भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १७ ) सुन्दरकाण्ड में भी बुल्के द्वारा पाठभेद की चर्चा, जो सिद्धान्ततः मान्य ५१९ सुन्दरकाण्ड में भी सर्ग २ से ११ तक १० सर्गों में पुनरावृत्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं आदि बुल्के की अनेक कल्पनाएँ निस्सार ५१९ त्रिजटा का स्वप्न ५१९ सीता के विविध शुभ शकुनों का वर्णन ५१९ सर्ग २९ और ३० की परस्पर सङ्गति सुस्पष्ट एवं टीकाकारों द्वारा प्रामाणिक मानकर उनकी व्याख्या ५२० अचिन्त्यबुद्धि हनुमान् का दर्शन ५२० भीमसत्त्व वानर के दुरासद और दुर्निरीक्ष्य रूप को देखकर सीता का मोह ५२० सीता के विश्वस्त होने के पूर्व उन्हें हनुमान् का आत्मपरिचय देना अस्वाभाविक है, यह कथन ठीक नहीं ५२० परस्पर सम्बद्ध और सङ्गत सुन्दरकाण्ड के समग्र वृत्तान्त को असम्बद्ध कहना अनभिज्ञता ५२० अयोध्या लौटते समय भरद्वाजजी ने सभी घटनाओं का वर्णन किया, लङ्कादहन का नहीं यह कहना निस्सार है 'कर्म वातात्मजस्य' से समुद्रलङ्घन से लेकर लङ्कादहन पर्यन्त हनुमान् के कृत्य का वर्णन किया ही है ५२३ लङ्कादहन वाल्मीकिरामायण का अविभाज्य अङ्ग ५२३ लङ्कादहन किष्किन्धाकाण्ड का अंश नहीं ५२३ लङ्कादेवी की पराजय ५२५ लङ्का में सीता की खोज ५२५ सीता-रावण-संवाद ५२६ त्रिजटा-स्वप्न ५२८ सीता-हनुमान्-संवाद ५३१ अभिज्ञानप्रदान ५३२ लङ्कादहन ५३२ हनुमान् का राम के निकट अपनी लङ्कायात्रा का वर्णन ५३३ अष्टादश अध्याय युद्धकाण्ड ५३६-५८९ युद्धकाण्ड के समग्र वृत्तान्तों का संक्षेप में वर्णन ५३६ बुल्के का यह कथन कि गायकों ने युद्धकाण्ड का कलेवर बढ़ाने में संकोच नहीं किया, ठीक नहीं ५३६ सर्ग १-३, ६-८, १०-१५ तथा २० को प्रक्षेप मानना निराधार ५३६ याकोबी का तर्काभासों के आधार पर सर्ग २६-४० को प्रक्षिप्त कहना निस्सार ५३६ बुल्के, याकोबी आदि के मत में सभी काण्ड अप्रामाणिक एवं पाश्चात्यों के विचार से फिट अंश को छोड़कर सभी में प्रक्षेप ५३६ बुल्के के मन्तव्यानुसार सर्ग ४२-११२ में इतनी पुनरावृत्ति और नीरसता दृष्टिगोचर होती है कि उस समग्र सामग्री का वाल्मीकि जैसे महाकवि की कृति होना सम्भव नहीं ५३७ इन्द्रजित्कृत नागमय बाणों की वृष्टि द्वारा राम और लक्ष्मण का शरबन्धन ५३७ 3