भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५३८ रामायणमीमांसा अष्टादश

"एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रत्यबुद्ध्यत वीर्यवान् । स्थिरत्वात् सत्त्वयोगाच्च शरैः संदानितोऽपि सन् ॥ ( वा० रा० ६।४९।३ ) अभी तक वे नागपाश से मुक्त नहीं हुए थे । इससे प्रतीत होता था कि वे नागपाश से बद्ध होने पर भी विशिष्ट सत्त्वयोग से कुछ क्षणों के लिए ही प्रतिबुद्ध होकर लक्ष्मण के लिए शोक करने लगे थे । उसी बीच गदाधारी विभीषण सम्पूर्ण सेना को व्यवस्थित कर वहाँ आये । उनको दूर से आते देखकर इन्द्रजित् समझ कर वानर इधर उधर दौड़ने लगे । सेना को अव्यवस्थित देख अङ्गद और जाम्बवान् ने सेना को आश्वासन दिया । विभीषण ने आकर राम और लक्ष्मण दोनों को देखा और उनकी अवस्था पर विषण्ण हुए । सुषेण ( वैद्य ) के परामर्श से क्षीरोद सन्निहित पर्वतस्थ महौषधि को लाने के लिए हनुमान् को प्रेषित करने की बात चल रही थी कि इसी बीच विद्युत्- सहित मेघों और द्वीप के महाद्रुमों को अपने पक्षवात से प्रकम्पित करते हुए सुपर्ण ( गरुड़ ) आ गये । उनके आते ही त्रस्त होकर बाणरूपी पन्नग भाग गये। दोनों भ्राता बन्धनमुक्त हो गये । वैनतेय के स्पर्श से राम और लक्ष्मण दोनों के व्रण नष्ट हो गये । दोनों के शरीर सुन्दर वर्णवाले तथा स्निग्ध हो गये । तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, बुद्धि, स्मृति आदि द्विगुण हो गये । इस तरह पूर्वापर के प्रसङ्ग से ५० वाँ सर्ग अत्यन्त महत्त्व का है। उसके बिना नाग- बाणबन्ध की निवृत्ति की उपपत्ति ही नहीं होती । ऐसे पाश्चात्यों की बुद्धि पर दया आती है जो बिना सोचे समझे आर्ष ग्रन्थों पर अपनी कलमकुल्हाड़ी चलाने को तैयार रहते हैं । वस्तुस्थिति प्रदर्शनार्थ इतना लिखा गया है । वस्तुतः यह ४९ वें सर्ग के ३ श्लोकों की केवल व्याख्या है जिससे बुल्के के उक्त तर्कों का खण्डन होता है । इसी तरह उनका दूसरा तर्क निम्नोक्त है—"सर्ग ५९ में अकम्पन और नरान्तक को जीवित माना गया है, किन्तु उनके वध का उल्लेख क्रमशः ५६ और ५८ सर्गों में हो चुका है। इसके अतिरिक्त इस सर्ग में राम और रावण के युद्ध का वर्णन है। यद्यपि आगे चलकर राम के प्रथम बार रावण से युद्ध करने का स्पष्ट उल्लेख है ( दे० ६।१००।४६-५१ ) । वास्तव में लक्ष्मण के शक्ति से आहत होने का जो वर्णन इस सर्ग में किया गया है वह १०० वें सर्ग का अनुकरणमात्र प्रतीत होता है। अतः सर्ग ५९ की प्रक्षिप्तता असंदिग्ध है,” परन्तु यह भी उनका कथन आपातरमणीय है, क्योंकि—"शिरस्यभिजघानाशु राक्षसेन्द्रमकम्पनम् ।” ( वा० रा० ६।५६।२९ ) । "द्विविदो गिरिशृङ्गेण जघानेकं नरान्तकम् ।” ( वा० रा० ६।५८।२० ) । यद्यपि इन वचनों से अकम्पन तथा नरान्तक का वध वर्णित है । तथापि उनसे भिन्न भी सर्ग ५९ के १४ और २२ वें श्लोकों के— “ह्याकम्पनं त्वेनमवेहि राजन्”, “नरान्तकोऽसौ नगशृङ्गयोधी” इन वचनों द्वारा अन्य अकम्पन तथा नरान्तक का होना मानना चाहिये । इसी लिए विशेषणों का भी प्रयोग किया गया है। सर्ग ५६ के अकम्पन को राक्षसेन्द्र कहा गया है, किन्तु ५९ का गजारूढ़ अकम्पन रावण का अङ्गरक्षक है । अतएव तिलककार ने स्पष्ट लिखा है कि यह पूर्वहत अकम्पन से भिन्न ही है । इसका विशेषण नगशृङ्ग- योधी है । तिलककार कहते हैं । अर्थात् इसके मुकाबले का कोई प्रतियोद्धा नहीं उपलब्ध होता तो वह अपनी भुजाओं की कण्डू ( खुजलाहट ) दूर करने के लिए महान् गिरिशृङ्गों से ही युद्ध करता है “प्रतियोद्ध्रभावाद् भुजकण्डू- निवृत्त्यर्थमिति भावः ।” इतना ही क्यों त्रिशिरा यद्यपि खर-दूषण के साथ मारा जा चुका था तथापि यहाँ १९ वें श्लोक में उससे अन्य त्रिशिरा का भी वर्णन है । जब आजकल भी कालिदास और वाचस्पति मिश्र अनेक हो सकते हैं तो अभिन्न नाम के अनेक राक्षसों के होने में शङ्का क्यों होनी चाहिए । प्रमाणयुक्त होने से अनेक अदृष्टों की कल्पना की जा सकती है—'प्रमाणवन्त्यदृष्टानि कल्प्यानि सुबहून्यपि' केवल समान नाम मात्र देखकर प्रमाणभूत महत्त्व- पूर्ण ५९ वें सर्ग का ही अपलाप करना अत्यन्त असङ्गत है । यदि ऐसा ही है तब तो जिन पाँच काण्डों को आप सब प्रमाण मानते हैं जब उनमें भी अनेक प्रक्षेप हैं तो उन पाँच काण्डों को ही अप्रमाण क्यों न माना जाये ? इष्टापत्ति करने पर आपकी रामकथा भी समुद्र में फेंकने लायक रह जायगी ।