रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ रामायणमीमांसा द्वादश इसमें बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट है । (१) खोतानी रामायण में अवतार वाद का उल्लेख न होकर राम का बुद्ध तथा लक्ष्मण का मैत्रेय होना कहा गया है । (२) यहाँ आहत रावण का वध नहीं किया जाता है । (३) इसमें रावण के बाद अर्जुन कार्तवीर्य सहस्रबाहु तथा परशुराम की कथा मिलती है । (४) इसमें दाशरथि राम और परशुराम का मिश्रण है । (५) इसमें दशरथ-पुत्र सहस्रबाहु, परशुराम के पिता की धेनु चुराता है जिसके कारण परशुराम सहस्रबाहु को मारते हैं सहस्रबाहु के राम और लक्ष्मण दो पुत्र होते हैं । राम परशुराम का वध करते हैं । (६) राम और लक्ष्मण दोनों वनवास करते हैं । निर्वासन का कारण निर्दिष्ट नहीं है । दोनों सीता से विवाह करते हैं । सीता-हरण वृत्तान्त में रेखा खींची जाने का उल्लेख है । सेतुबन्ध आदि की कथाएँ भी इसमें हैं । वस्तुतः भारतीय संस्कृति और संस्कृत ग्रन्थों का ज्ञान उक्त ग्रन्थकार को नहीं था, इसलिए उसने खोतानी रामायण में अशुद्ध कथाओं का संकलन किया है । दशरथ का पुत्र सहस्रबाहु, सहस्रबाहु के पुत्र राम और लक्ष्मण को बताना सर्वथा भ्रान्तिपूर्ण ही है । वैदिक धर्म-विरोधी बौद्धों में भाई-बहन में शादी एवं एक स्त्री का अनेक पुरुष-सम्बन्ध दोष नहीं माना जाता । इसी लिए लेखक ने बौद्ध रामायणों में सीता को राम की भगिनी मानकर भी विवाह सम्बन्ध माना है । खोतानी में उसी प्रभाव के कारण राम और लक्ष्मण दोनों का ही सीता से विवाह मान लिया है । वस्तुतः वैदिक राम के चरित्र का विकृत रूप ही यह कथा है । हिन्दोनेशिया की प्राचीनतम राम-कथा हिन्दोनेशिया में नवीं शती के एक शिव-मन्दिर में पाषाण चित्रलिपि के आधार पर रामकथा प्रमाणित होती है । उसी आधार पर जावा में विस्तृत राम-साहित्य की रचना हुई है । जावा के प्राचीन रामायण का रूप वाल्मीकि- रामायण से मिलता है । अर्वाचीन रूप में भिन्नता है । जावा के प्राचीनतम रामायण के रचयिता शैव थे । विस्तृत चित्रलिपियाँ भी शिव-मन्दिर में ही हैं । ३१४ अनु० : हिन्दोनेशिया की प्राचीनतम रामकथा रामायण ककविन है ( १० वीं शती ) । उसका लेखक अज्ञात है । डच अनुवाद से विदित होता कि उसका आधार भट्टिकाव्य है । युद्ध का वर्णन विस्तृत है । अभिषेकनाटक तथा महानाटक का भी अंश इसमें है । इसमें सीता अभिज्ञानस्वरूप चूड़ामणि के अतिरिक्त एक पत्र भी हनुमान् को देती हैं । शबरी राम से अपनी कथा सुनाती हुई कहती है—विष्णु ने वराहावतार में मेरी माला खायी थी और वे मर गये थे, तो मैंने उनकी लाश खायी थी । इसी लिए मेरा मुँह काला हो गया है । वह राम से उसे शुद्ध कर देने का अनुरोध करती है । ककविन में त्रिजटा का स्थान महत्त्वपूर्ण है । शबरी की उक्त कथा, जिसे बुल्के विशे- षता कहते हैं, लेखक की कल्पना अपने संस्कारवशात् ही है । उसका वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है । विष्णु एवं उनके सभी अवतार नित्य हैं । उनके मरने का प्रश्न ही नहीं उठता— “सर्वे देहाः शाश्वताश्च नित्यास्तस्य महात्मनः । हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित् ॥” ( विष्णुपु० ) जावा में एक प्राचीन उत्तरकाण्ड मिलता है । वह गद्य में वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड का अनुवाद है । चरितरामायण में १०१ श्लोकों में रामायण के छहों काण्डों की कथा के साथ व्याकरण के उदाहरण दिये हैं, अतः इसपर भी भट्टिकाव्य का प्रभाव है । हिमांशुभूषण सरकार के अनुसार ११ वीं शती की रचना सुमनसान्तक