रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 622, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५४५ योद्धुं रघुवरेणेति शुश्रुवे कलहध्वनिः । तत्र युद्धं समभवद् वानराणाञ्च रक्षसाम् ॥ रामरावणयोश्चैव तथा सौमित्रिणा सह । शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धः सोऽनुजं प्रति रावणः ॥ वक्षसा धारयामास सौमित्रिस्तां वियद्गताम् । तया स वध्यमानः सन् पपात धरणीतले ॥ हनूमता जीवितोऽभूदोषध्यानयनात् पुनः। ततः क्रुद्धो महातेजा राघवो राक्षसान्तकः ॥ जघान राक्षसान् सर्वान् शरैः कालान्तकोपमैः । भयात् प्रदुद्राव रणे लङ्कां प्रति निशाचरः ॥ जगद् राममयं पश्यन् निर्वेदात् स्वगृहं विशत् । निकुम्भिलां ततः प्राप्तो होमं चक्रे जिगीषया ॥ ध्वंसितं वानरेन्द्रैस्तदभिचारात्मकं रिपोः । पुनरुत्थाय पौलस्त्यो रामेण सह योधितुम् । दिव्यं स्यन्दनमारुह्य राक्षसैर्निययौ बहिः ॥” चतुर्दशी को राघव ने रावण के मूलबल (खास सेना) को मारा। अमावस्या को रावण राम से लड़ने निकला। उसके साथ चतुरङ्गिणी सेना और उत्तम मन्त्री थे। छत्र, चामर तथा सर्वाभरणसम्पन्न राजा रावण महारथ पर आरूढ़ होकर उत्तर द्वार से बाहर निकला। राक्षसों का राजा, देवकण्टक तथा ब्रह्मघ्न रावण रघुवर से युद्धार्थ बाहर आया ऐसा हल्ला सुनायी दिया। वहाँ वानर और राक्षसों का घोर युद्ध हुआ। राम के साथ तथा सौमित्रि के साथ भी रावण का युद्ध हुआ। रावण ने विभीषण के प्रति शक्ति चलायी। लक्ष्मण ने उसे अपनी छाती पर रोका और उससे बाधित होकर वे धरती पर गिर पड़े। हनुमान् ने औषधि लाकर लक्ष्मण को जिलाया। उसके बाद राम ने काल तथा यम के तुल्य बाणों द्वारा सभी राक्षसों को मारा। भयभीत होकर रावण लङ्का भाग गया। रावण भय से सारे जगत् को राममय देखने लगा। उसने निकुम्भिला में प्रवेश कर होम करना आरम्भ किया। वानरेन्द्रों ने उस होम का विध्वंस किया। पुनः उठकर पौलस्त्य रावण राम से युद्ध करने के लिए दिव्य स्यन्दन द्वारा राक्षसों के साथ निकला। रावण का निर्गमन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ। “ततः शतमखो दिव्यं रथं हर्यश्वसंयुक्तम् । राघवाय स्वसूतेन प्रेषयामास भक्तिमान् ॥ तं तु मातलिनानीतमारुह्य रथसत्तमम् । स्तूयमानः सुरगणैः युयुधे तेन रक्षसा ॥ ततो युद्धमभूद् घोरं रामरावणयोर्महत् । साप्ताह्निकमहोरात्रं शस्त्रास्त्रैरतिभीषणैः ॥” इन्द्र ने हर्यश्वों से युक्त रथ मातलि के द्वारा भेजा। देवताओं से स्तूयमान राम ने स्यन्दन पर आरूढ़ होकर रावण से युद्ध किया। राम-रावण का घोर युद्ध हुआ। मातलि द्वारा रथ लाने के बाद सात दिन तक घोर युद्ध के पश्चात् रावण का वध हुआ। इसी पक्ष का समर्थन कालिकापुराण से होता है— ६९