रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंककविन है। इसमें इन्दुमती का जन्म एवं अज से विवाह और दशरथ-जन्म वर्णित है। हरिश्रय ककविन में विष्णु द्वारा सुमाली तथा माल्यवान् का वध वर्णित है। अर्जुनविजय (१४ वीं शती) में सहस्रबाहु अर्जुन द्वारा रावण का पराजय वर्णित है। जावा का आधुनिक सेरतराम भी रामायण ककविन की तरह वाल्मीकिरामायण से मिलता है। वह पद्य में है। कवि का नाम यस० दि० पुरा है। ३१७ अनु० : मध्य जावा में परमबनन (परब्रह्म) नामक स्थान पर ९ वीं शती का एक शिवमन्दिर है। इस मन्दिर के चारों ओर की ऊँची दीवारों पर रामायण की समस्त घटनाओं का पाषाण चित्रलिपि में चित्रण किया गया है। इसमें वर्णित रामकथा वाल्मीकिरामायण-कथा से मिलती-जुलती है। परन्तु हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा की अधिकांश विशेषताओं का इसमें निर्देश नहीं मिलता। सेरीराम के अनुसार भरत सीता-हरण के बाद ही राम से मिलकर उनकी पादुकाएँ अयोध्या ले जाते हैं, किन्तु परमबनन में भरत-मिलाप का स्थान रामायण ककविन के अनुसार सीता-हरण के पूर्व ही माना गया है। वाल्मीकिरामायण से जो किंचित् भिन्नता इसमें है उसका प्रायः भारत में भी उल्लेख पाया जाता है। उदाहरणार्थ जटायु का राम को सीता की अँगूठी देने का वृत्तान्त महानाटक में है। मछलियों के द्वारा सेतु नष्ट करने की कथा सेतुबन्ध तथा बालरामायण में भी पायी जाती है। दशरथ की पुत्री (शान्ता) का उल्लेख रामायण के गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ, भवभूति के उत्तररामचरित आदि में किया गया है। लेकिन लक्ष्मण के तरकश में सुग्रीव के आँसुओं का पानी जमा होना तथा इस तरह सुग्रीव का पता लगाया जाना, यह वृत्तान्त किसी प्राचीन भारतीय रचना में नहीं मिलता। उपर्युक्त अधिकांश विशेषताएँ हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा में आ गयी हैं। ३१८ अनु० : पूर्व जावा के पनतरन नामक स्थान के १४ वीं शती पूर्वार्द्ध के एक मन्दिर में रामकथा पाषाण चित्रलिपि में अङ्कित है। यह कथा प्राचीन रामायण ककविन के कथानक से अभिन्न है। इससे ज्ञात होता है कि यद्यपि अर्वाचीन राम-कथा अधिक लोकप्रिय हुई फिर भी रामायण ककविन का भी कुछ महत्त्व माना जाता रहा है। हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा ३१९ वाँ अनु० : प्राचीन परम्परा को छोड़ कर हिन्देशिया में नवीन राम-कथा का रूप प्रचलित हुआ, जो अधिक लोकप्रिय है एवं जिसके अनुसार सुमात्रा तथा जावा में राम-कथा सम्बन्धी नाटकों का अभिनय होता है। जावा का नाटकसाहित्य प्रायः सेरतकाण्ड तथा राम केलिङ्ग पर आधारित है। बालीका 'वायांग वोंग' नामक नाटकों का पूरा वर्ग (जिसमें अभिनेता चेहरा नहीं पहनते) केवल रामायण के दृश्य ही प्रस्तुत करता है। रामकथा का यह अर्वाचीन रूप हिन्देशिया से हिन्दचीन, श्याम और ब्रह्मदेश तक फैल गया है। (ग्र) मलयन अर्वाचीन रामकथा हिकायत सेरीराम के तीन साहित्यिक पाठों के अनुसार उक्त नाटक होते हैं। इसके राफल्स मलय हस्तलिपि पाठ के अनुसार कई वस्तु अन्य पाठों में नहीं मिलती। इसके अनुसार राम के आज्ञानुसार लक्ष्मण शूर्पणखा से विवाह करते हैं और कथा सेरीराम पर निर्भर है। हिकायत महाराज रावण (ज० रा० ए० सो०, मलयन ब्रैञ्च, भाग ११) कथानक सेरीराम के अनुसार होते हुए भी इसमें एक विशेषता यह है कि रावण की पुत्री सोती हुई सीता के वक्षःस्थल पर रावण का एक चित्र रख देती है जिससे राम सीता को त्याग देते हैं।