भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 614, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 614

अध्याय युद्धकाण्ड ५३७ ५६३वें अनु० में बुल्के कहते हैं "सर्ग ४२-११२ से इतनी पुनरावृत्ति और नीरसता पायी जाती है कि यह समस्त सामग्री वाल्मीकि जैसे महान् कवि की रचना हो ही नहीं सकती" पर उनका यह तर्क तर्काभास है, क्योंकि ऐतिहासिक तथ्यों का वर्णन भावुकता एवं रसिकता निरपेक्ष ही होता है । दर्शन एवं गणित का विषय नीरस होने पर भी व्यास आदि ने श्रीमद्भागवत आदि में उसका वर्णन किया ही है। पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा के अत्यन्त जटिल नीरस विषयों का भी वर्णन वेदान्तदेशिक आदि ने अपने काव्यों में किया ही है। आपके परस्पर विरोधी उदाहरण भी अकिञ्चित्कर हैं । आप कहते हैं "सर्ग ५० में गरुड़ के आगमन का वर्णन किया गया है। राम और लक्ष्मण मूच्छित होकर पड़े हुए हैं और गरुड़ के आने पर नागपाश के मुक्त हो जाते हैं। किन्तु सर्ग ४९ में शरपाशबद्ध राम के जागने का उल्लेख हो चुका है। अतः सर्ग ५० का अनावश्यक वृत्तान्त बाद का प्रक्षेप सिद्ध होता है।" परन्तु उक्त कथन बुल्के की अनभिज्ञता का ही सूचक है, क्योंकि ४९वें सर्ग में यह नहीं कहा गया है कि राम नागपाशमुक्त हो गये थे । ४४वें सर्ग के अनुसार भीमकर्मा वालिपुत्र से र्निजित होकर, इन्द्रजित् अन्तर्धान होकर ब्रह्मा से वर प्राप्त करने के कारण अदृश्य रहकर ही वज्रतुल्य निशित बाण छोड़ने लगा । वह नागमय बाणों के द्वारा राम और लक्ष्मण दोनों के सर्व गात्रों का भेदन करने लगा । कूटयोधी इन्द्रजित् ने क्रुद्ध होकर मायासवृत रहकर युद्ध में दोनों राघववीरों को मोहित करते हुए शरबन्ध से बाँध दिया । “रामं च लक्ष्मणं चैव घोरैर्नागमयैः शरैः ।” ( वा० रा० ६।४४।३४ ) भीषण नाग ही शररूप में परिणत हुए थे । उन्हीं के द्वारा उसने राम और लक्ष्मण को बाँध दिया— “बबन्ध शरबन्धेन भ्रातरो रामलक्ष्मणौ ।” ( वा० रा० ६।४४।३६ ) ४५ वें सर्ग में इन्द्रजित्कृत बन्धन का ही विस्तार है। राम ने उसकी स्थिति जानने के लिए नील, अङ्गद, शरभ, द्विविद, हनुमान्, ऋषभ आदि दस वीरों को आदेश दिया । वे उसे ढूँढ़ने आकाश में प्रविष्ट हुए । परन्तु उस अस्त्रवित् ने अपने परमास्त्र से उन्हें वारित कर दिया । वे भीमवेगवाले भीषण बाणों से विक्षत होकर मेघ से आवृत सूर्य के समान उसको नहीं देख सके । पुनश्च वह और वेग से राम एवं लक्ष्मण के गात्रों में सर्वदेहभेदी बाणों को छोड़ने लगा । बाणरूपता को प्राप्त हुए पन्नगों के द्वारा उसने दोनों के शरीरों को सब ओर से विद्ध कर दिया । “पन्नगैः शरतां गतैः” (वा० रा० ६।४५।८) बड़े ही भीषण वेग से गर्जन के साथ बाणों से भेदन करते हुए उसने सभी स्थानों में बाणों को ठूंंस दिया । रणभूमि में दोनों भाई शरबन्धन से बँध गये । शरवेष्टितसर्वाङ्ग तथा रुधिर से सराबोर होकर दोनों वीर शयन में शयान हो गये । उनके गात्र में एक अङ्गुल भी भीषण बाणों से अविद्ध तथा अक्षत प्रदेश नहीं रहा । ४६ वें सर्ग में इन्द्रजित् अपनी सेना को हर्षित करता हुआ सब को निर्भय करके लङ्का चला गया । विभीषण सब को धैर्य बँधाते रहे । ४७ वें सर्ग में रावण पुष्पक पर त्रिजटा के साथ सीता को बैठाकर रणाङ्गण में शयान राम और लक्ष्मण को देखने के लिए भेजता है । सीता उनकी स्थिति देखकर संतप्त होती है । सर्ग ४८ में संतप्त सीता को त्रिजटा आश्वासन देती है । ४९ वें में घोर शरबन्धों से बद्ध, रुधिर से लथपथ तथा रणभूमि में शयान राम और लक्ष्मण को घेरकर बैठे वानरश्रेष्ठों में शोक की लहर व्याप्त हो रही थी । इसी बीच नागबाणों से निबद्ध होते हुए भी स्थिर होने तथा विशिष्ट सत्त्व के योग से राम प्रतिबुद्ध हो गये और लक्ष्मण की दशा को देखकर विविध प्रकार से विलाप करने लगे । यहाँ ध्यान देने योग्य है कि राम को तात्कालिक प्रबोधमात्र हुआ था— ६८

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