भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४०२ रामायणमीमांसा त्रयोदश तां विलोक्य तदेवाक्ष्णां सहस्रं भविता च ते। इतीन्द्रमपि तत्कालं शपति स्म स गौतमः ॥’’१४५॥ (कथासरित्सागर-३।३) अर्थ-उपर्युक्त वचनों में भी इन्द्र और अहल्या दोनों सदोष हैं। मार्जाररूप में इन्द्र को सत्यानुरोधिनी प्राकृत भाषा में अहल्या ने मार्जार-बोधन की दृष्टि से मज्जार कहा। जिसका वास्तविक अर्थ मज्जार मेरा जार ही था। गौतम ने उपहास करते हुए कहा सत्य ही यह त्वज्जार तुम्हारा जार (उपपति) ही है। उन्होंने उसे शाप दिया पापशीले तुम बहुत काल तक शिलाभाव को प्राप्त होओ और तबतक शिला बनी रहो जबतक वनान्तर संचारी राघव का दर्शन नहीं होता। इन्द्र के लिए पुनः कहा वराङ्गलुब्ध इन्द्र, तुम्हारे शरीर में सहस्र भग तबतक रहेंगे जबतक विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्यस्त्री तिलोत्तमा नहीं प्राप्त होती। उसको देखते ही वे सहस्र भग सहस्र नेत्रों के रूप में परिणत हो जायेंगे। “दत्वाऽस्य वृषणौ भूमौ नाशयित्वा भगानिमान् । मर्त्यलोके गतिश्चास्य यथा स्यात्तत्समाचर ॥४६॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां स मुनिर्दैवगौरवात् । वृषणौ मेषसम्भूतौ योजयामास तौ तदा ॥४७॥ तान् भगान् पाणिना स्पृष्ट्वा चक्रे नेत्राणि सन्मुनिः । ततः प्रोवाच तान् देवान् गौतमश्च महातपाः ॥४८॥ सहस्राक्षो मया शक्रो निर्मितोऽयं सुरोत्तमाः । समेषवृषणश्चापि स्वं च राज्यं करिष्यति ॥४९॥ शोभास्य नेत्रजा वक्त्रे सुरम्या सम्भविष्यति । पुंस्त्वं च मेषजोत्थाभ्यां वृषणाभ्यां भविष्यति ॥”५०॥ (स्कन्दपु० नागरखण्ड अ० २०७) उक्त वचनों के अनुसार गौतम से अनुग्रह करके इन्द्र को वृषण प्रदान करने और भगों को मिटाने तथा मर्त्यलोक आ सकने की देवताओं ने प्रार्थना की। देवताओं के गौरव से मुनि ने मेषवृषण लगाकर, अपने हाथ से भगों का स्पर्श करके उन्हें नेत्र बना दिया और मर्त्यलोक-गति की भी अनुमति दे दी। “ततो मार्गे मया दृष्टा गौतमस्याश्रमे शुभे । अहल्या सा शिलारूपा प्रमाणेन महत्तमा ॥२४॥ ततः प्रोक्तौ मया रामः स्पृशेमां वत्स पाणिना । मानुषत्वं लभेद्येन गौतमस्य प्रिया मुनेः ॥२५॥ अविकल्पं ततो रामो मम वाक्येन तां शिलाम् । पस्पर्श पार्थिवश्रेष्ठ कौतूहलसमन्वितः ॥२६॥ अथ रामेण संस्पृष्टा सहसैवाङ्गना मुनेः । शुशुभे मानुषी जाता दिव्यरूपवपुर्धरा ॥”२७॥ (स्कन्दपु० नागरखण्ड अ० २०८) इन वचनों के अनुसार शिलारूप में पड़ी अहल्या का परिचय देकर मुनि ने उसे हाथ से स्पर्श करने के लिए राम को प्रेरित किया। राम के स्पर्श करते ही वह दिव्यदेहधारिणी दिव्य स्त्री हो गयी।