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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५४२ रामायणमीमांसा अष्टादश तिलककार के अनुसार महाभारत में जिस प्रकार पाण्डवों का १३ वर्ष का वनवास अधिक मास को लेकर जोड़ा गया था । यह विराट्पर्व के भीष्मवाक्य से सिद्ध है । इसी तरह श्रीरामजी का १४ वर्ष का वनवास भी अधिक मास को लेकर ही पूरा हुआ था । इस तरह अमान्त मान से आश्विन कृष्ण चतुर्दशी में पूर्णिमान्त मान से कार्तिक कृष्ण षष्ठी में १४ वर्षों की पूर्ति होती है । अन्यथा चैत्रमास की शुक्ला दशमी से आरम्भ होकर १४ वर्ष की समाप्ति षष्ठी को नहीं हो सकती थी । परन्तु अधिक मास की गणना से ११ दिन कम ६ मास की वृद्धि हो जाती है । तभी १४ वें वर्ष की पूर्ति षष्ठी को हो सकती है । अतः १२ वर्ष पूरे होने पर १३ वें वर्ष के कुछ समय बीतने पर फाल्गुनशुक्ल अष्टमी को सीताहरण हुआ था । १४वें वर्ष के कुछ दिन बीतने पर श्रीरामजी लङ्का के समीप पहुँचे थे । “वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम ।” ( वा० रा० ५।३७।८ ) इसी सीतोक्ति के अनुसार सावन मान से स्वहरण दिन से १० मास बीत चुकने पर हनुमान् का सीता- संवाद हुआ था । “पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता” इस रामोक्ति के अनुसार पौष शुक्ल १४शी या पूर्णिमा को श्रीरामजी त्रिकूट- शिखर पर आये थे । हनुमान् के लङ्का प्रवेशकाल में— “हिमव्यपायेन च शीतरश्मिरभ्युत्थितो नैकसहस्ररश्मिः ।” “द्वौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः ।” इन वाक्यों से प्रतीत होता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के बाद दो दिन के भीतर हनुमान् का लङ्काप्रवेश हुआ है । अन्यत्र मार्गशीर्षकृष्ण अष्टमी को राम का प्रस्थान कहा गया है । पौषपूर्णिमा को राम त्रिकूट पर आये । उसके बाद १५ दिन सेनानिवेश, दूतप्रेषण आदि में बीत गये । तब युद्धारम्भ हुआ । तब से लेकर भाद्र और श्रावण उभय अमान्त पर्यन्त लङ्कापुर के बाहर दोनों सेनाओं का युद्ध हुआ तथा बहुत राक्षसों के क्षय से भयभीत होकर राक्षस लङ्का में प्रविष्ट हो गये । उस दिन युद्ध का अवहार ( युद्धबन्दी ) रहा । तदुत्तर प्रतिपदा को शरबद्ध राम का सीता ने दर्शन किया और उन्होंने कहा कि अक्षोभ्य सागर पार करके गोष्पद में दोनों भाई मारे गये— “तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं भ्रातरौ गोष्पदे हतौ ।” इससे प्रतीत होता है बहुत दिन के युद्ध में बहुत से राक्षस मारे गये थे । कतिपय यूथपों सहित थोड़ी ही सेना बांकी थी । उसी समय शरबन्ध हुआ था । “अयं ते सुमहान् कालः शयानस्य महाबल ।” यह कुम्भकर्ण के प्रति रावण ने कहा था । इससे प्रतीत होता है कि छः मास से अधिक कुम्भकर्ण को सोते बीत गये थे । सेतुबन्ध आदि वृत्तान्त तुम नहीं जानते । रावण के इस कथन से प्रतीत होता है कि मन्त्रणा के अनन्तर बीच में कुम्भकर्ण नहीं जगा था । यह भी प्रतीत होता है कि शरबन्धन कृष्णप्रतिपदा को नहीं हुआ, क्योंकि पूर्णिमा के अनन्तर की प्रतिपदा में सम्पूर्ण रात्रि में चन्द्रमा रहता है । इस स्थिति में “तस्मिंस्तमसि दारुणे” यह उक्ति सङ्गत नहीं होगी । अतः शुक्लपक्ष की प्रतिपदा ही मानना युक्त है । अमावस्या को ही रावण-वध हुआ है, यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि इन्द्रजित् वध के अनन्तर यह कहा गया है कि तुम आज कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को अभ्युत्थान करके अमावस्या में ही शत्रु-विजय के लिए गमन करो । यह रावण के प्रति सुपार्श्व ने कहा था । इससे प्रतीत होता है कि चतुर्दशी को रावण-बल-वध के अनन्तर अमावस्या को रावण रणभूमि में आया और रात्रि में उसने राम तथा लक्ष्मण से युद्ध किया । शक्तिघात के अनन्तर वह राम से पराभूत होकर लङ्का चला गया—