रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 481, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें४०४ रामायणमीमांसा त्रयोदश परशुराम जैसे "काशी में राम ने गङ्गास्नान किया" और "काशी दशाश्वमेध घाट पर राम ने गङ्गास्नान किया" इन वचनों का आपस में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि प्रथम वाक्य सामान्य है, द्वितीय विशेष है। गङ्गा में किसी विशेष घाट पर ही स्नान बन सकता है, अतः उसकी दशाश्वमेध घाट के साथ एकवाक्यता बन जाती है। इसी प्रकार- असति विरोधे-सभी विशेषों का सामान्य के साथ समन्वय हो जाता है। इस नीति से राम, सीता, लक्ष्मण और परशुराम सभी के चरित्रों में समन्वय कर लेना उचित है। महावीरचरित, अनर्घराघव, बालरामायण, महानाटक, प्रसन्नराघव, रामचरितमानस, रामचन्द्रिका आदि में परशुराम के तेजोभङ्ग का मिथिला में वर्णन किया गया है। इनमें परशुराम के वाग्युद्ध का विस्तृत वर्णन है। परशुराम का क्रोध उग्र होता है। वे वध करने की धमकी देते हैं। राजशेखर के बालरामायण के अनुसार दशरथ तथा परशुराम सीता और राम के विवाह के बाद मिथिला में पहुँचते हैं। उसके अनुसार विश्वामित्र का आदेश पाकर लक्ष्मण ही नारायणीय धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ाते हैं। जिसपर जनक, लक्ष्मण और उर्मिला के विवाह का प्रस्ताव करते हैं। विश्वामित्र के सुझाव के अनुसार भरत और माण्डवी एवं शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति का विवाह होता है। अद्भुतरामायण के अनुसार राम ने धनुष चढ़ाकर परशुराम को विराट् रूप दिखाया और बाण छोड़कर उनका तेज ले लिया। तब परशुराम ने होश में आकर राम को विष्णु का अवतार मानकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा से महेन्द्र पर्वत पर चले गये। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३ के अनुसार राम ने क्षत्रिय-विध्वंस के प्रायश्चित्तार्थ तप के उद्देश्य से उन्हें महादेव के पास भेजा था। इनमें कई अंशों को प्रशंसार्थवाद समझकर उनका समाधान करना उचित है। रामकीर्ति में रामपरमस्र को एक क्रूर यक्ष माना है। राम उनसे कहते हैं कि मैं नारायण का अवतार हूँ। उसपर वे प्रमाण चाहते हैं कि राम उनका चाप उठा लें। राम बायें हाथ से लीलापूर्वक उस धनुष को उठाकर बाण चढ़ाते हैं। तब रामपरमस्र क्षमा मांगते हैं तथा राम को अपना ऐन्द्रजालिक बाण भी दे देते हैं। यह भी वाल्मीकिरामायण की कथा का ही संवर्धित रूप है। कृत्तिवासरामायण में सीता को शङ्का होती है कि एक धनुष को तोड़कर मेरे साथ विवाह किया, अब भृगुमुनि एक धनुष और लाये हैं। न जाने मेरी कितनी सपत्नियां होंगी। अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, राघवोल्लास तथा रामचरितमानस में तेजोभंग के पश्चात् परशुराम राम की स्तुति करते हैं। रामभक्ति का वरदान लेकर चले जाते हैं। राघवोल्लास में राम की प्रभावपूर्ण बातों से ही परशुराम शान्त हो जाते हैं। विष्णु-धनुष चढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वे अपने सब अस्त्र-शस्त्र राम के चरणों में अर्पित कर देते हैं। कम्बरामायण के अनुसार तेजोभङ्ग के पश्चात् देवता पुष्पवृष्टि करते हैं और राम विष्णु का धनुष वरुण को अर्पित कर देते हैं। सामान्य विशेषपर्यवसायी होता है, अतएव सामान्य का विशेष से विरोध भी नहीं होता। हाँ, विरुद्ध विशेष्यों में विरोध हो सकता है। विष्णु के हुंकार से स्तम्भित होकर शिव ने धनुष छोड़ दिया था। वही धनुष जनक को प्राप्त हुआ था। उसी का भंग होने से परशुराम क्षुब्ध हुए थे। देवता लोगों ने "शिव और विष्णु में कौन श्रेष्ठ हैं" यह प्रश्न पितामह ब्रह्मा से किया। ब्रह्मा ने शङ्का दूर करने के लिए अपने सत्य संकल्प से दोनों में विरोध उत्पन्न कर दिया। ब्रह्मा की संकल्पसिद्धि के लिए ही दोनों ने विरोध स्वीकार किया। विष्णु के हुंकार से शिव का धनुष शिथिल हो गया और स्वयं महादेव स्तम्भित हो गये। देवताओं की प्रार्थना से दोनों ने युद्ध बन्द कर दिया। देवताओं ने इस घटना से विष्णु को अधिक श्रेष्ठ माना। रामाभिरामी टीका के अनुसार इस युद्ध में विष्णु की उत्कृष्टता सिद्ध हुई है। त्रिपुरवध में विष्णु बाण बनकर शिव के उपकरण हुए थे। अतः दोनों समान ही हैं।