नाम सुवर्णमच्छा हुआ । उसने हाथी बनकर हथिनियों से भी दो पुत्र उत्पन्न किये । उनका शरीर मनुष्य जैसा किन्तु मुख हाथी जैसा था । उनका नाम किरीधर और किरीवन हुआ । सीता-जन्म जब रावण के आदेशानुसार राक्षसी काकना कौए का वेश धारण कर दशरथयज्ञ से उत्पन्न दैवी भोजन का थोड़ा अंश चुराकर लायी तो उसके खाने से मण्डो गर्भवती हुई । उससे कन्या उत्पन्न हुई । उत्पन्न होते ही लड़की चिल्ला उठी "दशकण्ठ को मारो, मारो, मारो" परन्तु उसकी यह आवाज माँ बाप को नहीं सुनायी पड़ी । ज्योतिषियों ने, जिनमें विभेक (विभीषण) भी था, भविष्यवाणी की कि इस लड़की के द्वारा दशकण्ठ के सारे परिवार का नाश
अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४७ होगा । डर कर रावण ने लड़की विभेक को देकर कहा इसको ले जाओ, जो चाहो करो । विभेक ने उसे एक हाँडी में बन्द कर नदी में बहा दिया । दैवी-शक्ति से नदी के तल पर एक कमल दिखायी पड़ा । हाँडी बहती हुई उसपर टिक गयी । समुद्र की देवी मणिमेखला ने अन्य देवियों के सहयोग से उस बच्ची की रक्षा की । लक्ष्मी की दैवी शक्ति से हाँडी एक ऋषि के स्नान करने के घाट से जा लगी । दैवयोग से वह जनक थे । राजा ने उसका पालन किया । ईश्वर की प्रार्थना से राजा जनक की अंगुली में दूध हो गया । राजा ने वन में एक गड्ढा खोद कर कहा यदि इस कन्या को नारायण के अवतार की पत्नी बनना हो तो इसमें एक कमल उत्पन्न हो जाय । वैसा ही हुआ । जनक ने उसी कमल पर लड़की की हाँडी रख दी और पत्रों से छिपा कर गड्ढे को पाट दिया । जनक तपस्या छोड़कर घर लौटना चाहते थे, परन्तु उनको उससे मोह हुआ कि उस स्थान को छोड़कर जाने की उन्हें इच्छा नहीं हुई । सेवकों ने जमीन खोद कर हाँडी निकालना चाहा पर वह हाँडी हाथ न लगी । जनक ने सैनिकों और हलवाहों को भी बुलाया पर फिर भी वह हाँडी हाथ न आयी । तब राजा ने स्वयं हल हाथ में पकड़ा तुरन्त हाँडी प्रकट हो गयी । उसपर एक कमल था । कमल से एक सुन्दर कन्या निकली । हल की लकीर के साथ निकलने के कारण लड़की का नाम सीता रखा गया । उसको लेकर राजा अपने राज्य में लौट आये । महारानी रत्नमणि निःसन्तान थी । सीता उस रानी की आँखों का तारा थी । इधर राम और उनके भाई बड़े हुए एवं गुरु वसिष्ठ और स्वमित्र के पास शिक्षित हुए । उनकी विद्या से प्रसन्न होकर गुरुओं ने एक यज्ञ रचा कि उससे ऐसे शस्त्रास्त्र प्रकट हों जिनसे राक्षसों का संहार हो । हवन की अग्नि प्रज्वलित होने पर ईश्वर ने अग्नि में १२ बाण छोड़े । उस यज्ञ से प्रत्येक भाई के लिए तीन-तीन धनुष-बाण निकले । उनपर हरएक भाई के नाम अङ्कित थे । राम के शस्त्र सर्वोत्कृष्ट थे । उनके नाम थे ब्रह्मास्त्र, अग्निवत और प्लैवत । इस तरह विद्या और बल से युक्त पुत्रों को देखकर दशरथ और गुरुजन बहुत प्रसन्न हुए । कैकेयी के पिता ने शस्त्रनिपुणता सुनकर राक्षसों को मारने के लिए भरत और शत्रुघ्न को अपने यहाँ बुला लिया । रावण ने भयभीत होकर ऋषियों की तपस्या भङ्ग करने के लिए काकनासुरी राक्षसी को भेजा । वह सहेलियों के साथ कौआ बनकर ऋषियों के यज्ञों में विघ्न डालने लगी । ऋषि लोग तंग आकर वसिष्ठ और स्वमित्र के पास गये । दोनों ऋषि दशरथ से माँगकर राम और लक्ष्मण को ले आये । काकनासुरी रामबाण से मारी गयी । सुबाहु और मारीच अपनी माता का बदला लेने के लिए युद्ध करने लगे । सुबाहु मारा गया और मारीच लङ्का भाग गया । राम-सीता का परिणय जनक के पास ईश्वर का धनुष था । ईश्वर ने इससे त्रिपुर को मारा था । राजा ने घोषित कर दिया जो कोई इस कोदण्ड को उठा सकेगा सीता उसके साथ ब्याही जायगी । स्वमित्र राम और लक्ष्मण को जनक-दरबार में ले गये । राजमहल में सीता ने राम को देखा, राम ने भी सीता को देखा । दोनों परस्पर मुग्ध हो गये । राम- लक्ष्मण के पास धनुष लाया गया । लक्ष्मण ने परीक्षा ली । धनुष उठाना उनके लिए कठिन न था, परन्तु वे ताड़ गये कि राम के हृदय में सीता के लिए प्रेम उत्पन्न हो गया है, अतः उन्होंने नहीं उठाया । राम की बारी आयी तो उन्होंने अनायास ही पक्षी के पंख के समान धनुष उठा लिया । अयोध्या से दशरथ आये । धूम-धाम से सीता और राम का विवाह हुआ । राम-रामासुर युद्ध बारात जङ्गल से होकर गुजर रही थी । एक देवता रामासुर ने उसे रोका । उसका अस्त्र परशु था ।
२४८ रामायणमीमांसा द्वादश रामासुर ने राम के बल की परीक्षा लेनी चाही । वहाँ युद्ध हुआ । अन्त में रामासुर ने अपनी पराजय मान ली । इसके बाद रामासुर ने उन्हें त्रिमंध नामक अस्त्र दिया । राम-वनवास दशरथ वृद्ध थे । वे अपना उत्तराधिकारी राम को बनाना चाहते थे । कैकेयी की बाँदी कुब्जी के कान में यह सूचना पड़ी । कुब्जी को राम से बैर था, इसलिए उसकी पीठ में एक कूब था । राम ने तीर मारा तो बाहर आ गया । इसपर बड़ी हँसी हुई थी । राजा ने कैकेयी को वर दिया था । एक बार युद्ध में दैत्य ने बाण से दशरथ के रथ का धुरा तोड़ दिया था । कैकेयी ने अपना हाथ पहिये में डाल कर ईश्वर से प्रार्थना की कि वह राजा की रक्षा करे । रानी की सहायता से राजा विजयी हुए । इसपर राजा ने रानी को वर दिया । कुब्जी ने कैकेयी को यह वर माँगने को तैयार कर लिया कि राम को १४ वर्ष का वनवास और भरत को राज मिले । राजा ने बहुत समझाया पर रानी हठकर गयी । उन्होंने दुःखी हृदय से कैकेयी की बात मान ली । राम वन चले गये । वे मनुष्यों की भलाई में सदा तत्पर रहते थे । उन्होंने भूमि को राक्षसों से मुक्त करने का निश्चय किया । दशरथ को राम के वियोग से बड़ा दुःख हुआ और उनकी मृत्यु हो गयी । राम चलते-चलते सतोंग नदी के तीर पहुँचे वहाँ अहेरियों का राजा खुनन रहता था । उसने कहा कि आप यहाँ जङ्गल का राज करें । राम ने धन्यवादपूर्वक इस भेंट को अस्वीकार कर दिया । राम भरद्वाज के आश्रम में पहुंचे । ऋषि ने उनका बड़ा सत्कार किया । ऋषि ने शरभङ्ग आश्रम जाने को कहा । वह आश्रम भी अयोध्या के निकट था । तब ऋषि ने शतकूट पर्वत पर रहने को कहा । राम वहाँ जाकर रहने लगे । भरत और शत्रुघ्न राम का सिंहासनारोहण सुनकर बड़े प्रसन्न हुए । अयोध्या पहुंचे तो वहाँ उत्सव के बजाय रोना पीटना हो रहा था । तुरन्त ही वे वस्तुस्थिति को समझ गये । वे राम के परम भक्त थे । वे राम का राज्य कैसे ले लेते ? पिता की अन्त्येष्टि करके वे माताओं को साथ लेकर पैदल यात्रा करके राम के पास पहुँचे और उनसे अयोध्या का राज्य करने का आग्रह किया । राम ने पितृभक्ति के कारण वैसा स्वीकार नहीं किया और जो इस विपत्ति का मूल कैकेयी थी, उससे भी द्वेष नहीं माना । पर भरत भी राज करने को तैयार नहीं हुए । तब राम की पादुकाओं को गद्दी पर बैठा कर राम के प्रतिनिधि होकर भरत राज संभालने को तैयार हुए । भरत ने प्रार्थना की कि यदि आप १४ वर्ष के बाद अयोध्या न लौटे तो हम अग्नि में प्रवेश कर जायेंगे । दुःखी मन से भरत अयोध्या लौट आये । गोदावरी-तट पर राम उसके बाद और घने जंगलों में चले गये । वहाँ उनको एक राजा, जिसका नाम सुदर्शन था, मिला । वह अपनी रानी के साथ तप करता था । उसने राम से अपने साथ रहने का आग्रह किया, पर राम ने वहाँ रहना स्वीकार नहीं किया । अब वे बीख राक्षस के उपवन में आये । उसको ईश्वर के वरदान से समुद्र एवं अग्निदेव का बल प्राप्त था । राक्षस के कर्मचारियों ने उन्हें रोका । लक्ष्मण ने सबको मार डाला । बीख ने बदला लेने का निश्चय किया, पर वह बली होने पर भी राम-लक्ष्मण का मुकाबला न कर सका । अन्त में मारा गया । आगे उन्हें एक अप्सरा मिली जिसका नाम सोबरी था । ईश्वर की आराधना में त्रुटि होने से उसे जलते हुए जङ्गल में रहने का शाप मिला था । शाप छूटने की शर्त यह थी कि जब राम उस वन में आकर आग बुझायेंगे तब उसकी मुक्ति होगी । राम ने उस दुःखिया की टेर सुनी । आग बुझा दी और अप्सरा को दिव्य रूप प्राप्त करा दिया । आगे राम ऋषि अगत्त से आश्रम में पहुँचे । ईश्वर ने अपना वह अस्त्र जिससे उन्होंने त्रिपुर को मारा था, इन्हीं अगत्त के संरक्षण में रख दिया था कि जब राम आयें तो वह उनको दिया जाय । ऋषि से अस्त्र लेकर राम गोदावरी-तट आये । वहाँ इन्द्र ने पहले ही उनके लिए तीन पर्णकुटियाँ बना रखी थीं ।