रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 610, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंहनुमान् को भूख लगी थी। उन्होंने सीता की अनुमति लेकर अशोकवन के फल खाये और प्रणाम करके चले गये, कुछ दूर चले जाने पर उन्होंने सोचा कि रावण से मिलकर जाना अच्छा है। इसलिए वे अशोकवन उजाड़ने लगे। आनन्द- रामायण के अनुसार उन्होंने सीता की आज्ञा लेकर पूँछ से वृक्षों को हिलाकर फल गिरा दिये और खाये। वृक्ष भी गिरा दिये। रामचरितमानस के अनुसार— 'रहा न नगर वसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन कपि खेला॥' ( रा० मा० ५।२४।३ ) आनन्दरामायण आदि कई ग्रन्थों के अनुसार हनुमान् की पूंछ में आग लगाने के सब प्रयास व्यर्थ होने पर हनुमान् ने कहा—यदि रावण स्वयं फूंक मारे तो अग्नि प्रदीप्त हो सकेगी। रावण ने वैसा किया तो उसके दसों सिरों और मूंछ दाढ़ी में अग्नि लग गयी। मुंह पर थप्पड़ मार कर वह बुझाने लगा जिससे सब राक्षस खिलखिला कर हँसने लगे। आनन्दरामायण ( १।९।२०९-२११) के अनुसार दस करोड़ राक्षसों को लेकर रावण लड़ने निकला। हनुमान् ने लोहस्तम्भ से सबको मारा। पूंछ में करोड़ों राक्षसों को लपेट कर उन्हें रावण के सिर पर दे मारा जिससे वह मू्र्च्छित हो गया। उसी समय देवकन्याओं एवं देवताओं की मुक्ति की चर्चा भी है। वस्तुतः रामायण की अवि- भाज्य अङ्गभूत लङ्का-दहन की घटना महत्वपूर्ण वस्तु है। उस समय अनेक घटनाएँ घटी होंगी। शतकोटिप्रविस्तर रामायण में उनका विस्तार होगा ही। उपलब्ध वाल्मीकिरामायण में तो उसका संक्षेप ही हो सकता है। अनेक लोगों ने उसको विकृत करके अन्यथा भी वर्णन किया ही है। ५५३ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "लङ्का-दहन के पश्चात् केवल दो ही सर्ग प्रामाणिक हैं। उनके अनुसार लङ्का की घटनाओं के सम्बन्ध में हनुमान् ने यही कहा कि मैंने सीता को देखा, परन्तु यह कितनी अस्वाभाविक बात है यह बताने की आवश्यकता नहीं। सर्ग ६५ में में हनुमान् चूड़ामणि देकर राम से अपनी लङ्का-यात्रा का यों वर्णन करते हैं—समुद्र-लङ्घन करके मैंने रावण के यहाँ सीता को देखा। वह राक्षसियों से घिरकर आप ही का चिन्तन करती हैं। वह आपका समाचार पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं तथा अभिज्ञान स्वरूप उन्होंने चूड़ामणि के अतिरिक्त काक- वृत्तान्त तथा मैनशिल के तिलक के विषय में आपको स्मरण दिलाने को कहा है तथा यह भी निवेदन किया है कि मैं केवल एक महीने तक ही जीवित रह सकूँगी। अन्त में हनुमान् ने राम से यह प्रस्ताव किया कि 'समुद्र पार करने की तैयारियाँ प्रारम्भ हो जायँ।" वस्तुतः बुल्के आदि लेखक के अभिप्राय से नहीं, किन्तु अपने दृष्टिकोण से उसके लेख की छान-बीन और काट-छाँट करते हैं, पर यह सङ्गत नहीं है। समालोचकों की दृष्टि भी एक-सी नहीं होती है। एक साहित्यिक और दार्शनिक तथा न्यायवादी की दृष्टि समान नहीं हो सकती। संक्षेप और विस्तार की भी पृथक्-पृथक् दृष्टियाँ होती हैं। एक न्यायवादी एडवोकेट विषय के अनुसार अन्यूनानतिरिक्त शब्दों का प्रयोग करना चाहेगा। वैयाकरण एक मात्रा के लाघव से पुत्रोत्सव मनायेगा। परन्तु साहित्यिक और दार्शनिक अपनी बातों को रोचकता के साथ हृदयङ्गम कराने के लिए शब्ददारिद्र्य और ग्रन्थदारिद्र्य का आदर कदापि नहीं करेगा। महर्षि वाल्मीकि महान् दार्शनिक एवं साहित्यिक हैं। हमें उनकी कृतियों का विश्लेषण, अर्थलाघव तथा गुण-दोष-विचार का अधिकार हो सकता है, परन्तु अपनी दृष्टि के अनुसार यह कहने का अधिकार नहीं है कि अमुक सर्ग अनावश्यक है, अतएव वह प्रक्षेप है। पुनरावृत्ति अनेक स्थलों में दूषण नहीं होती और आंशिक पुनरावृत्ति तो उत्तम लेखकों में भी होती है। वेदों एवं उपनिषदों में भी वह दृष्ट है। हनुमान् ने ५७ वें सर्ग में पहले सीता को देखा इतना ही कहा, इसपर वानरों में खुशी की लहर दौड़ गयी। कोई किलकिला शब्द तो कोई