रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४४ रामायणमीमांसा अष्टादश बोधित कुम्भकर्ण को बोधनोत्तर सातवें दिन मारा गया । इसी लिए सप्तमी का उल्लेख न होकर सप्तम वासर का उल्लेख है । जो लोग कहते हैं षष्ठी को जागरण और सप्तमी को ही वध हो गया उनका कथन ठीक नहीं है । उसके प्रबोधन का प्रयास दो दिन में सम्भव नहीं था । जागकर वह रावण मन्दिर में गया । वहाँ कहा गया है कि सूर्य की प्रभा से रावण का मन्दिर अत्यन्त भास्वर हो रहा था । मन्त्रणा आदि में समय लगने से सप्तमी के दिन युद्ध ही नहीं हो सकता था । इन्द्रजित् का वध तीन दिनों में हुआ था, पर इसका वध छः प्रहरों में हुआ है । अन्यथा—"वधोऽस्य यामषट्केन" इसके साथ सङ्गति न हो सकेगी । अतः भाद्रपद पूर्णिमा को इसका वध युक्त है । दूसरे दिन लक्ष्मण ने रावण-पुत्र अतिकाय को मारा था । अन्य दिन में इन्द्रजित् ने सुग्रीव, विभीषण एवं वानरों को ब्रह्मास्त्र से बाँधा था । उसी दिन हनुमान् ओषधिपर्वत लाये थे । उस पर्वत के औषधस्पृष्ट वायु से सब वानर उठ पड़े थे— “जघान लक्ष्मणोऽन्येद्युरतिकायं दशास्यजम् । बबन्धान्येद्युरिन्द्रारिर्ब्रह्मास्त्रेण नृपौ कपीन् ॥ हनूमता समानीतो महौषधमहीधरः । तस्यानिलस्पर्शवशात् सर्वे एते समुत्थिताः ॥” × × × “अन्येद्युः कपिराट् कुम्भं निकुम्भं वायुजोऽवधीत् । तस्यां निशि रघुश्रेष्ठो जघान मकराक्षम् ॥ मायासीतावधं चक्रे शक्रजिद् रणमूर्धनि । तेन खिन्नोऽभवद्रामः आश्वस्तो लक्ष्मणेन सः ॥ त्रयोदशाहे सौमित्रिस्त्रिदिनं योधयन् बली । जघान शक्रजेतारं रामध्यानेन हेतुना ॥” अन्य दिन सुग्रीव ने कुम्भ को तथा हनुमान् ने निकुम्भ को मारा । उसी दिन राम ने मकराक्ष को मारा । उसी रात को इन्द्रजित् ने मायासीता का रणभूमि में वध किया । उससे राम बहुत खिन्न हुए । लक्ष्मण ने उन्हें आश्वस्त किया । तेरहवें दिवस सौमित्रि ने रामध्यान के प्रभाव से तीन दिनों में मेघनाद को मारा । यहाँ अतिकाय के ग्रहण को त्रिशिरा, देवान्तक, नरान्तक, महोदर तथा महापार्श्व का उपलक्षण समझना चाहिये । अतः 'अन्येद्युः' का अर्थ अन्य दिनों में ऐसा करना चाहिये । तथाच छः दिनों में इन छहों का वध हुआ था, क्योंकि रामायण में क्रम से ही उनका वध कहा गया है । अन्येद्युः अर्थात् सप्तमी को इन्द्रजित् ने ब्रह्मास्त्र से वानरों को बाँधा । हनुमान् महौषध- पर्वत अष्टमी को लाये और अन्येद्यु अर्थात् नवमी को कुम्भ तथा निकुम्भ का वध हुआ । उसी रात्रि को राम ने मक- राक्ष को मारा । उसी रात्रि के अन्त में इन्द्रजित् ने मायासीता का वध किया । दशमी के चौथे प्रहर से लेकर त्रयोदशी के चौथे प्रहर की अवधि में लक्ष्मण ने इन्द्रजित् को मारा । “ततोऽवधीन्मूलबलं चतुर्दश्यां रघूद्वहः । दर्शोऽथ निर्ययौ राजा योद्धुं रामेण संयुगे ॥ चतुरङ्गबलैः सार्धं मन्त्रिभिर्दशकन्धरः । छत्रचामरसंयुक्तः सर्वाभरणभूषितः ॥ महारथगतो द्वारादुत्तरान्निर्ययौ बहिः । आगतो रक्षसां राजा ब्रह्मघ्नो देवकण्टकः ॥