रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४०५ शिवपुराण एवं शिवमहिम्न के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही ज्योतिर्लिङ्गरूप भगवान् का अन्त नहीं पा सके । अतएव विष्णु भगवान् सदा सहस्र कमलों से शिव की अर्चा किया करते थे । भक्ति-परीक्षा के लिए एक दिन शिवजी ने एक कमल लुप्त कर दिया, तब विष्णु ने अपना नेत्रकमल ही चढ़ा दिया । शिव भगवान् के वरदान से वह नेत्र ही सुदर्शनचक्र हो गया । इस तरह शिव और विष्णु दोनों ही वस्तुतः एक हैं, फिर भी एक दूसरे की उपासना करते हैं तथा एक दूसरे को अपने से उत्कृष्ट प्रख्यापित करते हैं । वाल्मीकिरामायण तथा अन्य राम-कथाओं में विवाह के पश्चात् अयोध्या की यात्रा के समय परशुराम आते हैं । “राम रामापति कर धनु लेहू । खैंचहु चाप मिटै सन्देहू ॥ ( रा० मा० १।२८३।४) उनके यह कहने पर ज्यों ही राम विष्णु का धनुष चढ़ाते हैं, परशुराम निस्तेज हो जाते हैं और युद्ध का अवसर ही नहीं आता । वे राम को विष्णु समझकर प्रणाम करते हैं । राम ने चढ़े हुए बाण से परशुराम के तपोबल से संचित लोकों को नष्ट कर दिया, क्योंकि राम का बाण अमोघ था और ब्राह्मण परशुराम पर प्रहार करना राम को इष्ट नहीं था । उनकी दिव्य गति पर बाण का प्रयोग इसलिए नहीं किया कि परशुराम ने यह कहा कि कश्यप के अनुरोध से मैं पृथ्वी पर निवास नहीं कर सकता । मैं समुद्र से नया स्थान महेन्द्राचल लेकर वहीं रहता हूँ । दिव्यगति नष्ट होने पर वहाँ पहुँचना असंभव होगा, अतः मेरे तपोबल से अर्जित लोकों पर ही बाण चलाइये । कहते हैं, परशुराम एक सुयोग्य प्रतिद्वन्द्वी क्षत्रिय से युद्ध करना चाहते थे । पर यह कथन निष्प्रमाण ही है । सहस्रबाहु कार्तवीर्यार्जुन जैसे महान् क्षत्रियों से वे द्वन्द्वयुद्ध कर ही चुके थे । महाभारत के अनुसार उन्होंने भीष्म से २१ दिन तक द्वन्द्वयुद्ध किया था । परशुराम राम से कहते हैं विष्णु-धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा दो तो मैं तुमसे द्वन्द्वयुद्ध करूँगा । शिव-धनुष और विष्णु-धनुष दोनों ही विश्वकर्मा से निर्मित थे । अध्यात्मरामायण के अनुसार परशुराम कहते हैं—या तो अपना राम नाम छोड़ दो अथवा मुझसे युद्ध करो । नृसिंहपुराण में भी ऐसा उल्लेख है— “त्यज त्वं रामसंज्ञां तु मया वा समरं कुरु ।” “त्वं राम इति नाम्ना मे चरसि क्षत्रियाधम । द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि वै ॥ अध्यात्मरामायण ( १।७।११ ) तथा आनन्दरामायण ( १।३।३५ ) में भी ऐसा ही उल्लेख है । अध्यात्मरामायण के अनुसार “पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ।” ( १।७।८२ ) परशुराम कहते हैं तुम जर्जर पुराने धनुष को तोड़कर व्यर्थ डींग हांकते हो । यहाँ वे शिव-धनुष का अपमान नहीं करते हैं, परन्तु उसकी प्राचीनता कहकर राम के पराक्रम का ही अपकर्ष बताना चाहते हैं । अतएव अन्यत्र परशुराम को शिव का शिष्य माना गया है और शिव-धनुष तोड़ने को वे अपने गुरु का अनादर समझते हैं— “सुनहु राम जो शिव-धनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा ॥” ( रा० मा० १।२७०।२ ) वस्तुतः इनका कोई विरोध नहीं है ।