भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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“भर्तृभक्तिं पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर । नाहं स्प्रष्टुं स्वतो गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम ॥” ( वा० रा० ५।३७।६२ ) हनुमान् ने यह तर्क मान लिया ( सर्ग ३९) । सीता ने पुनः कहा—राम ही रावण को परास्त कर मुझे ले जायें— “रावणमुत्पाट्य राघवो मां नयतु ॥” ( वा० रा० ५।५८।१०१ ) लुक छिपकर मुझे ले जाना राम को शोभा नहीं देगा । उनकी कीर्ति के लिए आवश्यक है कि रावण पर विजय प्राप्त कर लें— “बलैः समग्रैर्युधि मां रावणं जित्य संयुगे । विजयी स्वपुरीं यायात् तत्तस्य सदृशं भवेत् ॥” ( वा० रा० ५।३९।२९ ) “बलैः समग्रैर्यदि मां हृत्वा रावणमाहवे । विजयी स्वपुरं रामो नयेत्तत्स्याद्यशस्करम् ॥” ( वा० रा० ५।६८।१२ ) “यथाहं तस्य वीरस्य वनादुपधिना हृता । रक्षसा तद्भयादेव तथा नार्हति राघवः ॥” ( वा० रा० ५।६८।१३ ) बुल्के इस सर्ग को भी प्रक्षेप कहते हैं । परन्तु यह भी उनकी धारणा गलत है। यह सर्ग टीकाकारसम्मत तथा परम्पराप्राप्त है । अभिज्ञान बुल्के कहते हैं, वाल्मीकिरामायण के प्रामाणिक सर्गों में चूड़ामणि तथा काकवृत्तान्त दो अभिज्ञानों की चर्चा है । महाभारत के रामोपाख्यान में भी दो का ही वर्णन है ( ३।२६६।६६, ६७) । वाल्मीकिरामायण के अनुसार हनुमान् मैनशिल के तिलक का स्मरण दिलाकर राम को एक तीसरा अभिज्ञान देते हैं— “मनःशिलायास्तिलको गण्डपार्श्वे निवेशितः ।” ( वा० रा० ५।४०।५ ) लङ्का-दहन लङ्का-दहन अंश को भी बुल्के प्रक्षेप मानते हैं, पर उनका यह मन्तव्य असङ्गत है । यह बात पहले कही जा चुकी है। रावण के बल का परिज्ञान एक सफल दूत के लिए परम आवश्यक था। इसी उद्देश्य से हनुमान् ने अशोकवन नष्ट किया और रावण के भेजे योद्धाओं जम्बूमाली, सात मन्त्रि-पुत्रों, पाँच सेनापतियों तथा रावण-पुत्र अक्षय का वध किया । इन्द्रजित् द्वारा ब्रह्मास्त्र से बद्ध होकर हनुमान् ने रावण के पास पहुँच कर अपने को सुग्रीव द्वारा भेजा हुआ राम-दूत बतलाया और सीता को लौटाने का अनुरोध किया । रावण क्रुद्ध होकर उन्हें वध का दण्ड देना चाहता था, पर विभीषण की आपत्ति पर ध्यान देकर घृत और तेल युक्त वस्त्रों से वेष्टित पूँछ में आग लगा देने का निर्णय हुआ । सीता को समाचार मिलने पर उन्होंने अग्निदेव से प्रार्थना की कि वह हनुमान् के लिए ठण्डे हो जायें—“शीतो भव हनूमते” ( वा० रा० ५।५३।२७ ) । फलस्वरूप हनुमान् ने शीतलता का अनुभव किया । उन्होंने इसे सीता की दयालुता, राम का प्रभाव तथा अग्नि से अपने पिता की मित्रता का परिणाम माना । हनुमान् ने अपना शरीर बढ़ा कर पुनः लघु करके उस बन्धन से अपने को मुक्त कर लिया और फिर आकार बढ़ा कर विभी- षण का गृह छोड़ कर शेष लङ्का को भस्म कर डाला । अन्त में जलती हुई पूँछ समुद्र में बुझा ली । तब उन्हें सीता की कुशल के सम्बन्ध में चिन्ता हुई । किन्तु शकुनों तथा चारणों के गीतों से उन्हें आश्वासन मिला ( वा० रा० ५।५५।२९-३४ ) । अध्यात्मरामायण के अनुसार