रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३० रामायणमीमांसा समदश वे वानर-सेना लेकर तुम्हें छुड़ाने आ रहे हैं। रावण से मत डरना, क्योंकि नलकूबर के शाप के कारण वह तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता है (म० भा० ३।२६४।५८)। बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता ने कला नामक विभीषण की पुत्री की चर्चा की है। त्रिजटा के स्वप्न के प्रसङ्ग के अतिरिक्त महाभारत के अन्य स्थल पर त्रिजटा का उल्लेख है। रावणवध के बाद लङ्का से चलने के समय राम ने त्रिजटा को अर्थ और सम्मान प्रदान किया था— “त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजयामास राक्षसीम् ।” (म० भा० ३।२७५।३९)” परन्तु वस्तुतः इससे भी रामायणोक्त वृत्तान्त का बाध नहीं होता है। विभीषण-पत्नी होने के नाते और सीता की अधिक प्रिय होने के कारण त्रिजटा का अधिक सम्मान असङ्गत नहीं है। रघुवंश (१२।७४), सेतुबन्ध (सर्ग ११) आदि में मायाशीर्ष के प्रसङ्ग में त्रिजटा ही सरमा का स्थान लेती है। प्रसन्नराघव में सीता के अनुरोध से त्रिजटा आकाश में स्थित होकर मेघनाद द्वारा हनुमान् के बन्धन और लङ्का-दहन का वर्णन करती है। उदीच्य पाठ में इस प्रसङ्ग में सरमा की चर्चा है। बुल्के इसमें इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि “वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभिन्न राक्षसियों ने जो कुछ भी उपकार किया था, वह सब बाद में त्रिजटा का उपकार माना गया है। राम-कथा के कवियों ने इतने से ही सन्तुष्ट न होकर कथानक में त्रिजटा का महत्त्वपूर्ण स्थान बना दिया है।” परन्तु बुल्के को यह जानना चाहिये कि वस्तुस्थितिहीन कल्पना का कोई महत्त्व नहीं होता। वाल्मीकिरामायण में ही त्रिजटा का महत्व वर्णित है। त्रिजटा के स्वप्न को ही ले लिया जाय तो केवल एक वही त्रिजटा का महत्त्व ख्यापन के लिए पर्याप्त है। अतएव महाभारत रामोपाख्यान में भी त्रिजटा को महत्त्व दिया गया है। सरमा और कला का भी राम-भक्तों के हृदय में आदर है। परन्तु संक्षेप की दृष्टि से सब का वर्णन सम्भव नहीं होता। वाल्मीकिरामायण तो सबका आकर ग्रन्थ है ही। उसमें सरमा तथा कला का भी महत्त्व- वर्णन है ही। यह ठीक है कि त्रिजटा ने गुप्तचर बनकर सीता को रावण की सभा के समाचार भी दिये थे। बाल- रामायण (अंक ८) के अनुसार सुमुख तथा दुर्मुख द्वारा नरान्तक-वध, कुम्भकर्ण-जागरण तथा इन्द्रजित् के निकुम्भिला-प्रवेश आदि के समाचार भी सीता को त्रिजटा ने दिये थे। इन्द्रजित्-वध के बाद लक्ष्मण का शङ्खनाद सुन- कर सीता ने त्रिजटा को भेज दिया था और उससे युद्ध का सब समाचार सुनकर प्रसन्न हुई थी। रामचरितमानस के अनुसार वह रामचरणरत एवं विवेकनिपुण थी, इत्यादि बातें वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध होने तथा परम्पराप्राप्त होने से प्रामाणिक ही हैं। यहीं बुल्के ने जैनी राम-साहित्य की रचनाओं की चर्चा करते हुए बतलाया है कि “यद्यपि पउमचरियं और उत्तरपुराण में त्रिजटा का उल्लेख नहीं है। तथापि स्वयम्भूदेवकृत पउमचरियं (४९।१०) में त्रिजटा को सीता की हितैषिणी नहीं माना गया है। जब हनुमान् द्वारा गिरायी गयी राम-मुद्रिका को देखकर सीता आह्लादित हो उठी तो त्रिजटा रावण के पास जाकर कहती है कि आज आपका जीवन सफल है। आपकी प्रतिज्ञा पूरी होगी, क्योंकि भट्टारिका सीता हँस रही है। हेमचन्द्र के ग्रन्थों में भी ऐसी ही बातें हैं। उनके अनुसार सीता को उपवन में रखने के बाद सीता प्रलोभन देने के लिए त्रिजटा को ही रखा गया है (योगशास्त्र १ ११७) ।” प्रायः वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध और विलक्षण रचना के लिए जैन विद्वान् प्रस्तुत ही रहते हैं, अतः वैसा होना आश्चर्य की बात नहीं है, किन्तु यह सब जैनों का पाखण्ड। १. यह योगशास्त्र जैनों का है। पातञ्जल योगदर्शन नहीं है।