रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय सुन्दरकाण्ड ५२९ कि राम समुद्र पार कर लङ्का के निकट आ गये हैं। उसने यह भी समाचार दिया कि रावण ने अपनी माता और सभासदों का अनुरोध ठुकरा कर सीता को लौटाना अस्वीकार कर दिया है। सरमा सीता की प्रणयिनी सखी है। उसके साथ सीता की मैत्री थी ( वा० रा० ६।३३।३ ) । उदीच्य पाठ तथा गौड़ीय पाठ ५।५२ एवं पश्चिमोत्तरीय पाठ ५।५१ में "सरमावाक्य" नामक सर्ग पाया जाता है, जिससे सरमा सीता के लिए लङ्का-दहन का वर्णन करती है। उपर्युक्त वृत्तान्तों में सरमा तथा विभीषण का कोई सम्बन्ध नहीं प्रतीत होता है। सीता-हनुमान्-संवाद के अन्तर्गत सीता हितकारिणी के रूप में विभीषण की पत्नी का उल्लेख है। बाद में सीता की प्रिय सखी सरमा के उन उपकारों का वर्णन मिलता है। बुल्के कहते हैं उत्तरकाण्ड के व्यासों ने सरमा को विभीषण की पत्नी घोषित कर दोनों को अभिन्न माना है। उत्तरकाण्ड के अनुसार धर्मज्ञा सरमा गन्धर्वराज शैलूष की पुत्री है। उसके नाम की व्युत्पत्ति के विषय में कहा गया है कि सरोवर की बाढ़ आते देख कर शिशु रोने लगा तो माँ ने कहा था "सरो मा वर्धत" इसी लिए शिशु का नाम सरमा हो गया ( वा० रा० ७।१२।२४-२६ ) ।" वस्तुतः बुल्के भारतीय विचारपद्धति से अपरिचित हैं; इसी लिए वे जैसी तैसी शङ्काएँ उठाते हैं और उन्हीं के आधार पर कुछ का कुछ निर्णय कर बैठते हैं। पहले उनकी यह कल्पना ही असंगत है कि उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण के अंश नहीं हैं। वस्तुतः पूर्वकथनानुसार सातों काण्ड रामायण वाल्मीकिकृत है। जब वाल्मीकिरामायण में ही एक स्थल में विभीषण के पत्नीमात्र का उल्लेख है और अन्य स्थल में उसके नाम का भी उल्लेख है। ऐसी स्थिति में दोनों का समन्वय हो कर लेना उचित है। संदिग्ध वाक्यों के अर्थ का वाक्यशेष से निर्णय किया ही जाता है। जैसे—'यवैर्यजेत्' वाक्य में 'यवों' से यजन करने का उल्लेख है, परन्तु 'यव' शब्द से कई स्थलों में प्रियङ्गु का ग्रहण होता है। परन्तु— "वसन्ते सर्वसस्यानां जायते पत्रशातनम् । मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः ॥" इस वाक्य के अनुसार वसन्त में होनेवाला कणिशशाली औषधि यव है। प्रियङ्गु तो वसन्त में रहती ही नहीं। यह निर्णय होता है। वाल्मीकिरामायण में न सही अन्य पुराणों में भी अगर विभीषण-पत्नी का नाम सरमा निश्चित हो तो भी उसके अनुसार वाल्मीकिरामायण में विभीषण-पत्नी का वही नाम निश्चित किया जा सकता है, क्योंकि सामान्य का विशेष के साथ समन्वय होता है। विभीषण-पत्नी का कोई नाम होगा ही। उपलब्ध विशिष्ट नाम से सामान्य की विशेष आकांक्षा पूर्ण हो जाती है। अतः विभीषण की पत्नी का 'सरमा' नामनिर्धारण उचित ही है और यह व्यासों का निर्णय न होकर उत्तरकाण्ड वाल्मीकिरामायण का ही निर्णय है। उसे वाल्मीकिरामायण न मानना दुराग्रह ही है। ५४७ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "रामायण और महाभारत में कहीं भी विभीषण और त्रिजटा के सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। किन्तु परवर्ती साहित्यों में सीता के प्रति कला तथा सरमा के उपकारों का श्रेय त्रिजटा को दिया गया है। फलस्वरूप त्रिजटा को विभीषण की पत्नी या पुत्री माना गया है। उदाहरणार्थ—गोविन्दराजटीका (५।२७।४), कम्बरामायण ( ५।६ ) तथा आनन्दरामायण में त्रिजटा को विभीषण की पत्नी माना है— "त्रिजटानाम्नी विभीषणप्रियानुगा" ( आ० रा० १।९।११ ) । रामकियेन के अनुसार रावण ने विभीषण को निर्वासित कर उसकी पत्नी त्रिजटा को सीता की सेवा में नियुक्त किया था।" किन्तु इस सम्बन्ध में यह भी ध्यान देना उचित है कि आपातमात्र विरोध विरोधाभास ही कहा जाता है। उस विरोधाभास का परिहार करना उचित है। अतएव गोविन्दराज त्रिजटा को सरमा से अन्य विभीषण की दूसरी पत्नी कहते हैं। महाभारत रामोपाख्यान में सीता ने हनुमान् से कहा था कि त्रिजटा ने मुझे अविन्ध्य का यह सन्देश दिया है कि राम और लक्ष्मण सकुशल हैं। ६७