रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 620, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५४३ लक्ष्मण की चिकित्सा के अनन्तर पुनः राम और रावण का युद्ध वाल्मीकि द्वारा वर्णित है। अतः अमावस्या का रावण-वध होना संभव ही नहीं था। अगस्त्य ने आदित्यहृदय का उपदेश दिन को ही दिया था, क्योंकि वहीं यह उल्लेख है कि आदित्य का दर्शन कर तथा आदित्यहृदय का जप करके राम प्रसन्न हुए— "आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वाेदं परं हर्षमवाप्तवान्।" (वा० रा० ६।१०५।२९) उसके बाद ही रावण वध और इसके अनन्तर आदित्य का स्थिरप्रभ होना कहा गया है— "स्थिरप्रभश्चाप्यभवद् दिवाकरः।" (वा० रा० ६।१०८।३२) इससे प्रतीत होता है कि दिन में ही रावण वध हुआ था, अतः चिरकाल तक युद्ध होने के बाद लक्ष्मण पर शक्तिघात हुआ, तदर्थ औषधपर्वत का आनयन हुआ था। अमावस्या की रात्रि को शक्तिघात और रावण का मानभङ्ग कहा गया है इससे अमावस्या को रावण-वध नहीं कहा जा सकता। पद्मपुराण में कहा गया है— "ततो जज्ञे महायुद्धं संकुलं कपिरक्षसाम् । मध्याह्ने प्रथमं युद्धं प्रारब्धं प्रतिपद्यभूत् ॥" यहाँ प्रतिपदा का अर्थ शुक्ल प्रतिपदा है। उस दिन मध्याह्न में वानरों और राक्षसों का भीषण युद्ध हुआ। पर उसी दिन रात्रि को मायावी इन्द्रजित् ने नागपाश से दोनों भाइयों (राम और लक्ष्मण) को बाँध दिया था। "ततो निशि समागम्य मायावी शक्रजिद् बली । बबन्ध नागपाशैस्तौ राघवौ च हरिव्रजान् ॥" यहाँ ततः का अर्थ है बहुत काल तक युद्ध के बाद उसी दिन नहीं अन्यथा 'तस्यामेव निशि' ऐसा कहना उचित होता। अगले प्रसङ्गों में 'द्वितीयेऽह्नि षष्ठ्यां' कहा गया है। और रामायण में "दारुणे तमसि" भी कहा गया है। अतः भाद्रश्रावणोत्तर प्रतिपदा की रात्रि को इन्द्रजित् ने नागपाश का प्रयोग किया था। "वैनतेयस्तदाभ्येत्य तानि चास्त्राण्यमोचयत् । द्वितीयेऽह्नि धूम्राक्षं हनूमान्निजघान वै ॥" "तृतीयेऽह्नि वज्रदंष्ट्रं खड्गाच्छिच्छेद चाङ्गदः । जघान हनूमान् भूयश्चतुर्थेऽह्न्यकम्पनम् ॥" "प्रहस्तं पञ्चमीतिय्यां नीलश्छिच्छेद मूर्धनि । रावणः परिभूतोऽभूत् षष्ठ्यां रामेण धन्विना ॥" "अथ लङ्केश्वरः खिन्नः कुम्भकर्णं सहोदरम् ॥ शैलमुद्गरघाताश्वधावनाद्यैरबोधयत् । जघान तं कुम्भकर्णं रामः सप्तमवासरे ॥" अर्थात् तब गरुड़ ने आकर नागपाश से राम और लक्ष्मण को मुक्त किया। द्वितीय दिन हनुमान् ने धूम्राक्ष को मारा, तीसरे दिन वज्रदंष्ट्र को अङ्गद ने मारा। चौथे दिन हनुमान् ने अकम्पन को मारा। पञ्चमी तिथि को नील ने प्रहस्त का वध किया। षष्ठी को रावण राम के द्वारा अभिभूत हुआ। इससे स्पष्ट है कि पद्मपुराण से भी यही सिद्ध होता है कि प्रहस्त-वध के बाद रावण और राम का मुकाबला हुआ था। अतः बुल्के जो इसे प्रक्षेप कहते हैं, वह निर्मूल है। तब लङ्केश्वर ने खिन्न होकर कुम्भकर्ण को जगाने का प्रयास किया। जगाने के लिए उसपर शैल और मुद्गर गिराये गये तथा घोड़े दौड़ाए गये। कुम्भकर्ण को राम ने मारा। दो दिन में कुम्भकर्ण को जगाया गया।