भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १६ ) शाखाभेद से वेदों के पाठभेदों के तुल्य वाल्मीकिरामायण के सभी पाठभेद प्रामाणिक ५०४ राम के प्रति तारा का शाप ५०४ अङ्गद को अपनी पीठ पर रख समुद्र पार ले जाने के लिए सम्पाति द्वारा अपने पुत्र का आह्वान प्रक्षिप्त नहीं ५०४ केसरी को दिग्गजधवल का वध करने पर वररूप मरुद्विक्रम पुत्र हनुमान् की प्राप्ति ५०४ बालि-वध सर्ग १७ और १८ प्रक्षिप्त नहीं ५०४ महाभारत-रामोपाख्यान वाल्मीकिरामायण का संक्षेप ५०४ बुल्के का प्रामाणिक पाठनिर्धारण वानरीय पङ्कजविश्लेषणमात्र ५०४ सर्ग ३१, ३२, ३५, ३७, ३९ आदि प्रक्षिप्त नहीं ५०४ भारतीय परम्परा में ये सभी प्रामाणिक ५०४ निशाकर ऋषि और सम्पाति की कथा विस्तृत होनेमात्र से प्रक्षिप्त नहीं ५०४ हनुमान् की जन्मकथावाले सर्ग को वाल्मीकिकृत न मानना अल्पज्ञ का सा मखौल ५०४ परस्परविरोधी उल्लेखों के कारण अन्य सर्ग भी प्रतिभाशाली कवि वाल्मीकि-कृत नहीं, प्रक्षिप्त हैं—बुल्के ५०४ भारतीय परम्परानभिज्ञ होने के कारण ही पाश्चात्य विद्वानों को शास्त्रों में भ्रान्ति ५०६ शास्त्रों में ही नहीं, वेद में भी भ्रान्ति होती है ५०६ वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुग्रीव का राम-लक्ष्मण को देख वालिप्रेषित जानकर पता लगाने हनुमान् को भेजना ५०६ अन्य रामायणों के अनुसार हनुमान् की कथा ५०६ वाली और सुग्रीव की जन्मकथा ५०७ वाली और सुग्रीव की शत्रुता का कारण ५०९ वाली का वध ५१० राम के सम्मुख खड़े होने की इन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मा तथा त्रिपुरान्तक में भी क्षमता नहीं ५१२ अङ्गद और हनुमान् दोनों राम के परम प्रिय भक्त ५१२ बालिवध-दोष निवारण ५१२ राम की चातुर्मास्यसाधना ५१३ राम की नवरात्रोपासना ५१३ सीतान्वेषणार्थ वानरों का प्रेषण ५१३ अङ्गद आदि का ऋक्षबिल गुफा में प्रवेश ५१४ सम्पाति और जटायु का इन्द्रविजयार्थ स्वर्गगमन ५१५ इन्द्रविजय कर लौटते समय दर्प से दोनों का सूर्य के निकट गमन ५१५ निशाकर ऋषि के कथनानुसार रामदूतों के आगमन से पुनः पर उगने पर ऋषिजी के वचनों पर दृढ़ीभूत विश्वास से हर्षित हुए सम्पाति का पुनः विस्तार से कथा कहना ५१६ आदित्य-किरणों से दग्ध उसके पर मुनि के प्रभाव से पुनः उग गये ५१७ सप्तदश अध्याय सुन्दरकाण्ड ४१९-५३५ हनुमान् का लङ्का-प्रवेश तथा लङ्का-वर्णन आदि सुन्दरकाण्डीय सब विषयों का दिग्दर्शन ५१९