रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० रामायणमीमांसा एकादश किशोर, मैथिली में चन्दा झा का रामायण । १९०० सन् के बाद शिवरत्न शुक्ल का रामावतार, वंशीधर शुक्ल का राममड़ैया, रामनाथ ज्योतिषी का श्रीरामचन्द्रोदय । रामचरित उपाध्याय का रामचरितचिन्तामणि, मैथिलीशरण गुप्त का साकेत ( १९२९ ई० ), हरिऔध का वैदेहीवनवास ( १९३९ ई० ), बलदेव प्रसाद मिश्र का साकेत-सन्त ( १९४६ ई० ), केदारनाथ मिश्र का कैकेयी ( १९५० ई० ), बालकृष्ण शर्मा नवीन का उर्मिला ( १९५७ ई० ) खड़ी बोली के समृद्ध साहित्य हैं। इनमें अवतारवाद को कम महत्त्व दिया गया है। शृङ्गारिकता के स्थान पर सामाजिक तथा राजनीतिक आदर्श तथा पूर्ववर्ती रामकाव्य के उपेक्षित अथवा कम विकसित पात्रों को नायक एवं नायिका बनाने को प्रवृत्ति है। वस्तुतः ऐसे काव्य लोक-निर्माण के लिए ही कल्पित किये जाते हैं। जनसमूह के श्रद्धास्पद होने के कारण ही प्राचीन ग्रन्थों एवं उनके पात्रों का इनमें उपयोग किया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन केशवदास की रामचन्द्रिका में सीता-स्वयंवर में बाणासुर तथा रावण के संवाद का उल्लेख है। मिथिला में परशुराम का तेजोभङ्ग वर्णित है। रावणवध के पश्चात् अयोध्या लौटने पर राम की विरक्ति तथा वसिष्ठ का समझाना उल्लिखित हैं। पद्मपुराण तथा जैमिनीयाश्वमेध के अनुसार सीता-त्याग, लव- कुश का जन्म और राम-सेना के साथ लव-कुश के युद्ध का वर्णन है। ३०३ अनु० : सिक्खों के दशवें गुरु गोविन्दसिंह ने १६९८ ई० में रामावतार-कथा लिखी है जो १९५३ ई० में गोविन्दरामायण के नाम से प्रकाशित हुई है। उसकी विशेषताएँ राम और सीता का पूर्वानुराग, अयोध्या में भी परशुराम का तेजोभङ्ग, लक्ष्मण द्वारा सीता की रक्षा के लिए रेखा खींचना, सीता का नाग-मन्त्र पढ़ कर राम और लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करना, लव-कुश-युद्ध के अन्त में सीता अपने सतीत्व की शपथ लेकर राम की सेना को जिला देती है और राम के साथ अयोध्या लौट आती है। रावण-चित्र के कारण राम को सीता पर सन्देह होता है। फलस्वरूप सीता शपथ पर भूमि में प्रवेश करती है। प्रायः प्रचलित विभिन्न रामायणों तथा पुराणों पर ही उक्त आख्यान निर्मित हुआ है। मराठीसाहित्य में रामकथा ३०४ अनु० : मराठी-साहित्य के भावार्थरामायण की रचना १६ वीं शती की है। इसका उत्तरकाण्ड एकनाथ के किसी शिष्य ने लिखा था। समालोचकों के अनुसार युद्धकाण्ड के अहिमहिऱावण-वृत्तान्त को छोड़कर युद्ध- काण्ड पर्यन्त सम्पूर्ण भावार्थरामायण एकनाथजी की ही रचना है। अहिमहिऱावण की कथा जयरामसुत द्वारा लिखी हुई है। उसका कथानक वाल्मीकिरामायण के ढाँचे पर निर्मित हुआ है। उसके आधार वाल्मीकिरामायण, अध्यात्म- रामायण तथा आनन्दरामायण हैं। उसमें भक्तिवातावरण का आधार अध्यात्म रामायण है। वाल्मीकिरामायण से भिन्न नवीन सामग्री का आधार आनन्दरामायण है। दशरथ-पुत्री शान्ता, तारा-शाप आदि का उल्लेख वाल्मीकि- रामायण के दाक्षिणात्य पाठ में नहीं मिलते किन्तु पश्चिमोत्तरीय पाठ में मिलते हैं। एकनाथ के कथानक पर आनन्दरामायण की गहरी छाप है। दशरथ-कौशल्या-विवाह आदि बहुत-सी नयी सामग्री आनन्दरामायण की ही है। भरत तथा शत्रुघ्न का कैकेयी की सन्तान के रूप में उल्लेख तीनों में नहीं मिलता। अन्य काण्डों की अपेक्षा उत्तर- काण्ड वाल्मीकिरामायण से अधिक साम्य रखता है । एकनाथ परम आस्तिक थे। उनकी दृष्टि में उक्त तीनों रामायण तथा अन्य रामायण तथा पुराण भी प्रमाण हैं, अतः उन्होंने भी तुलसीदासजी के समान ही सब का संकलन कर भावार्थरामायण ग्रन्थ लिखा है—उसमें मतभेद का समाधान कल्पभेद से किया जा सकता है। एकनाथजी ने शतकोटिप्रविस्तररामायण और शिवजी द्वारा तीनों लोकों के लिए उसका विभाग कहा है। तदनुसार ३३ कोटि ३३ लक्ष ३३ सहस्र ३ सौ ३३ श्लोक और १०