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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

५२४ रामायणमीमांसा सप्तदश यह सब सुनकर हम सब निर्णय करेंगे कि राम, लक्ष्मण और सुग्रीव के पास जाकर क्या कहना है और क्या नहीं कहना है— “यथार्थस्तत्र वक्तव्यो गतेरस्माभिरात्मवान् । रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥” (वा० रा० ५।५८।६) रामसम्बन्धी विस्तृत चरित्र जहाँ आध्यात्मिक, धार्मिक एवं शिक्षाप्रद है वहीं श्रवणमात्र से कल्याणप्रद भी है, अतः संक्षेप तथा विस्तार दोनों ही प्रकार का वर्णन है । ५९, ६० में भी परमावश्यक ही आंशिक पुनरावृत्ति है । मधुवन का उत्पात कथावस्तु की गति में बाधक नहीं है, किन्तु कथा का अङ्ग ही है । आज भी महान् कार्य करने के बाद कुछ आमोद-प्रमोद की खुली छूट देखी ही जाती है । विजयोत्सव में भी ऐसी स्थितियाँ आती हैं । वाल्मीकि- रामायण महाकाव्य है, अतः प्रासङ्गिक हास्य भी महाकाव्य का पूरक ही है । कोई भी कार्य सीधा नहीं होता, बीच में कई अन्य कार्य और समस्याएँ आती ही हैं । इस तरह आधुनिक नास्तिक एवं विधर्मी लोगों ने अनेक अनर्गल दुष्कल्पनाओं द्वारा प्रचलित रामायण को संदिग्ध बनाने का प्रयास किया है । उनकी तथाकथित आदिरामायण नाम की वस्तु खपुष्पतुल्य ही है । उसका कोई सर्वसम्मत रूप है ही नहीं । उनका अन्वेषण केवल अव्यवस्था का ही मूल है । जिन पाँच काण्डों को वे प्रामाणिक मानते हैं जब उन काण्डों के सम्बन्ध में यह स्थिति है तब फिर अनभिमत दो काण्डों के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है ? ५३१ वें अनु० में दाक्षिणात्य पाठ में समुद्रलङ्घन के विस्तार के सम्बन्ध में भी बुल्के की दुर्द्दृष्टि है । परन्तु वह सर्वथा असङ्गत है । वाल्मीकिरामायण में मैनाक, सुरसा और सिंहिका के मिलने का क्रम है । वाल्मीकिरामायण गौडीय पाठ में, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण में एवं कृत्तिवासरामायण आदि में सुरसा, मैनाक और सिंहिका के मिलने का क्रम है । कम्बरामायण, उड़िया बलरामदासरामायण तथा तोरवेरामायण में दाक्षिणात्य पाठ का ही क्रम रखा गया है । श्याम के रामजातक में हनुमान् और अङ्गद दोनों का साथ लङ्का जाना लिखा है । सेरीराम के अनुसार कोई दृढ़ आधार न देखकर हनुमान् राम की बाहु से ही समुद्र का लङ्घन करते हैं । इस कथा में समुद्र में हनुमान् का वीर्य गिर गया है, उसे समुद्र की रानी मछली ने खाकर मकरध्वज को उत्पन्न किया । बिर्होर तथा सन्ताल आदिवासियों की कथा के अनुसार राम द्वारा चलाये गये बाण के आधार पर हनुमान् ने समुद्र पार किया था । एक अन्य कथा के अनुसार हनुमान् पहले एक बाण चलाते हैं तब कूद कर उस पर सवार होते हैं । अनेक वृत्तान्तों के अनुसार हनुमान् अपने लक्ष्य से बहुत दूर आगे जाकर उतरते हैं । सेरीराम के अनुसार वे किसी महर्षि के आश्रम में जाकर उनका आतिथ्य ग्रहण करते हैं । पुनः उनके मार्ग-प्रदर्शन में लङ्का-प्रवेश करते हैं । रामकियेन के अनुसार नारद के आश्रम में उतरकर उनके अनुग्रह से लङ्का-प्रवेश करते हैं । तोरवेरामायण के अनुसार हनुमान् लङ्का से ७०० योजन दूर एक टापू पर उतर कर तृणबिन्दु मुनि के निर्देश से पुनः पीछे लौटकर लङ्का गये । आनन्दरामायण ( १।९।१७ ) के अनुसार हनुमान् परलङ्का में पहुँचकर रावण की बहन क्रौञ्चा का वध करते हैं । भावार्थरामायण ( ५।१८ ) के अनुसार लङ्का की उपनगरी परलङ्का थी । वहाँ रावण की विधवा बहन अपनी १८०० दासियों के साथ निवास करती थी । हनुमान् ने दासियों को समुद्र में फेंककर क्रौञ्चा का वध किया । समुद्र-लङ्घन को बुल्के ने प्रक्षेप नहीं कहा, यही गनीमत है । मूल कथा वाल्मीकिरामायण का ही कहीं विकास और कहीं विकृति हुई समझना उचित है । हनुमान् का छद्मवेश वाल्मीकिरामायण के अनुसार बिडाल के

अध्याय सुन्दरकाण्ड ५२५ आकार के छोटे बन्दर का रूप था। उसी रूप को धारण कर हनुमान् लङ्का में प्रवेश करते हैं— “सूर्ये चास्तं गते रात्रौ देहं संक्षिप्य मारुतिः । वृषदंशकमात्रोऽथ बभूवादभुतदर्शनः ॥” ( वा० रा० ५।२।४७ ) वृहद्धर्मपुराण ( पू० ख० अ० २०१२ ), पद्मपुराण ( वंगीय पाठ १८४२ पृ० ११२६ ) आदि में बिडाल के रूप में ही हनुमान् का लङ्का-प्रवेश कहा गया है। रामचरितमानस के अनुसार मशक के समान रूप धारण कर हनुमान् ने लङ्का-प्रवेश किया— “मशक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥” ( रा० मा० ५।३।१ ) सम्भवतः लङ्का के मच्छर भी छोटे बन्दरों के तुल्य रहे होंगे । उत्तरपुराण ( ६८।२९८ ) में भ्रमरतुल्य रूप धारण कहा गया है। रामकियेन ( अ० २४ ) के अनुसार राक्षसरूप धारण करके हनुमान् ने लङ्का-प्रवेश किया था । अध्यात्मरामायण ( ५।३।२० ) के अनुसार चटक पक्षी के तुल्य बन्दर होकर वे प्रविष्ट हुए थे । आनन्दरामायण ( ८।७।२९ ) के अनुसार छोटे बालक के रूप में वे सीता के सामने प्रकट हुए थे। धनञ्जयकृत गणकचरित्र के अनुसार हनुमान् क्रमशः भ्रमर, बिडाल तथा ज्योतिषी का रूप धारण करते हैं । कई कथाएँ कल्पभेद से संगत हो सकती हैं। लङ्कादेवी वाल्मीकिरामायण ( दाक्षिणात्य पाठ प्रक्षेप ३।२०-५१ ) के अनुसार लङ्कादेवी राक्षसी के रूप में हनुमान् को रोक लेती है । हनुमान् से पराजित होकर वह कहती है, स्वयंभू ने कहा है कि तुम्हारी पराजय के बाद राक्षसों का विनाश होगा । अध्यात्मरामायण ( ५।१।५७ ) में वह कहती है आज बहुत दिनों के बाद मुझे संसार-बन्धन से मुक्ति देनेवाली राघव की स्मृति हुई है । उनके भक्त का अति दुर्लभ सत्संग मिला है। मैं धन्य हूँ । आनन्दरामायण ( १।९।२१ ) में लङ्कादेवी हनुमान् से सीता के रहने के स्थान का रहस्य प्रकट करती है। रामचन्द्रिका ( १३।४४ ) के अनुसार हनुमान् से पराजित होने के बाद वह ( सुन्दरी नारी ) हो जाती है । रामदूत हनुमान् का दर्शन पाकर उसके मन में भी भक्तिभावना उत्पन्न हुई हो यह असम्भव नहीं है । तभी रामचरितमानसकार ने भी इसे स्वीकार किया है— “तात मोर अति पुण्य बहूता । देखिउँ नयन राम कर दूता ॥” ( रा० मा० ५।३।४ ) तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला इक अंग । तुलै न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥” ( रा० मा० ५।४ ) “प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कोसलपुर राजा ॥” ( रा० मा० ५।४।१ ) पउमचरियं के अनुसार लङ्कासुन्दरी के साथ हनुमान् रात भर प्रेमक्रीड़ा करते हैं । यह वाल्मीकिरामायण आदि से स्पष्टतः विरुद्ध ही है । बृहद्धर्मपुराण ( अध्याय २० ) के अनुसार चण्डिकादेवी लङ्का में निवास करती थी । शिवावतार हनुमान् उनसे लङ्का त्याग देने की प्रार्थना करते हैं । सीता के अपमान के कारण वह लङ्का त्याग देती हैं। लङ्का में सीता की खोज वाल्मीकिरामायण में कहा गया है कि हनुमान् ने मुख्य राक्षसों के महलों में तथा रावण के अन्तःपुर में सीता की खोज की ( सर्ग १०,११ ) । फिर अशोकवन में चले गये । परन्तु परवर्ती कथाओं में वे विभीषण से भेंट

५२६ रामायणमीमांसा सप्तदश... करते हैं। पउमचरियं के अनुसार विभीषण ने हनुमान् का स्वागत किया और सीता को लौटाने के लिए रावण से आग्रह करने की प्रतिज्ञा की थी। गुणभद्र के अनुसार हनुमान् दूसरी बार जाकर विभीषण से मिलते हैं। विभीषण रावण को समझाते हैं और हनुमान् को रावण के पास ले जाते हैं। उनके समझाने पर भी वह नहीं मानता, यह सब नवीनता लाने का प्रयत्नमात्र है। तुलसीदास के अनुसार विभीषण के रामनामस्मरण से उसे भक्त जानकर हनुमान् उससे पहिचान करते हैं और राम की महिमा का वर्णन करते हैं— “राम नाम तेहि सुमिरन कीन्हा। हृदय हरषि कपि सज्जन चीन्हा॥ एहि सन हठि करिहउ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥” (रा० मा० ५।५।२) “प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिले अहारा॥” (रा० मा० ५।६।४) “अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे विलोचन-नीर॥” (रा० मा० ५।७) तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार हनुमान् रावण तथा उसकी पत्नियों के सब वस्त्र समेट कर ले गये थे। रामकेर्ति और रामजातक के अनुसार हनुमान् ने रावण तथा मन्दोदरी के बालों को बाँधकर मन्त्र पढ़कर लिख दिया था कि जब मन्दोदरी रावण को थप्पड़ मारेगी तभी यह गाँठ खुलेगी। भावार्थरामायण के अनुसार हनुमान् ने रावण के सामने ही अनेक उत्पात किये थे। रावण की सभा के दीपकों को बुझा दिया था। सीता-रावण-संवाद ५४० वाँ अनु० सीता को लङ्का में न पाकर अशोकवन में प्रवेश कर हनुमान् सीता को देखते हैं। रावण अपनी पत्नियों के साथ दीनतापूर्वक सीता से निवेदन करता है कि वह उसे पति के रूप में स्वीकार कर लें। सीता ने उसके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर उसको उपदेश दिया कि मुझको राम के पास पहुँचा दे, अन्यथा राम अवश्य उसका वध करेंगे। रावण ने क्रुद्ध होकर दो मास की अवधि दी कि यदि तुम दो महीने में मेरा प्रस्ताव स्वीकार नहीं करोगी तो तुम्हारा शरीर काटकर राक्षस लोग उसे मेरे प्रातः भोजन (कलेवा) के लिए तैयार करेंगे यह कह- कर उसने राक्षसियों को आदेश दिया कि वे सब सीता को वश में लाने का प्रयत्न करती रहें। वाल्मीकिरामायण (५।१८।५) के अनुसार रावण का यह अशोकवन में आगमन कामवासनामूलक ही था। परन्तु अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, तत्त्वसंग्रहरामायण आदि के अनुसार रावण उत्सुकतापूर्वक राम के आगमन की प्रतीक्षा करता था, क्योंकि उसे विष्णु के हाथों से मरकर मुक्ति प्राप्त करने की अभिलाषा थी। उसी दिन उसने स्वप्न देखा था कि राम का सन्देश लेकर कोई कामरूपी वानर वृक्ष की शाखा पर बैठकर सीता को देख रहा है। स्वप्न की सत्यता की सम्भावना से ही वह वाग्बाणों से सीता को दुःख पहुँचाने के लिए गया, जिससे वानर यह सब देखकर राम को सुनावे और मुझे शीघ्र ही मुक्ति मिल जाय। यह कहा जा चुका है कि वाल्मीकिरामायण में लौकिक ऐतिहासिक वर्णन की प्रधानता होने से उसमें अधिकांश लौकिक ही वर्णन मिलता है; किन्तु अध्यात्मरामायण आदि आध्यात्मिक रहस्यों का भी वर्णन करते हैं। अतः बाह्यरूप से रावण की काममूलक प्रवृत्ति होने पर अन्तरङ्ग अभिरुचि मुक्ति की ही थी। धर्मखण्ड (अ० १०५) के अनुसार रावण सीता को मार डालना चाहता था, किन्तु मन्दोदरी उसे वैसा करने से रोक देती है। हनुमान् प्रकट होकर उसकी छाती पर मुष्टिप्रहार करते हैं। जिससे वह भयभीत होकर भाग जाता है।

प्रसन्नराघव (अङ्क ६।३४) में यह दिखाया गया है कि रावण सीता का वध करना ही चाहता था कि हनुमान् ने रावण के हाथ पर अक्षयकुमार का मस्तक रख दिया। जिसे देखकर वह मूच्छित होकर गिर पड़ा। बाद में सचेत होकर हनुमान् को पकड़ने के लिए सीता को छोड़कर चला गया। यह सब वर्णन चमत्कृति की अभि- व्यक्ति के उद्देश्य से ही है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता को प्रलोभन देने के लिए उसने लङ्का का वैभव दिखाया था। परवर्ती रचनाओं में अनेक उपायों का सहारा लिया गया है। उत्तरपुराण के अनुसार मञ्जरिका नाम की रावण-दूती की चर्चा है। गणकचरित में रावण ने मायामय राम और लक्ष्मण की सृष्टि की। रावण चाहता था कि वे राम और लक्ष्मण सीता से अनुरोध करें कि वह रावण को पति मान लें। इतने में हनुमान् ज्योतिषी के रूप में लङ्का में प्रवेश कर गये। बाद में वह भ्रमर बनकर मालिनी के फूलों पर बैठकर मन्दोदरी के महल में पहुँच गये। मन्दोदरी के यहाँ हनुमान् ने बिडाल का रूप धारण कर लिया। मन्दोदरी ने बिडाल को खिलाया। बिडाल उसका माणिक्य छीनकर उसके स्तनों पर नखक्षत कर भाग गया। तब हनुमान् अशोकवन में पहुँचे ! जब मायामय राम रावण से जीवन की भिक्षा माँग रहे थे। रावण को ज्योतिषी के गले में कण्ठमाणिक्य देखकर आश्चर्य हुआ। हनुमान् ने कहा यह माणिक्य एक गन्धर्व से मिला है। जिसका मन्दोदरी से अनुचित सम्बन्ध है। उसने मन्दोदरी के स्तनों में नखक्षत किया है। इसपर रावण ने क्रुद्ध होकर ज्योतिषी को पकड़ लिया और कहा कि यदि तुम्हारा अभियोग सच निकलेगा तो इनाम मिलेगा। अन्यथा तुम्हारा वध होगा। अन्त में हनुमान् का कहा सच निकला। नखक्षत मिल गया ! बाद में हनुमान् सीता के पास आकर उनका समाचार लेकर राम के पास लौटे। रावण के तिरस्कार के कारण विरक्त होकर मन्दोदरी नारायण का स्मरण करती थी। बाद में उसने अपने सतीत्व की शपथ खाकर भूकम्प उत्पन्न किया। सूर्य को रोक लिया। इन्द्र द्वारा पुष्पवृष्टि करा दी। फिर भी रावण का सन्देह दूर न हुआ। मन्दोदरी की अग्निपरीक्षा हुई। अग्नि लगाई गयी, तब- तक दुबरी नाम की स्त्री ने रावण को विश्वास दिलाया कि हनुमान् का अभियोग मिथ्या है। मन्दोदरी ने कहा कि तुमने सीता का अपहरण किया है। इसी लिए हनुमान् ने मेरा अपमान किया है। सीता को लौटाओ। बिहौर जाति की कथाओं में सीता ने रावण के बलप्रयोग से बचने के लिए जादू द्वारा अपने शरीर में भयंकर फोड़े उत्पन्न कर लिए। उक्त अनेक कल्पनाओं में वस्तुस्थितिनिरपेक्ष अपनी अपनी भावनाओं को जोड़ा गया है। इसी प्रकार ५४३ वें अनु० में कहा गया है, वाल्मीकिरामायण (प्रक्षिप्त सर्ग ५८) में जब रावण सीता को मारने उठा तो मन्दोदरी ने उसे रोका। इस वृत्तान्त के आधार पर परवर्ती रचनाओं में रंगनाथरामायण (५।७), धर्मखण्ड (अ० १०५), अध्यात्मरामायण (५।२।३८), आनन्दरामायण (१।९।८४), भावार्थरामायण (५।८) तथा रामचरितमानस (५।१०) के अनुसार भी मन्दोदरी सीतावध को रोकती है। बलरामदासरामायण के अनुसार त्रिजटा रोकती है। काश्मीरीरामायण के अनुसार हरण के बाद ही सीता को मन्दोदरी की देख-रेख में रखा गया था। ५४४ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में रावण-वध के पूर्व मन्दोदरी के हस्तक्षेप का उल्लेख नहीं था। सुन्दरकाण्ड के एक प्रक्षेप, जो तीनों पाठों में मिलता है, के अनुसार मन्दोदरी ने रावण को सीता का वध करने से रोका था। उत्तरपुराण के अनुसार मन्दोदरी ने यह भी याद दिलाया था कि किसी पतिव्रता का स्पर्श करने से तुम्हारी आकाशगामिनी विद्या नष्ट हो जायेगी। उदीच्य पाठ के अनुसार प्रहस्तवध के बाद भी मन्दोदरी ने परामर्श दिया था। राम से युद्ध मत करो, क्योंकि राम मनुष्यमात्र नहीं हैं। पश्चिमोत्तर पाठ के अनुसार यज्ञध्वंस के प्रसङ्ग में मन्दोदरी के केशग्रहण का भी वर्णन है। पीछे कहा जा चुका है कि सुन्दरकाण्ड का ५८ वाँ सर्ग प्रक्षेप नहीं है। बुल्के के अनुसार भी जब वह तीनों पाठों में विद्यमान है और उसपर टीकाकारों ने टीकाएँ की हैं। जो सर्ग परम्पराप्राप्त नहीं उनपर टीकाकारों ने

५२८ रामायणमीमांसा सप्तदश टीकाएँ नहीं लिखी हैं। अन्य राम-कथाओं में उसी का विस्तार हुआ है। "नह्यमूलं प्ररोहति" सर्वथा निर्मूल का प्ररोहण नहीं हो सकता है। ५८ वें सर्ग को प्रामाणिक रामायण में अविद्यमान कहना बुल्के का साहस ही है। भावार्थरामायण (६।५५) में इन्द्रजित्-वध के बाद रावण मन्दोदरी को धमकी देकर बाध्य करता है कि वह अशोकवन में जाकर रावण की इच्छा-पूर्ति के लिए सीता से अनुरोध करे। कई रचनाओं में उसी समय मन्दोदरी ने सीता-वध से रावण को रोका था। अध्यात्मरामायण तथा आनन्दरामायण में यज्ञविध्वंस के बाद भी मन्दोदरी ने सीता को लौटाने का रावण से अनुरोध किया था। रामचरितमानस में वह तीन बार रावण को भगवान् की शरण लेने को कहती है। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड (सर्ग १११) में रावण-वध के बाद मन्दोदरी का विलाप विस्तृतरूप से वर्णित है। पर बुल्के इसे भी प्रक्षेप कहकर आर्ष काव्य में उसका अभाव मानते हैं, जो कि निराधार प्रलापमात्र है। वस्तुतः वह सर्ग भी प्रामाणिक ही है। अतएव टीकाएँ उसपर भी उपलब्ध होती हैं। भावार्थरामायण (६।५५) के अनुसार मन्दोदरी रावण के साथ सती हो गयी। पर कहीं-कहीं विभीषण के साथ उसके विवाह का भी वर्णन है। काश्मीरीरामायण के अनुसार मन्दोदरी एक अप्सरा थी, जो रावण के विनाशार्थ पृथ्वी पर आयी थी। त्रिजटा वाल्मीकिरामायण के अनुसार त्रिजटा सीता का चरित्र देखकर उनकी ओर आकर्षित हुई थी। रावण के चले जाने पर राक्षसियाँ सीता को डरा रही थीं तब त्रिजटा ने डाँट कर उनसे कहा, मैंने ऐसा स्वप्न देखा है जिससे राक्षसों का विनाश और राम की विजय की सूचना मिलती है। तुम लोग सीता की शरण ग्रहण करो। यही तुम लोगों को महान् भय से बचा सकती है— “प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा । अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् ॥” (वा० रा० ५।२७।३९ ) युद्धकाण्ड में जब इन्द्रजित् ने राम और लक्ष्मण को नागपाश में बाँधा था तब रावण ने सीता तथा त्रिजटा को पुष्पक पर बैठा कर रणभूमि में निःसहाय पड़े हुए राम और लक्ष्मण को दिखाया था। सीता दोनों को मृत समझकर करुण विलाप करने लगी थी तब त्रिजटा ने आश्वासन दिया था कि राम और लक्ष्मण जीवित हैं। सीता के प्रति उसने स्नेह को व्यक्त किया था— “स्नेहादेतद् ब्रवीमि ते।” (वा० रा० ६।४८।२८ ) रामायणककविन (सर्ग २१) के अनुसार सीता राम को शरपाश में बँधा देखकर चिता तैयार करने का निवेदन करती है, किन्तु त्रिजटा अपने पिता विभीषण से मिलने जाती है और राम के कुशल-क्षेम का शुभ समाचार लेकर लौटती है। ५४६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “सीता की त्रिजटा से अन्य हितैषिणी राक्षसियों की भी चर्चा है। वाल्मीकिरामायण सुन्दरकाण्ड में विभीषण की पुत्री तथा पत्नी की चर्चा है। सीता कहती है कलानामक विभीषण की ज्येष्ठा पुत्री ने अपनी माता के आदेशानुसार मुझसे कहा है कि विभीषण तथा अविन्ध्य के सत्परामर्शों की अवज्ञा करके रावण ने सीता को लौटाना हठपूर्वक अस्वीकार कर दिया है। उदीच्य पाठ के अनुसार उसका नाम नन्दा था। जानकीपरिणय में उसका अनला नाम उल्लिखित है। रावण ने राम का मायामय शीर्ष दिखलाया था। किन्तु सरमा ने सीता के पास आकर रावण के छल-कपट का रहस्य प्रकट किया था। सरमा ने सीता को यह शुभ समाचार दिया

अध्याय सुन्दरकाण्ड ५२९ कि राम समुद्र पार कर लङ्का के निकट आ गये हैं। उसने यह भी समाचार दिया कि रावण ने अपनी माता और सभासदों का अनुरोध ठुकरा कर सीता को लौटाना अस्वीकार कर दिया है। सरमा सीता की प्रणयिनी सखी है। उसके साथ सीता की मैत्री थी ( वा० रा० ६।३३।३ ) । उदीच्य पाठ तथा गौड़ीय पाठ ५।५२ एवं पश्चिमोत्तरीय पाठ ५।५१ में "सरमावाक्य" नामक सर्ग पाया जाता है, जिससे सरमा सीता के लिए लङ्का-दहन का वर्णन करती है। उपर्युक्त वृत्तान्तों में सरमा तथा विभीषण का कोई सम्बन्ध नहीं प्रतीत होता है। सीता-हनुमान्-संवाद के अन्तर्गत सीता हितकारिणी के रूप में विभीषण की पत्नी का उल्लेख है। बाद में सीता की प्रिय सखी सरमा के उन उपकारों का वर्णन मिलता है। बुल्के कहते हैं उत्तरकाण्ड के व्यासों ने सरमा को विभीषण की पत्नी घोषित कर दोनों को अभिन्न माना है। उत्तरकाण्ड के अनुसार धर्मज्ञा सरमा गन्धर्वराज शैलूष की पुत्री है। उसके नाम की व्युत्पत्ति के विषय में कहा गया है कि सरोवर की बाढ़ आते देख कर शिशु रोने लगा तो माँ ने कहा था "सरो मा वर्धत" इसी लिए शिशु का नाम सरमा हो गया ( वा० रा० ७।१२।२४-२६ ) ।" वस्तुतः बुल्के भारतीय विचारपद्धति से अपरिचित हैं; इसी लिए वे जैसी तैसी शङ्काएँ उठाते हैं और उन्हीं के आधार पर कुछ का कुछ निर्णय कर बैठते हैं। पहले उनकी यह कल्पना ही असंगत है कि उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण के अंश नहीं हैं। वस्तुतः पूर्वकथनानुसार सातों काण्ड रामायण वाल्मीकिकृत है। जब वाल्मीकिरामायण में ही एक स्थल में विभीषण के पत्नीमात्र का उल्लेख है और अन्य स्थल में उसके नाम का भी उल्लेख है। ऐसी स्थिति में दोनों का समन्वय हो कर लेना उचित है। संदिग्ध वाक्यों के अर्थ का वाक्यशेष से निर्णय किया ही जाता है। जैसे—'यवैर्यजेत्' वाक्य में 'यवों' से यजन करने का उल्लेख है, परन्तु 'यव' शब्द से कई स्थलों में प्रियङ्गु का ग्रहण होता है। परन्तु— "वसन्ते सर्वसस्यानां जायते पत्रशातनम् । मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः ॥" इस वाक्य के अनुसार वसन्त में होनेवाला कणिशशाली औषधि यव है। प्रियङ्गु तो वसन्त में रहती ही नहीं। यह निर्णय होता है। वाल्मीकिरामायण में न सही अन्य पुराणों में भी अगर विभीषण-पत्नी का नाम सरमा निश्चित हो तो भी उसके अनुसार वाल्मीकिरामायण में विभीषण-पत्नी का वही नाम निश्चित किया जा सकता है, क्योंकि सामान्य का विशेष के साथ समन्वय होता है। विभीषण-पत्नी का कोई नाम होगा ही। उपलब्ध विशिष्ट नाम से सामान्य की विशेष आकांक्षा पूर्ण हो जाती है। अतः विभीषण की पत्नी का 'सरमा' नामनिर्धारण उचित ही है और यह व्यासों का निर्णय न होकर उत्तरकाण्ड वाल्मीकिरामायण का ही निर्णय है। उसे वाल्मीकिरामायण न मानना दुराग्रह ही है। ५४७ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "रामायण और महाभारत में कहीं भी विभीषण और त्रिजटा के सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। किन्तु परवर्ती साहित्यों में सीता के प्रति कला तथा सरमा के उपकारों का श्रेय त्रिजटा को दिया गया है। फलस्वरूप त्रिजटा को विभीषण की पत्नी या पुत्री माना गया है। उदाहरणार्थ—गोविन्दराजटीका (५।२७।४), कम्बरामायण ( ५।६ ) तथा आनन्दरामायण में त्रिजटा को विभीषण की पत्नी माना है— "त्रिजटानाम्नी विभीषणप्रियानुगा" ( आ० रा० १।९।११ ) । रामकियेन के अनुसार रावण ने विभीषण को निर्वासित कर उसकी पत्नी त्रिजटा को सीता की सेवा में नियुक्त किया था।" किन्तु इस सम्बन्ध में यह भी ध्यान देना उचित है कि आपातमात्र विरोध विरोधाभास ही कहा जाता है। उस विरोधाभास का परिहार करना उचित है। अतएव गोविन्दराज त्रिजटा को सरमा से अन्य विभीषण की दूसरी पत्नी कहते हैं। महाभारत रामोपाख्यान में सीता ने हनुमान् से कहा था कि त्रिजटा ने मुझे अविन्ध्य का यह सन्देश दिया है कि राम और लक्ष्मण सकुशल हैं। ६७

५३० रामायणमीमांसा समदश वे वानर-सेना लेकर तुम्हें छुड़ाने आ रहे हैं। रावण से मत डरना, क्योंकि नलकूबर के शाप के कारण वह तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता है (म० भा० ३।२६४।५८)। बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता ने कला नामक विभीषण की पुत्री की चर्चा की है। त्रिजटा के स्वप्न के प्रसङ्ग के अतिरिक्त महाभारत के अन्य स्थल पर त्रिजटा का उल्लेख है। रावणवध के बाद लङ्का से चलने के समय राम ने त्रिजटा को अर्थ और सम्मान प्रदान किया था— “त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजयामास राक्षसीम् ।” (म० भा० ३।२७५।३९)” परन्तु वस्तुतः इससे भी रामायणोक्त वृत्तान्त का बाध नहीं होता है। विभीषण-पत्नी होने के नाते और सीता की अधिक प्रिय होने के कारण त्रिजटा का अधिक सम्मान असङ्गत नहीं है। रघुवंश (१२।७४), सेतुबन्ध (सर्ग ११) आदि में मायाशीर्ष के प्रसङ्ग में त्रिजटा ही सरमा का स्थान लेती है। प्रसन्नराघव में सीता के अनुरोध से त्रिजटा आकाश में स्थित होकर मेघनाद द्वारा हनुमान् के बन्धन और लङ्का-दहन का वर्णन करती है। उदीच्य पाठ में इस प्रसङ्ग में सरमा की चर्चा है। बुल्के इसमें इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि “वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभिन्न राक्षसियों ने जो कुछ भी उपकार किया था, वह सब बाद में त्रिजटा का उपकार माना गया है। राम-कथा के कवियों ने इतने से ही सन्तुष्ट न होकर कथानक में त्रिजटा का महत्त्वपूर्ण स्थान बना दिया है।” परन्तु बुल्के को यह जानना चाहिये कि वस्तुस्थितिहीन कल्पना का कोई महत्त्व नहीं होता। वाल्मीकिरामायण में ही त्रिजटा का महत्व वर्णित है। त्रिजटा के स्वप्न को ही ले लिया जाय तो केवल एक वही त्रिजटा का महत्त्व ख्यापन के लिए पर्याप्त है। अतएव महाभारत रामोपाख्यान में भी त्रिजटा को महत्त्व दिया गया है। सरमा और कला का भी राम-भक्तों के हृदय में आदर है। परन्तु संक्षेप की दृष्टि से सब का वर्णन सम्भव नहीं होता। वाल्मीकिरामायण तो सबका आकर ग्रन्थ है ही। उसमें सरमा तथा कला का भी महत्त्व- वर्णन है ही। यह ठीक है कि त्रिजटा ने गुप्तचर बनकर सीता को रावण की सभा के समाचार भी दिये थे। बाल- रामायण (अंक ८) के अनुसार सुमुख तथा दुर्मुख द्वारा नरान्तक-वध, कुम्भकर्ण-जागरण तथा इन्द्रजित् के निकुम्भिला-प्रवेश आदि के समाचार भी सीता को त्रिजटा ने दिये थे। इन्द्रजित्-वध के बाद लक्ष्मण का शङ्खनाद सुन- कर सीता ने त्रिजटा को भेज दिया था और उससे युद्ध का सब समाचार सुनकर प्रसन्न हुई थी। रामचरितमानस के अनुसार वह रामचरणरत एवं विवेकनिपुण थी, इत्यादि बातें वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध होने तथा परम्पराप्राप्त होने से प्रामाणिक ही हैं। यहीं बुल्के ने जैनी राम-साहित्य की रचनाओं की चर्चा करते हुए बतलाया है कि “यद्यपि पउमचरियं और उत्तरपुराण में त्रिजटा का उल्लेख नहीं है। तथापि स्वयम्भूदेवकृत पउमचरियं (४९।१०) में त्रिजटा को सीता की हितैषिणी नहीं माना गया है। जब हनुमान् द्वारा गिरायी गयी राम-मुद्रिका को देखकर सीता आह्लादित हो उठी तो त्रिजटा रावण के पास जाकर कहती है कि आज आपका जीवन सफल है। आपकी प्रतिज्ञा पूरी होगी, क्योंकि भट्टारिका सीता हँस रही है। हेमचन्द्र के ग्रन्थों में भी ऐसी ही बातें हैं। उनके अनुसार सीता को उपवन में रखने के बाद सीता प्रलोभन देने के लिए त्रिजटा को ही रखा गया है (योगशास्त्र १ ११७) ।” प्रायः वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध और विलक्षण रचना के लिए जैन विद्वान् प्रस्तुत ही रहते हैं, अतः वैसा होना आश्चर्य की बात नहीं है, किन्तु यह सब जैनों का पाखण्ड। १. यह योगशास्त्र जैनों का है। पातञ्जल योगदर्शन नहीं है।

संध्यार्थ सुन्दरकाण्ड ५३१ रामायणककविन के अनुसार ३०० राक्षसियां तो सीता को डराने धमकाने के लिए नियुक्त की गयी थीं। उनमें एक त्रिजटा भी थी, जो सीता का पक्ष लेती थी। उसकी सहानुभूति पाकर सीता ने अपनी कथा उसे सुनायी थी। दोनों मन्दिर में प्रार्थना करने गयी थीं। राम और लक्ष्मण के मायामय शीर्ष देखकर सीता अग्नि में प्रवेश करने के लिए प्रस्तुत हुई थी, किन्तु त्रिजटा ने उनका साथ दिया। उसने विभीषण से समाचार लेकर राम और लक्ष्मण के जीवित रहने का समाचार देकर सीता को अग्नि-प्रवेश से विरत किया। ऐसे ही शरबन्ध से बँधे हुए राम और लक्ष्मण को देखकर भी सीता विकल हुई थी। उस समय भी त्रिजटा ने विभीषण से मिलकर सीता को आश्वासन दिया था। अग्निपरीक्षा के समय भी त्रिजटा ने सीता के सतीत्व का साक्ष्य दिया था। वह बाद में सीता के साथ अयोध्या चली आयी थी (सर्ग २४)। वाल्मीकिरामायण से अनुप्राणित कथाओं में त्रिजटा का महत्त्व-वर्णन होना स्वाभाविक ही है। ५४८वें अनु० में बुल्के का यह कहना असङ्गत ही है कि “रामायण के प्रक्षिप्त सर्ग २८, २९ के अनुसार सीता हनुमान् के आगमन के ठीक पहले देहत्याग के लिए फाँसी लगाने का विचार कर रही थी। इतने में शुभ शकुन प्रकट हुए”, क्योंकि उक्त दोनों सर्ग प्रक्षेप नहीं हैं। उनकी सङ्गति है, अतएव उनपर टीकाएँ हैं। इसी लिए अध्यात्म- रामायण, आनन्दरामायण आदि में भी उक्त वर्णन है। रामकियेन के अनुसार सीता फाँसी लगा चुकी थी। हनुमान् ने फाँसी की गाँठ खोल दी । सीता-हनुमान्-संवाद वाल्मीकिरामायण के अनुसार यह ठीक ही है कि हनुमान् अशोकवाटिका में सीता को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और सोचने लगे कि यदि मैं सीता से बिना भाषण किये एवं उन्हें आश्वस्त बिना किये जाता हूँ तो सीता ने क्या कहा है ? राम के यह पूछने पर क्या उत्तर दूंगा ? इसके अतिरिक्त आश्वासन दिये बिना जाने से सीता राम के आगमन से पहले ही प्राणत्याग कर सकती हैं। फिर सेनासहित राम का लङ्का आगमन ही व्यर्थ हो जायेगा, अतः मैं सूक्ष्म वानरतनु से सीता से मानुषी संस्कृता वाणी से भाषण करूँगा। यदि मैं द्विजाति के समान संस्कृत देववाणी बोलूंगा तो मुझे रावण समझकर सीता भयभीत हो सकती हैं। अतः अवश्य ही मुझे मानुष-वाक्य ही बोलना चाहिये— “वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् । यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।। रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति । अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत् ।।

  • मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता ।।” (वा० रा० ५।३०।१७–१९) हनुमान् ने सीता के सुनने योग्य स्वर में रामचरित का संक्षिप्त वर्णन किया। उसे सुनकर सीता को विस्मय हुआ। उन्होंने आँखें उठाकर शिंशपा वृक्ष पर हनुमान् को देखा। हनुमान् ने अपने को रामदूत कहकर राम के कुशल-क्षेम का समाचार सुनाया। सीता को हर्ष हुआ। पश्चात् कामरूपी रावण समझकर सीता सन्देह में पड़ गयीं। हनुमान् ने सीता को राम की मुद्रिका अर्पित की तथा आश्वासन दिया कि राम शीघ्र आनेवाले हैं। सीता विश्वस्त होकर यह सन्देश देने लगी कि राम मुझे जीवित पाना चाहें तो दो महीनों के अन्दर आ जायें । हनुमान् सीता को अपनी पीठ पर ले जाने का प्रस्ताव करते हैं। सीता पहले तो हनुमान् की सामर्थ्य पर सन्देह करती हैं। जब हनुमान् ने अपनी शक्ति को प्रमाणित किया तो पीछे अनेक अन्य न जाने के हेतु देकर अन्त में कहती हैं, मैं राम को छोड़कर स्वतः दूसरे का शरीरस्पर्श नहीं करना चाहती—

“भर्तृभक्तिं पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर । नाहं स्प्रष्टुं स्वतो गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम ॥” ( वा० रा० ५।३७।६२ ) हनुमान् ने यह तर्क मान लिया ( सर्ग ३९) । सीता ने पुनः कहा—राम ही रावण को परास्त कर मुझे ले जायें— “रावणमुत्पाट्य राघवो मां नयतु ॥” ( वा० रा० ५।५८।१०१ ) लुक छिपकर मुझे ले जाना राम को शोभा नहीं देगा । उनकी कीर्ति के लिए आवश्यक है कि रावण पर विजय प्राप्त कर लें— “बलैः समग्रैर्युधि मां रावणं जित्य संयुगे । विजयी स्वपुरीं यायात् तत्तस्य सदृशं भवेत् ॥” ( वा० रा० ५।३९।२९ ) “बलैः समग्रैर्यदि मां हृत्वा रावणमाहवे । विजयी स्वपुरं रामो नयेत्तत्स्याद्यशस्करम् ॥” ( वा० रा० ५।६८।१२ ) “यथाहं तस्य वीरस्य वनादुपधिना हृता । रक्षसा तद्भयादेव तथा नार्हति राघवः ॥” ( वा० रा० ५।६८।१३ ) बुल्के इस सर्ग को भी प्रक्षेप कहते हैं । परन्तु यह भी उनकी धारणा गलत है। यह सर्ग टीकाकारसम्मत तथा परम्पराप्राप्त है । अभिज्ञान बुल्के कहते हैं, वाल्मीकिरामायण के प्रामाणिक सर्गों में चूड़ामणि तथा काकवृत्तान्त दो अभिज्ञानों की चर्चा है । महाभारत के रामोपाख्यान में भी दो का ही वर्णन है ( ३।२६६।६६, ६७) । वाल्मीकिरामायण के अनुसार हनुमान् मैनशिल के तिलक का स्मरण दिलाकर राम को एक तीसरा अभिज्ञान देते हैं— “मनःशिलायास्तिलको गण्डपार्श्वे निवेशितः ।” ( वा० रा० ५।४०।५ ) लङ्का-दहन लङ्का-दहन अंश को भी बुल्के प्रक्षेप मानते हैं, पर उनका यह मन्तव्य असङ्गत है । यह बात पहले कही जा चुकी है। रावण के बल का परिज्ञान एक सफल दूत के लिए परम आवश्यक था। इसी उद्देश्य से हनुमान् ने अशोकवन नष्ट किया और रावण के भेजे योद्धाओं जम्बूमाली, सात मन्त्रि-पुत्रों, पाँच सेनापतियों तथा रावण-पुत्र अक्षय का वध किया । इन्द्रजित् द्वारा ब्रह्मास्त्र से बद्ध होकर हनुमान् ने रावण के पास पहुँच कर अपने को सुग्रीव द्वारा भेजा हुआ राम-दूत बतलाया और सीता को लौटाने का अनुरोध किया । रावण क्रुद्ध होकर उन्हें वध का दण्ड देना चाहता था, पर विभीषण की आपत्ति पर ध्यान देकर घृत और तेल युक्त वस्त्रों से वेष्टित पूँछ में आग लगा देने का निर्णय हुआ । सीता को समाचार मिलने पर उन्होंने अग्निदेव से प्रार्थना की कि वह हनुमान् के लिए ठण्डे हो जायें—“शीतो भव हनूमते” ( वा० रा० ५।५३।२७ ) । फलस्वरूप हनुमान् ने शीतलता का अनुभव किया । उन्होंने इसे सीता की दयालुता, राम का प्रभाव तथा अग्नि से अपने पिता की मित्रता का परिणाम माना । हनुमान् ने अपना शरीर बढ़ा कर पुनः लघु करके उस बन्धन से अपने को मुक्त कर लिया और फिर आकार बढ़ा कर विभी- षण का गृह छोड़ कर शेष लङ्का को भस्म कर डाला । अन्त में जलती हुई पूँछ समुद्र में बुझा ली । तब उन्हें सीता की कुशल के सम्बन्ध में चिन्ता हुई । किन्तु शकुनों तथा चारणों के गीतों से उन्हें आश्वासन मिला ( वा० रा० ५।५५।२९-३४ ) । अध्यात्मरामायण के अनुसार

हनुमान् को भूख लगी थी। उन्होंने सीता की अनुमति लेकर अशोकवन के फल खाये और प्रणाम करके चले गये, कुछ दूर चले जाने पर उन्होंने सोचा कि रावण से मिलकर जाना अच्छा है। इसलिए वे अशोकवन उजाड़ने लगे। आनन्द- रामायण के अनुसार उन्होंने सीता की आज्ञा लेकर पूँछ से वृक्षों को हिलाकर फल गिरा दिये और खाये। वृक्ष भी गिरा दिये। रामचरितमानस के अनुसार— 'रहा न नगर वसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन कपि खेला॥' ( रा० मा० ५।२४।३ ) आनन्दरामायण आदि कई ग्रन्थों के अनुसार हनुमान् की पूंछ में आग लगाने के सब प्रयास व्यर्थ होने पर हनुमान् ने कहा—यदि रावण स्वयं फूंक मारे तो अग्नि प्रदीप्त हो सकेगी। रावण ने वैसा किया तो उसके दसों सिरों और मूंछ दाढ़ी में अग्नि लग गयी। मुंह पर थप्पड़ मार कर वह बुझाने लगा जिससे सब राक्षस खिलखिला कर हँसने लगे। आनन्दरामायण ( १।९।२०९-२११) के अनुसार दस करोड़ राक्षसों को लेकर रावण लड़ने निकला। हनुमान् ने लोहस्तम्भ से सबको मारा। पूंछ में करोड़ों राक्षसों को लपेट कर उन्हें रावण के सिर पर दे मारा जिससे वह मू्र्च्छित हो गया। उसी समय देवकन्याओं एवं देवताओं की मुक्ति की चर्चा भी है। वस्तुतः रामायण की अवि- भाज्य अङ्गभूत लङ्का-दहन की घटना महत्वपूर्ण वस्तु है। उस समय अनेक घटनाएँ घटी होंगी। शतकोटिप्रविस्तर रामायण में उनका विस्तार होगा ही। उपलब्ध वाल्मीकिरामायण में तो उसका संक्षेप ही हो सकता है। अनेक लोगों ने उसको विकृत करके अन्यथा भी वर्णन किया ही है। ५५३ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "लङ्का-दहन के पश्चात् केवल दो ही सर्ग प्रामाणिक हैं। उनके अनुसार लङ्का की घटनाओं के सम्बन्ध में हनुमान् ने यही कहा कि मैंने सीता को देखा, परन्तु यह कितनी अस्वाभाविक बात है यह बताने की आवश्यकता नहीं। सर्ग ६५ में में हनुमान् चूड़ामणि देकर राम से अपनी लङ्का-यात्रा का यों वर्णन करते हैं—समुद्र-लङ्घन करके मैंने रावण के यहाँ सीता को देखा। वह राक्षसियों से घिरकर आप ही का चिन्तन करती हैं। वह आपका समाचार पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं तथा अभिज्ञान स्वरूप उन्होंने चूड़ामणि के अतिरिक्त काक- वृत्तान्त तथा मैनशिल के तिलक के विषय में आपको स्मरण दिलाने को कहा है तथा यह भी निवेदन किया है कि मैं केवल एक महीने तक ही जीवित रह सकूँगी। अन्त में हनुमान् ने राम से यह प्रस्ताव किया कि 'समुद्र पार करने की तैयारियाँ प्रारम्भ हो जायँ।" वस्तुतः बुल्के आदि लेखक के अभिप्राय से नहीं, किन्तु अपने दृष्टिकोण से उसके लेख की छान-बीन और काट-छाँट करते हैं, पर यह सङ्गत नहीं है। समालोचकों की दृष्टि भी एक-सी नहीं होती है। एक साहित्यिक और दार्शनिक तथा न्यायवादी की दृष्टि समान नहीं हो सकती। संक्षेप और विस्तार की भी पृथक्-पृथक् दृष्टियाँ होती हैं। एक न्यायवादी एडवोकेट विषय के अनुसार अन्यूनानतिरिक्त शब्दों का प्रयोग करना चाहेगा। वैयाकरण एक मात्रा के लाघव से पुत्रोत्सव मनायेगा। परन्तु साहित्यिक और दार्शनिक अपनी बातों को रोचकता के साथ हृदयङ्गम कराने के लिए शब्ददारिद्र्य और ग्रन्थदारिद्र्य का आदर कदापि नहीं करेगा। महर्षि वाल्मीकि महान् दार्शनिक एवं साहित्यिक हैं। हमें उनकी कृतियों का विश्लेषण, अर्थलाघव तथा गुण-दोष-विचार का अधिकार हो सकता है, परन्तु अपनी दृष्टि के अनुसार यह कहने का अधिकार नहीं है कि अमुक सर्ग अनावश्यक है, अतएव वह प्रक्षेप है। पुनरावृत्ति अनेक स्थलों में दूषण नहीं होती और आंशिक पुनरावृत्ति तो उत्तम लेखकों में भी होती है। वेदों एवं उपनिषदों में भी वह दृष्ट है। हनुमान् ने ५७ वें सर्ग में पहले सीता को देखा इतना ही कहा, इसपर वानरों में खुशी की लहर दौड़ गयी। कोई किलकिला शब्द तो कोई

गर्जन करते हुए उछल-कूद करने एवं पूँछ पटकने लगे और सब एकस्वर से हनुमान् की प्रशंसा करने लगे। ५८ वें सर्ग में जाम्बवान् ने सारा वृत्तान्त विस्तार सहित कहने का अनुरोध किया। क्रूरकर्मा रावण का सीता से कैसा व्यवहार है ? तुमने सीता को कैसे ढूँढ़ा ? उन्होंने क्या कहा ? सब सुनकर हम लोग विचार करेंगे कि राम के पास जाकर क्या कहना है एवं क्या नहीं कहना है-- यश्चार्थस्तत्र वक्तव्यो गतैरस्माभिरात्मवान् । रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥” यह सुनकर हनुमान् ने रोमाञ्चयुक्त होकर हर्ष से उन सीतादेवी को नमस्कार कर अपनी यात्रा का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया । इसी में मैनाक, सुरसा, सिंहिका तथा लङ्किनी का वृत्तान्त भी कहा। सीतान्वेषण, सीतादर्शन, सीता-रावण-संवाद, सीता की दृढ़ता, त्रिजटा का स्वप्न एवं उसके द्वारा सीता का आश्वासन, सीता से संभाषण, मुद्रिकासमर्पण, सीता का आश्वासन, अभिज्ञानग्रहण, अशोकवन का उत्सादन, राक्षसों से युद्ध, मेघनाद से युद्ध, ब्रह्मास्त्र से बन्धन, रावण-भाषण, लङ्का-दहन, पुनः सीतादर्शन और लौटने का वर्णन किया। पुनः सीतामाहात्म्य और उनकी स्थिति का वर्णन ५९ वें सर्ग में किया है। ६० वें सर्ग में अङ्गद ने कहा कि हम सब लङ्का को नष्ट करके, रावण को मारकर एवं सीता को लेकर राम के सामने रख दें; यही ठीक है। परन्तु जाम्बवान् की बात मानकर सब लोगों ने राम, लक्ष्मण और सुग्रीव के पास जाना ही उचित समझा। जाम्बवान्, अङ्गद, हनुमान् आदि के साथ सभी बलवान् वानर आनन्द एवं आह्लाद के उद्रेक में मधुवन में जाकर रक्षकों एवं दधिमुख आदि को निगृहीत कर मधु-पान, फल-भक्षण आदि करके आमोद-प्रमोद करने लगे । परिस्थिति के अनुसार मधुवन में प्रवेश कर मधु तथा फल आदि का खान-पान करना असङ्गत नहीं है । महान् कार्य सम्पादित करने के अनन्तर खुशियों में ऐसे कार्य होते ही हैं। रक्षकों के पुकार करने पर सब समाचार जानकर सुग्रीव ने सारी स्थिति का अनुमान कर लिया एवं रक्षकों के द्वारा ही सबको बुलाया। ६४ वें सर्ग में अङ्गद और हनुमान् को पुरस्कृत कर (नेता बनाकर ) सब लोग राम के पास आये । सुग्रीव ने कमलोचन रामको बतलाया कि अङ्गद की प्रसन्नता से स्पष्ट होता है कि कार्य करके वे लोग आये हैं, बिना कार्य किये मधुवनध्वंस करने का साहस नहीं हो सकता था और वह कार्य हनुमान् से ही हो सकता है। उनमें सिद्धि, मति, अध्यवसाय एवं शौर्य सब प्रतिष्ठित हैं। जहाँ जाम्बवान् नेता हो, हनुमान् और अङ्गद अधिष्ठाता हों वहाँ कार्यसिद्धि में अन्यथा मति नहीं हो सकती । ६५ वें सर्ग में राम के सन्निधान में आकर हनुमान् ने सीता का वृत्तान्त बतलाया। सीता कहाँ हैं ? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है ? राम के इस कथन को सुनकर हनुमान् ने जिधर सीता थीं उस दिशा की ओर सीता को प्रणाम करके सीता का दर्शन बताया और देदीप्यमान काञ्चनमय दिव्यमणि राम को प्रदान की और हाथ जोड़कर राम से कहा कि सौ योजन समुद्र का लङ्घन कर मैं सीता-दर्शन की इच्छा से लङ्का गया। वहाँ दुरात्मा रावण के यहाँ मैंने सीता को देखा । वह आप में ही जीवन अर्पित करके राक्षसीगण द्वारा बार बार तर्जित होकर रह रही हैं। वे एकवेणीधारिणी, चिन्तापरायण, भूमिशयन से विशीर्णाङ्गी होकर हिमागम से पद्मिनी के समान मुरझायी हुई, मरने का निश्चय किये हुए, रावण से सर्वथा विमुख तथा आप में मन लगा कर स्थित हैं। मैंने शनैः शनैः इक्ष्वाकुवंश का कीर्तन करते हुए उन्हें आश्वासन दिया और उनसे भाषण किया । उन्हें यहाँ की स्थिति बतलायी । राम और सुग्रीव के सख्य का समाचार सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुईं । उनका उदात्त समाचार नियत है। आपमें उनकी सदा स्थिर भक्ति है। उग्र तपस्या और आपकी भक्ति से युक्त जनकनन्दिनी को मैंने देखा। यह काञ्चन मणिरूप अभिज्ञान देकर उन्होंने काकवृत्तान्त भी कहा। मनःशिला के तिलक का भी स्मरण दिलाया और कहा है कि मैं मास भर से अधिक जीवन नहीं रख सकूँगी । हनुमान् ने कहा, अतः शीघ्र ही सागर पारकर प्रस्थान करना चाहिये ।

बुल्के तो अप्टूडेट वकालती वर्णन चाहते हैं। वस्तुस्थिति या तो समझते ही नहीं या भूल जाते हैं। स्वाभाविक वर्णन को भी प्रक्षेप कहने का निराधार साहस करते हैं। ६६ वें सर्ग में हनुमान् की बात सुनकर मणि को हृदय से लगाकर राम रोने लगे और अश्रुपूर्ण नयनों से मणि को देखते हुए सुग्रीव से कहते हैं जैसे वत्स को देखकर वत्सला धेनु स्नेहस्रुत होती है वैसे ही इस मणिश्रेष्ठ को देखकर मेरा हृदय स्रुत होता है। यज्ञ से सन्तुष्ट होकर देवराज ने जनक को यह मणि प्रदान की थी। जनक ने विवाहकाल में सीता की माता के हाथ से लेकर मेरे पिता दशरथ के हाथ में दी थी। उन्होंने वैदेही के मूर्धा को उससे अलङ्कृत किया था। आज उस मणि के दर्शन से मैं वैदेही के मिलने के सुख का अनुभव कर रहा हूँ। राम पुनः हनुमान् से पूछने लगे, वैदेही ने और क्या कहा है। सौमित्रे, वैदेही के बिना आयी हुई मणि को मैं देख रहा हूँ। इससे अधिक क्या दुःख होगा। वैदेही मास भर जीवित रहेगी यह तो बहुत है मैं तो क्षणभर भी उनके बिना जीवित नहीं रह सकता। इस प्रकार ६६ वें सर्ग में राम ने विलाप किया। हनुमान् ने पुनः ६७ वें सर्ग में सविस्तर सीता का सन्देश सुनाया। राम सेना सहित आकर लङ्का को विध्वस्त करके मुझे ले जायें, यही उनके स्वरूप के अनुरूप है। परन्तु समुद्र पारकर यहाँ सेना सहित राघव का आना कैसे हो सकेगा। इसपर मैंने कहा देवि, वानरों और भालुओं के राजा सुग्रीव के पास बहुत बड़े बलशाली तथा विक्रम-संपन्न योद्धा हैं। उनकी गति ऊपर, नीचे तथा तिर्यक् कहीं भी रुद्ध नहीं होती। मैं तो उनमें से एक बहुत छोटा हूँ। एक छलाँग में हरिवीर यहाँ आ जायेंगे। राम और लक्ष्मण दोनों सूर्य और चन्द्र के तुल्य मेरे पृष्ठ पर आरूढ़ होकर आ जायेंगे। देवि, तुम नख-दंष्ट्रा आयुधवाले वीरों का गर्जन शीघ्र ही सुनोगी और शीघ्र ही वनवास की अवधि पूरी कर अयोध्या में अभिषिक्त राम को देखोगी। इस तरह कल्याणमयी अभीष्ट उदारवाणी द्वारा प्रसादित होकर अदीनभाषिणी एवं आपके विरह से अतिपीड़ित सीता ने शान्ति प्राप्त की (सर्ग ६८)। कानूनी लिखा-पढ़ी की बात पृथक् है। व्यावहारिक स्वाभाविक बात यही है कि बहुत काल के अनन्तर प्रियजन के सम्बन्ध में समाचार मिलने पर उससे बार-बार पूछा जाता ही है। सविस्तर जानकारी की इच्छा होती ही है। उन्हीं स्वाभाविक व्यावहारिक चरित्रों का चित्रण वाल्मीकि ने किया है। यह भूमिका भी न भूलनी चाहिए कि सीता वाल्मीकि के आश्रम में थीं। सीता के चरित्रों के सम्बन्ध में कुछ विपरीत चर्चाओं के कारण उन्हें बनवास दिया गया था। उसके लिए अनेक अन्य उपायों के बदले आप्तकाम, पूर्णकाम, अभ्रक्ष, वायुभक्ष, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी, वीतराग महर्षि के द्वारा सीता के पवित्र चरित्रों का सत्य वर्णन किया जाय। इसी दृष्टि से पुनः पुनः विभिन्न प्रसङ्गों द्वारा सीता के चरित्रों का वर्णन करना आवश्यक था। जाम्बवान् तथा राम की भी जिज्ञासा के प्रसङ्ग से महर्षि ने सीता की जीवनचर्या, वार्तालाप, सीता-रावण-संवाद तथा सीता की दृढ़ तपस्या और उनके तनिक तनिक व्यवहारों और वार्तालापों का वर्णन किया है। इसी दृष्टि से विभिन्न घटनाओं का भी यथावत् वर्णन किया गया है, जिससे उस समय के उन लोगों को जिन्होंने उन घटनाओं को आँखों से देखा था, आँखों देखी घटनाओं का यथावत् वर्णन सुनकर उस इतिहास या काव्य में विश्वास होना स्वाभाविक था। उसी सम्बन्ध से उन लोगों ने सीतासम्बन्धी घटनाओं की भी सच्चाई जानना चाहा होगा और महर्षि वाल्मीकि द्वारा ठीक वर्णन सुनकर उन्हें अवश्य ही समाधान प्राप्त हुआ होगा।

अष्टादश अध्याय युद्धकाण्ड वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में लङ्काभियान, राम द्वारा हनुमान् के कार्यों की प्रशंसा और उनको स्वात्म- परिष्वङ्ग प्रदान, समुद्र की बाधा के विचार से राम की निराशा तथा प्रोत्साहन देते हुए सुग्रीव का सेतुबन्ध का प्रस्ताव, हनुमान् द्वारा लङ्का का वर्णन, समुद्र तक पहुँचना, राम का विग्रहवर्णन, रावण के सभासदों द्वारा रावण को विजय का आश्वासन, विभीषण द्वारा चेतावनी, कुम्भकर्ण का जगना, रावण को दोष देना, अन्त में युद्ध में सहायता करने की प्रतिज्ञा करना, पुञ्जिकस्थली के कारण पितामह के शाप का रावण द्वारा वर्णन करना (सर्ग १३), विभीषण की शरणागति, सुग्रीवादि का विभीषण को ग्रहण करने में मतभेद, हनुमान् की सहमति, शरणागतरक्षण व्रत के कारण विभीषण का ग्रहण, अङ्गुल्यग्रमात्र से पृथिवी भर के सभी दैत्यों, दानवों, राक्षसों और पिशाचों का वध करने की सामर्थ्य बतलाकर राम का सबको आश्वस्त करना। विभीषण का राम द्वारा अभिषेक, प्रायोपवेशन द्वारा समुद्र को अनुकूल बनाने की विभीषण की मन्त्रणा, शार्दूल द्वारा रावण को रामसेना की सूचना देना, सेतुबन्ध, शुक, सारण, शार्दूल तथा विद्युज्जिह्व द्वारा राम का मायामय शीर्ष प्रदर्शन। वानर भटों द्वारा लङ्कावरोध, शरपाशबन्धन, राम और रावण का द्वन्द्वयुद्ध, कुम्भकर्ण का वध, द्वन्द्वयुद्ध, पुनः लंका-दहन, इन्द्रजित्-वध, विभिन्न युद्धों में रावण-वध, अग्निपरीक्षा, प्रत्यावर्तन, अयोध्याप्रवेश ये सभी अंश रामायण के हैं। तीनों पाठों में अनेक पाठ-भेद हैं और सब प्रामाणिक हैं। वेदों में तथा सप्तशती में भी ऐसे पाठभेद मिलते हैं। पाठभेदों का अनुचित लाभ उठाकर बुल्के आदि पाश्चात्य प्रक्षेप सिद्ध करते हैं। साथ ही जो तीनों पाठों में भी उनके स्वाभिमत-विरुद्ध होता है उसको भी वे प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं। ५६१ वें अनु० में बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि “तीनों पाठों की उपर्युक्त विभिन्नता से स्पष्ट है कि गायकों ने युद्धकाण्ड का कलेवर बढ़ाने में संकोच नहीं किया", क्योंकि यदि गायकों को मूलपाठ में बढ़ाने का अधिकार होता तो आज भी पाठभेद बढ़ाया जा सकता है। आधुनिक साहित्यिकों एवं व्यासों में श्लोकनिर्माण की क्षमता कम नहीं है। अतएव सर्ग १-३, ६-८, १०-१५ तथा २० को प्रक्षेप मानना निराधार है। याकोबी के अनुसार सर्ग २३-४० को प्रक्षिप्त कहना भी तर्काभास के आधार पर है। क्योंकि बहुत-सी वास्तविक घटनाओं को भी हटा देने पर किसी अंश का अभाव परिलक्षित नहीं होगा। विधि का विधान या घटनाएँ किसी की सङ्गति की अपेक्षा नहीं रखतीं हैं। अपितु घटनाओं के अनुसार कथाएँ होती हैं। उनका यह भी कहना सङ्गत नहीं है कि “इस अंश में बालकाण्ड में वर्णित वानरों की उत्पत्ति का निर्देश मिलता है (२८।५ और ३०।२७); प्रामाणिक सर्गों में बालकाण्ड की सामग्री का उल्लेख नहीं होता", इससे तो यही सिद्ध होता है कि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड दोनों ही काण्डों को अर्वाचीन कहने की धृष्टता सर्वथा अनुचित है। तभी तो युद्धकाण्ड के उक्त वर्णनों से बालकाण्ड का सम्बन्ध जुड़ता है। इसके अतिरिक्त बुल्के, याकोबी आदि के यहाँ कोई भी काण्ड प्रामाणिक है ही नहीं। क्योंकि वे सर्वत्र प्रक्षेप कहने को प्रस्तुत रहते हैं। केवल जो अंश पाश्चात्यों के विचार से फिट बैठता हो वही उनका प्रामाणिक अंश है। प्रामाणिकता की कसौटी संभवतः उनके पास है ही नहीं। सर्ग २८ और ३० दोनों ही स्थलों में विशिष्ट वानर वीरों की उत्पत्ति और विशिष्ट देवताओं का वानर आदि योनियों में अवतार-ग्रहण प्रमाणित होता है।

अध्याय युद्धकाण्ड ५३७ ५६३वें अनु० में बुल्के कहते हैं "सर्ग ४२-११२ से इतनी पुनरावृत्ति और नीरसता पायी जाती है कि यह समस्त सामग्री वाल्मीकि जैसे महान् कवि की रचना हो ही नहीं सकती" पर उनका यह तर्क तर्काभास है, क्योंकि ऐतिहासिक तथ्यों का वर्णन भावुकता एवं रसिकता निरपेक्ष ही होता है । दर्शन एवं गणित का विषय नीरस होने पर भी व्यास आदि ने श्रीमद्भागवत आदि में उसका वर्णन किया ही है। पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा के अत्यन्त जटिल नीरस विषयों का भी वर्णन वेदान्तदेशिक आदि ने अपने काव्यों में किया ही है। आपके परस्पर विरोधी उदाहरण भी अकिञ्चित्कर हैं । आप कहते हैं "सर्ग ५० में गरुड़ के आगमन का वर्णन किया गया है। राम और लक्ष्मण मूच्छित होकर पड़े हुए हैं और गरुड़ के आने पर नागपाश के मुक्त हो जाते हैं। किन्तु सर्ग ४९ में शरपाशबद्ध राम के जागने का उल्लेख हो चुका है। अतः सर्ग ५० का अनावश्यक वृत्तान्त बाद का प्रक्षेप सिद्ध होता है।" परन्तु उक्त कथन बुल्के की अनभिज्ञता का ही सूचक है, क्योंकि ४९वें सर्ग में यह नहीं कहा गया है कि राम नागपाशमुक्त हो गये थे । ४४वें सर्ग के अनुसार भीमकर्मा वालिपुत्र से र्निजित होकर, इन्द्रजित् अन्तर्धान होकर ब्रह्मा से वर प्राप्त करने के कारण अदृश्य रहकर ही वज्रतुल्य निशित बाण छोड़ने लगा । वह नागमय बाणों के द्वारा राम और लक्ष्मण दोनों के सर्व गात्रों का भेदन करने लगा । कूटयोधी इन्द्रजित् ने क्रुद्ध होकर मायासवृत रहकर युद्ध में दोनों राघववीरों को मोहित करते हुए शरबन्ध से बाँध दिया । “रामं च लक्ष्मणं चैव घोरैर्नागमयैः शरैः ।” ( वा० रा० ६।४४।३४ ) भीषण नाग ही शररूप में परिणत हुए थे । उन्हीं के द्वारा उसने राम और लक्ष्मण को बाँध दिया— “बबन्ध शरबन्धेन भ्रातरो रामलक्ष्मणौ ।” ( वा० रा० ६।४४।३६ ) ४५ वें सर्ग में इन्द्रजित्कृत बन्धन का ही विस्तार है। राम ने उसकी स्थिति जानने के लिए नील, अङ्गद, शरभ, द्विविद, हनुमान्, ऋषभ आदि दस वीरों को आदेश दिया । वे उसे ढूँढ़ने आकाश में प्रविष्ट हुए । परन्तु उस अस्त्रवित् ने अपने परमास्त्र से उन्हें वारित कर दिया । वे भीमवेगवाले भीषण बाणों से विक्षत होकर मेघ से आवृत सूर्य के समान उसको नहीं देख सके । पुनश्च वह और वेग से राम एवं लक्ष्मण के गात्रों में सर्वदेहभेदी बाणों को छोड़ने लगा । बाणरूपता को प्राप्त हुए पन्नगों के द्वारा उसने दोनों के शरीरों को सब ओर से विद्ध कर दिया । “पन्नगैः शरतां गतैः” (वा० रा० ६।४५।८) बड़े ही भीषण वेग से गर्जन के साथ बाणों से भेदन करते हुए उसने सभी स्थानों में बाणों को ठूंंस दिया । रणभूमि में दोनों भाई शरबन्धन से बँध गये । शरवेष्टितसर्वाङ्ग तथा रुधिर से सराबोर होकर दोनों वीर शयन में शयान हो गये । उनके गात्र में एक अङ्गुल भी भीषण बाणों से अविद्ध तथा अक्षत प्रदेश नहीं रहा । ४६ वें सर्ग में इन्द्रजित् अपनी सेना को हर्षित करता हुआ सब को निर्भय करके लङ्का चला गया । विभीषण सब को धैर्य बँधाते रहे । ४७ वें सर्ग में रावण पुष्पक पर त्रिजटा के साथ सीता को बैठाकर रणाङ्गण में शयान राम और लक्ष्मण को देखने के लिए भेजता है । सीता उनकी स्थिति देखकर संतप्त होती है । सर्ग ४८ में संतप्त सीता को त्रिजटा आश्वासन देती है । ४९ वें में घोर शरबन्धों से बद्ध, रुधिर से लथपथ तथा रणभूमि में शयान राम और लक्ष्मण को घेरकर बैठे वानरश्रेष्ठों में शोक की लहर व्याप्त हो रही थी । इसी बीच नागबाणों से निबद्ध होते हुए भी स्थिर होने तथा विशिष्ट सत्त्व के योग से राम प्रतिबुद्ध हो गये और लक्ष्मण की दशा को देखकर विविध प्रकार से विलाप करने लगे । यहाँ ध्यान देने योग्य है कि राम को तात्कालिक प्रबोधमात्र हुआ था— ६८

५३८ रामायणमीमांसा अष्टादश

"एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रत्यबुद्ध्यत वीर्यवान् । स्थिरत्वात् सत्त्वयोगाच्च शरैः संदानितोऽपि सन् ॥ ( वा० रा० ६।४९।३ ) अभी तक वे नागपाश से मुक्त नहीं हुए थे । इससे प्रतीत होता था कि वे नागपाश से बद्ध होने पर भी विशिष्ट सत्त्वयोग से कुछ क्षणों के लिए ही प्रतिबुद्ध होकर लक्ष्मण के लिए शोक करने लगे थे । उसी बीच गदाधारी विभीषण सम्पूर्ण सेना को व्यवस्थित कर वहाँ आये । उनको दूर से आते देखकर इन्द्रजित् समझ कर वानर इधर उधर दौड़ने लगे । सेना को अव्यवस्थित देख अङ्गद और जाम्बवान् ने सेना को आश्वासन दिया । विभीषण ने आकर राम और लक्ष्मण दोनों को देखा और उनकी अवस्था पर विषण्ण हुए । सुषेण ( वैद्य ) के परामर्श से क्षीरोद सन्निहित पर्वतस्थ महौषधि को लाने के लिए हनुमान् को प्रेषित करने की बात चल रही थी कि इसी बीच विद्युत्- सहित मेघों और द्वीप के महाद्रुमों को अपने पक्षवात से प्रकम्पित करते हुए सुपर्ण ( गरुड़ ) आ गये । उनके आते ही त्रस्त होकर बाणरूपी पन्नग भाग गये। दोनों भ्राता बन्धनमुक्त हो गये । वैनतेय के स्पर्श से राम और लक्ष्मण दोनों के व्रण नष्ट हो गये । दोनों के शरीर सुन्दर वर्णवाले तथा स्निग्ध हो गये । तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, बुद्धि, स्मृति आदि द्विगुण हो गये । इस तरह पूर्वापर के प्रसङ्ग से ५० वाँ सर्ग अत्यन्त महत्त्व का है। उसके बिना नाग- बाणबन्ध की निवृत्ति की उपपत्ति ही नहीं होती । ऐसे पाश्चात्यों की बुद्धि पर दया आती है जो बिना सोचे समझे आर्ष ग्रन्थों पर अपनी कलमकुल्हाड़ी चलाने को तैयार रहते हैं । वस्तुस्थिति प्रदर्शनार्थ इतना लिखा गया है । वस्तुतः यह ४९ वें सर्ग के ३ श्लोकों की केवल व्याख्या है जिससे बुल्के के उक्त तर्कों का खण्डन होता है । इसी तरह उनका दूसरा तर्क निम्नोक्त है—"सर्ग ५९ में अकम्पन और नरान्तक को जीवित माना गया है, किन्तु उनके वध का उल्लेख क्रमशः ५६ और ५८ सर्गों में हो चुका है। इसके अतिरिक्त इस सर्ग में राम और रावण के युद्ध का वर्णन है। यद्यपि आगे चलकर राम के प्रथम बार रावण से युद्ध करने का स्पष्ट उल्लेख है ( दे० ६।१००।४६-५१ ) । वास्तव में लक्ष्मण के शक्ति से आहत होने का जो वर्णन इस सर्ग में किया गया है वह १०० वें सर्ग का अनुकरणमात्र प्रतीत होता है। अतः सर्ग ५९ की प्रक्षिप्तता असंदिग्ध है,” परन्तु यह भी उनका कथन आपातरमणीय है, क्योंकि—"शिरस्यभिजघानाशु राक्षसेन्द्रमकम्पनम् ।” ( वा० रा० ६।५६।२९ ) । "द्विविदो गिरिशृङ्गेण जघानेकं नरान्तकम् ।” ( वा० रा० ६।५८।२० ) । यद्यपि इन वचनों से अकम्पन तथा नरान्तक का वध वर्णित है । तथापि उनसे भिन्न भी सर्ग ५९ के १४ और २२ वें श्लोकों के— “ह्याकम्पनं त्वेनमवेहि राजन्”, “नरान्तकोऽसौ नगशृङ्गयोधी” इन वचनों द्वारा अन्य अकम्पन तथा नरान्तक का होना मानना चाहिये । इसी लिए विशेषणों का भी प्रयोग किया गया है। सर्ग ५६ के अकम्पन को राक्षसेन्द्र कहा गया है, किन्तु ५९ का गजारूढ़ अकम्पन रावण का अङ्गरक्षक है । अतएव तिलककार ने स्पष्ट लिखा है कि यह पूर्वहत अकम्पन से भिन्न ही है । इसका विशेषण नगशृङ्ग- योधी है । तिलककार कहते हैं । अर्थात् इसके मुकाबले का कोई प्रतियोद्धा नहीं उपलब्ध होता तो वह अपनी भुजाओं की कण्डू ( खुजलाहट ) दूर करने के लिए महान् गिरिशृङ्गों से ही युद्ध करता है “प्रतियोद्ध्रभावाद् भुजकण्डू- निवृत्त्यर्थमिति भावः ।” इतना ही क्यों त्रिशिरा यद्यपि खर-दूषण के साथ मारा जा चुका था तथापि यहाँ १९ वें श्लोक में उससे अन्य त्रिशिरा का भी वर्णन है । जब आजकल भी कालिदास और वाचस्पति मिश्र अनेक हो सकते हैं तो अभिन्न नाम के अनेक राक्षसों के होने में शङ्का क्यों होनी चाहिए । प्रमाणयुक्त होने से अनेक अदृष्टों की कल्पना की जा सकती है—'प्रमाणवन्त्यदृष्टानि कल्प्यानि सुबहून्यपि' केवल समान नाम मात्र देखकर प्रमाणभूत महत्त्व- पूर्ण ५९ वें सर्ग का ही अपलाप करना अत्यन्त असङ्गत है । यदि ऐसा ही है तब तो जिन पाँच काण्डों को आप सब प्रमाण मानते हैं जब उनमें भी अनेक प्रक्षेप हैं तो उन पाँच काण्डों को ही अप्रमाण क्यों न माना जाये ? इष्टापत्ति करने पर आपकी रामकथा भी समुद्र में फेंकने लायक रह जायगी ।

अष्टम प्राय युद्धकाण्ड ५३९ सर्ग ५९ का राम और रावण का मुकाबला सहेतुक ५९ वें सर्ग के प्रारम्भ में ही दिखलाया गया है । ५८ वें सर्ग के अनुसार वानरी सेना के सेनापति नील के द्वारा राक्षसी सेना के सेनापति प्रहस्त का वध हो गया तो रावण उत्तेजित हो उठा । उसने प्रधान प्रधान राक्षसयूथमुख्यों से कहा कि उन रिपुओं की अवज्ञा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये जिन्होंने हमारे ससैन्य सकुञ्जर सेनापति को मार डाला है । अतः अब मैं स्वयं विजय के लिए रणभूमि में जा रहा हूँ । यह कहकर अमरराजशत्रु राक्षसराज रावण रणभेरी, पणव आदि के प्रणादों और आस्फोटों, शौर्यप्रकाशक शब्दों, सिंहनादों तथा पुण्यस्तवों से स्तूयमान होता हुआ अपने दलबल के साथ भूतों से घिरे हुए रुद्र के समान रणाङ्गण की ओर चल पड़ा । महार्णवों एवं बादलों के गर्जनों के तुल्य गर्जती हुई तथा महान् वृक्षों एवं शैलों को हाथों में ली हुई प्रचण्ड राक्षसी सेना को देखकर राम ने विभीषण से पूछा कि वह अक्षोभ्य अभीरु वीरों तथा महेन्द्रपर्वतसदृश गजेन्द्रों से युक्त किसकी सेना है। विभीषण ने मुख्य वीरों का वर्णन करते हुए बताया कि यह प्रबलप्रताप तेजोमय रावण है जो कि दैत्यों और देवताओं के भी दर्प का हनन करनेवाला है । उसे देख श्रीराम भी सीता-हरणसंभव क्रोध को उसके ऊपर छोड़ने के लिए संनद्ध हो गये । किन्तु लक्ष्मण के अनुरोध करने पर उन्हें युद्ध करने की अनुमति दे दी । पहले सुग्रीव से रावण का संग्राम हुआ । बाद में गवाक्ष, गवय, सुषेण, ऋषभ, नल आदि वानरों ने भी युद्ध किया । अन्त में लक्ष्मण सामने उपस्थित हुए । बीच में हनुमान् से रावण का युद्ध होने लगा । एक बार तो रावण ने तलप्रहार से हनुमान् को विचलित कर दिया, पर तेजस्वी महामति हनुमान् ने तल से आहत होकर दशग्रीव भूकम्प में महापर्वत के समान विचलित एवं विकम्पित हो उठा । पुनः हनुमान् पर मुष्टिप्रहार कर वह नील से भीड़ गया । भीषण युद्ध के बाद उसने आग्नेय अस्त्र से नील को मारा परन्तु अग्निपुत्र नील अत्यन्त आहत होने पर भी मृत नहीं हुए । तदनन्तर लक्ष्मण और रावण का तुमुल संग्राम हुआ । लक्ष्मण के हस्तलाघव से रावण विस्मित हुआ । रावण ने कालाग्निप्रभ स्वयम्भूदत्त शर से लक्ष्मण के सिर पर प्रहार किया तो लक्ष्मण सायक से पीड़ित होकर मूच्छित हो गये । कठिनाई से होश में आकर राक्षसराट्नाथ रावण ने स्वयम्भू से प्राप्त रिपुवित्रासनी महाशक्ति का प्रयोग किया । लक्ष्मण ने अनेक अग्नितुल्यबाणों से उसका प्रतीकार किया, किन्तु वह अमोघ दिव्य शक्ति थी । उसने लक्ष्मण को घायल कर दिया । रावण ने घायल लक्ष्मण को दोनों भुजाओं से उठाने का प्रयास किया। जो हिमाचल, मन्दर एवं त्रैलोक्य को उठा सकता था वह लक्ष्मण को उठा नहीं सका । ब्राह्मी शक्ति से ताड़ित होने पर भी लक्ष्मण ने विष्णु के अमीमांस्य भाग स्वात्मा का अनुसन्धान किया, अतः रावण उन्हें उठाने में समर्थ नहीं हुआ । इसी बीच हनुमान् ने आकर रावण पर मुष्टिप्रहार किया, वह मूच्छित होकर जानुओं के बल से रथ-पृष्ठभूमि पर गिर पड़ा । उसके मुख, नेत्र और कानों से रक्त की धारा बह चली। वह निश्चेष्ट होकर रथ-मध्य में बेहोश हो गिर गया । हनुमान् ने अपनी बाहुओं से लक्ष्मण को उठा लिया । वायुपुत्र हनुमान् के सौहार्द एवं परम भक्ति से वे अनायास ही उठ गये । फिर महातेजा रावण होश में आकर वानर सेना को विद्रावित करने लगा । तब गरुड़ारूढ़ विष्णु के समान हनुमान् पर आरूढ़ होकर राम ने रावण से संग्राम किया । रावण ने हनुमान् पर भी बहुत बाण चलाये, पर स्वाभाविक तेज से सम्पन्न हनुमान् उनसे अधिकाधिक तेजस्वी हो गये । राम ने रावण पर ऐसा भीषण प्रहार किया कि उसका चक्र, अश्व, ध्वज, पताका, सारथि तथा वज्र, शूल और खड्ग सहित रथ नष्ट हो गया । फिर वज्रतुल्य बाण से उसकी भुजा में ऐसा प्रहार किया कि वह अत्यन्त आर्त होकर विचलित हो गया। उसके हाथ से धनुष छूट गया। उसे विह्वल देखकर राम ने पुनः अर्धचन्द्र से विशालकाय रावण के किरीटों को काट डाला । अनन्तर राम ने कहा तुम आज बहुत थक गये हो, अतः आज तुम्हें मृत्यु के वश में नहीं भेजूंगा । रात्रिञ्चर, जा लङ्का में विश्राम कर । पुनः रथी धन्वी होकर आना तब मेरा बल देखना । इस तरह शरादित, निकृत्तचाप तथा भग्नकिरीटकूट होने से रावण का हर्ष और दर्प चूरचूर हो गया । वह लङ्का चला गया। इस महत्त्वपूर्ण सर्ग को प्रक्षेप कहने का प्रयास दुरभिसन्ध्विमूलक ही है। इसमें राम, लक्ष्मण,

५४० रामायणमीमांसा अष्टादश हनुमान् आदि का अलौकिक महत्त्व वर्णित है। इसमें भी राम और लक्ष्मण की विष्णुरूपता सिद्ध होती है, इसलिए बुल्के हठात् इसे प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं । किन्हीं समान घटनाओं में एक दूसरे का अनुकरण नहीं कहा जा सकता । महर्षि वाल्मीकि ने घटनाओं का वर्णन सत्यता के आधार पर ही किया है । "सन्तुष्यतु दुर्जनः" न्याय से ज्यादा से ज्यादा इतना ही कहा जा सकता है कि ५९ वें सर्ग में अकम्पन और नरान्तक का वर्णन प्रक्षेप है, परन्तु सिर्फ दो नामों की पुनरुक्ति के आधार पर इतने महत्त्वपूर्ण सर्ग को प्रक्षेप कहना ही अति साहस है । १०० वें सर्ग में लक्ष्मण पर रावण द्वारा शक्ति-प्रयोग का वर्णन है । परन्तु दोनों के स्वरूप में बहुत भेद है । सर्ग १०० में लक्ष्मण ने रावण के रथ, सारथि तथा मनुष्यशीर्ष ध्वज काट कर रावण के धनुष एवं घोड़ों को नष्ट कर दिया । उस समय विभीषण ने रावण पर प्रहार किया था । भग्न रथ से हटकर रावण ने विभीषण पर क्रोध करके शक्ति का प्रयोग किया पर लक्ष्मण ने उसे बीच में ही नष्ट कर दिया । उसके बाद रावण ने और भी तीव्र काल से भी भीषण वज्रोपम शक्ति का प्रयोग किया । लक्ष्मण फिर विभीषण को बचाकर स्वयं सामने आकर भीषण बाणों से रावण पर प्रहार करने लगे तब उसने अष्ट घण्टावाली महास्वना शक्ति का प्रयोग लक्ष्मण पर ही कर डाला । उस समय राम ने— "स्वस्त्यस्तु लक्ष्मणायेति मोघा भव हतोद्यमा ।” कहकर शक्ति को मोघ बनाया और राम ने स्वयं उस महाशक्ति को लक्ष्मण की छाती से निकाला और तोड़ डाला । इस बीच रावण ने शक्ति निकालते समय राम पर भीषण मर्मभेदी बाण चलाये । उनकी कुछ चिन्ता न करते हुए राम हनुमान् आदि वानरों को लक्ष्मण की रक्षा में छोड़कर स्वयं रावण से निबटने के लिए प्रस्तुत हुए । (श्लोक ४६-५२) तक में यह नहीं कहा गया है कि राम ने पहले पहल ही रावण को देखा है । किन्तु इसकी ५९ वें सर्ग से सङ्गति लगाकर यही निश्चित करना चाहिये कि आज के पराक्रम का यह काल बहुत समय से ईप्सित था । उस दिन परिश्रान्त जानकर रावण को पराजित करके छोड़ दिया था । मौत के घाट उसे नहीं उतारा था । तब से वह अब तक सामने नहीं आया । अब इस समय पापात्मा दशग्रीव का वध अवश्य करना है । जैसे ग्रीष्मान्त में चातक को मेघदर्शन अभीष्ट होता है वैसे ही वध के लिए मुझे रावण का दृष्टिगत होना अभीष्ट है । इस क्षण मैं प्रतिज्ञा करता हूँ अब वानर लोग जगत् को अरावण या अराम ही देखेंगे। अतः यह चक्षु के गोचर होकर जीवित नहीं रह सकता- “सोऽद्यमद्य रणे पापश्चक्षुर्विषयमागतः । चक्षुर्विषयमागम्य नायं जीवितुमर्हति ॥” ५१ ॥ आज यह पापी मेरे चक्षु का विषय बनकर जीवित नहीं रह सकता । इससे यह नहीं निकलता कि अभी तक राम के सामने रावण आया ही नहीं था । इतना ही क्यों सर्ग के अन्त में भी कहा गया है कि दीप्तधनुष्मान् राम से मर्दित रावण भय से वैसे ही भाग गया जैसे प्रबल वायु के भय से बलाहक भाग जाते हैं । पुनः रावण सर्ग १०३ में तैयार होकर आता है । अतः सर्ग १०० के श्लो० ४६-५२ के बलपर भी ५९ वें सर्ग को प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता । बुल्के का यह भी कहना है कि सर्ग ६९ और ७० भी प्रक्षेप हैं । यत्र तत्र इन्द्रवज्रा छन्दों के प्रयोग के अतिरिक्त इन सर्गों की कथावस्तु इन्हें प्रक्षिप्त ठहराती है । इनमें दो राक्षसों का वध वर्णित है, जो पहले मारे जा चुके हैं । त्रिशिरा (३।२७।१८,१९) तथा नरान्तक ( ६।५८।२० ) में । महोदर और महापार्श्व एवं दो अन्य राक्षसों के वध का उल्लेख है जिनका वध बाद में फिर किया गया है । महोदर का ( ६।९७ ) तथा महापार्श्व का ( ६।९८ ) में । परन्तु बुल्के की यह भ्रान्ति ही है । वस्तुतः यह किसी भ्रान्त व्यास द्वारा वर्णित प्रक्षेप नहीं है, किन्तु सत्य घटना के आधार पर ही वाल्मीकिरामायण का वर्णन है । ६।७०।९४-९६ में नरान्तक का वध अङ्गद द्वारा हुआ है एवं नील के द्वारा महोदर का वध ७०।१२६ में हुआ है । त्रिशिरा रावण पुत्र था तथा महोदर उसका पितृव्य था ।

अध्याय युद्धकाण्ड ५४१ त्रिशिरा का वध राम के द्वारा ७०।१३८-१४२-१४४ में वर्णित है। ३।२७ में दूषण के भाई त्रिशिरा का वध राम के द्वारा हुआ था। महापाश्वं का वध ऋषभ द्वारा उसी की गदा से ७०।१५३-१६१ में हुआ है। द्विविद द्वारा नरान्तक का वध (५८।२०) में हुआ है। यह नरान्तक प्रहस्त के सचिवों में एक था— “नरान्तकः कुम्भहनुः महानादः समुन्नतः। एते प्रहस्तसचिवाः ॥” अङ्गद द्वारा निहत नरान्तक इससे भिन्न ही था। (६।९७) में महोदर एवं सुग्रीव का तुमुल युद्ध होता है। (६-३७) श्लोकों में इसका वध वर्णित है। इससे रावण के महान् शोक एवं राघव को महती प्रसन्नता हुई थी। महापाश्वं का वध अङ्गद द्वारा (६।७८।१-२२) श्लोकों में होता है। उक्त वर्णन भ्रान्ति के परिणाम नहीं हैं। बुल्के को विदित होना चाहिये कि विभिन्न त्रिशिरों, नरान्तकों, महोदरों एवं महापाश्वों के अस्त्र-शस्त्रों, युद्धप्रकारों एवं प्रतिद्वन्द्वियों में भेद है। अतः नाम समान होने पर भी उन व्यक्तियों में भेद है। यदि वस्तुस्थिति वैसी न होती तो नामान्तर भी कल्पित किये जा सकते थे। पुनः बुल्के कहते हैं, “इन्द्रजित् के वध के बाद स्पष्ट शब्दों में उल्लेख (९१।१६) है कि उस समय तक युद्ध केवल तीन दिन से चल रहा था। रावणवध के लिए एक दिन और रखने पर अनुमान किया जाता है कि आदि- रामायण के अनुसार प्रथम दिन सामूहिक युद्ध और नागपाश-प्रसङ्ग, दूसरे दिन कुम्भकर्ण-वध, तीसरे दिन इन्द्रजित्- वध और चौथे दिन रावण-वध हुआ होगा।” परन्तु उनकी यह कल्पना निराधार ही नहीं किन्तु प्रमाणान्तरों से विरुद्ध भी है। ९१।१६वाँ श्लोक निम्नोक्त है— “अहोरात्रैस्त्रिभिर्वीरः कथंचिद्विनिपातितः । निरमित्रः कृतोऽस्म्यद्य निर्यास्यति हि रावणः ॥” अर्थात् तीन दिन रातों में वीर इन्द्रजित् मारा गया है। इससे आज मैं निरमित्रप्राय हो गया हूँ। शत्रु का मुख्य वीर मारा गया। अब रावण स्वयं युद्ध में आयेगा। तिलककार के अनुसार दशमी के चतुर्थ प्रहर से इन्द्रजित् से युद्ध प्रारम्भ हुआ था और त्रयोदशी के चतुर्थ प्रहर में वह मारा गया था। इस कथन से चार दिन में युद्ध की समाप्ति की अटकलें लगाना अनभिज्ञता ही है, क्योंकि इस श्लोक का स्पष्ट अर्थ यह है कि तीन दिनों में मेघनाद मारा गया न कि सारा युद्ध तीन दिन चला। १०८वें सर्ग के ३४वें श्लोक में कतक तथा तीर्थ टीकाकारों के अनुसार श्रीराम ने जिस दिन सुवेल पर्वत पर आरोहण किया था वहीं सूर्य अस्त हो गये थे। “ततोऽस्तमगमत् सूर्यः सन्ध्ययाप्रतिरञ्जितः । पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत ॥” इससे प्रतीत होता है कि उस दिन पूर्णिमा की रात्रि थी। इस दृष्टि से कृष्णपक्ष से युद्ध प्रारम्भ हुआ था। उसी रात्रि में नागपाश-बन्ध और उससे मुक्ति हुई थी। द्वितीया के दिन धूम्राक्ष-वध, तृतीया को वज्रदंष्ट्र का वध तथा चतुर्थी को अकम्पन का वध हुआ था। षष्ठी को रावण का मान-भङ्ग एवं सप्तमी को कुम्भकर्ण-वध हुआ था। अष्टमी को अतिकाय-वध तथा नवमी को इन्द्रजित् द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग हुआ था। दशमी को निकुम्भ-वध और उसी रात्रि को मकराक्ष-वध हुआ था। एकादशी से त्रयोदशी तक इन्द्रजित् का वध हुआ था। चतुर्दशी को मूलबल का वध, अमावस्या को रावण-युद्ध एवं उसका वध हुआ था।

५४२ रामायणमीमांसा अष्टादश तिलककार के अनुसार महाभारत में जिस प्रकार पाण्डवों का १३ वर्ष का वनवास अधिक मास को लेकर जोड़ा गया था । यह विराट्पर्व के भीष्मवाक्य से सिद्ध है । इसी तरह श्रीरामजी का १४ वर्ष का वनवास भी अधिक मास को लेकर ही पूरा हुआ था । इस तरह अमान्त मान से आश्विन कृष्ण चतुर्दशी में पूर्णिमान्त मान से कार्तिक कृष्ण षष्ठी में १४ वर्षों की पूर्ति होती है । अन्यथा चैत्रमास की शुक्ला दशमी से आरम्भ होकर १४ वर्ष की समाप्ति षष्ठी को नहीं हो सकती थी । परन्तु अधिक मास की गणना से ११ दिन कम ६ मास की वृद्धि हो जाती है । तभी १४ वें वर्ष की पूर्ति षष्ठी को हो सकती है । अतः १२ वर्ष पूरे होने पर १३ वें वर्ष के कुछ समय बीतने पर फाल्गुनशुक्ल अष्टमी को सीताहरण हुआ था । १४वें वर्ष के कुछ दिन बीतने पर श्रीरामजी लङ्का के समीप पहुँचे थे । “वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम ।” ( वा० रा० ५।३७।८ ) इसी सीतोक्ति के अनुसार सावन मान से स्वहरण दिन से १० मास बीत चुकने पर हनुमान् का सीता- संवाद हुआ था । “पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता” इस रामोक्ति के अनुसार पौष शुक्ल १४शी या पूर्णिमा को श्रीरामजी त्रिकूट- शिखर पर आये थे । हनुमान् के लङ्का प्रवेशकाल में— “हिमव्यपायेन च शीतरश्मिरभ्युत्थितो नैकसहस्ररश्मिः ।” “द्वौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः ।” इन वाक्यों से प्रतीत होता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के बाद दो दिन के भीतर हनुमान् का लङ्काप्रवेश हुआ है । अन्यत्र मार्गशीर्षकृष्ण अष्टमी को राम का प्रस्थान कहा गया है । पौषपूर्णिमा को राम त्रिकूट पर आये । उसके बाद १५ दिन सेनानिवेश, दूतप्रेषण आदि में बीत गये । तब युद्धारम्भ हुआ । तब से लेकर भाद्र और श्रावण उभय अमान्त पर्यन्त लङ्कापुर के बाहर दोनों सेनाओं का युद्ध हुआ तथा बहुत राक्षसों के क्षय से भयभीत होकर राक्षस लङ्का में प्रविष्ट हो गये । उस दिन युद्ध का अवहार ( युद्धबन्दी ) रहा । तदुत्तर प्रतिपदा को शरबद्ध राम का सीता ने दर्शन किया और उन्होंने कहा कि अक्षोभ्य सागर पार करके गोष्पद में दोनों भाई मारे गये— “तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं भ्रातरौ गोष्पदे हतौ ।” इससे प्रतीत होता है बहुत दिन के युद्ध में बहुत से राक्षस मारे गये थे । कतिपय यूथपों सहित थोड़ी ही सेना बांकी थी । उसी समय शरबन्ध हुआ था । “अयं ते सुमहान् कालः शयानस्य महाबल ।” यह कुम्भकर्ण के प्रति रावण ने कहा था । इससे प्रतीत होता है कि छः मास से अधिक कुम्भकर्ण को सोते बीत गये थे । सेतुबन्ध आदि वृत्तान्त तुम नहीं जानते । रावण के इस कथन से प्रतीत होता है कि मन्त्रणा के अनन्तर बीच में कुम्भकर्ण नहीं जगा था । यह भी प्रतीत होता है कि शरबन्धन कृष्णप्रतिपदा को नहीं हुआ, क्योंकि पूर्णिमा के अनन्तर की प्रतिपदा में सम्पूर्ण रात्रि में चन्द्रमा रहता है । इस स्थिति में “तस्मिंस्तमसि दारुणे” यह उक्ति सङ्गत नहीं होगी । अतः शुक्लपक्ष की प्रतिपदा ही मानना युक्त है । अमावस्या को ही रावण-वध हुआ है, यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि इन्द्रजित् वध के अनन्तर यह कहा गया है कि तुम आज कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को अभ्युत्थान करके अमावस्या में ही शत्रु-विजय के लिए गमन करो । यह रावण के प्रति सुपार्श्व ने कहा था । इससे प्रतीत होता है कि चतुर्दशी को रावण-बल-वध के अनन्तर अमावस्या को रावण रणभूमि में आया और रात्रि में उसने राम तथा लक्ष्मण से युद्ध किया । शक्तिघात के अनन्तर वह राम से पराभूत होकर लङ्का चला गया—

अध्याय युद्धकाण्ड ५४३ लक्ष्मण की चिकित्सा के अनन्तर पुनः राम और रावण का युद्ध वाल्मीकि द्वारा वर्णित है। अतः अमावस्या का रावण-वध होना संभव ही नहीं था। अगस्त्य ने आदित्यहृदय का उपदेश दिन को ही दिया था, क्योंकि वहीं यह उल्लेख है कि आदित्य का दर्शन कर तथा आदित्यहृदय का जप करके राम प्रसन्न हुए— "आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वाेदं परं हर्षमवाप्तवान्।" (वा० रा० ६।१०५।२९) उसके बाद ही रावण वध और इसके अनन्तर आदित्य का स्थिरप्रभ होना कहा गया है— "स्थिरप्रभश्चाप्यभवद् दिवाकरः।" (वा० रा० ६।१०८।३२) इससे प्रतीत होता है कि दिन में ही रावण वध हुआ था, अतः चिरकाल तक युद्ध होने के बाद लक्ष्मण पर शक्तिघात हुआ, तदर्थ औषधपर्वत का आनयन हुआ था। अमावस्या की रात्रि को शक्तिघात और रावण का मानभङ्ग कहा गया है इससे अमावस्या को रावण-वध नहीं कहा जा सकता। पद्मपुराण में कहा गया है— "ततो जज्ञे महायुद्धं संकुलं कपिरक्षसाम् । मध्याह्ने प्रथमं युद्धं प्रारब्धं प्रतिपद्यभूत् ॥" यहाँ प्रतिपदा का अर्थ शुक्ल प्रतिपदा है। उस दिन मध्याह्न में वानरों और राक्षसों का भीषण युद्ध हुआ। पर उसी दिन रात्रि को मायावी इन्द्रजित् ने नागपाश से दोनों भाइयों (राम और लक्ष्मण) को बाँध दिया था। "ततो निशि समागम्य मायावी शक्रजिद् बली । बबन्ध नागपाशैस्तौ राघवौ च हरिव्रजान् ॥" यहाँ ततः का अर्थ है बहुत काल तक युद्ध के बाद उसी दिन नहीं अन्यथा 'तस्यामेव निशि' ऐसा कहना उचित होता। अगले प्रसङ्गों में 'द्वितीयेऽह्नि षष्ठ्यां' कहा गया है। और रामायण में "दारुणे तमसि" भी कहा गया है। अतः भाद्रश्रावणोत्तर प्रतिपदा की रात्रि को इन्द्रजित् ने नागपाश का प्रयोग किया था। "वैनतेयस्तदाभ्येत्य तानि चास्त्राण्यमोचयत् । द्वितीयेऽह्नि धूम्राक्षं हनूमान्निजघान वै ॥" "तृतीयेऽह्नि वज्रदंष्ट्रं खड्गाच्छिच्छेद चाङ्गदः । जघान हनूमान् भूयश्चतुर्थेऽह्न्यकम्पनम् ॥" "प्रहस्तं पञ्चमीतिय्यां नीलश्छिच्छेद मूर्धनि । रावणः परिभूतोऽभूत् षष्ठ्यां रामेण धन्विना ॥" "अथ लङ्केश्वरः खिन्नः कुम्भकर्णं सहोदरम् ॥ शैलमुद्गरघाताश्वधावनाद्यैरबोधयत् । जघान तं कुम्भकर्णं रामः सप्तमवासरे ॥" अर्थात् तब गरुड़ ने आकर नागपाश से राम और लक्ष्मण को मुक्त किया। द्वितीय दिन हनुमान् ने धूम्राक्ष को मारा, तीसरे दिन वज्रदंष्ट्र को अङ्गद ने मारा। चौथे दिन हनुमान् ने अकम्पन को मारा। पञ्चमी तिथि को नील ने प्रहस्त का वध किया। षष्ठी को रावण राम के द्वारा अभिभूत हुआ। इससे स्पष्ट है कि पद्मपुराण से भी यही सिद्ध होता है कि प्रहस्त-वध के बाद रावण और राम का मुकाबला हुआ था। अतः बुल्के जो इसे प्रक्षेप कहते हैं, वह निर्मूल है। तब लङ्केश्वर ने खिन्न होकर कुम्भकर्ण को जगाने का प्रयास किया। जगाने के लिए उसपर शैल और मुद्गर गिराये गये तथा घोड़े दौड़ाए गये। कुम्भकर्ण को राम ने मारा। दो दिन में कुम्भकर्ण को जगाया गया।