रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअक्षर एक एक लोक को मिले हैं। एक श्लोक में ३२ अक्षर होते हैं। उसमें से दस दस अक्षर बँट जाने पर दो अक्षर शेष रह गये। उनका बँटवारा नहीं हो सकता था। उन्हें सर्वसार समझ कर शिवजी ने ग्रहण किया था। इसमें रामायण के मुख्य वक्ता शिवजी और श्रोत्री पार्वतीजी कही गयी हैं। एक कथा में शिव वक्ता और राम श्रोता हैं। वह शिवरामायण है। श्वेतकेतुरामायण तथा आत्मरामायण राम द्वारा उक्त हैं। जैमिनिरामायण ओर अध्यात्मरामायण अनेक रामायणों के सार हैं—वे अपेक्षा कृत नवीन हैं। उनके अनुसार असंख्यात रामायण हैं। शिवरामायण, शैवरामायण, आगमपाञ्चरात्ररामायण, गुहागुह्यकरामायण, हनुमन्द्रामायणनाटक, इनके अनुसार हनुमन्नाटक हनुमत्कृत ही है। भक्त-कूर्म-वराह-रामायण, महाकालीरामायण, स्कन्दरामायण, अगस्ति-पौलस्ति- रामायण, पद्मपुराण, त्रिरामायण, अग्निवरुणरामायण, जटायुरामायण, महाभारतरामायण, महाभारतीरामायण तथा धर्मरामायण । अरण्यकाण्डभावार्थरामायण में राम को सच्चिदानन्द तथा लक्ष्मण को शेष कहा गया है। वैराग्य और ज्ञान का निरूपण करते हुए एकनाथ महाराज ने योगवासिष्ठ के अनेकों श्लोकों का उद्धरण किया है— न राघव तवास्त्यन्यज्ज्ञेयं ज्ञानवतांवर । स्वमेव सूक्ष्मया बुद्ध्या कवि विज्ञातवानसि ॥ भगवद्व्यासपुत्रस्य शुकस्येव मतिस्तव । विश्रान्तिमात्रमेवैतज्ज्ञानाज्ञानमपेक्षते ॥'' अर्थात् राघव, तुम्हारे लिए अन्य कुछ ज्ञातव्य नहीं है। अपनी सूक्ष्म बुद्धि से ही तुमने सब कुछ जान लिया है। भगवान् व्यास के पुत्र शुक की जैसी तुम्हारी प्रज्ञा है। केवलमात्र विश्रान्ति ही अपेक्षित है। भावार्थरामायण के अनुसार अहमात्मा ही दशरथ है, सद्विद्या कौशल्या है, शुद्ध मेधा सुमित्रा है, अविद्या कैकेयी है और कुविद्या मन्थरा है (बालकाण्ड अध्याय १)। सीता-स्वयंवर अन्य अनेक विद्वानों ने सीतास्वयंवर ग्रन्थों की रचनाएँ की थीं। संक्षेपरामायण, अहिमहिरावण-वध, समर्थ रामदास का लघुरामायण सुन्दरकाण्ड तथा युद्धकाण्ड, वेणाबाई का रामायण आदि भी सत्रहवीं शती की रचनाएँ हैं। १७०३ की श्रीधरकृत रामविजय सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है। इसमें अहल्या गौतम-विवाह की कथा ब्रह्मपुराण के अनुसार दी गयी है। मोरो पन्त के ७४ रामायण प्रकाशित हैं। कथानक वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही है। अमृतराव का शतमुखरामायण ग्रन्थ १९वीं शती की रचना है। वस्तुतः अपनी वाणी को सफल बनाने के लिए अनेक विद्वानों एवं सन्तों ने रामचरित्र का कीर्तन करने के उद्देश्य से रामकथाओं का संकलन किया है, पर आधुनिक पाश्चात्य लोग तो अश्रद्धा ही उत्पन्न करने की दृष्टि से इस ओर प्रयत्न करते हैं। गुजरातीसाहित्य में रामकथा ३०६ अनु० : रामलीला ना पदो (१४वीं शती), भालणकृत रामविवाह और रामबालचरित (१५वीं शती), मन्त्री कर्मणकृत सीता-हरण, भीमकृत रामलीला ना पदो (१५वीं शती), मांडण बंधारो का रामायण (१५वीं शती), लावण्यसमयकृत रावण-मन्दोदरी-संवाद (१६वीं शती) तथा उद्धवकृत सीता-हनुमान्संवाद, इसी प्रकार अन्य विद्वानों ने लवकुशाख्यान, रणयज्ञ, सीताविरह आदि रचनाएँ की हैं। १९वीं शती का गिरधरदास- कृत रामायण सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। आधुनिक काल में योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि का गुजराती अनुवाद हुआ है। रामायणनोसार १९वीं शती की रचना है।