रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५४१ त्रिशिरा का वध राम के द्वारा ७०।१३८-१४२-१४४ में वर्णित है। ३।२७ में दूषण के भाई त्रिशिरा का वध राम के द्वारा हुआ था। महापाश्वं का वध ऋषभ द्वारा उसी की गदा से ७०।१५३-१६१ में हुआ है। द्विविद द्वारा नरान्तक का वध (५८।२०) में हुआ है। यह नरान्तक प्रहस्त के सचिवों में एक था— “नरान्तकः कुम्भहनुः महानादः समुन्नतः। एते प्रहस्तसचिवाः ॥” अङ्गद द्वारा निहत नरान्तक इससे भिन्न ही था। (६।९७) में महोदर एवं सुग्रीव का तुमुल युद्ध होता है। (६-३७) श्लोकों में इसका वध वर्णित है। इससे रावण के महान् शोक एवं राघव को महती प्रसन्नता हुई थी। महापाश्वं का वध अङ्गद द्वारा (६।७८।१-२२) श्लोकों में होता है। उक्त वर्णन भ्रान्ति के परिणाम नहीं हैं। बुल्के को विदित होना चाहिये कि विभिन्न त्रिशिरों, नरान्तकों, महोदरों एवं महापाश्वों के अस्त्र-शस्त्रों, युद्धप्रकारों एवं प्रतिद्वन्द्वियों में भेद है। अतः नाम समान होने पर भी उन व्यक्तियों में भेद है। यदि वस्तुस्थिति वैसी न होती तो नामान्तर भी कल्पित किये जा सकते थे। पुनः बुल्के कहते हैं, “इन्द्रजित् के वध के बाद स्पष्ट शब्दों में उल्लेख (९१।१६) है कि उस समय तक युद्ध केवल तीन दिन से चल रहा था। रावणवध के लिए एक दिन और रखने पर अनुमान किया जाता है कि आदि- रामायण के अनुसार प्रथम दिन सामूहिक युद्ध और नागपाश-प्रसङ्ग, दूसरे दिन कुम्भकर्ण-वध, तीसरे दिन इन्द्रजित्- वध और चौथे दिन रावण-वध हुआ होगा।” परन्तु उनकी यह कल्पना निराधार ही नहीं किन्तु प्रमाणान्तरों से विरुद्ध भी है। ९१।१६वाँ श्लोक निम्नोक्त है— “अहोरात्रैस्त्रिभिर्वीरः कथंचिद्विनिपातितः । निरमित्रः कृतोऽस्म्यद्य निर्यास्यति हि रावणः ॥” अर्थात् तीन दिन रातों में वीर इन्द्रजित् मारा गया है। इससे आज मैं निरमित्रप्राय हो गया हूँ। शत्रु का मुख्य वीर मारा गया। अब रावण स्वयं युद्ध में आयेगा। तिलककार के अनुसार दशमी के चतुर्थ प्रहर से इन्द्रजित् से युद्ध प्रारम्भ हुआ था और त्रयोदशी के चतुर्थ प्रहर में वह मारा गया था। इस कथन से चार दिन में युद्ध की समाप्ति की अटकलें लगाना अनभिज्ञता ही है, क्योंकि इस श्लोक का स्पष्ट अर्थ यह है कि तीन दिनों में मेघनाद मारा गया न कि सारा युद्ध तीन दिन चला। १०८वें सर्ग के ३४वें श्लोक में कतक तथा तीर्थ टीकाकारों के अनुसार श्रीराम ने जिस दिन सुवेल पर्वत पर आरोहण किया था वहीं सूर्य अस्त हो गये थे। “ततोऽस्तमगमत् सूर्यः सन्ध्ययाप्रतिरञ्जितः । पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत ॥” इससे प्रतीत होता है कि उस दिन पूर्णिमा की रात्रि थी। इस दृष्टि से कृष्णपक्ष से युद्ध प्रारम्भ हुआ था। उसी रात्रि में नागपाश-बन्ध और उससे मुक्ति हुई थी। द्वितीया के दिन धूम्राक्ष-वध, तृतीया को वज्रदंष्ट्र का वध तथा चतुर्थी को अकम्पन का वध हुआ था। षष्ठी को रावण का मान-भङ्ग एवं सप्तमी को कुम्भकर्ण-वध हुआ था। अष्टमी को अतिकाय-वध तथा नवमी को इन्द्रजित् द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग हुआ था। दशमी को निकुम्भ-वध और उसी रात्रि को मकराक्ष-वध हुआ था। एकादशी से त्रयोदशी तक इन्द्रजित् का वध हुआ था। चतुर्दशी को मूलबल का वध, अमावस्या को रावण-युद्ध एवं उसका वध हुआ था।