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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

संध्यार्थ सुन्दरकाण्ड ५३१ रामायणककविन के अनुसार ३०० राक्षसियां तो सीता को डराने धमकाने के लिए नियुक्त की गयी थीं। उनमें एक त्रिजटा भी थी, जो सीता का पक्ष लेती थी। उसकी सहानुभूति पाकर सीता ने अपनी कथा उसे सुनायी थी। दोनों मन्दिर में प्रार्थना करने गयी थीं। राम और लक्ष्मण के मायामय शीर्ष देखकर सीता अग्नि में प्रवेश करने के लिए प्रस्तुत हुई थी, किन्तु त्रिजटा ने उनका साथ दिया। उसने विभीषण से समाचार लेकर राम और लक्ष्मण के जीवित रहने का समाचार देकर सीता को अग्नि-प्रवेश से विरत किया। ऐसे ही शरबन्ध से बँधे हुए राम और लक्ष्मण को देखकर भी सीता विकल हुई थी। उस समय भी त्रिजटा ने विभीषण से मिलकर सीता को आश्वासन दिया था। अग्निपरीक्षा के समय भी त्रिजटा ने सीता के सतीत्व का साक्ष्य दिया था। वह बाद में सीता के साथ अयोध्या चली आयी थी (सर्ग २४)। वाल्मीकिरामायण से अनुप्राणित कथाओं में त्रिजटा का महत्त्व-वर्णन होना स्वाभाविक ही है। ५४८वें अनु० में बुल्के का यह कहना असङ्गत ही है कि “रामायण के प्रक्षिप्त सर्ग २८, २९ के अनुसार सीता हनुमान् के आगमन के ठीक पहले देहत्याग के लिए फाँसी लगाने का विचार कर रही थी। इतने में शुभ शकुन प्रकट हुए”, क्योंकि उक्त दोनों सर्ग प्रक्षेप नहीं हैं। उनकी सङ्गति है, अतएव उनपर टीकाएँ हैं। इसी लिए अध्यात्म- रामायण, आनन्दरामायण आदि में भी उक्त वर्णन है। रामकियेन के अनुसार सीता फाँसी लगा चुकी थी। हनुमान् ने फाँसी की गाँठ खोल दी । सीता-हनुमान्-संवाद वाल्मीकिरामायण के अनुसार यह ठीक ही है कि हनुमान् अशोकवाटिका में सीता को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और सोचने लगे कि यदि मैं सीता से बिना भाषण किये एवं उन्हें आश्वस्त बिना किये जाता हूँ तो सीता ने क्या कहा है ? राम के यह पूछने पर क्या उत्तर दूंगा ? इसके अतिरिक्त आश्वासन दिये बिना जाने से सीता राम के आगमन से पहले ही प्राणत्याग कर सकती हैं। फिर सेनासहित राम का लङ्का आगमन ही व्यर्थ हो जायेगा, अतः मैं सूक्ष्म वानरतनु से सीता से मानुषी संस्कृता वाणी से भाषण करूँगा। यदि मैं द्विजाति के समान संस्कृत देववाणी बोलूंगा तो मुझे रावण समझकर सीता भयभीत हो सकती हैं। अतः अवश्य ही मुझे मानुष-वाक्य ही बोलना चाहिये— “वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् । यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।। रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति । अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत् ।।

  • मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता ।।” (वा० रा० ५।३०।१७–१९) हनुमान् ने सीता के सुनने योग्य स्वर में रामचरित का संक्षिप्त वर्णन किया। उसे सुनकर सीता को विस्मय हुआ। उन्होंने आँखें उठाकर शिंशपा वृक्ष पर हनुमान् को देखा। हनुमान् ने अपने को रामदूत कहकर राम के कुशल-क्षेम का समाचार सुनाया। सीता को हर्ष हुआ। पश्चात् कामरूपी रावण समझकर सीता सन्देह में पड़ गयीं। हनुमान् ने सीता को राम की मुद्रिका अर्पित की तथा आश्वासन दिया कि राम शीघ्र आनेवाले हैं। सीता विश्वस्त होकर यह सन्देश देने लगी कि राम मुझे जीवित पाना चाहें तो दो महीनों के अन्दर आ जायें । हनुमान् सीता को अपनी पीठ पर ले जाने का प्रस्ताव करते हैं। सीता पहले तो हनुमान् की सामर्थ्य पर सन्देह करती हैं। जब हनुमान् ने अपनी शक्ति को प्रमाणित किया तो पीछे अनेक अन्य न जाने के हेतु देकर अन्त में कहती हैं, मैं राम को छोड़कर स्वतः दूसरे का शरीरस्पर्श नहीं करना चाहती—