भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १८ ) नागपाशबद्ध राम का विशिष्टसत्त्वयोगवश कुछ क्षणों के लिए प्रबुद्ध हो लक्ष्मण की दशा परशोक करना ५३७ वैनतेय के आगमन पर त्रस्त बाणरूपी पन्नगों का पलायन एवं दोनों भ्राताओं की बन्धन से मुक्ति ५३८ अकम्पन तथा नरान्तक पूर्वहृत अकम्पन और नरान्तक से भिन्न ५३८ रावण का रणभूमि में उपस्थित हो लक्ष्मण से युद्ध एवं शक्ति द्वारा लक्ष्मण को घायल करना ५३९ राम-रावण संग्राम, राम ने उसके ऊपर ऐसा भीषण प्रहार किया कि उसके चक्र, अश्व, ध्वज, पताका, सारथि तथा वज्र, शूल और खङ्ग-सहित रथ नष्ट हो गया ५३९ राम ने रावण को विपन्न देख कहा—रात्रिञ्चर, तुम क्लान्त हो, लङ्का में जा विश्राम करो, पुनः रथी, धन्वी होकर आना तब मेरा बल देखना ५३९ पद्मपुराण, कालिकापुराण आदि के अनुसार युद्धकाल एवं योद्धाओं की तालिका ५४३ हनुमान् की हिमालय-यात्रा प्रक्षिप्त नहीं ५४९ अग्निपरीक्षा तथा पुष्पक द्वारा अयोध्यागमन का वृत्तान्त प्रक्षिप्त नहीं ५४९ आतिथ्यस्वीकार करने के निमित्त विभीषण की प्रार्थना पर राम का मेरा मन भाई भरत को देखने को अत्यन्त आतुर है, पुष्पक लाओं जिससे मैं शीघ्र अयोध्या पहुँचूं कहना ५५० राम का भरद्वाज आश्रम में आगमन ५५१ राम के बिना माँगे महर्षि द्वारा वर प्रदान ५५१ सभी वानरों के स्वागत-सम्मानार्थ राम द्वारा मार्ग के निकटस्थ अमृतोपमफल और मधुस्रावी वृक्ष होने का वरदान महर्षि से माँगना ५५१ भरद्वाज आश्रम से हनुमान को अयोध्या भेजना ५५२ सुग्रीव, विभीषण आदि के समुचित स्वागतार्थ हनुमान् को अयोध्या भेजना ५५२ विभीषण को शरणागति ५५७ उसकी ग्राह्यता या अग्राह्यता का विस्तृत विचार ५५८ विभीषणचरित ५६४ सेतुबन्ध ५६५ द्रुमकुल्य-विनाश ५६६ रामेश्वरप्रतिष्ठा ५६८ लङ्कावरोध ५६८ रामसेना की टोह लेने आये शुक, सारण और शार्दूल की सीता लौटा देने की रावण को सलाह ५६९ राम के मायाशीर्ष का वृत्तान्त ५७० नागपाशबन्धन ५७२ औषधि आनयनार्थ हनुमान् की हिमालय-यात्रा ५७३ कुम्भकर्ण-वध ५७५ इन्द्रजित् का मायासीता का सिर काटना ८७८ इन्द्रजित्-वध ५७८ रावण-वध ५७९ रावण का मर्मस्थान ५८२ रावण-मुक्ति ५८३