भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५२४ रामायणमीमांसा सप्तदश यह सब सुनकर हम सब निर्णय करेंगे कि राम, लक्ष्मण और सुग्रीव के पास जाकर क्या कहना है और क्या नहीं कहना है— “यथार्थस्तत्र वक्तव्यो गतेरस्माभिरात्मवान् । रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥” (वा० रा० ५।५८।६) रामसम्बन्धी विस्तृत चरित्र जहाँ आध्यात्मिक, धार्मिक एवं शिक्षाप्रद है वहीं श्रवणमात्र से कल्याणप्रद भी है, अतः संक्षेप तथा विस्तार दोनों ही प्रकार का वर्णन है । ५९, ६० में भी परमावश्यक ही आंशिक पुनरावृत्ति है । मधुवन का उत्पात कथावस्तु की गति में बाधक नहीं है, किन्तु कथा का अङ्ग ही है । आज भी महान् कार्य करने के बाद कुछ आमोद-प्रमोद की खुली छूट देखी ही जाती है । विजयोत्सव में भी ऐसी स्थितियाँ आती हैं । वाल्मीकि- रामायण महाकाव्य है, अतः प्रासङ्गिक हास्य भी महाकाव्य का पूरक ही है । कोई भी कार्य सीधा नहीं होता, बीच में कई अन्य कार्य और समस्याएँ आती ही हैं । इस तरह आधुनिक नास्तिक एवं विधर्मी लोगों ने अनेक अनर्गल दुष्कल्पनाओं द्वारा प्रचलित रामायण को संदिग्ध बनाने का प्रयास किया है । उनकी तथाकथित आदिरामायण नाम की वस्तु खपुष्पतुल्य ही है । उसका कोई सर्वसम्मत रूप है ही नहीं । उनका अन्वेषण केवल अव्यवस्था का ही मूल है । जिन पाँच काण्डों को वे प्रामाणिक मानते हैं जब उन काण्डों के सम्बन्ध में यह स्थिति है तब फिर अनभिमत दो काण्डों के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है ? ५३१ वें अनु० में दाक्षिणात्य पाठ में समुद्रलङ्घन के विस्तार के सम्बन्ध में भी बुल्के की दुर्द्दृष्टि है । परन्तु वह सर्वथा असङ्गत है । वाल्मीकिरामायण में मैनाक, सुरसा और सिंहिका के मिलने का क्रम है । वाल्मीकिरामायण गौडीय पाठ में, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण में एवं कृत्तिवासरामायण आदि में सुरसा, मैनाक और सिंहिका के मिलने का क्रम है । कम्बरामायण, उड़िया बलरामदासरामायण तथा तोरवेरामायण में दाक्षिणात्य पाठ का ही क्रम रखा गया है । श्याम के रामजातक में हनुमान् और अङ्गद दोनों का साथ लङ्का जाना लिखा है । सेरीराम के अनुसार कोई दृढ़ आधार न देखकर हनुमान् राम की बाहु से ही समुद्र का लङ्घन करते हैं । इस कथा में समुद्र में हनुमान् का वीर्य गिर गया है, उसे समुद्र की रानी मछली ने खाकर मकरध्वज को उत्पन्न किया । बिर्होर तथा सन्ताल आदिवासियों की कथा के अनुसार राम द्वारा चलाये गये बाण के आधार पर हनुमान् ने समुद्र पार किया था । एक अन्य कथा के अनुसार हनुमान् पहले एक बाण चलाते हैं तब कूद कर उस पर सवार होते हैं । अनेक वृत्तान्तों के अनुसार हनुमान् अपने लक्ष्य से बहुत दूर आगे जाकर उतरते हैं । सेरीराम के अनुसार वे किसी महर्षि के आश्रम में जाकर उनका आतिथ्य ग्रहण करते हैं । पुनः उनके मार्ग-प्रदर्शन में लङ्का-प्रवेश करते हैं । रामकियेन के अनुसार नारद के आश्रम में उतरकर उनके अनुग्रह से लङ्का-प्रवेश करते हैं । तोरवेरामायण के अनुसार हनुमान् लङ्का से ७०० योजन दूर एक टापू पर उतर कर तृणबिन्दु मुनि के निर्देश से पुनः पीछे लौटकर लङ्का गये । आनन्दरामायण ( १।९।१७ ) के अनुसार हनुमान् परलङ्का में पहुँचकर रावण की बहन क्रौञ्चा का वध करते हैं । भावार्थरामायण ( ५।१८ ) के अनुसार लङ्का की उपनगरी परलङ्का थी । वहाँ रावण की विधवा बहन अपनी १८०० दासियों के साथ निवास करती थी । हनुमान् ने दासियों को समुद्र में फेंककर क्रौञ्चा का वध किया । समुद्र-लङ्घन को बुल्के ने प्रक्षेप नहीं कहा, यही गनीमत है । मूल कथा वाल्मीकिरामायण का ही कहीं विकास और कहीं विकृति हुई समझना उचित है । हनुमान् का छद्मवेश वाल्मीकिरामायण के अनुसार बिडाल के