भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 616

अष्टम प्राय युद्धकाण्ड ५३९ सर्ग ५९ का राम और रावण का मुकाबला सहेतुक ५९ वें सर्ग के प्रारम्भ में ही दिखलाया गया है । ५८ वें सर्ग के अनुसार वानरी सेना के सेनापति नील के द्वारा राक्षसी सेना के सेनापति प्रहस्त का वध हो गया तो रावण उत्तेजित हो उठा । उसने प्रधान प्रधान राक्षसयूथमुख्यों से कहा कि उन रिपुओं की अवज्ञा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये जिन्होंने हमारे ससैन्य सकुञ्जर सेनापति को मार डाला है । अतः अब मैं स्वयं विजय के लिए रणभूमि में जा रहा हूँ । यह कहकर अमरराजशत्रु राक्षसराज रावण रणभेरी, पणव आदि के प्रणादों और आस्फोटों, शौर्यप्रकाशक शब्दों, सिंहनादों तथा पुण्यस्तवों से स्तूयमान होता हुआ अपने दलबल के साथ भूतों से घिरे हुए रुद्र के समान रणाङ्गण की ओर चल पड़ा । महार्णवों एवं बादलों के गर्जनों के तुल्य गर्जती हुई तथा महान् वृक्षों एवं शैलों को हाथों में ली हुई प्रचण्ड राक्षसी सेना को देखकर राम ने विभीषण से पूछा कि वह अक्षोभ्य अभीरु वीरों तथा महेन्द्रपर्वतसदृश गजेन्द्रों से युक्त किसकी सेना है। विभीषण ने मुख्य वीरों का वर्णन करते हुए बताया कि यह प्रबलप्रताप तेजोमय रावण है जो कि दैत्यों और देवताओं के भी दर्प का हनन करनेवाला है । उसे देख श्रीराम भी सीता-हरणसंभव क्रोध को उसके ऊपर छोड़ने के लिए संनद्ध हो गये । किन्तु लक्ष्मण के अनुरोध करने पर उन्हें युद्ध करने की अनुमति दे दी । पहले सुग्रीव से रावण का संग्राम हुआ । बाद में गवाक्ष, गवय, सुषेण, ऋषभ, नल आदि वानरों ने भी युद्ध किया । अन्त में लक्ष्मण सामने उपस्थित हुए । बीच में हनुमान् से रावण का युद्ध होने लगा । एक बार तो रावण ने तलप्रहार से हनुमान् को विचलित कर दिया, पर तेजस्वी महामति हनुमान् ने तल से आहत होकर दशग्रीव भूकम्प में महापर्वत के समान विचलित एवं विकम्पित हो उठा । पुनः हनुमान् पर मुष्टिप्रहार कर वह नील से भीड़ गया । भीषण युद्ध के बाद उसने आग्नेय अस्त्र से नील को मारा परन्तु अग्निपुत्र नील अत्यन्त आहत होने पर भी मृत नहीं हुए । तदनन्तर लक्ष्मण और रावण का तुमुल संग्राम हुआ । लक्ष्मण के हस्तलाघव से रावण विस्मित हुआ । रावण ने कालाग्निप्रभ स्वयम्भूदत्त शर से लक्ष्मण के सिर पर प्रहार किया तो लक्ष्मण सायक से पीड़ित होकर मूच्छित हो गये । कठिनाई से होश में आकर राक्षसराट्नाथ रावण ने स्वयम्भू से प्राप्त रिपुवित्रासनी महाशक्ति का प्रयोग किया । लक्ष्मण ने अनेक अग्नितुल्यबाणों से उसका प्रतीकार किया, किन्तु वह अमोघ दिव्य शक्ति थी । उसने लक्ष्मण को घायल कर दिया । रावण ने घायल लक्ष्मण को दोनों भुजाओं से उठाने का प्रयास किया। जो हिमाचल, मन्दर एवं त्रैलोक्य को उठा सकता था वह लक्ष्मण को उठा नहीं सका । ब्राह्मी शक्ति से ताड़ित होने पर भी लक्ष्मण ने विष्णु के अमीमांस्य भाग स्वात्मा का अनुसन्धान किया, अतः रावण उन्हें उठाने में समर्थ नहीं हुआ । इसी बीच हनुमान् ने आकर रावण पर मुष्टिप्रहार किया, वह मूच्छित होकर जानुओं के बल से रथ-पृष्ठभूमि पर गिर पड़ा । उसके मुख, नेत्र और कानों से रक्त की धारा बह चली। वह निश्चेष्ट होकर रथ-मध्य में बेहोश हो गिर गया । हनुमान् ने अपनी बाहुओं से लक्ष्मण को उठा लिया । वायुपुत्र हनुमान् के सौहार्द एवं परम भक्ति से वे अनायास ही उठ गये । फिर महातेजा रावण होश में आकर वानर सेना को विद्रावित करने लगा । तब गरुड़ारूढ़ विष्णु के समान हनुमान् पर आरूढ़ होकर राम ने रावण से संग्राम किया । रावण ने हनुमान् पर भी बहुत बाण चलाये, पर स्वाभाविक तेज से सम्पन्न हनुमान् उनसे अधिकाधिक तेजस्वी हो गये । राम ने रावण पर ऐसा भीषण प्रहार किया कि उसका चक्र, अश्व, ध्वज, पताका, सारथि तथा वज्र, शूल और खड्ग सहित रथ नष्ट हो गया । फिर वज्रतुल्य बाण से उसकी भुजा में ऐसा प्रहार किया कि वह अत्यन्त आर्त होकर विचलित हो गया। उसके हाथ से धनुष छूट गया। उसे विह्वल देखकर राम ने पुनः अर्धचन्द्र से विशालकाय रावण के किरीटों को काट डाला । अनन्तर राम ने कहा तुम आज बहुत थक गये हो, अतः आज तुम्हें मृत्यु के वश में नहीं भेजूंगा । रात्रिञ्चर, जा लङ्का में विश्राम कर । पुनः रथी धन्वी होकर आना तब मेरा बल देखना । इस तरह शरादित, निकृत्तचाप तथा भग्नकिरीटकूट होने से रावण का हर्ष और दर्प चूरचूर हो गया । वह लङ्का चला गया। इस महत्त्वपूर्ण सर्ग को प्रक्षेप कहने का प्रयास दुरभिसन्ध्विमूलक ही है। इसमें राम, लक्ष्मण,