रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगर्जन करते हुए उछल-कूद करने एवं पूँछ पटकने लगे और सब एकस्वर से हनुमान् की प्रशंसा करने लगे। ५८ वें सर्ग में जाम्बवान् ने सारा वृत्तान्त विस्तार सहित कहने का अनुरोध किया। क्रूरकर्मा रावण का सीता से कैसा व्यवहार है ? तुमने सीता को कैसे ढूँढ़ा ? उन्होंने क्या कहा ? सब सुनकर हम लोग विचार करेंगे कि राम के पास जाकर क्या कहना है एवं क्या नहीं कहना है-- यश्चार्थस्तत्र वक्तव्यो गतैरस्माभिरात्मवान् । रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥” यह सुनकर हनुमान् ने रोमाञ्चयुक्त होकर हर्ष से उन सीतादेवी को नमस्कार कर अपनी यात्रा का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया । इसी में मैनाक, सुरसा, सिंहिका तथा लङ्किनी का वृत्तान्त भी कहा। सीतान्वेषण, सीतादर्शन, सीता-रावण-संवाद, सीता की दृढ़ता, त्रिजटा का स्वप्न एवं उसके द्वारा सीता का आश्वासन, सीता से संभाषण, मुद्रिकासमर्पण, सीता का आश्वासन, अभिज्ञानग्रहण, अशोकवन का उत्सादन, राक्षसों से युद्ध, मेघनाद से युद्ध, ब्रह्मास्त्र से बन्धन, रावण-भाषण, लङ्का-दहन, पुनः सीतादर्शन और लौटने का वर्णन किया। पुनः सीतामाहात्म्य और उनकी स्थिति का वर्णन ५९ वें सर्ग में किया है। ६० वें सर्ग में अङ्गद ने कहा कि हम सब लङ्का को नष्ट करके, रावण को मारकर एवं सीता को लेकर राम के सामने रख दें; यही ठीक है। परन्तु जाम्बवान् की बात मानकर सब लोगों ने राम, लक्ष्मण और सुग्रीव के पास जाना ही उचित समझा। जाम्बवान्, अङ्गद, हनुमान् आदि के साथ सभी बलवान् वानर आनन्द एवं आह्लाद के उद्रेक में मधुवन में जाकर रक्षकों एवं दधिमुख आदि को निगृहीत कर मधु-पान, फल-भक्षण आदि करके आमोद-प्रमोद करने लगे । परिस्थिति के अनुसार मधुवन में प्रवेश कर मधु तथा फल आदि का खान-पान करना असङ्गत नहीं है । महान् कार्य सम्पादित करने के अनन्तर खुशियों में ऐसे कार्य होते ही हैं। रक्षकों के पुकार करने पर सब समाचार जानकर सुग्रीव ने सारी स्थिति का अनुमान कर लिया एवं रक्षकों के द्वारा ही सबको बुलाया। ६४ वें सर्ग में अङ्गद और हनुमान् को पुरस्कृत कर (नेता बनाकर ) सब लोग राम के पास आये । सुग्रीव ने कमलोचन रामको बतलाया कि अङ्गद की प्रसन्नता से स्पष्ट होता है कि कार्य करके वे लोग आये हैं, बिना कार्य किये मधुवनध्वंस करने का साहस नहीं हो सकता था और वह कार्य हनुमान् से ही हो सकता है। उनमें सिद्धि, मति, अध्यवसाय एवं शौर्य सब प्रतिष्ठित हैं। जहाँ जाम्बवान् नेता हो, हनुमान् और अङ्गद अधिष्ठाता हों वहाँ कार्यसिद्धि में अन्यथा मति नहीं हो सकती । ६५ वें सर्ग में राम के सन्निधान में आकर हनुमान् ने सीता का वृत्तान्त बतलाया। सीता कहाँ हैं ? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है ? राम के इस कथन को सुनकर हनुमान् ने जिधर सीता थीं उस दिशा की ओर सीता को प्रणाम करके सीता का दर्शन बताया और देदीप्यमान काञ्चनमय दिव्यमणि राम को प्रदान की और हाथ जोड़कर राम से कहा कि सौ योजन समुद्र का लङ्घन कर मैं सीता-दर्शन की इच्छा से लङ्का गया। वहाँ दुरात्मा रावण के यहाँ मैंने सीता को देखा । वह आप में ही जीवन अर्पित करके राक्षसीगण द्वारा बार बार तर्जित होकर रह रही हैं। वे एकवेणीधारिणी, चिन्तापरायण, भूमिशयन से विशीर्णाङ्गी होकर हिमागम से पद्मिनी के समान मुरझायी हुई, मरने का निश्चय किये हुए, रावण से सर्वथा विमुख तथा आप में मन लगा कर स्थित हैं। मैंने शनैः शनैः इक्ष्वाकुवंश का कीर्तन करते हुए उन्हें आश्वासन दिया और उनसे भाषण किया । उन्हें यहाँ की स्थिति बतलायी । राम और सुग्रीव के सख्य का समाचार सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुईं । उनका उदात्त समाचार नियत है। आपमें उनकी सदा स्थिर भक्ति है। उग्र तपस्या और आपकी भक्ति से युक्त जनकनन्दिनी को मैंने देखा। यह काञ्चन मणिरूप अभिज्ञान देकर उन्होंने काकवृत्तान्त भी कहा। मनःशिला के तिलक का भी स्मरण दिलाया और कहा है कि मैं मास भर से अधिक जीवन नहीं रख सकूँगी । हनुमान् ने कहा, अतः शीघ्र ही सागर पारकर प्रस्थान करना चाहिये ।