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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 617

५४० रामायणमीमांसा अष्टादश हनुमान् आदि का अलौकिक महत्त्व वर्णित है। इसमें भी राम और लक्ष्मण की विष्णुरूपता सिद्ध होती है, इसलिए बुल्के हठात् इसे प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं । किन्हीं समान घटनाओं में एक दूसरे का अनुकरण नहीं कहा जा सकता । महर्षि वाल्मीकि ने घटनाओं का वर्णन सत्यता के आधार पर ही किया है । "सन्तुष्यतु दुर्जनः" न्याय से ज्यादा से ज्यादा इतना ही कहा जा सकता है कि ५९ वें सर्ग में अकम्पन और नरान्तक का वर्णन प्रक्षेप है, परन्तु सिर्फ दो नामों की पुनरुक्ति के आधार पर इतने महत्त्वपूर्ण सर्ग को प्रक्षेप कहना ही अति साहस है । १०० वें सर्ग में लक्ष्मण पर रावण द्वारा शक्ति-प्रयोग का वर्णन है । परन्तु दोनों के स्वरूप में बहुत भेद है । सर्ग १०० में लक्ष्मण ने रावण के रथ, सारथि तथा मनुष्यशीर्ष ध्वज काट कर रावण के धनुष एवं घोड़ों को नष्ट कर दिया । उस समय विभीषण ने रावण पर प्रहार किया था । भग्न रथ से हटकर रावण ने विभीषण पर क्रोध करके शक्ति का प्रयोग किया पर लक्ष्मण ने उसे बीच में ही नष्ट कर दिया । उसके बाद रावण ने और भी तीव्र काल से भी भीषण वज्रोपम शक्ति का प्रयोग किया । लक्ष्मण फिर विभीषण को बचाकर स्वयं सामने आकर भीषण बाणों से रावण पर प्रहार करने लगे तब उसने अष्ट घण्टावाली महास्वना शक्ति का प्रयोग लक्ष्मण पर ही कर डाला । उस समय राम ने— "स्वस्त्यस्तु लक्ष्मणायेति मोघा भव हतोद्यमा ।” कहकर शक्ति को मोघ बनाया और राम ने स्वयं उस महाशक्ति को लक्ष्मण की छाती से निकाला और तोड़ डाला । इस बीच रावण ने शक्ति निकालते समय राम पर भीषण मर्मभेदी बाण चलाये । उनकी कुछ चिन्ता न करते हुए राम हनुमान् आदि वानरों को लक्ष्मण की रक्षा में छोड़कर स्वयं रावण से निबटने के लिए प्रस्तुत हुए । (श्लोक ४६-५२) तक में यह नहीं कहा गया है कि राम ने पहले पहल ही रावण को देखा है । किन्तु इसकी ५९ वें सर्ग से सङ्गति लगाकर यही निश्चित करना चाहिये कि आज के पराक्रम का यह काल बहुत समय से ईप्सित था । उस दिन परिश्रान्त जानकर रावण को पराजित करके छोड़ दिया था । मौत के घाट उसे नहीं उतारा था । तब से वह अब तक सामने नहीं आया । अब इस समय पापात्मा दशग्रीव का वध अवश्य करना है । जैसे ग्रीष्मान्त में चातक को मेघदर्शन अभीष्ट होता है वैसे ही वध के लिए मुझे रावण का दृष्टिगत होना अभीष्ट है । इस क्षण मैं प्रतिज्ञा करता हूँ अब वानर लोग जगत् को अरावण या अराम ही देखेंगे। अतः यह चक्षु के गोचर होकर जीवित नहीं रह सकता- “सोऽद्यमद्य रणे पापश्चक्षुर्विषयमागतः । चक्षुर्विषयमागम्य नायं जीवितुमर्हति ॥” ५१ ॥ आज यह पापी मेरे चक्षु का विषय बनकर जीवित नहीं रह सकता । इससे यह नहीं निकलता कि अभी तक राम के सामने रावण आया ही नहीं था । इतना ही क्यों सर्ग के अन्त में भी कहा गया है कि दीप्तधनुष्मान् राम से मर्दित रावण भय से वैसे ही भाग गया जैसे प्रबल वायु के भय से बलाहक भाग जाते हैं । पुनः रावण सर्ग १०३ में तैयार होकर आता है । अतः सर्ग १०० के श्लो० ४६-५२ के बलपर भी ५९ वें सर्ग को प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता । बुल्के का यह भी कहना है कि सर्ग ६९ और ७० भी प्रक्षेप हैं । यत्र तत्र इन्द्रवज्रा छन्दों के प्रयोग के अतिरिक्त इन सर्गों की कथावस्तु इन्हें प्रक्षिप्त ठहराती है । इनमें दो राक्षसों का वध वर्णित है, जो पहले मारे जा चुके हैं । त्रिशिरा (३।२७।१८,१९) तथा नरान्तक ( ६।५८।२० ) में । महोदर और महापार्श्व एवं दो अन्य राक्षसों के वध का उल्लेख है जिनका वध बाद में फिर किया गया है । महोदर का ( ६।९७ ) तथा महापार्श्व का ( ६।९८ ) में । परन्तु बुल्के की यह भ्रान्ति ही है । वस्तुतः यह किसी भ्रान्त व्यास द्वारा वर्णित प्रक्षेप नहीं है, किन्तु सत्य घटना के आधार पर ही वाल्मीकिरामायण का वर्णन है । ६।७०।९४-९६ में नरान्तक का वध अङ्गद द्वारा हुआ है एवं नील के द्वारा महोदर का वध ७०।१२६ में हुआ है । त्रिशिरा रावण पुत्र था तथा महोदर उसका पितृव्य था ।