भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

अष्टादश अध्याय युद्धकाण्ड वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में लङ्काभियान, राम द्वारा हनुमान् के कार्यों की प्रशंसा और उनको स्वात्म- परिष्वङ्ग प्रदान, समुद्र की बाधा के विचार से राम की निराशा तथा प्रोत्साहन देते हुए सुग्रीव का सेतुबन्ध का प्रस्ताव, हनुमान् द्वारा लङ्का का वर्णन, समुद्र तक पहुँचना, राम का विग्रहवर्णन, रावण के सभासदों द्वारा रावण को विजय का आश्वासन, विभीषण द्वारा चेतावनी, कुम्भकर्ण का जगना, रावण को दोष देना, अन्त में युद्ध में सहायता करने की प्रतिज्ञा करना, पुञ्जिकस्थली के कारण पितामह के शाप का रावण द्वारा वर्णन करना (सर्ग १३), विभीषण की शरणागति, सुग्रीवादि का विभीषण को ग्रहण करने में मतभेद, हनुमान् की सहमति, शरणागतरक्षण व्रत के कारण विभीषण का ग्रहण, अङ्गुल्यग्रमात्र से पृथिवी भर के सभी दैत्यों, दानवों, राक्षसों और पिशाचों का वध करने की सामर्थ्य बतलाकर राम का सबको आश्वस्त करना। विभीषण का राम द्वारा अभिषेक, प्रायोपवेशन द्वारा समुद्र को अनुकूल बनाने की विभीषण की मन्त्रणा, शार्दूल द्वारा रावण को रामसेना की सूचना देना, सेतुबन्ध, शुक, सारण, शार्दूल तथा विद्युज्जिह्व द्वारा राम का मायामय शीर्ष प्रदर्शन। वानर भटों द्वारा लङ्कावरोध, शरपाशबन्धन, राम और रावण का द्वन्द्वयुद्ध, कुम्भकर्ण का वध, द्वन्द्वयुद्ध, पुनः लंका-दहन, इन्द्रजित्-वध, विभिन्न युद्धों में रावण-वध, अग्निपरीक्षा, प्रत्यावर्तन, अयोध्याप्रवेश ये सभी अंश रामायण के हैं। तीनों पाठों में अनेक पाठ-भेद हैं और सब प्रामाणिक हैं। वेदों में तथा सप्तशती में भी ऐसे पाठभेद मिलते हैं। पाठभेदों का अनुचित लाभ उठाकर बुल्के आदि पाश्चात्य प्रक्षेप सिद्ध करते हैं। साथ ही जो तीनों पाठों में भी उनके स्वाभिमत-विरुद्ध होता है उसको भी वे प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं। ५६१ वें अनु० में बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि “तीनों पाठों की उपर्युक्त विभिन्नता से स्पष्ट है कि गायकों ने युद्धकाण्ड का कलेवर बढ़ाने में संकोच नहीं किया", क्योंकि यदि गायकों को मूलपाठ में बढ़ाने का अधिकार होता तो आज भी पाठभेद बढ़ाया जा सकता है। आधुनिक साहित्यिकों एवं व्यासों में श्लोकनिर्माण की क्षमता कम नहीं है। अतएव सर्ग १-३, ६-८, १०-१५ तथा २० को प्रक्षेप मानना निराधार है। याकोबी के अनुसार सर्ग २३-४० को प्रक्षिप्त कहना भी तर्काभास के आधार पर है। क्योंकि बहुत-सी वास्तविक घटनाओं को भी हटा देने पर किसी अंश का अभाव परिलक्षित नहीं होगा। विधि का विधान या घटनाएँ किसी की सङ्गति की अपेक्षा नहीं रखतीं हैं। अपितु घटनाओं के अनुसार कथाएँ होती हैं। उनका यह भी कहना सङ्गत नहीं है कि “इस अंश में बालकाण्ड में वर्णित वानरों की उत्पत्ति का निर्देश मिलता है (२८।५ और ३०।२७); प्रामाणिक सर्गों में बालकाण्ड की सामग्री का उल्लेख नहीं होता", इससे तो यही सिद्ध होता है कि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड दोनों ही काण्डों को अर्वाचीन कहने की धृष्टता सर्वथा अनुचित है। तभी तो युद्धकाण्ड के उक्त वर्णनों से बालकाण्ड का सम्बन्ध जुड़ता है। इसके अतिरिक्त बुल्के, याकोबी आदि के यहाँ कोई भी काण्ड प्रामाणिक है ही नहीं। क्योंकि वे सर्वत्र प्रक्षेप कहने को प्रस्तुत रहते हैं। केवल जो अंश पाश्चात्यों के विचार से फिट बैठता हो वही उनका प्रामाणिक अंश है। प्रामाणिकता की कसौटी संभवतः उनके पास है ही नहीं। सर्ग २८ और ३० दोनों ही स्थलों में विशिष्ट वानर वीरों की उत्पत्ति और विशिष्ट देवताओं का वानर आदि योनियों में अवतार-ग्रहण प्रमाणित होता है।