भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 483

४०६ रामायणमीमांसा त्रयोदश वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड में वर्णित परशुराम की कथा को बुल्के विकास या प्रक्षिप्त मानते हैं, क्योंकि महाभारत के रामोपाख्यान में उसका संकेत नहीं है । परन्तु उनका यह मत सर्वथा अशुद्ध है, कारण रामो- पाख्यान में संक्षिप्त रामकथा का वर्णन है । जब वाल्मीकिरामायण महाभारत से प्राचीन है तो उसकी कथावस्तु का अस्तित्व अर्वाचीन महाभारत पर कैसे निर्भर हो सकता है ? अतः परशुराम की कथा को अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता है । महाभारत के अनुसार परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा के अनुसार अपनी माता रेणुका का वध किया था । आज्ञापालन के फलस्वरूप वर पाकर उसे पुनः जिलाया था ( म० भा० ३।११६ ) । रामचरितमानस में भी उसकी चर्चा है— “परशुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥ ( रा० मा० २।१७२।४ ) । इसी तरह कार्तवीर्यार्जुन ने जमदग्नि की कामधेनु का हरण किया था तब परशुराम ने उसका वध किया था । सहस्रार्जुन के पुत्रों ने जामदग्न्य की अनुपस्थिति में जमदग्नि को मार डाला । उन्होंने उसके प्रतीकारस्वरूप पृथिवी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन बना दिया था । कश्यप को पृथिवी देकर स्वयं महेन्द्र पर्वत पर रहने लगे—म० भा० ३।११७।१४ तथा शान्तिपर्व ४९ अध्याय— ‘त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ॥ ६४ ॥’ वाल्मीकिरामायण के अनुसार परशुराम क्षत्रियविरोधी थे । वे राम द्वारा धनुर्भङ्ग सुनकर उनसे द्वन्द्वयुद्ध करने के लिए प्रस्तुत थे । प्रसन्नराघव, रामचरितमानस तथा कृत्तिवासरामायण में लक्ष्मण परशुराम से कुछ उग्रता से बातें करते हैं । रामचन्द्रिका में भरत तथा शत्रुघ्न भी वार्तालाप में भाग लेते हैं । अन्त में महादेव आकर विवाद शान्त करते हैं । महावीरचरित, अनर्घराघव तथा प्रसन्नराघव में राम तथा परशुराम युद्ध करने के लिए रङ्गमञ्च पर आ जाते हैं; परन्तु राम के वैष्णव धनुष चढ़ाने से परशुराम का तेजोभङ्ग होने के कारण युद्ध की नौबत नहीं आती । शङ्कर- देवकृत रामविजय के अनुसार अयोध्या के मार्ग में परशुराम राम का वध करने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि उन्होंने उनके गुरु का धनुष तोड़ डाला था । द्वन्द्वयुद्ध में राम ने उन्हें पराजित किया । तोरवेरामायण में राम ने तोमर से परशुराम का परशु आकाश में फेंक दिया तथा अपने रथ से उतरकर, परशुराम का धनुष छीन लिया । इन अंशों को वस्तुतः विकार ही समझना चाहिये, क्योंकि ये सब राम की ब्रह्मण्यता तथा धीरोदात्तता के विरुद्ध हैं । विदेशी राम- कथाओं में उक्त संघर्ष और भी उग्र हो जाता है । खोतानी रामायण के अनुसार दशरथ ने परशुराम के पिता के आश्रम में कामधेनु गाय देखी तथा दशरथ का पुत्र सहस्रबाहु उसका अपहरण करने को गया । परशुराम ने तपस्या द्वारा कुठार प्राप्त कर सहस्रबाहु का वध किया । बाद में सहस्रबाहु के पुत्र राम तथा लक्ष्मण परशुराम को खोज में निकले । अन्त में राम ने बाण से परशुराम को मार डाला। यह भी विदेशियों के भारतीय शास्त्रानभिज्ञता का ही परिणाम है । उन्हें हैहयवंश तथा रघुवंश का भेद ज्ञात न होने से इस प्रकार का विपर्यय हुआ है । सेरीराम के अनुसार पुष्पराम ( परशुराम ) राम को आदेश देते हैं कि अपना राम नाम छोड़ दो । अस्वीकार करने पर राम से उनका युद्ध होता है । अगले दिन राम का बाण पुष्पराम का पोछा करता है । वे स्वर्ग, पाताल और सागर में भ्रमण करके कहीं त्राण न पाकर राम की ही शरण लेते हैं । रामकियेन के अनुसार राम ने द्वन्द्वयुद्ध के अन्त में अपने को नारायण के रूप में प्रकट किया, इसपर रामासुर ने राम को ईश्वर का धनुष प्रदान किया । राम ने उसे ले लिया । उसे आकाश में फेंक दिया, जिससे आवश्यकता पड़ने पर वह धनुष उनके काम आ सके । कहना न होगा कि विविध देशों में होकर के उन देशों में पहुँचने तक राम-कथा में अनेक विकृतियाँ आ गयी हैं ।