रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुल्के तो अप्टूडेट वकालती वर्णन चाहते हैं। वस्तुस्थिति या तो समझते ही नहीं या भूल जाते हैं। स्वाभाविक वर्णन को भी प्रक्षेप कहने का निराधार साहस करते हैं। ६६ वें सर्ग में हनुमान् की बात सुनकर मणि को हृदय से लगाकर राम रोने लगे और अश्रुपूर्ण नयनों से मणि को देखते हुए सुग्रीव से कहते हैं जैसे वत्स को देखकर वत्सला धेनु स्नेहस्रुत होती है वैसे ही इस मणिश्रेष्ठ को देखकर मेरा हृदय स्रुत होता है। यज्ञ से सन्तुष्ट होकर देवराज ने जनक को यह मणि प्रदान की थी। जनक ने विवाहकाल में सीता की माता के हाथ से लेकर मेरे पिता दशरथ के हाथ में दी थी। उन्होंने वैदेही के मूर्धा को उससे अलङ्कृत किया था। आज उस मणि के दर्शन से मैं वैदेही के मिलने के सुख का अनुभव कर रहा हूँ। राम पुनः हनुमान् से पूछने लगे, वैदेही ने और क्या कहा है। सौमित्रे, वैदेही के बिना आयी हुई मणि को मैं देख रहा हूँ। इससे अधिक क्या दुःख होगा। वैदेही मास भर जीवित रहेगी यह तो बहुत है मैं तो क्षणभर भी उनके बिना जीवित नहीं रह सकता। इस प्रकार ६६ वें सर्ग में राम ने विलाप किया। हनुमान् ने पुनः ६७ वें सर्ग में सविस्तर सीता का सन्देश सुनाया। राम सेना सहित आकर लङ्का को विध्वस्त करके मुझे ले जायें, यही उनके स्वरूप के अनुरूप है। परन्तु समुद्र पारकर यहाँ सेना सहित राघव का आना कैसे हो सकेगा। इसपर मैंने कहा देवि, वानरों और भालुओं के राजा सुग्रीव के पास बहुत बड़े बलशाली तथा विक्रम-संपन्न योद्धा हैं। उनकी गति ऊपर, नीचे तथा तिर्यक् कहीं भी रुद्ध नहीं होती। मैं तो उनमें से एक बहुत छोटा हूँ। एक छलाँग में हरिवीर यहाँ आ जायेंगे। राम और लक्ष्मण दोनों सूर्य और चन्द्र के तुल्य मेरे पृष्ठ पर आरूढ़ होकर आ जायेंगे। देवि, तुम नख-दंष्ट्रा आयुधवाले वीरों का गर्जन शीघ्र ही सुनोगी और शीघ्र ही वनवास की अवधि पूरी कर अयोध्या में अभिषिक्त राम को देखोगी। इस तरह कल्याणमयी अभीष्ट उदारवाणी द्वारा प्रसादित होकर अदीनभाषिणी एवं आपके विरह से अतिपीड़ित सीता ने शान्ति प्राप्त की (सर्ग ६८)। कानूनी लिखा-पढ़ी की बात पृथक् है। व्यावहारिक स्वाभाविक बात यही है कि बहुत काल के अनन्तर प्रियजन के सम्बन्ध में समाचार मिलने पर उससे बार-बार पूछा जाता ही है। सविस्तर जानकारी की इच्छा होती ही है। उन्हीं स्वाभाविक व्यावहारिक चरित्रों का चित्रण वाल्मीकि ने किया है। यह भूमिका भी न भूलनी चाहिए कि सीता वाल्मीकि के आश्रम में थीं। सीता के चरित्रों के सम्बन्ध में कुछ विपरीत चर्चाओं के कारण उन्हें बनवास दिया गया था। उसके लिए अनेक अन्य उपायों के बदले आप्तकाम, पूर्णकाम, अभ्रक्ष, वायुभक्ष, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी, वीतराग महर्षि के द्वारा सीता के पवित्र चरित्रों का सत्य वर्णन किया जाय। इसी दृष्टि से पुनः पुनः विभिन्न प्रसङ्गों द्वारा सीता के चरित्रों का वर्णन करना आवश्यक था। जाम्बवान् तथा राम की भी जिज्ञासा के प्रसङ्ग से महर्षि ने सीता की जीवनचर्या, वार्तालाप, सीता-रावण-संवाद तथा सीता की दृढ़ तपस्या और उनके तनिक तनिक व्यवहारों और वार्तालापों का वर्णन किया है। इसी दृष्टि से विभिन्न घटनाओं का भी यथावत् वर्णन किया गया है, जिससे उस समय के उन लोगों को जिन्होंने उन घटनाओं को आँखों से देखा था, आँखों देखी घटनाओं का यथावत् वर्णन सुनकर उस इतिहास या काव्य में विश्वास होना स्वाभाविक था। उसी सम्बन्ध से उन लोगों ने सीतासम्बन्धी घटनाओं की भी सच्चाई जानना चाहा होगा और महर्षि वाल्मीकि द्वारा ठीक वर्णन सुनकर उन्हें अवश्य ही समाधान प्राप्त हुआ होगा।