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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय युद्धकाण्ड ५४१ त्रिशिरा का वध राम के द्वारा ७०।१३८-१४२-१४४ में वर्णित है। ३।२७ में दूषण के भाई त्रिशिरा का वध राम के द्वारा हुआ था। महापाश्वं का वध ऋषभ द्वारा उसी की गदा से ७०।१५३-१६१ में हुआ है। द्विविद द्वारा नरान्तक का वध (५८।२०) में हुआ है। यह नरान्तक प्रहस्त के सचिवों में एक था— “नरान्तकः कुम्भहनुः महानादः समुन्नतः। एते प्रहस्तसचिवाः ॥” अङ्गद द्वारा निहत नरान्तक इससे भिन्न ही था। (६।९७) में महोदर एवं सुग्रीव का तुमुल युद्ध होता है। (६-३७) श्लोकों में इसका वध वर्णित है। इससे रावण के महान् शोक एवं राघव को महती प्रसन्नता हुई थी। महापाश्वं का वध अङ्गद द्वारा (६।७८।१-२२) श्लोकों में होता है। उक्त वर्णन भ्रान्ति के परिणाम नहीं हैं। बुल्के को विदित होना चाहिये कि विभिन्न त्रिशिरों, नरान्तकों, महोदरों एवं महापाश्वों के अस्त्र-शस्त्रों, युद्धप्रकारों एवं प्रतिद्वन्द्वियों में भेद है। अतः नाम समान होने पर भी उन व्यक्तियों में भेद है। यदि वस्तुस्थिति वैसी न होती तो नामान्तर भी कल्पित किये जा सकते थे। पुनः बुल्के कहते हैं, “इन्द्रजित् के वध के बाद स्पष्ट शब्दों में उल्लेख (९१।१६) है कि उस समय तक युद्ध केवल तीन दिन से चल रहा था। रावणवध के लिए एक दिन और रखने पर अनुमान किया जाता है कि आदि- रामायण के अनुसार प्रथम दिन सामूहिक युद्ध और नागपाश-प्रसङ्ग, दूसरे दिन कुम्भकर्ण-वध, तीसरे दिन इन्द्रजित्- वध और चौथे दिन रावण-वध हुआ होगा।” परन्तु उनकी यह कल्पना निराधार ही नहीं किन्तु प्रमाणान्तरों से विरुद्ध भी है। ९१।१६वाँ श्लोक निम्नोक्त है— “अहोरात्रैस्त्रिभिर्वीरः कथंचिद्विनिपातितः । निरमित्रः कृतोऽस्म्यद्य निर्यास्यति हि रावणः ॥” अर्थात् तीन दिन रातों में वीर इन्द्रजित् मारा गया है। इससे आज मैं निरमित्रप्राय हो गया हूँ। शत्रु का मुख्य वीर मारा गया। अब रावण स्वयं युद्ध में आयेगा। तिलककार के अनुसार दशमी के चतुर्थ प्रहर से इन्द्रजित् से युद्ध प्रारम्भ हुआ था और त्रयोदशी के चतुर्थ प्रहर में वह मारा गया था। इस कथन से चार दिन में युद्ध की समाप्ति की अटकलें लगाना अनभिज्ञता ही है, क्योंकि इस श्लोक का स्पष्ट अर्थ यह है कि तीन दिनों में मेघनाद मारा गया न कि सारा युद्ध तीन दिन चला। १०८वें सर्ग के ३४वें श्लोक में कतक तथा तीर्थ टीकाकारों के अनुसार श्रीराम ने जिस दिन सुवेल पर्वत पर आरोहण किया था वहीं सूर्य अस्त हो गये थे। “ततोऽस्तमगमत् सूर्यः सन्ध्ययाप्रतिरञ्जितः । पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत ॥” इससे प्रतीत होता है कि उस दिन पूर्णिमा की रात्रि थी। इस दृष्टि से कृष्णपक्ष से युद्ध प्रारम्भ हुआ था। उसी रात्रि में नागपाश-बन्ध और उससे मुक्ति हुई थी। द्वितीया के दिन धूम्राक्ष-वध, तृतीया को वज्रदंष्ट्र का वध तथा चतुर्थी को अकम्पन का वध हुआ था। षष्ठी को रावण का मान-भङ्ग एवं सप्तमी को कुम्भकर्ण-वध हुआ था। अष्टमी को अतिकाय-वध तथा नवमी को इन्द्रजित् द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग हुआ था। दशमी को निकुम्भ-वध और उसी रात्रि को मकराक्ष-वध हुआ था। एकादशी से त्रयोदशी तक इन्द्रजित् का वध हुआ था। चतुर्दशी को मूलबल का वध, अमावस्या को रावण-युद्ध एवं उसका वध हुआ था।

५४२ रामायणमीमांसा अष्टादश तिलककार के अनुसार महाभारत में जिस प्रकार पाण्डवों का १३ वर्ष का वनवास अधिक मास को लेकर जोड़ा गया था । यह विराट्पर्व के भीष्मवाक्य से सिद्ध है । इसी तरह श्रीरामजी का १४ वर्ष का वनवास भी अधिक मास को लेकर ही पूरा हुआ था । इस तरह अमान्त मान से आश्विन कृष्ण चतुर्दशी में पूर्णिमान्त मान से कार्तिक कृष्ण षष्ठी में १४ वर्षों की पूर्ति होती है । अन्यथा चैत्रमास की शुक्ला दशमी से आरम्भ होकर १४ वर्ष की समाप्ति षष्ठी को नहीं हो सकती थी । परन्तु अधिक मास की गणना से ११ दिन कम ६ मास की वृद्धि हो जाती है । तभी १४ वें वर्ष की पूर्ति षष्ठी को हो सकती है । अतः १२ वर्ष पूरे होने पर १३ वें वर्ष के कुछ समय बीतने पर फाल्गुनशुक्ल अष्टमी को सीताहरण हुआ था । १४वें वर्ष के कुछ दिन बीतने पर श्रीरामजी लङ्का के समीप पहुँचे थे । “वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम ।” ( वा० रा० ५।३७।८ ) इसी सीतोक्ति के अनुसार सावन मान से स्वहरण दिन से १० मास बीत चुकने पर हनुमान् का सीता- संवाद हुआ था । “पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता” इस रामोक्ति के अनुसार पौष शुक्ल १४शी या पूर्णिमा को श्रीरामजी त्रिकूट- शिखर पर आये थे । हनुमान् के लङ्का प्रवेशकाल में— “हिमव्यपायेन च शीतरश्मिरभ्युत्थितो नैकसहस्ररश्मिः ।” “द्वौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः ।” इन वाक्यों से प्रतीत होता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के बाद दो दिन के भीतर हनुमान् का लङ्काप्रवेश हुआ है । अन्यत्र मार्गशीर्षकृष्ण अष्टमी को राम का प्रस्थान कहा गया है । पौषपूर्णिमा को राम त्रिकूट पर आये । उसके बाद १५ दिन सेनानिवेश, दूतप्रेषण आदि में बीत गये । तब युद्धारम्भ हुआ । तब से लेकर भाद्र और श्रावण उभय अमान्त पर्यन्त लङ्कापुर के बाहर दोनों सेनाओं का युद्ध हुआ तथा बहुत राक्षसों के क्षय से भयभीत होकर राक्षस लङ्का में प्रविष्ट हो गये । उस दिन युद्ध का अवहार ( युद्धबन्दी ) रहा । तदुत्तर प्रतिपदा को शरबद्ध राम का सीता ने दर्शन किया और उन्होंने कहा कि अक्षोभ्य सागर पार करके गोष्पद में दोनों भाई मारे गये— “तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं भ्रातरौ गोष्पदे हतौ ।” इससे प्रतीत होता है बहुत दिन के युद्ध में बहुत से राक्षस मारे गये थे । कतिपय यूथपों सहित थोड़ी ही सेना बांकी थी । उसी समय शरबन्ध हुआ था । “अयं ते सुमहान् कालः शयानस्य महाबल ।” यह कुम्भकर्ण के प्रति रावण ने कहा था । इससे प्रतीत होता है कि छः मास से अधिक कुम्भकर्ण को सोते बीत गये थे । सेतुबन्ध आदि वृत्तान्त तुम नहीं जानते । रावण के इस कथन से प्रतीत होता है कि मन्त्रणा के अनन्तर बीच में कुम्भकर्ण नहीं जगा था । यह भी प्रतीत होता है कि शरबन्धन कृष्णप्रतिपदा को नहीं हुआ, क्योंकि पूर्णिमा के अनन्तर की प्रतिपदा में सम्पूर्ण रात्रि में चन्द्रमा रहता है । इस स्थिति में “तस्मिंस्तमसि दारुणे” यह उक्ति सङ्गत नहीं होगी । अतः शुक्लपक्ष की प्रतिपदा ही मानना युक्त है । अमावस्या को ही रावण-वध हुआ है, यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि इन्द्रजित् वध के अनन्तर यह कहा गया है कि तुम आज कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को अभ्युत्थान करके अमावस्या में ही शत्रु-विजय के लिए गमन करो । यह रावण के प्रति सुपार्श्व ने कहा था । इससे प्रतीत होता है कि चतुर्दशी को रावण-बल-वध के अनन्तर अमावस्या को रावण रणभूमि में आया और रात्रि में उसने राम तथा लक्ष्मण से युद्ध किया । शक्तिघात के अनन्तर वह राम से पराभूत होकर लङ्का चला गया—

अध्याय युद्धकाण्ड ५४३ लक्ष्मण की चिकित्सा के अनन्तर पुनः राम और रावण का युद्ध वाल्मीकि द्वारा वर्णित है। अतः अमावस्या का रावण-वध होना संभव ही नहीं था। अगस्त्य ने आदित्यहृदय का उपदेश दिन को ही दिया था, क्योंकि वहीं यह उल्लेख है कि आदित्य का दर्शन कर तथा आदित्यहृदय का जप करके राम प्रसन्न हुए— "आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वाेदं परं हर्षमवाप्तवान्।" (वा० रा० ६।१०५।२९) उसके बाद ही रावण वध और इसके अनन्तर आदित्य का स्थिरप्रभ होना कहा गया है— "स्थिरप्रभश्चाप्यभवद् दिवाकरः।" (वा० रा० ६।१०८।३२) इससे प्रतीत होता है कि दिन में ही रावण वध हुआ था, अतः चिरकाल तक युद्ध होने के बाद लक्ष्मण पर शक्तिघात हुआ, तदर्थ औषधपर्वत का आनयन हुआ था। अमावस्या की रात्रि को शक्तिघात और रावण का मानभङ्ग कहा गया है इससे अमावस्या को रावण-वध नहीं कहा जा सकता। पद्मपुराण में कहा गया है— "ततो जज्ञे महायुद्धं संकुलं कपिरक्षसाम् । मध्याह्ने प्रथमं युद्धं प्रारब्धं प्रतिपद्यभूत् ॥" यहाँ प्रतिपदा का अर्थ शुक्ल प्रतिपदा है। उस दिन मध्याह्न में वानरों और राक्षसों का भीषण युद्ध हुआ। पर उसी दिन रात्रि को मायावी इन्द्रजित् ने नागपाश से दोनों भाइयों (राम और लक्ष्मण) को बाँध दिया था। "ततो निशि समागम्य मायावी शक्रजिद् बली । बबन्ध नागपाशैस्तौ राघवौ च हरिव्रजान् ॥" यहाँ ततः का अर्थ है बहुत काल तक युद्ध के बाद उसी दिन नहीं अन्यथा 'तस्यामेव निशि' ऐसा कहना उचित होता। अगले प्रसङ्गों में 'द्वितीयेऽह्नि षष्ठ्यां' कहा गया है। और रामायण में "दारुणे तमसि" भी कहा गया है। अतः भाद्रश्रावणोत्तर प्रतिपदा की रात्रि को इन्द्रजित् ने नागपाश का प्रयोग किया था। "वैनतेयस्तदाभ्येत्य तानि चास्त्राण्यमोचयत् । द्वितीयेऽह्नि धूम्राक्षं हनूमान्निजघान वै ॥" "तृतीयेऽह्नि वज्रदंष्ट्रं खड्गाच्छिच्छेद चाङ्गदः । जघान हनूमान् भूयश्चतुर्थेऽह्न्यकम्पनम् ॥" "प्रहस्तं पञ्चमीतिय्यां नीलश्छिच्छेद मूर्धनि । रावणः परिभूतोऽभूत् षष्ठ्यां रामेण धन्विना ॥" "अथ लङ्केश्वरः खिन्नः कुम्भकर्णं सहोदरम् ॥ शैलमुद्गरघाताश्वधावनाद्यैरबोधयत् । जघान तं कुम्भकर्णं रामः सप्तमवासरे ॥" अर्थात् तब गरुड़ ने आकर नागपाश से राम और लक्ष्मण को मुक्त किया। द्वितीय दिन हनुमान् ने धूम्राक्ष को मारा, तीसरे दिन वज्रदंष्ट्र को अङ्गद ने मारा। चौथे दिन हनुमान् ने अकम्पन को मारा। पञ्चमी तिथि को नील ने प्रहस्त का वध किया। षष्ठी को रावण राम के द्वारा अभिभूत हुआ। इससे स्पष्ट है कि पद्मपुराण से भी यही सिद्ध होता है कि प्रहस्त-वध के बाद रावण और राम का मुकाबला हुआ था। अतः बुल्के जो इसे प्रक्षेप कहते हैं, वह निर्मूल है। तब लङ्केश्वर ने खिन्न होकर कुम्भकर्ण को जगाने का प्रयास किया। जगाने के लिए उसपर शैल और मुद्गर गिराये गये तथा घोड़े दौड़ाए गये। कुम्भकर्ण को राम ने मारा। दो दिन में कुम्भकर्ण को जगाया गया।

५४४ रामायणमीमांसा अष्टादश बोधित कुम्भकर्ण को बोधनोत्तर सातवें दिन मारा गया । इसी लिए सप्तमी का उल्लेख न होकर सप्तम वासर का उल्लेख है । जो लोग कहते हैं षष्ठी को जागरण और सप्तमी को ही वध हो गया उनका कथन ठीक नहीं है । उसके प्रबोधन का प्रयास दो दिन में सम्भव नहीं था । जागकर वह रावण मन्दिर में गया । वहाँ कहा गया है कि सूर्य की प्रभा से रावण का मन्दिर अत्यन्त भास्वर हो रहा था । मन्त्रणा आदि में समय लगने से सप्तमी के दिन युद्ध ही नहीं हो सकता था । इन्द्रजित् का वध तीन दिनों में हुआ था, पर इसका वध छः प्रहरों में हुआ है । अन्यथा—"वधोऽस्य यामषट्केन" इसके साथ सङ्गति न हो सकेगी । अतः भाद्रपद पूर्णिमा को इसका वध युक्त है । दूसरे दिन लक्ष्मण ने रावण-पुत्र अतिकाय को मारा था । अन्य दिन में इन्द्रजित् ने सुग्रीव, विभीषण एवं वानरों को ब्रह्मास्त्र से बाँधा था । उसी दिन हनुमान् ओषधिपर्वत लाये थे । उस पर्वत के औषधस्पृष्ट वायु से सब वानर उठ पड़े थे— “जघान लक्ष्मणोऽन्येद्युरतिकायं दशास्यजम् । बबन्धान्येद्युरिन्द्रारिर्ब्रह्मास्त्रेण नृपौ कपीन् ॥ हनूमता समानीतो महौषधमहीधरः । तस्यानिलस्पर्शवशात् सर्वे एते समुत्थिताः ॥” × × × “अन्येद्युः कपिराट् कुम्भं निकुम्भं वायुजोऽवधीत् । तस्यां निशि रघुश्रेष्ठो जघान मकराक्षम् ॥ मायासीतावधं चक्रे शक्रजिद् रणमूर्धनि । तेन खिन्नोऽभवद्रामः आश्वस्तो लक्ष्मणेन सः ॥ त्रयोदशाहे सौमित्रिस्त्रिदिनं योधयन् बली । जघान शक्रजेतारं रामध्यानेन हेतुना ॥” अन्य दिन सुग्रीव ने कुम्भ को तथा हनुमान् ने निकुम्भ को मारा । उसी दिन राम ने मकराक्ष को मारा । उसी रात को इन्द्रजित् ने मायासीता का रणभूमि में वध किया । उससे राम बहुत खिन्न हुए । लक्ष्मण ने उन्हें आश्वस्त किया । तेरहवें दिवस सौमित्रि ने रामध्यान के प्रभाव से तीन दिनों में मेघनाद को मारा । यहाँ अतिकाय के ग्रहण को त्रिशिरा, देवान्तक, नरान्तक, महोदर तथा महापार्श्व का उपलक्षण समझना चाहिये । अतः 'अन्येद्युः' का अर्थ अन्य दिनों में ऐसा करना चाहिये । तथाच छः दिनों में इन छहों का वध हुआ था, क्योंकि रामायण में क्रम से ही उनका वध कहा गया है । अन्येद्युः अर्थात् सप्तमी को इन्द्रजित् ने ब्रह्मास्त्र से वानरों को बाँधा । हनुमान् महौषध- पर्वत अष्टमी को लाये और अन्येद्यु अर्थात् नवमी को कुम्भ तथा निकुम्भ का वध हुआ । उसी रात्रि को राम ने मक- राक्ष को मारा । उसी रात्रि के अन्त में इन्द्रजित् ने मायासीता का वध किया । दशमी के चौथे प्रहर से लेकर त्रयोदशी के चौथे प्रहर की अवधि में लक्ष्मण ने इन्द्रजित् को मारा । “ततोऽवधीन्मूलबलं चतुर्दश्यां रघूद्वहः । दर्शोऽथ निर्ययौ राजा योद्धुं रामेण संयुगे ॥ चतुरङ्गबलैः सार्धं मन्त्रिभिर्दशकन्धरः । छत्रचामरसंयुक्तः सर्वाभरणभूषितः ॥ महारथगतो द्वारादुत्तरान्निर्ययौ बहिः । आगतो रक्षसां राजा ब्रह्मघ्नो देवकण्टकः ॥

अध्याय युद्धकाण्ड ५४५ योद्धुं रघुवरेणेति शुश्रुवे कलहध्वनिः । तत्र युद्धं समभवद् वानराणाञ्च रक्षसाम् ॥ रामरावणयोश्चैव तथा सौमित्रिणा सह । शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धः सोऽनुजं प्रति रावणः ॥ वक्षसा धारयामास सौमित्रिस्तां वियद्गताम् । तया स वध्यमानः सन् पपात धरणीतले ॥ हनूमता जीवितोऽभूदोषध्यानयनात् पुनः। ततः क्रुद्धो महातेजा राघवो राक्षसान्तकः ॥ जघान राक्षसान् सर्वान् शरैः कालान्तकोपमैः । भयात् प्रदुद्राव रणे लङ्कां प्रति निशाचरः ॥ जगद् राममयं पश्यन् निर्वेदात् स्वगृहं विशत् । निकुम्भिलां ततः प्राप्तो होमं चक्रे जिगीषया ॥ ध्वंसितं वानरेन्द्रैस्तदभिचारात्मकं रिपोः । पुनरुत्थाय पौलस्त्यो रामेण सह योधितुम् । दिव्यं स्यन्दनमारुह्य राक्षसैर्निययौ बहिः ॥” चतुर्दशी को राघव ने रावण के मूलबल (खास सेना) को मारा। अमावस्या को रावण राम से लड़ने निकला। उसके साथ चतुरङ्गिणी सेना और उत्तम मन्त्री थे। छत्र, चामर तथा सर्वाभरणसम्पन्न राजा रावण महारथ पर आरूढ़ होकर उत्तर द्वार से बाहर निकला। राक्षसों का राजा, देवकण्टक तथा ब्रह्मघ्न रावण रघुवर से युद्धार्थ बाहर आया ऐसा हल्ला सुनायी दिया। वहाँ वानर और राक्षसों का घोर युद्ध हुआ। राम के साथ तथा सौमित्रि के साथ भी रावण का युद्ध हुआ। रावण ने विभीषण के प्रति शक्ति चलायी। लक्ष्मण ने उसे अपनी छाती पर रोका और उससे बाधित होकर वे धरती पर गिर पड़े। हनुमान् ने औषधि लाकर लक्ष्मण को जिलाया। उसके बाद राम ने काल तथा यम के तुल्य बाणों द्वारा सभी राक्षसों को मारा। भयभीत होकर रावण लङ्का भाग गया। रावण भय से सारे जगत् को राममय देखने लगा। उसने निकुम्भिला में प्रवेश कर होम करना आरम्भ किया। वानरेन्द्रों ने उस होम का विध्वंस किया। पुनः उठकर पौलस्त्य रावण राम से युद्ध करने के लिए दिव्य स्यन्दन द्वारा राक्षसों के साथ निकला। रावण का निर्गमन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ। “ततः शतमखो दिव्यं रथं हर्यश्वसंयुक्तम् । राघवाय स्वसूतेन प्रेषयामास भक्तिमान् ॥ तं तु मातलिनानीतमारुह्य रथसत्तमम् । स्तूयमानः सुरगणैः युयुधे तेन रक्षसा ॥ ततो युद्धमभूद् घोरं रामरावणयोर्महत् । साप्ताह्निकमहोरात्रं शस्त्रास्त्रैरतिभीषणैः ॥” इन्द्र ने हर्यश्वों से युक्त रथ मातलि के द्वारा भेजा। देवताओं से स्तूयमान राम ने स्यन्दन पर आरूढ़ होकर रावण से युद्ध किया। राम-रावण का घोर युद्ध हुआ। मातलि द्वारा रथ लाने के बाद सात दिन तक घोर युद्ध के पश्चात् रावण का वध हुआ। इसी पक्ष का समर्थन कालिकापुराण से होता है— ६९

'५४६ रामायणमीमांसा अष्टादश

“रामस्यानुग्रहार्थं वै रावणस्य वधाय च। रात्रावेव महादेवी ब्रह्मणा बोधिता पुरा॥ ततस्तु त्यक्तनिद्रा सा नन्दायामाश्विने सिते। जगाम नगरीं लङ्कां यत्रासीद् राघवः पुरा॥ आगत इति शेषः। इदमागमनं रात्र्यन्ते, तदैव मातलि-रथागमनम् । रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी। यावत्तयोः स्वयं देवी युद्धकेलिमुदैक्षत ॥ तावत्तु अष्टरात्राणि सर्वैर्देवैः सुपूजिता। निहते रावणे वीरे नवम्यां सकलैः सुरैः। विशेषपूजां दुर्गायाश्चक्रे लोकपितामहः॥” राम के अनुग्रहार्थ और रावण के वधार्थ ब्रह्मा द्वारा प्रबोधित देवी लङ्का में आयी। राम और रावण का सात दिन तक युद्ध कराया। नवमी को राम से रावण का वध कराया। सब देवताओं तथा ब्रह्मा के द्वारा ८ दिन तक दुर्गा की पूजा होती रही। अग्निवेश्य प्रसिद्ध रामायण में कहा गया है— मार्गशुक्लदशम्यां तु वसन्तीं रावणालये। सम्पातिर्दशमे मासि आचख्यौ वानरेषु ताम् ॥ एकादश्यां महेन्द्राग्रात् पुप्लुवे शतयोजनम्। तद्रात्रिशेषे सीताया दर्शनं हि हनूमतः ॥ द्वादश्यां शिंशपावृक्षे हनूमान् पर्यवस्थितः। तस्यां निशायां सीताया विश्वासालापसत्कथाः ॥ अक्षादिभिस्त्रयोदश्यां ततो युद्धमवर्तत। वधो ह्यक्षकुमारस्य वनविध्वंसनं तथा॥ × × × पौषशुक्लप्रतिपदस्तृतीयां यावदम्बुधेः। उपस्थानं ससैन्यस्य राघवस्य बभूव ह॥ विभीषणश्चतुर्थ्यां वै रामेण सह संगतः। समुद्रतरणार्थाय पञ्चम्यां मन्त्र उद्गमः ॥ प्रायोपवेशनं चक्रे रामो दिनचतुष्टयम्। समुद्रवरलाभश्च सेतूपायप्रकीर्तनम् ॥ सेतोर्दशम्यामारम्भस्त्रयोदश्यां समापनम्। चतुर्दश्यां सुवेलाग्रे रामः सैन्यं न्यवेशयत् ॥ पौर्णमास्यां द्वितीयान्तं सम्पन्नं सैन्यतारणम्। दशम्यन्तं मन्त्रणमेकादश्यां शुकसारणयोः सैन्यप्राप्तिः। माघेऽसितायां द्वादश्यां सैन्यसंख्या कृता। सारणेन कपीनां तु सारासारोपवर्णनम् ॥

अध्याय युद्धकाण्ड ५४७

अग्निवेश्यरामायण के अनुसार मार्गशुक्ल दशमी को सीता लङ्का में लायी गयी। दशवें मास में सम्पाति ने वानरों को उनका समाचार बताया। ११वें दिन महेन्द्र पर्वत से कूदकर हनुमान् १०० योजन समुद्र पारकर लङ्का गये। उसी दिन रात को सीता का दर्शन हुआ। द्वादशी को शिंशपा में हनुमान् स्थित रहे। उसी रात्रि को सीता से वार्तालाप हुआ। त्रयोदशी को अक्षकुमार का वध हुआ। चतुर्दशी को इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र से बन्धन हुआ। चतुर्दशी को लङ्कादाह हुआ। सप्तमी को लौटकर राम को प्रत्यभिज्ञान दिया। अष्टमी उत्तराफाल्गुनी में अभिजित् मुहूर्त में लङ्का के लिए राम का प्रस्थान हुआ। सातवें दिन में समुद्र के तीर पर सेनानिवेश हुआ। पौषशुक्ल प्रति- पदा से ४ दिन तक समुद्र के प्रति प्रायोपवेशन, १० मी से १३शी तक सेतुबन्ध, चतुर्दशी को सुवेलारोहण, पूर्णमासी से द्वितीया तक सैन्यतारण, ३या से १० मी० तक मन्त्रणा, माघशुक्ल १२शी को सारण ने सेना की संख्या की, फिर सारण ने वानरों के सारासार का वर्णन किया। ययावथाङ्गदो दौत्यं माघशुक्लादिवासरे। माघशुक्लद्वितीयादिदिनैः सप्तभिरेव तु ॥ रक्षसां वानराणां तु युद्धमासीत् सुदारुणम् । माघशुक्लनवम्यां तु रात्राविन्द्रजिता रणे ॥ रामलक्ष्मणयोर्नागपाशैर्बन्धो बभूव ह। नागपाशविमोक्षार्थं दशम्यां गरुडोऽभ्यगात् ॥ अत्रावहारः कथितः दशम्यादिदिनद्वयम् । द्वादश्यामाञ्जनेयेन धूम्राक्षस्य वधः कृतः॥ त्रयोदश्यां तु तेनैव निहतोऽकम्पनो रणे। माघशुक्लचतुर्दश्यां यावत् कृष्णादिवासरम् ॥ त्रिदिनेन प्रहस्तस्य नीलेन विहितो वधः। माघासितद्वितीयायाश्चतुर्थ्यन्तं त्रिभिर्दिनैः ॥ रामेण तुमुले युद्धे रावणो द्रावितो रणात्। पञ्चम्यास्त्वष्टमीं यावद् रावणेन प्रबोधितः॥ कुम्भकर्णः समुत्तस्थावत्रायुद्ध्यच्चतुर्दिनम् । कुम्भकर्णो दिनैः षड्भिर्नवम्यास्तु चतुर्दशीम् ॥ रामेण निहतो युद्धे बहुवानरभक्षकः । अमावस्या दिने शोकादवहारो बभूव ह॥ फाल्गुनादिप्रतिपदश्चतुर्थ्यन्तदिने नरान्तकप्रभृतयः पञ्च राक्षसा हताः। पञ्चम्याः सप्तमीं यावदतिकायो हतः। अष्टम्या द्वादशीं यावत् निकुम्भकुम्भावूध्वं मकराक्षश्चतुर्दिनैः । फाल्गुनकृष्णद्वितीयायां शक्रजिता जितम्। ततः पञ्च दिनान्यवहारः। त्रयोदशीमारभ्य षड्भिर्दिनैः लक्ष्मणेनेन्द्रजित् हतः। अमावस्यां ययौ वीरः युद्धाय दशकन्धरः ॥ चैत्रशुक्लप्रतिपदः पञ्चमीं दिनपञ्चकैः। रावणस्य प्रधानानां युद्ध्यतामभवत् क्षयः॥

चैत्रषष्ठ्याष्टमीं यावन्महापाश्र्वादिमारणम् । चैत्रशुक्लनवम्यां तु सौमित्रेः शक्तिभेदनम् ॥ द्रोणाद्रिराजनेयेन लक्ष्मणार्यमुपाहृतः । दशम्यामवहारोऽभूद् रात्रौ युद्धं नृरक्षसोः ॥ एकादश्यां तु रामाय रथो मातलिसारथिः । अष्टादशदिने रामो द्वैरथे रावणं वधीत् ॥ द्वादश्याः शुक्लपक्षस्य यावत्कृष्णचतुर्दशीम् । माघशुक्लद्वितीयायाश्चैत्रकृष्णचतुर्दशीम् ॥ अष्टाशीतिदिनं युद्धं मध्ये पञ्चदशाहकम् । युद्धावहारं संग्रामस्त्रिसप्तविदिनान्यभूत् ॥ संस्कारो रावणदीनाममावास्या दिनेऽभवत् । वैशाखादितिथौ रामः सुवेलं पुनरागमत् ॥ अभिषिक्तो द्वितीयायां लङ्काराज्ये विभीषणः । सीताशुद्धिस्तृतीयायां देवेभ्यो वरलम्भनम् ॥ वैशाखस्य चतुर्थ्यां तु रामः पुष्पकमास्थितः । पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां माधवस्य तु ॥ भरद्वाजाश्रमं रामः ससीतः पुनरागमत् । नन्दिग्रामे तु षष्ठ्यां वै भरतेन समागतः ॥ सप्तम्यामभिषिक्तोऽसावयोध्यायां रघूत्तमः । माघ शुक्ल १ को अङ्गद-दौत्य, २ या से सात दिन तक वानरों और राक्षसों का भीषण युद्ध, माघ शुक्ल ९ मी को नागपाशबन्ध, १० मी को गरुड़ द्वारा मुक्ति, दो दिन अवहार, १२ शी को धूम्राक्ष-वध, १३ शी को अकम्पन का हनुमान् द्वारा वध, माघशुक्ल १४ शी से तीन दिन में प्रहस्तवध, २ या से चतुर्थी तक राम से युद्ध में रावण का विद्रावणम् । पञ्चमी से ८ मी तक ४ दिनों में कुम्भकर्ण-प्रबोधन । नवमी से १४ शी तक ६ दिनों में कुम्भकर्णवध, ३० अमावस्या को अवहार, फा० शु० १ से ४ तक नरान्तकादिवध, ५ मी से ७ मी तक तीन दिन में अतिकाय-वध, ८ मी से १२ शी तक निकुम्भादि-वध, ४ दिनों में मकराक्ष-वध, फा० कृ० २ या को शक्रजित् की विजय, ३ या को औषधि आनयन, तदनन्तर ५ दिनों का अवहार ( युद्धबन्दी ), १३ शी से ६ दिन में इन्द्रजित् का वध, ३० अमा० को रावण की युद्ध यात्रा, चै० शु० ३ या से पाँच दिनों में रावण के प्रधानों का वध, चै० शु० ६ ष्ठी से ८ मी तक महापाश्र्वादि का वध, शुक्ल ९ मी को लक्ष्मण पर शक्ति औषधपर्वतानयन, १० मी को अवहार, ११ शी को मातलि आगमन, तदनन्तर १८ दिनों में रावण-वध । इस तरह माघशुक्ल २ या से चैत्रकृष्ण चतुर्दशी तक ८८ दिन तक युद्ध चला । बीच में १५ दिन अवहार रहा । अमा को रावण-संस्कार हुआ । वैशाख २ या को विभीषण का अभिषेक, ३ या को सीताशुद्धि, चतुर्थी को पुष्पकारोहण, वै० ५ मी को १४ वर्ष पर भरद्वाजाश्रम आगमन, ६ष्ठी को भरतभेंट और ७ मी को राम का अभिषेक । यद्यपि रावण-वध के अनन्तर सीता के दर्शन में विलम्ब होना अस्वाभाविक-सा लगता है तथापि कल्पभेद से कालगणनाभेद वश अग्निवेश्य-कथा की भी संगति हो सकती है । सर्वथापि ४ दिन में ही युद्धसमाप्ति की बात असम्भव ही है । अभी अभी बंगलादेश की स्वाधीनता का युद्ध १४ दिनों में समाप्त हुआ है । परन्तु अटकल के आधार पर कोई कह सकता है कि दो दिन में खुलना, कुष्ठिया आदि पर अधिकार, तीन दिन में चटगाँव, ढाका आदि पर

अधिकार कर लिया गया होगा । स्पष्ट ही है कि वस्तुस्थिति एवं अटकल में बहुत भेद होता है । बुल्के स्वयं मानते हैं कि प्रक्षिप्त सर्गों का ठीक-ठीक निर्णय करना कठिन है । हनुमान् की हिमालय-यात्रा ५६४ वें अनु० में वे कहते हैं, "हनुमान् की हिमालय-यात्रा का दो बार सर्ग ७४ और सर्ग १०१ में वर्णन हैं । वे कहते हैं इसके प्रक्षिप्त होने का सबसे महत्त्वपूर्ण तर्क हनुमान् के समुद्र-लङ्घन का वर्णन है (वा० रा० ५।१) । हिमालय की यात्रा इस लङ्घन से कहीं अधिक असाधारण है। फिर भी इस कार्य की कठिनाई का वर्णन नहीं किया गया । यदि समुद्र-लङ्घन तथा हिमालय यात्रा का वर्णन दोनों एक के ही द्वारा रचित होते तो हिमालय-यात्रा को अधिक महत्त्व दिया जाता । महाभारत में हनुमान् की हिमालय-यात्रा का उल्लेख नहीं है ।" परन्तु यह भी उनकी भ्रान्ति ही है, कारण स्पष्ट है । १०० योजन समुद्र का लङ्घन ही कठिन काम था, क्योंकि उसमें बीच में कहीं ठहरने या रुकने का अवकाश नहीं था। हिमालय-यात्रा में वह कठिनाई नहीं थी । पर्वतों और वृक्षों को उखाड़ कर लाना तो उन असाधारण बन्दरों के लिए कठिन था ही नहीं । इसके अतिरिक्त एक बड़ी कठिनाई के वर्णन के बाद पुनः पुनः वैसा ही वर्णन महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता । महाभारत का रामोपाख्यान तो संक्षेप कथानक ही है । अतः उसमें हिमालय-यात्रा का वर्णन न होना लाघवार्थ ही है । बुल्के कहते हैं कि "त्रिष्टुप् छन्दों का बाहुल्य भी प्रामाणिकता के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न करता है । सर्ग १०१ को हटाने पर १०० का १०२ से सुगमता से मेल बैठ जाता है । १०० के कुछ श्लोक १०२ में दुहराये गये हैं । इससे भी १०० का प्रक्षिप्त होना सिद्ध होता है," पर यह भी तर्क लचर ही है, क्योंकि महाकाव्यों में विविध छन्दों का होना दूषण न होकर भूषण ही है । मेल तो सर्गान्त के श्लोकों से ही हो जाता है फिर तो बीच के सभी श्लोक प्रक्षिप्त ही ठहरेंगे । इस दृष्टि से देखा जायगा तो सारी बाइबिल प्रक्षिप्त ही सिद्ध होगी । चमत्कारवाली सारी घटनाएँ बाइबिल की प्रक्षिप्त ही सिद्ध होंगी । अग्नि-परीक्षा ५६५ अनु०, अग्नि-परीक्षा के सम्बन्ध में पिछले प्रकरण में विचार हो ही चुका है । इसी तरह ५६६ वें अनु० में पुष्पक-यात्रा सर्ग १२३ को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं । "यदि रावण के पास पुष्पक होता तो सीता-हरण में उसका उपयोग वर्णित होता, किन्तु अरण्यकाण्ड में उसका उल्लेख नहीं है । सुन्दरकाण्ड का पुष्पक-वर्णन सर्ग भी प्रक्षिप्त है । युद्धकाण्ड की अन्तरङ्ग परीक्षा से भी प्रतीत होता है कि आदिरामायण में वापसी यात्रा में पुष्पक का कोई उल्लेख नहीं था । सर्ग १२३ के अन्त में पुष्पक द्वारा अयोध्या के पास पहुँचने का उल्लेख किया गया है, किन्तु सर्ग १२४ में वनवास की समाप्ति पर राम के भरद्वाज आश्रम में पहुँचने का वर्णन है । लङ्का में राम ने विभीषण से दुर्गम मार्ग का उल्लेख किया था— “अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ।” (वा० रा० ६।१२१।७) भरद्वाज आश्रम में राम ने मुनि से यह वरदान माँग लिया था कि मार्ग में सभी वृक्ष अकाल में भी फल- दार हों “अकालफलिनो वृक्षाः ।” इसके अतिरिक्त हनुमान् से समाचार प्राप्त करने के पश्चात् जब अयोध्यावासी राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे तब वानर-सेना द्वारा गोमती नदी पार करने का तथा उनके द्वारा उड़ायी गयी धूल का उल्लेख किया गया है— "मन्ये वानर-सेना सा नदीं तरति गोमतीम् । रजोवर्षं समुद्भूतं पश्य सालवनं प्रति ॥" (वा० रा० ६।१२७।२८)

५५० रामायणमीमांसा अष्टादश

इन उद्धरणों से अनुमान किया जा सकता है कि आदिरामायण में राम स्थल-मार्ग से ही अयोध्या लौटे थे । अतः पुष्पकविषयक सामग्री को विशेषकर सर्ग १२३ को प्रक्षिप्त माना जाना चाहिये।" बुल्के की उक्तियाँ कुशकाशावलम्बन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। पहले नास्तिक लोग यह विश्वास ही नहीं करते थे कि उड़ने- वाला यथेष्ट मनुष्यों को लेकर चलनेवाला भी विमान हो सकता है ? परन्तु आज विमानों के बाहुल्यकाल में समझदार लोग अब वैसी शङ्का नहीं करते हैं, पर फिर भी पाश्चात्यों का यह अन्धविश्वास आज भी बना हुआ है कि दुनिया में सभ्यता या विज्ञान का विकास ईसा के पहले हो ही नहीं सकता। इसी कारण वाल्मीकिरामायण तथा सभी रामायणों में प्रसिद्ध पुष्पक यान को बुल्के झुठलाने का प्रयत्न करते हैं। इसी लिए वे सुन्दरकाण्ड के पुष्पक-वर्णन को भी झुठलाते हैं। यह कोई तर्क ही नहीं है कि यदि पुष्पक होता तो सीता-हरण में उसी का प्रयोग होता। आज भी वायुयान रहने पर कई बार राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री मोटर पर भी यात्रा करते हैं। एतावता कौन कह सकता है कि राष्ट्रपति को वायुयान सुलभ नहीं है। इतना ही क्यों पुष्पक यान द्वारा ही रावण ने युद्ध क्यों नहीं किया ? यह भी शङ्का हो सकती है। बुल्के को क्या अभीष्ट है ? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि पुष्पक यान था ही नहीं ? या था तो परन्तु उसका प्रयोग ही नहीं हुआ ? दोनों बातों में उक्त हेतु सङ्गत नहीं है, क्योंकि अमुक समय पर उसके प्रयोग का उल्लेख न होना उसके अभाव का साधक नहीं होता। जब कि उसके विपरीत सुन्दरकाण्ड में पुष्पक का वर्णन है। पुष्पक द्वारा राम की यात्रा का भी वर्णन है। केवल एक स्थल के अनुल्लेख से दो स्थलों के उल्लेख को अनुल्लेख कैसे मान लिया जाय ? यदि अरण्यकाण्ड में उल्लेख होता भी तो भी सुन्दरकाण्ड के उल्लेख के समान ही उसको प्रक्षिप्त कहने में आपको क्या बाधा हो सकती थी ? दूसरा तर्क और भी निस्सार है। यदि आप सर्ग १२१ के ७ वें श्लोक को प्रमाण मानते हैं तो उसके पूर्वापर के श्लोकों को भी प्रमाण मानना ही पड़ेगा । अयोध्या का दुर्गम मार्ग है, यह कहने का प्रसङ्ग ही क्यों आया और फिर उसका समाधान क्या हुआ ? इन बातों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि विभीषण ने प्रार्थना की कि ये अलङ्कारकुशल पद्माक्षी स्त्रियाँ आपको विधिवत् उद्वर्तन, अभ्यङ्ग, स्नान, अङ्गराग, वस्त्राभरण, चन्दन तथा दिव्य माल्य धारण करायेंगी। इसपर राम ने विभीषण से कहा कि सुग्रीव प्रभृति मुख्य वानरों को स्नानादि करने को निमन्त्रित करो। वह धर्मात्मा सुखोचित सुकुमार सत्यसंश्रय महाबाहु भरत मेरे लिए तपस्याभिरत होकर संतप्त हैं। उन कैकेयीपुत्र धर्मचारी भरत के विना मुझे स्नान, वस्त्राभरण आदि कुछ भी इष्ट नहीं है। अतः हम शीघ्र ही जाना चाहते हैं। अयोध्या जाने का रास्ता बड़ा ही दुर्गम है। राम का ऐसा वचन सुनकर ही विभीषण ने कहा कि मैं आपको एक ही दिन में अथवा झटिति अयोध्या पहुँचाऊँगा । सूर्यसंनिभ पुष्पक नामक विमान, जो कि कुबेर का था, जिसे बलवान् रावण ने जीत लिया था। वह कामगामी दिव्य विमान आपके लिए प्रस्तुत है। इससे आप शीघ्र ही अयोध्या पहुँच जायँगे। इससे स्पष्ट है कि अयोध्या का मार्ग दुर्गम है। भरत का विश्लेष अधिक काल तक अब सह्य नहीं है। इस स्थिति में पुष्पक का प्रयोग उपयुक्त ही है। बुल्के के अनुसार यदि पद-यात्रा होती तो लङ्का से अयोध्या पहुँचने में कम से कम तो एक मास का समय अपेक्षित होता। बहुसंख्यक वानर दल को लेकर इतनी दूर की यात्रा का उल्लेख भी कहीं नहीं है, अतः सर्ग १२१ के ७ वें श्लोक से ही पुष्पक यान द्वारा राम की अयोध्या-यात्रा प्रमाणित होती है। वहीं विभीषण ने यह भी कहा, यदि मैं आपका अनुग्राह्य हूँ, यदि आप मेरे गुणों और सेवाओं को स्मरण करते हैं, यदि मुझमें आपका सौहार्द है तो आप यहाँ सर्वकामों से अचित होकर कुछ समय निवास करें। ससैन्य तथा ससुहृद्गण मेरी सत्क्रिया को स्वीकार करें। मैं बड़े प्रणय, संमान तथा सौहार्द से आपसे प्रार्थना करता हूँ। मैं आपका प्रेष्य ( सेवक ) हूँ, आज्ञा नहीं प्रार्थना करता हूँ। मेरी सेवा ग्रहण के अनन्तर ही आप अयोध्या का प्रस्थान करें। राम ने सुन रहे सभी वानरों और राक्षसों के बीच में कहा कि वीर, मैं तुम्हारे परम सौहार्द, उत्कृष्ट प्रयत्नों तथा उत्कृष्ट साचिव्य ( मन्त्रणा ) से पूजित हो चुका हूँ। मैं तुम्हारी बात न मानूंगा यह नहीं, किन्तु राक्षसेश्वर, अपने उस भरत को

अध्याय युद्धकाण्ड ५५१ देखने के लिए मेरा मन अत्यन्त आतुर है, जो मुझे लौटाने के लिए चित्रकूट आया था और पादलग्न सिर से लौटाने के लिए प्रार्थना कर रहा था, फिर भी जिसकी बात को मैंने नहीं स्वीकार किया। कौशल्या, सुमित्रा तथा यशस्विनी कैकेयी, सुहृद् गुहराज तथा जानपदों को देखने के लिए मेरा मन त्वरित है, अतः मुझे जाने की ही अनुमति दो । सौम्य, मन्यु नहीं करना । मैं तुमसे अनुमति देने की प्रार्थना करता हूँ । राक्षसेश्वर, अब कृतकार्य होने पर विलम्ब उचित नहीं । शीघ्र ही विमान लाओ— “स तु ताम्यति धर्मात्मा मम हेतोः सुखोचितः । सुकुमारो महाबाहुर्भरतः सत्यसंश्रयः ॥ तं विना कैकेयीपुत्रं भरतं धर्मचारिणम् । न मे स्नानं बहुमतं वस्त्राण्याभरणानि च ॥ एतत्पश्य यथा क्षिप्रं प्रतिगच्छामि तां पुरीम् । अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ॥ एवमुक्तस्तु काकुत्स्थं प्रत्युवाच विभीषणः । अह्ना त्वां प्रापयिष्यामि तां पुरीं पार्थिवात्मज ॥ पुष्पकं नाम भद्रं ते विमानं सूर्यसन्निभम् । त्वदर्थं पालितं चेदं तिष्ठत्यतुलविक्रम ॥ येन यास्यसि यानेन त्वमयोध्यां गतज्वरः ॥” (वा० रा० ६।१२१।५–११) इस प्रसङ्ग से स्पष्ट ही पुष्पक-यात्रा की सङ्गति प्रतीत होती है । सर्ग १२३ को प्रक्षिप्त मान लेने से यही कहना पड़ेगा कि एकदम १४ वर्ष पूर्ण होने पर पञ्चमी के दिन भरद्वाज के आश्रम में आ गये । पर यह वर्णन अस्वाभाविक ही होगा, स्वाभाविक यही है कि पुष्पक यान के द्वारा लौटते हुए राम सीता को त्रिकूटशिखरस्थित लङ्का, युद्धस्थली, रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि के वधस्थलों को बतलाते हुए सेतुबन्ध महादेव आदि की चर्चा करते हुए किष्किन्धा आये । वहाँ से सुग्रीवादि के अन्तःपुर को लेकर ऋष्यमूक, पम्पा, कबन्ध-वधस्थल, जटायुमुक्ति- स्थान, गोदावरी, अगस्त्य और शरभङ्ग के आश्रम और चित्रकूट दिखलाते हुए ऊपर से दिखायी देनेवाली अयोध्या को दिखलाकर भरद्वाज के आश्रम में उतरे । कोई दुस्तर्क ही करने बैठे तो कह सकता है राम अगस्त्य के आश्रम में तथा चित्रकूट आदि में क्यों नहीं रुके । भरद्वाज के आश्रम में ही क्यों रुके, सीधे अयोध्या क्यों नहीं चले आये ? अस्तु, सर्ग १२४ में राम ने स्वयं वरदान नहीं माँगा, किन्तु महर्षि ने ही सम्पूर्ण वृत्तान्त का वर्णन कर कहा कि जैसे ब्रह्मादि देवताओं ने वरप्रदान किया था वैसे ही मैं भी आपको वरप्रदान करता हूँ। तब राम ने वानरों के सुख के लिए वरदान माँगा कि सभी वृक्ष उत्तमोत्तम अमृततुल्य रस और गन्धयुक्त फलवाले तथा उत्तमोत्तम मधुस्रावी हो जायँ । पर इससे यह नहीं सिद्ध होता है कि राम पदाति वानरों के साथ चल रहे थे । इसी तरह वानर- सेना गोमती पार कर रही थी, उससे उड़ी हुई धूलि से इतना ही सिद्ध होता है कि वानर-सेना नदी पार कर रही थी और वही वहाँ पदाति चल रही थी । सेतुबन्ध होने पर भी बहुत से बन्दर उड़कर तथा कूदकर पार जा रहे थे । हनुमान् तथा अङ्गद पर आरूढ होकर राम और लक्ष्मण वानरी-सेना के आगे चल रहे थे । बहुत से वानर बीच में, बहुत से अगल बगल चल रहे थे, कई लोग सलिल मार्ग से चल रहे थे एवं बहुत से सुपर्ण के तुल्य आकाशमार्ग से ही चल रहे थे— “सलिलं प्रपतन्त्यन्ये मार्गमन्ये प्रपेदिरे । केचिद् वेहायसगताः सुपर्णा इव पुप्लुवुः ॥” (वा० रा० ६।१२४।८१ )

इसी तरह वानर लोग मधुर फल एवं सुगन्धित मधु पान करते हुए भूमिमार्ग पर चल रहे थे। वे ही लोग गोमती पार करते हुए धूलि उड़ा रहे थे । उसी सर्ग १२७ का जहां वानरों के गोमती पार करने की चर्चा है वहीं यह भी वर्णन है कि हनुमान् ने बतलाया यह तरुणादित्य संकाश विमान आ रहा है । इसमें वैदेही के साथ राम और लक्ष्मण विराजमान हैं। उनके साथ सुग्रीव एवं राक्षसराज विभीषण बैठे हैं। इस तरह प्रधान प्रधान लोग विमान में थे । अन्य बहुत से लोग आकाश-मार्ग तथा स्थल-मार्ग से चल रहे थे । “विमानं पुष्पकं दिव्यं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् ।” ३०।। “एतस्मिन् भ्रातरो वीरो वैदेह्या सह राघवौ । सुंग्रीवश्च महातेजा राक्षसश्च विभीषणः ।। "३२।। (वा० रा० ६।१२९) यदि इसे प्रक्षेप कहें तो गोमती तरणवाले श्लोक को ही क्यों न प्रक्षेप कहा जाय ? अतः १२५ वें सर्ग के अनुसार समझना चाहिये कि आकाश-मार्ग से आते हुए राम ने अयोध्या देखकर विचार किया कि आज पञ्चमी को ही १४ वाँ वर्ष पूर्ण हो रहा है। भरद्वाज के आश्रम में विलम्ब हो सकता है। भरत की प्रतिज्ञा थी कि यदि १४ वर्ष पूर्ण होने पर आपका दर्शन न होगा तो मैं अग्नि में प्रवेश करूँगा । इसलिए राम ने हनुमान् पर दृष्टि डाली और कहा तुम अयोध्या शीघ्र जाओ और जानो कि सब लोग सकुशल हैं ? शृङ्गवेरपुर जाकर मेरे आत्मतुल्य सखा निषाद- राज से कुशल कहो । वे सब अयोध्या की स्थिति बतलायेंगे । भरत को सब समाचार बताओ और भरत आदि का अभिप्राय जानो । यदि वे राज्य चाहते हों तो वही सम्पूर्ण वसुधा का शासन करें । इस तरह भरत का अभिप्राय जान जब तक आश्रम से दूर अयोध्या के समीप न पहुँचें तभी तक लौटकर सब समाचार बताओ । हनुमान् आकाशमार्ग से शीघ्र ही गुहराज से मिल कर भरत से मिले । भरत को सविस्तर राम का सारा समाचार सुनाया और भरत की दृढ़ प्रीति की स्थिति का प्रत्यक्ष दर्शन किया । पद्मपुराण के अनुसार पञ्चमी को ही हनुमान् ने अयोध्या जाकर देखा कि भरत अग्नि-प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं— "अग्निप्रवेशे सोद्योगः काले भ्रातुरनागमात् । न्यवेदयत्तदा तस्मै श्रीरामागमनोत्सवम् ॥” ( वा० रा० ६।१२५।१ टीकोद्धृत पद्मपुराणवचन ) भ्राता राम के न आने के कारण भरत अग्नि-प्रवेश की तैयारी कर रहे थे । हनुमान् ने जाकर उन्हें श्रीराम के आगमन का शुभ समाचार सुनाया था । अपने सखा वानरेन्द्र सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गदादि तथा विभीषण आदि की प्रियकामना से ही समुचित स्वागत आदि के लिए राम ने हनुमान् को अयोध्या भेजा था— “प्रियकामः प्रियं रामस्ततस्त्वरितविक्रमः ।” ( वा० रा० ६।१२६।१ ) सभी वानरों के सम्मान एवं स्वागत के लिए ही राम ने भरद्वाज से दिव्य गन्ध और रस से युक्त अमृतो- पम फलों से युक्त एवं मधुस्रावी वृक्षों के होने का वरदान माँगा था। भरद्वाज के वर-प्रदान से सभी वृक्ष कल्पवृक्ष के समान दिव्य पुष्प और फलों से लद गये थे । शुष्क वृक्ष भी पत्र, पुष्प, फल तथा दिव्य मधु प्रस्रवणशील हो गये । अयोध्या के मार्ग में सब तरफ तीन तीन योजन तक यही स्थिति रही— “अभवन् पादपास्तत्र स्वर्गपादपसन्निभाः । निष्फलाः फलिनश्चासन् विपुष्पाः पुष्पशालिनः ॥ शुष्काः समग्रपत्रास्ते नगाश्चैव मधुस्रवाः । सर्वतो योजनास्तिस्रो १ गच्छतामभवंस्तदा ॥" (वा० रा० ६।१२६।२१,२२) १. योजना त्रीणि इति वा पाठः ।

अध्याय युद्धकाण्ड ५५३ यह सब वानरों के विश्रामार्थ ही हुआ । यहाँ तिलककार ने "वानराणां विश्रामार्थमिति शेषः" कहा है । अतएव वानर भरद्वाज के आश्रम से फलों, फूलों तथा मधुररस फलों का स्वाद लेते हुए पुष्पक छोड़कर आकाश-मार्ग एवं स्थल-मार्ग से ही चल पड़े । इसी लिए वानर-सेना के पदाति चलने तथा गोमती पार करने का उल्लेख सार्थक ही है । यदि पुष्पक-प्रयोग न हुआ होता तो अवश्य ही उल्लेख होना आवश्यक था कि राम पैदल चले या किसी रथ पर चले । रथ भी तो कौन ? रावण-रथ के समान आकाशचारी रथ था या भूमिचारी था और राम कितने दिनों में भरद्वाज के आश्रम में पहुँचे ? पूर्वोक्त गणना के क्रम से और सर्ग १२१ की भरतसम्बन्धी रामचिन्ता से स्पष्ट निश्चय होता है १४ वर्ष पूरे होने में एक दो दिन ही शेष थे । अतः पुष्पक यान के बिना इतनी शीघ्रता से अयोध्या पहुँचना असम्भव ही था । बुल्के आगे चलकर ५६७ वें अनु० में युद्धकाण्ड में विकास की बात करते हैं । वस्तुतः प्राणी को एक झूठ का समर्थन करने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं । ऐसे ही बुल्के को एक अंश को प्रक्षिप्त सिद्ध करने के लिए तत्सम्बन्धित अनेक स्थलों को भी क्षेपक कहना पड़ता है । युद्धकाण्ड के प्रारम्भ में राम हनुमान् की प्रशंसा करते हुए लङ्का-दहन का उल्लेख करते हैं तथा समुद्र के कारण चिन्तित होते हैं । इस अंश को बुल्के इसलिए प्रक्षेप कहते हैं कि वे लङ्का-दहन को प्रक्षिप्त कह चुके हैं । सर्ग २ और ३ को भी वे विकास मानते हैं, क्योंकि उनमें लङ्का-दहन की बात है । सेतुनिर्माण के उल्लेख को वे इसलिए प्रक्षेप मानते हैं कि सेतुनिर्माण का अब तक निर्णय हुआ ही नहीं था, क्योंकि राम ने समुद्र के तट पर पहुँचकर कहा कि अब हमें समुद्र पार करने के उपाय पर परामर्श करना चाहिये— "सम्प्राप्तो मन्त्रकालो नः सागरस्येह लङ्घने ।” ( वा० रा० ६।४।१०१ ) इस सर्ग में सेना के अभियान का वर्णन किया गया है । बुल्के का यह तर्क निराधार है, कारण कि अन्तिम निर्णय होने के पहले भी सम्भावना के आधार पर आश्वासन देना असम्भव नहीं है । समुद्रपार लङ्कास्थित सीता का आनयन करना ही है । हनुमान् जैसे अध्यवसायी, उद्योगी और प्रयत्नशील हैं वैसे सब नहीं हैं, अतः समुद्र में सेतुबन्ध द्वारा ही इतनी बड़ी सेना उतारी जा सकती है । सुग्रीव का यह आश्वासन देना कि समुद्र में सेतु बाँधकर हम लोग समुद्र उतरेंगे असम्भव नहीं कहा जा सकता है । इतनेमात्र से सर्ग के सर्ग को प्रक्षिप्त मानना असङ्गत ही है । मन्त्रणा द्वारा अन्तिम निर्णय किया जाता है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि मन्त्रणा के पहले वैसी बातें किसी के मन में आ ही नहीं सकतीं । अतएव सुग्रीव का यह वाक्य युक्त ही है— "अबध्वा सागरे सेतुं घोरे च वरुणालये । लङ्का न मर्दितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥" ( वा० रा० ६।२।११ ) घोर वरुणालय समुद्र में सेतुबन्ध के बिना सेन्द्रादि सुरासुर भी लङ्का का मर्दन नहीं कर सकते । अतः— "सेतुरत्र यथा बध्येद्यथा पश्येम तां पुरीम् ।” ( वा० रा० ६।२।९ ) वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार भरत ने भी सीताहरण का समाचार सुनकर राजाओं को आमन्त्रित कर युद्ध की तैयारी की थी । परन्तु उनके वहाँ गमन के पहले ही वानर-सेना सहित राम ने लङ्काविजय कर ली थी । "भरतेन वयं पश्चात् समानीता निरर्थकम् ।” ( वा० रा० ७।३९।४ )

५५४ रामायणमीमांसा अष्टादश गौड़ीय पाठ ५६८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि विभीषण-चरित रावणसभा-सम्बन्धी सर्गों में से दो ही सर्ग प्रामाणिक प्रतीत होते हैं। सर्ग ९ की मुख्य कथावस्तु है विभीषण द्वारा लङ्का के विनाश की आशङ्का तथा सीता को लौटाने का रावण से अनुरोध । १६ वें सर्ग में रावण सम्बन्धियों की सामान्य निन्दा करते हुए कहता है जाति के लोग ही स्वार्थ- प्रयुक्त घोर भयावह होते हैं । विभीषण को कुलपांसन भी कहा गया है । इस घोर भर्त्सना से घबराकर विभीषण चार राक्षसों के साथ लङ्का छोड़ देता है (सर्ग १६) । किन्तु बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है । इन सर्गों को प्रक्षिप्त मानना भी प्रमाद ही है। क्योंकि ९ वें सर्ग में विभीषण ने रावण के पार्श्ववर्तियों के बड़े-बड़े अनर्गल प्रलापों को सुनकर बड़ी नम्रता से सबको बैठाकर समझाया और कहा कि तात ! जो अर्थ प्राप्त हो सकता है उसी के लिए विक्रम किया जाना उचित है। प्रमत्तों में, शस्त्रादि आक्रान्त जनों में एवं दैव से प्रहत लोगों में विधिप्रयुक्त विक्रम सफल नहीं होते हैं। जो विजिगीषु अप्रमत्त है और बलयुक्त है, जितरोष एवं दुराधर्ष है उसकी धर्षणा नहीं हो सकती। नदनदीपति-समुद्र का उल्लङ्घन कर लङ्का आनेवाले हनुमान् की गति को कौन जान सकता है और कौन उस सम्बन्ध में तर्क भी कर सकता है ? शत्रु के अपरि- मेय बलों एवं वीर्यों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये । राम ने राक्षसराज रावण का क्या अपराध किया था जो जनस्थान से उनकी भार्या को अपहरण करके ले आये हैं। यदि खर ने मर्यादा का अतिक्रमण किया तो उसे दण्ड दिया गया। प्राणी को अपने प्राणों की रक्षा का अधिकार तो है ही । इन सबका निमित्त वैदेही का अपहरण है । उसका शीघ्र ही परित्याग करना चाहिये । धर्मानुवर्ती वीर्यवान् राम से निरर्थक कलह में कोई लाभ नहीं । जब तक राम साश्व, सगज, बहुरत्नसमाकुला पुरी को अपने बाणों से विदीर्ण न करें उसके पहले ही मैथिली को प्रदान कर देना चाहिये । १० वें सर्ग में साहित्यिक ढङ्ग से वर्णन किया गया है कि विभीषण पुनः रावण के समृद्धि-सम्पन्न भवन में पहुँचे । वहाँ वेदविद् विद्वानों द्वारा विजयानुगुण पुण्य घोष सुना, लोक-परलोकविद् आचारकोविद विभीषण ने शिष्टा- चार के साथ तेजों से दीप्यमान राक्षसों से पूजित ज्येष्ठ भ्राता रावण का वन्दन किया और मन्त्रियों की सन्निधि में सान्त्वना के साथ रावण का प्रसादन करते हुए अत्यन्त युक्तियुक्त एवं हित की वैसी ही बात कही जो देश, काल एवं अर्थ के अनुगुण थी । उन्होंने बतलाया कि जब से वैदेही लङ्का में आयी हैं उसी समय से अशुभ निमित्त परिलक्षित हो रहे हैं। अरणि-मन्थनादि द्वारा उत्पन्न होते हुए तथा प्रणयन काल में धूम-कलुषित चिनगारीयुक्त अग्नि का उदय होता है। विधिवत् मन्त्रसंघ से होम करने पर भी अग्निदेव अभिवृद्धि को प्राप्त नहीं होते हैं। आपकी अग्निशाला तथा वेदाध्ययन स्थान में सर्प दिखायी देते हैं । हवनीय हवि में पिपीलिकाएँ मिलती हैं। गायों का दूध सूख गया है, कुञ्जर मदहीन हो रहे हैं, अश्व दीन शब्दों में हिनहिनाते हैं और खूब खाने पर भी भूखे ही बने रहते हैं । खर, उष्ट्र और अश्वतर ऊर्ध्वरोमा (जिनके रोयें खड़े हैं) होकर आँसू गिराते हैं, नाना प्रकार की चिकित्सा होने पर भी स्वस्थ नहीं होते हैं। कौए संघ के संघ एकत्रित होकर विमानों के अग्रभाग में स्थित होकर क्रूर बोली बोलते हैं। सायं प्रातः गृध्र पुरी के ऊपर मँडराते रहते हैं। शृगालियाँ अमंगल नाद करती हैं। पुरी के द्वारों पर संघबद्ध भेड़िये और मृग एकत्रित होते हैं। विद्युत्पात तथा घनगर्जन के निर्घोष सुनायी पड़ते हैं । इन सबका प्रायश्चित्त यही है कि सीता राघव को दे दी जायें। मोह से या लोभ से आप मेरे वचनों में दोषबुद्धि न करें। मैंने जो कहा है, वह सबको प्रत्यक्ष है, बाहर भीतर राक्षस राक्षसी सभी अनुभव करते हैं। आपके भय से मन्त्री लोग कुछ नहीं कहते हैं तथापि जो देखा और सुना है, उसके अनुसार आपके हितार्थ सब कुछ कहना कर्तव्य है । ११ वें सर्ग में भी बड़े उत्तम ढङ्ग से महान् ऐश्वर्यपूर्ण सपरिकर राजा रावण का तथा विभीषण का समागमन और यथायोग्य उपवेशन वर्णित है । १२ वें सर्ग में प्रहस्त सेनापति अपने आभ्यन्तर एवं बाह्य रक्षा-प्रबन्ध

अध्याय युद्धकाण्ड ५५५

का निरूपण करता है । प्रहस्त का वचन सुनकर रावण अपनी सीताविषयिणी कामना का निरूपण करते हुए अपना दैन्य व्यक्त करता हुआ कहता है सीता को प्राप्त करने के लिए राम और लक्ष्मण समुद्र-तट पर आ गये हैं । जिस तरह सीता न देनी पड़े और वे दोनों मारे जायें इस प्रकार की मन्त्रणा करें— “अदेया च यथा सीता वध्यौ दशरथात्मजौ । भवद्भिमंन्त्र्यतां मन्त्रः सुनीतं चाभिधीयताम् ॥” (वा० रा० ६।१२।२५ ) कामव्याकुल रावण का परिदेवन, काम, शोक और प्रलाप सुनकर क्रुद्ध होकर कुम्भकर्ण ने कहा “यदि पहले ही विचार कर यह कार्य किया गया होता तो आपके चित्त की यह दशा न होती । हम लोगों के साथ पहले से ही विचार करना आवश्यक था । जो राजा न्याय से राजकार्य करता है, उसे पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता । जैसे अभिचारप्राय अपवित्र यज्ञों में हुत हवि उलट कर प्रयोक्ता के लिए ही अशुभकारक होते हैं “प्रत्यगेनमभिचारस्तुनोते” उसी तरह मन्त्रियों द्वारा सामादि उपायों का विचार बिना किये मोह से स्वयं जो विपरीत अनुचित कार्यों को करता है वे कर्म ही कर्ता के लिए अनिष्टकारक होते हैं । जो प्रथम कार्य को पीछे करना चाहता है और पश्चात् कर्तव्य को पहले ही कर डालता है वह नय-अनय कुछ भी नहीं जानता । जैसे प्रथम सामप्रयोग के स्थान पर दण्ड का प्रयोग करता है और पश्चात् प्रयोक्तव्य दण्ड का प्रथम ही प्रयोग करता है । शत्रु लोग अधिक बल देखकर भी विषय-चापल्य के कारण उसी तरह रन्ध्र ढूँढ ही लेते हैं जैसे हंस लोग दुर्लङ्घ्य भी क्रौञ्च पर्वत को लांघने के लिए उसमें कीर्तिकेय- शक्ति द्वारा किये हुए छिद्रों को ढूँढ़ लेते हैं । ऐसा अप्रचिन्तित महान् अनुचित कर्म करने पर राम ने आपका वध नहीं किया आप जीवित हैं, यह सौभाग्य की बात है । विषमिश्र आमिष भक्षण के तुल्य प्रबल दारहरणरूप कार्य आपने अप्रतिम अनुचित कार्य किया है । फिर भी मैं तुम्हारे शत्रुओं का हनन करके तुम्हारा कार्य सब ठीक करूँगा ।” १३वें सर्ग में कुम्भकर्ण की बात से क्रुद्ध रावण को देखकर महापार्श्व ने रावण से अनुरोध किया कि वह बल-प्रयोग से अपनी कामनापूर्ण करें, पर रावण ने पुञ्जिकस्थली के कारण पितामह के शाप की चर्चा करके बल-प्रयोग में लाचारी प्रकट की । १४वें सर्ग में विभीषण ने पुनः रावण से राम के प्रबल पराक्रम और उनके घोर बाणों की चर्चा करते हुए कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, महापार्श्व, महोदर, कुम्भ, निकुम्भ, अतिकाय आदि को अकिञ्चित्कर बतलाया और यह कहा कि यह सब मित्ररूप अमित्र ही हैं जो असमीक्ष्यकारी राजा का अनुसरण कर रहे हैं । निष्काम सुहृदों का कर्तव्य है कि सहस्रमूर्धावाले अनन्त देहवाले महावल भीम नागपाश से वेष्टित राजा की केशग्रहणान्त अनुचित कार्य करके भी वैसे ही रक्षा करें जैसे भीमबलवाले भूतों से गृहीत पुरुष की उसके अभिभावक निगृहीत करके रक्षा करते हैं । विभीषण ने कहा सुचरितरूपी जल से पूर्ण राघवरूप सागर से प्रच्छाद्यमान तथा निमज्ज्यमान और पाताल-मुख में गिरते हुए राजा को मेरा यह कथन पुर और राष्ट्र सहित, राक्षस जाति सहित तथा सुहृदों सहित राजा के लिए अत्यन्त पथ्य है कि राम को मैथिली प्रदान की जाय, परकीय बल एवं स्वबल को देखकर बलस्थिति और उसके उपचय को देखकर मन्त्री को यथावत् करना चाहिए । प्रकृत में वानरों की सहायता से परकीय बल का उपचय हुआ है । हमारा बल खर, दूषण आदि के नाश से क्षीण हुआ है । १५वें सर्ग में बृहस्पतितुल्य बुद्धिवाले विभीषण की बात को सुनकर नैर्ऋतराजमुख्य इन्द्रजित् ने कहा—तात कनिष्ठ, आप बहुत भययुक्त अनर्थक बात कह रहे हैं । जो इस महान् पौलस्त्य-कुल में नहीं उत्पन्न हुआ वह भी ऐसा नहीं बोल सकता । सत्त्व, वीर्य, पराक्रम, धैर्य, शौर्य और तेज से रहित एक ही पुरुष तात कनिष्ठ विभीषण ही इस कुल में हुए हैं— “सत्त्वेन वीर्येण पराक्रमेण धैर्येण शौर्येण च तेजसा च । एकः कुलेऽस्मिन् पुरुषो विमुक्तो विभीषणस्तातकनिष्ठ एषः ॥” ( वा० रा० ६।१५।३ ) वे मानुषपुत्र राम और लक्ष्मण क्या हैं ? एक प्राकृत राक्षस भी उन्हें मार सकता है । भीरो ! क्या

५५६ रामायणमीमांसा अष्टादश डरवाते हो त्रिलोकनाथ देवराज इन्द्र को भी जीतकर मैंने धरातल में निविष्ट कर दिया था। भयभीत होकर देवगण विभिन्न दिशाओं की ओर भग गये थे। निःस्वन उन्माद करते हुए ऐरावत को भी मैंने भूमि में गिरा दिया था। उसके दाँतों को बलात् खींच कर मैंने समग्र देवताओं को डराया था। मैं देवताओं का दर्पहन्ता एवं दैत्योत्तमोँ का शोकहर्ता हूँ। क्या मैं प्राकृत दो मनुष्य राजपुत्रों का निग्रह नहीं कर सकता ? इस तरह इन्द्रकल्प सुदुरासद-महोर्जा इन्द्रजित् का बचन सुनकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण महार्थ वचन बोले, हे तातपुत्र ! अभी भी तुम अपरिपक्वबुद्धि बालक हो, मन्त्र में कृत्याकृत्य-विचार में तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है । इन्द्रजित्, पुत्रप्रवाद से तुम भी रावण के मित्रशत्रु ही हो, क्योंकि तुम राघव के द्वारा मोहवश रावण को विनाश की अनुमति दे रहे हो। तुम दुर्मति एवं वध्य हो। इतना ही नहीं वह भी वध्य है जो तुम्हारे जैसे बालक एवं दृढ़साहसिक को मन्त्रणा करनेवालों के बीच में लाया है। इन्द्रजित्, तुम कृत्याकृत्यविवेकहीन, मतिप्रागल्भ्यहीन, अविनीत, अनयमर्ति, दुरात्मा एक साहसी हो, बालकपन के कारण प्रलाप कर रहे हो। ब्रह्मादण्ड के समान प्रकाशवाले कालतुल्य ज्योतिष्मान् तथा यमदण्डतुल्य राम के बाणों को युद्ध में कौन सहन कर सकेगा ? अतः धन, रत्न, सुन्दर भूषणों, वसनों, दिव्यमणयों के साथ राम को सीता समर्पण करने से ही हम लोग सुख से रह सकेंगे। १६ वें सर्ग में युक्तियुक्त हित वाक्य बोलनेवाले विभीषण को कालचोदित रावण ने परुष वचन कहे और सामान्यतया ज्ञातियों से सबको भय होता है, यह भी कहा—कुलपांसन, यदि अन्य कोई ऐसा कहता तो वह जीवित नहीं रह सकता था। तुम सोदर होने से वधानर्ह हो। तुम्हारे लिये धिक्कार ही दण्ड है। ऐसा परुष वचन सुनकर न्यायवादी विभीषण ने क्रुद्ध होकर चार साथी राक्षसों के साथ अन्तरिक्ष में जाकर राक्षसाधिप रावण से कहा- राजन्, आप भ्रान्त हो, जो इच्छा हो सो कहो । आप मेरे ज्येष्ठ, मान्य तथा पितृसमान हैं। आप धर्मपथ पर स्थित नहीं हैं। राजन्, कालवश हुए अकृतात्मा प्राणी हितैषी के हित वाक्य को नहीं सुनते। राजन्, प्रियवादी पुरुष सदा सुलभ होते हैं, परन्तु अप्रिय किन्तु पथ्य के वक्ता और श्रोता दुर्लभ ही होते हैं— “सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता सुदुर्लभः ॥” ( वा० रा० ६।१६।२१ ) आप अपनी एवं राक्षसों सहित अपने पुर और राष्ट्र की रक्षा करो। आपका स्वस्ति हो, मैं जा रहा हूँ। आप सुखी हों । बुल्के कहते हैं कि “घबराकर विभीषण लङ्का छोड़ देता है, परन्तु इन श्लोकों में घबराने जैसी कोई बात ही नहीं है। इतने महत्त्वपूर्ण प्रसङ्गों को साधारण बाजारू तर्कों के बलपर बुल्के प्रक्षिप्त कहना चाहते हैं। वस्तुतः ज्ञान-विज्ञान तथा नीतिसार सर्वस्वसंयुक्त स्वाभाविक स्थिति का चित्रण करनेवाले इन सर्गों का अपलाप करना वस्तु- स्थिति का ही अपलाप है। इसी तरह विभीषण की महत्त्वपूर्ण शरणागति के प्रसङ्ग को भी बुल्के महत्त्वहीन बनाने के लिए सचेष्ट हैं। १७ वें सर्ग के अनुसार विभीषण मुहूर्त्तमात्र में उत्पन्नप्रतिपन्न रावण का त्यागकर जहाँ लक्ष्मण के साथ राम विराजमान थे वहाँ पहुँच गया। वानराधिपों ने मेरुशिखर के तुल्य दीप्त विद्युत के तुल्य गगनस्थ विभीषण को देखा । विभीषण के अनुचर भीमविक्रम ओर कवच, आयुध आदि से युक्त तथा भूषणोत्तमों से भूषित थे। विभीषण मेघपर्वत तुल्य वज्रायुध के समान दीप्यमान वरायुध धारण करनेवाला दिव्याभरणभूषित था। बुद्धिमान् वानरेन्द्र सुग्रीव ने वानरों से विचार कर हनुमत्प्रमुख वानरों से कहा-देखो, सर्वायुधसम्पन्न चार राक्षसों के साथ यह राक्षस हम लोगों के अभिघात के लिए आया है। सुग्रीव का वचन सुनकर शैल और शाल वृक्ष लेकर वानर भट उनके वध के लिए प्रस्तुत हो गये । वे आपस में विमर्श कर ही रहे थे कि आकाश में ही स्थिर रहकर महाप्राज्ञ विभीषण ने सुग्रीव

अध्याय युद्धकाण्ड ५५७

एवं उनके साथियों को देखकर धीर गम्भीर महान् स्वर से कहा, रावण नामक दुर्वृत्त राक्षसराज का मैं छोटा भाई विभीषण हूँ । रावण ने जनस्थान से जटायु को मारकर सीता का हरण किया है। विवश, दीन तथा अवरुद्ध सीता राक्षसियों द्वारा सुरक्षित हैं। मैंने युक्तियुक्त वाक्यों से उसे राम को सीता प्रदान करने के लिए समझाया पर काल- प्रेरित होकर उसने स्वीकार नहीं किया । मैं रावण से परुषित तथा दासवत् अपमानित होकर पुत्रों और पत्नी को छोड़कर राम की शरण में आया हूँ । सर्वलोकशरण्य महात्मा राम को निवेदन कर दो कि विभीषण उपस्थित है— “सोऽहं परुषितस्तेन दासवच्चावमानितः । त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ।। निवेदयत मां क्षिप्रं राघवाय महात्मने । सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ॥” ( वा० रा० ६।१७।१६,१७ ) ऐसा वचन सुनकर सुग्रीव ने लक्ष्मण के सामने राम से संरम्भ के साथ कहा, अतर्कित यह शत्रु शत्रुसैन्य में आ गया है। छिद्र पाकर उलूक ने जैसे वायसों का संहार किया था वैसे ही यह अवसर पाकर घातक हो सकता है । परन्तप ! मन्त्र, कार्याकार्य-विचार, सेनासंनिवेश तथा सेनानयन में परबल-वृत्तान्तादि के ज्ञानार्थ चार पुरुष प्रवर्तन में अत्यन्त सावधान होना उचित है। कामरूपी राक्षस अन्तर्धान रहकर कपटोपाय से विप्रियकरण में चतुर होते हैं । इनपर विश्वास करना कभी भी युक्त नहीं । यह रावण का प्रणिधि ( चार ) हो सकता है अथवा रावण भी हो सकता है। हम लोगों में प्रविष्ट होकर हम लोगों में भेदनीति का प्रयोग कर सकता है अथवा स्वयं ही विश्वास प्राप्त कर प्रहार कर सकता है। नीति के अनुसार आरण्यक मित्र से प्रेषित बल एवं आप्त बन्धुओं से प्रेषित बल तथा तात्कालिक वेतनदान से प्राप्त बल का संग्रह करना उचित है। परन्तु शत्रुबल का सदा परिहार ही करना चाहिये । प्रकृत्या राक्षस कुटिल होते हैं । तत्रापि अमित्र रावण का भाई यह रिपु ही है। इसमें कैसे विश्वास किया जा सकता है ? क्षमाशिलों में श्रेष्ठ, मेरी दृष्टि में तो इसका निग्रह करना ही श्रेष्ठ है। यह नृशंस रावण का भ्राता हैं, तीव्र दण्ड से इसे दण्डित करना ही उचित है । राम ने हनुमान् प्रभृति वानरों से कहा, कपिराज ने विभीषण के प्रति जो सहेतु बातें कहीं हैं, उन्हें आप सबने सुना है। बुद्धिमान् और समर्थ को चाहिये कि संकट की घड़ी में शाश्वती भूति चाहने- वाले मित्र को उचित परामर्श दे । इस तरह राम के पूछने पर रामप्रियचिकीर्षु सभी मित्रों ने अपना अपना मत व्यक्त किया । राघव, तीनों लोकों में कोई बात आप से अज्ञात नहीं है, तो भी सुहृद्भाव से हम सबको सम्मान देने की दृष्टि से ही आपका यह प्रश्न है । आप सत्यव्रत तथा शूर हैं, धार्मिक एवं दृढ़विक्रम हैं एवं परीक्ष्यकारी, स्मृतिमान् और सुहृदों में विश्वास करनेवाले हैं । अतः आपके सभी सचिव मतिमान् तथा समर्थ हैं । अपना अपना मत प्रकट करें । इसपर अङ्गद ने कहा, शत्रु के पक्ष से आया हुआ व्यक्ति अवश्य शङ्कास्पद है । सहसा विश्वास न कर उसकी परीक्षा करनी चाहिये । आत्मा को आवृत्त करके शठबुद्धि व्यवहार करते हैं । रन्ध्र पाने पर वे अवश्य ही प्रहार करते हैं । अतः अर्थानर्थ का निश्चय करके गुण होने के संग्रह करना उचित है। शरभ ने कहा शीघ्र ही चार का प्रयोग करना उचित है। सूक्ष्मबुद्धि चार के द्वारा परीक्षण करके यथान्याय ग्रहण करना उचित है। विचक्षण जाम्बवान् ने शास्त्रबुद्धि से दोषवजित तथा गुणयुक्त वाक्य कहा, राम से वैर बाँधनेवाले पाप- युक्त रावण के समीप से अदेशकाल में आनेवाला विभीषण सर्वथा शङ्कास्पद है। अर्थात् स्वामिदेश को छोड़कर शत्रुदेश में आना और स्वामी के संकटकाल में उससे विपरीत होकर उसपर प्रहार करना अनुचित है। इस तरह अदेशकाल में आने से विभीषण शङ्कनीय है। जो अपने पुराने मालिक के प्रति निष्ठावान् नहीं है वह अन्यत्र भी लाभदायक नहीं हो सकता । नयानयकोविद मैन्द ने कहा—यह रावण का अनुज है । नरपतीश्वर, धीरे से मधुरता से इससे बात की जाय । इसके भाव का ज्ञान प्राप्त करके कार्य किया जाय । यदि दुष्ट न हो तो ग्रहण किया जाय । सचिवश्रेष्ठ हनुमान् ने स्निग्ध मधुर गम्भीर अर्थ युक्त थोड़े शब्दों में कहा वक्ताओं में श्रेष्ठ, समर्थ एवं मतिवान् आपसे

अधिक बृहस्पति भी क्या कह सकते हैं। राघवेन्द्र, मैं तर्ककुशलता दिखलाने के लिए नहीं, आपके अन्य मन्त्रियों की स्पर्धा से नहीं, अधिक बुद्धिमत्ता के अभिमान से नहीं तथा अपनी इच्छा से भी नहीं, किन्तु कार्य-गौरव की दृष्टि से यथार्थ बात यह कहता हूँ कि आपके सचिवों मे अर्थानर्थ निमित्त जो बातें कही हैं, उनमें मैं अंशतः वैगुण्य देखता हूँ। विभीषण शङ्कनीय है, परीक्षणीय है यह तो ठीक है, किन्तु कुछ निश्चय न होने के कारण यह उत्तर नहीं है। परीक्षणरूपा क्रिया का यह समय नहीं है। नियोग के बिना सामर्थ्य का ज्ञान नहीं हो सकता । अर्थात् उसे बुलाकर सब वृत्तान्त सुने बिना त्याग या परिग्रह के औचित्य का निर्णय नहीं किया जा सकता । साथ ही सहसा नियोग भी उचित नहीं है अर्थात् सहसा राजसंनिधि में लाकर वृत्तान्त प्रतिपादन का अनुज्ञादानरूप नियोग भी मुझे दोष प्रतीत होता है । तस्मात् किसी समर्थ अधिकृत द्वारा उससे सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर ही आपके पास विभीषण का लाया जाना उचित है। कहा जा सकता है कि फिर तो शरभ का ही मत आपका भी है, पर यह ठीक नहीं; क्योंकि चार के प्रेषण का यहाँ कोई कारण नहीं दिखता है। चार-प्रेषण से सिद्ध होनेवाले प्रयोजन की यहाँ अनुपपत्ति ही है। यदि परीक्षणीय व्यक्ति सन्निहित न हो और उसका वृत्तान्त प्रकट न हो तभी चार-प्रेषण उचित होता है। जो प्रत्यक्ष उपस्थित है एवं अपना वृत्तान्त निवेदन करने के लिए प्रस्तुत ही है, उसके प्रति चार-प्रेषण व्यर्थ है । कहा जा सकता है कि कपटयुक्त व्यक्ति प्रत्यक्षरूप से सामने स्थित होकर भी अपनी स्थिति एवं वृत्तान्त को अन्यथा व्यक्त कर सकता है, यह ठीक है, किन्तु चार द्वारा परोक्षरूप से ही वस्तुस्थिति का ज्ञान हो सकता है और उसके लिए परोक्षता और अधिक काल अपेक्षित होता है। तत्काल तो कपटयुक्त व्यक्ति भी सावधानी से कपट के साथ अपने को चार के प्रति भी अन्यथा व्यक्त कर ही सकता है । जो यह कहा गया है कि अदेशकाल में विभीषण आया है । इसके सम्बन्ध में भी मेरा यह कहना है कि रावण जैसे पापी पुरुष की अपेक्षा उत्तम पुरुष को प्राप्त कर के बुद्धि से गुण और दोष का विवेचन कर जो विभीषण ने रावण को त्यागकर राम की शरण ग्रहण करने का निर्णय किया है यह तो उसकी बुद्धिमत्ता ही है। वस्तुतः विभीषण के शरण में आने का यही योग्य देश एवं योग्य काल है। रावण का परदार-हरणरूप दौर्रात्म्य देखकर एवं जिसने रावण को बगल में दबाकर चारों समुद्रों का परिक्रमण किया था उस वाली को एक बाण से मारनेवाले आपका लोकोत्तर विक्रम देखकर इस समय उसका आगमन उसकी बुद्धिमत्ता के अनुरूप ही है। जो यह कहा गया है कि अज्ञात कुल, शील और प्रयोजनवाले गुप्तचरों के द्वारा उसका हृदय जानना चाहिये । यह भो उचित नहीं प्रतीत होता, क्योंकि यह क्रिया बहुकाल सापेक्ष होती है। अज्ञात पुरुष के पास जाकर आप कौन हैं ? कहाँ से आये हैं ? ऐसा प्रश्न करने पर प्रष्टा के स्वरूपज्ञान के बिना बुद्धिमान् पुरुष सहसा शङ्का कर सकता है कि मैं इसे जानता नहीं, यह किसके द्वारा प्रेषित है और क्यों पूछता है ? केवल इस प्रकार शङ्काकुल ही नहीं होगा, किन्तु उत्तर भी नहीं देगा। यदि प्रष्टा का शनैः शनैः ज्ञान होगा, तब तो स्वागत हो करेगा । यदि मित्रभाव ज्ञात होगा तो प्रश्न से मित्रभाव में दूषण भी आ सकता है। यह सोचा जा सकता है कि क्यों अन्य पुरुष के द्वारा इस प्रकार का विचार किया जा रहा है ? उससे स्नेह कुण्ठित हो सकता है और मित्रता में व्यवधान आ सकता है। यदि वस्तुतः शत्रु होगा तो चारों के द्वारा सहसा प्रश्नमात्र से उसका अभिप्राय विदित नहीं हो सकता । अज्ञातकुलशील द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक ही नहीं समझा जाता है। उलटे शत्रु प्रेषित होने से दण्ड देना ही सम्भव है। कहा जा सकता है कि इस तरह तो संसार में चार- प्रेषण ही निरर्थक समझा जायगा, पर यह भो ठीक नहीं। बहुत काल तक साथ में स्थिति संभव होने से उसके स्वाभाविक वचनों और व्यवहारों से हर्ष, अमर्ष आदि से शत्रुत्व तथा मित्रत्व जानने के लिए चार-प्रेषण सार्थक हो ही सकता है। अतः आप स्वयं ही उसके व्यवहार के मध्य में ही उसके विलक्षण स्वरों, कण्ठध्वनियों से निपुणतया उसकी साधुता या असाधुता का निर्णय कर सकते हैं। भय से, वाष्पकण्ठ से तथा पूर्वापर असंगत कथन ने असाधु समझा जा सकता है अन्यथा साधु समझा जा सकता है—

"अशक्यं सहसा राजन् भावो बोद्धं परस्य वै १। अन्तरेण स्वरैर्भिन्नैर्नैपुण्यं पश्यतां भृशम् ॥" ( वा० रा० ६।१७।६१ ) सामान्यतया अपने में निपुणता देखनेवाला व्यक्ति भी आपाततः प्रसन्नार्थ वाक्यों से भी गूढ अभिप्रायवाले भाषणों से परकीय अभिप्राय को सहसा नहीं समझ सकता । यदि यह कहा जाय कि पहले तुम्हीं परीक्षण करो तो मैंने तो परीक्षा कर ली है। मुझे तो उसके भाषण में कोई दुष्टता, वचन एवं चेष्टाओं से उसके अन्तःकरण की दुष्टता नहीं प्रतीत होती । प्रसन्नवदनता स्पष्ट परिलक्षित होती है । अतः मुझे उसके प्रति तथा उसकी बुद्धि के प्रति कोई संशय नहीं है । रामशरणगमन ही मेरा इष्टसाधन है, इस तरह वह निःशङ्क एवं स्वस्थ अर्थात् साधुस्वभाववाला ही शरणागत हुआ है । गूढविप्रियबुद्धिवाला नहीं है। उसकी वाणी में कोई भी दोष नहीं है। यद्यपि शठ भी वैसा भाषण कर सकता है तथापि आन्तर भाव को छिपाने का शक्तिभर प्रयत्न करने पर भी वह सर्वथा छिपाया नहीं जा सकता, किन्तु अन्तर्यामी देवता बलात् भीतर की असाधुता या साधुता को, तादृश वचनादि की प्रेरणा कर, प्रकट कर देता है। कार्यविदों में श्रेष्ठ, उसका इस समय का आगमन देश-काल के अनुसार है । प्रयोग से, अनुष्ठान से सम्पादित ईदृश कार्य को शीघ्र ही सफल करें । आपका रावणवधविषयक उद्योग तथा मिथ्याबलगर्वित पापवृत्त रावण को देखकर रावण से भी अधिक बलवाले वाली का वध एवं सुग्रीव का अभिषेक सुनकर उसने बुद्धि से निश्चय किया है कि वाली के समान ही राम रावण को मार कर सुग्रीव के समान ही मुझे लङ्का का राज्य देंगे । शरणागतवत्सल राम अवश्य मेरी रक्षा करेंगे । इस तरह बुद्धिपूर्वक वह शरण में आया है । उसका संग्रह करना उचित है । इस तरह मैंने यथाशक्ति विभीषण का आर्जव वर्णन किया है । बुद्धिमानों में श्रेष्ठ आप से अधिक कहना उचित नहीं, शेष कृत्य के निर्णय में आप ही प्रमाण हैं । हनुमान् का वचन सुनकर १८ वें सर्ग में राम ने अपना अभिप्राय भी सुनने के लिए सबसे अनुरोध करके कहा—मित्रभाव से सम्यक् प्राप्त शरणागत विभीषण का त्याग उचित नहीं है । यदि उसमें सुग्रीव आदि के कथना- नुसार रन्ध्र में प्रहरण-कामना आदि दोष भी हों तो भी शरणागत दुष्ट का रक्षण भी सत्पुरुषों की दृष्टि से गर्हित नहीं है । हनुमान् ने निर्दोषत्व प्रतिपादनपूर्वक इसकी ग्राह्यता कही है । अन्य लोगों ने दोषनिरूपणपूर्वक अग्राह्यता का प्रतिपादन किया है । पर भगवान् ने तो प्रौढिवाद से रन्ध्र-प्रहारित्वरूप दोष स्वीकार कर के भी ग्राह्यता का ही प्रतिपादन किया है । 'राघवं शरणं गतः' इस प्रसन्न वचन से मित्रभावना का अनुमान होता है । स्निग्धभाव से पति को सम्यक् प्राप्त होनेवाली पत्नी के समान मित्रभाव से प्राप्त विभीषण को रन्ध्रप्रहारित्व के भय से मैं किसी भी देश, काल और अवस्था में त्याग नहीं सकता । वस्तुतः तो विभीषण में कोई दोष है ही नहीं। शरणागत होने के कारण शत्रुपक्षीय होने के भय से उसका त्याग नहीं किया जा सकता । आप लोगों ने जो दोष कहे हैं वे और उनसे अतिरिक्त भी दोष उसमें हों तो भी उसका मैं त्याग नहीं करूँगा । यद्यपि दुष्टजनपरिग्रह शिष्टविर्गाहत है तथापि "वध्यं प्रपन्नं न प्रतियच्छन्ति" वध्य होने पर भी प्रपन्न ( शरणागत ) का परित्याग नहीं करना चाहिये । शास्त्रवचन के अनुसार सदोष शरणागत का ग्रहण भी पूजित ही है । इसपर पुनः सुग्रीव ने कहा कि भले यह दुष्ट हो अथवा अदुष्ट भी हो तो भी क्या है, जो ऐसी विपत्ति में पड़े हुए अपने बड़े भ्राता का परित्याग कर सकता है वह ऐसा कौन है जिसका त्याग नहीं कर सकता । अतः विश्वासघाती एवं कृतघ्न होने से विभीषण सर्वथा त्याज्य ही है । वानराधिपति का वचन सुनकर सबकी ओर निहार कर, लक्ष्मण की ओर भी देखकर थोड़ा हँसते हुए सत्यपराक्रम काकुत्स्थ राम ने कहा—सुग्रीव ने जैसी बात कही है शास्त्रों का सम्यक् अध्ययन बिना किये और वृद्धों

१. 'अन्तःस्वभावैर्गौतैस्तैर्नैपुण्यं पश्यता भृशम् ।' इति पाठान्तरम् ।

की सम्यक् सेवा बिना किये वैसी बात नहीं कही जा सकती है तो भी इस सम्बन्ध में मुझे कुछ सूक्ष्मतर बात प्रतीत होती है। भ्रातृ-त्यागरूप दोष सभी राजाओं में प्रत्यक्षसिद्ध है और सब लोकों में प्रसिद्ध होने से वह लौकिक ही है। लोक-स्थिति यह है कि राजाओं के अमित्र (शत्रु) दो प्रकार के होते हैं। एक तो तत्कुलीन अर्थात् उनकी ज्ञाति के लोग और दूसरे आसन्न देशवासी लोग । ये दोनों ही प्रकार के शत्रु आध्यात्मिकादि त्रिविध कष्टों के द्वारा प्रहार करते हैं। अतः नाना प्रकार के उत्पीड़क प्रहर्त्ता ज्ञातिजनों के भय से स्वात्मत्राणार्थ विभीषण का शरण में आना सम्भव है अथवा व्यसन में प्रहार करनेवाले स्वजातीय होने के कारण व्यसनी रावण पर प्रहार करने की दृष्टि से उसका आना सम्भव है। केवल ज्ञातिमात्र का होना ही शत्रुता का प्रयोजक नहीं होता, किन्तु परस्पर अनिष्ट चिन्तन के कारण भी शत्रुता होती है। परस्पर अनिष्ट चिन्तारहित पापशून्य लोग परस्पर हितैषी होकर अपने हित का रक्षण करते हैं, परन्तु राजाओं की स्थिति इससे भिन्न होती है। उनमें तो शोभन मित्र भी ज्ञाति के व्यक्ति शङ्कनीय होते हैं, क्योंकि उन्हें भी महत्तर राज्य एवं ऐश्वर्य का लोभ होना सम्भव होता है। भेदनीति का प्रभाव भरत की माता कैकेयी आदि में भी देखा गया है। इस दृष्टि से अपने से शङ्कित रावण से अनिष्ट की सम्भावना से रावण को त्याग कर विभीषण आया होगा। “यो हिंसार्थमभिक्रान्तं हन्ति मन्युरेव मन्युं स्पृशति न तस्मिन् दोषः ।” इस आपस्तम्ब-वचन के अनुसार जो हिंसार्थ उद्यत शत्रु का हनन करता है। मन्यु ही मन्यु का हनन करता है, इस दृष्टि से यदि रावण के नाशार्थ विभीषण आया है तो भी दोष नहीं है। शत्रुपक्ष के परिग्रह में जो दोष कहा गया है उसका भी समाधान यह है कि हम लोग न रावण के जातीय हैं और नहीं उसके प्रतिदेश्य हैं। अतः हममें राज्य की जिघृक्षा नहीं हो सकती है। इसलिए हम लोगों में प्रहार की कल्पना नहीं हो सकती। किन्तु हम लोगों के द्वारा स्वजाति शत्रु का विनाश कर निज राज्य की आकाङ्क्षा हो सकती है। अतः हम लोगों पर प्रहार करना उपजीव्य-विरोध ही होगा। यद्यपि तमःप्रधान मूर्ख राक्षसों में ऐसा विचार करना कम सम्भव है तथापि पर्यालोचनापूर्वक कर्त्तव्यनिश्चय में समर्थ पण्डित सर्वत्र ही होते हैं। एकपितृजन्य होने पर भी जैसे कुम्भकर्ण अति- तामस है, रावण अतिराजस है, इसी तरह विभीषण अतिसात्त्विक होने से ऐसा विचार विभीषण में असम्भव नहीं है, अतः विभीषण ग्राह्य है ! अव्यग्र, अनाकुल तथा प्रहृष्ट सौभ्रात्र से परस्पर मिलजुल कर रहते हैं। परन्तु विपरीत जातीय लोग राज्य-लोभादि से भेदभाव को प्राप्त होते हैं। तभी उनमें युद्धादि कोलाहल होता है। सौभ्रात्र के अपगत होने पर किसी हेतु से वैर उत्पन्न हो जाने से शरण में आना सम्भव ही है। कहा जा सकता है कि भरत आदि भ्राताओं में ऐसा दोष नहीं देखा जाता है। उन्होंने तो प्राप्त राज्य का भी परित्याग करके सौभ्रात्र को निभाया है। परन्तु भरत के समान प्राप्त राज्य को त्याग कर सौभ्रात्र निभानेवाले भ्राता, मेरे तुल्य सुखलोभ से पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन न करनेवाले पुत्र और कपिराज सुग्रीवादि जैसे सब सुख त्याग कर सर्व बल से तथा सब यत्नों से मित्रकार्यसाधक सुहृद् सब नहीं हो सकते— “न सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः । मद्विधा वा पितुः पुत्राः सुहृदो वा भवद्विधाः ॥” ( वा० रा० ६।१८।१५ ) राम के ऐसे वचनों को सुनकर लक्ष्मण सहित महाप्राज्ञ सुग्रीव ने प्रणत होकर कहा कि विभीषण रावण द्वारा भेजा हुआ गुप्तचर ही है। अतः उसका निग्रह करना ही उचित है। यह कुटिलबुद्धि से संदिग्ध होकर आया हुआ है। विश्वास प्राप्त कर लेने पर आपपर या विश्वस्त होने से मुझपर या लक्ष्मण पर प्रहार कर सकता है,