रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२८ रामायणमीमांसा सप्तदश टीकाएँ नहीं लिखी हैं। अन्य राम-कथाओं में उसी का विस्तार हुआ है। "नह्यमूलं प्ररोहति" सर्वथा निर्मूल का प्ररोहण नहीं हो सकता है। ५८ वें सर्ग को प्रामाणिक रामायण में अविद्यमान कहना बुल्के का साहस ही है। भावार्थरामायण (६।५५) में इन्द्रजित्-वध के बाद रावण मन्दोदरी को धमकी देकर बाध्य करता है कि वह अशोकवन में जाकर रावण की इच्छा-पूर्ति के लिए सीता से अनुरोध करे। कई रचनाओं में उसी समय मन्दोदरी ने सीता-वध से रावण को रोका था। अध्यात्मरामायण तथा आनन्दरामायण में यज्ञविध्वंस के बाद भी मन्दोदरी ने सीता को लौटाने का रावण से अनुरोध किया था। रामचरितमानस में वह तीन बार रावण को भगवान् की शरण लेने को कहती है। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड (सर्ग १११) में रावण-वध के बाद मन्दोदरी का विलाप विस्तृतरूप से वर्णित है। पर बुल्के इसे भी प्रक्षेप कहकर आर्ष काव्य में उसका अभाव मानते हैं, जो कि निराधार प्रलापमात्र है। वस्तुतः वह सर्ग भी प्रामाणिक ही है। अतएव टीकाएँ उसपर भी उपलब्ध होती हैं। भावार्थरामायण (६।५५) के अनुसार मन्दोदरी रावण के साथ सती हो गयी। पर कहीं-कहीं विभीषण के साथ उसके विवाह का भी वर्णन है। काश्मीरीरामायण के अनुसार मन्दोदरी एक अप्सरा थी, जो रावण के विनाशार्थ पृथ्वी पर आयी थी। त्रिजटा वाल्मीकिरामायण के अनुसार त्रिजटा सीता का चरित्र देखकर उनकी ओर आकर्षित हुई थी। रावण के चले जाने पर राक्षसियाँ सीता को डरा रही थीं तब त्रिजटा ने डाँट कर उनसे कहा, मैंने ऐसा स्वप्न देखा है जिससे राक्षसों का विनाश और राम की विजय की सूचना मिलती है। तुम लोग सीता की शरण ग्रहण करो। यही तुम लोगों को महान् भय से बचा सकती है— “प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा । अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् ॥” (वा० रा० ५।२७।३९ ) युद्धकाण्ड में जब इन्द्रजित् ने राम और लक्ष्मण को नागपाश में बाँधा था तब रावण ने सीता तथा त्रिजटा को पुष्पक पर बैठा कर रणभूमि में निःसहाय पड़े हुए राम और लक्ष्मण को दिखाया था। सीता दोनों को मृत समझकर करुण विलाप करने लगी थी तब त्रिजटा ने आश्वासन दिया था कि राम और लक्ष्मण जीवित हैं। सीता के प्रति उसने स्नेह को व्यक्त किया था— “स्नेहादेतद् ब्रवीमि ते।” (वा० रा० ६।४८।२८ ) रामायणककविन (सर्ग २१) के अनुसार सीता राम को शरपाश में बँधा देखकर चिता तैयार करने का निवेदन करती है, किन्तु त्रिजटा अपने पिता विभीषण से मिलने जाती है और राम के कुशल-क्षेम का शुभ समाचार लेकर लौटती है। ५४६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “सीता की त्रिजटा से अन्य हितैषिणी राक्षसियों की भी चर्चा है। वाल्मीकिरामायण सुन्दरकाण्ड में विभीषण की पुत्री तथा पत्नी की चर्चा है। सीता कहती है कलानामक विभीषण की ज्येष्ठा पुत्री ने अपनी माता के आदेशानुसार मुझसे कहा है कि विभीषण तथा अविन्ध्य के सत्परामर्शों की अवज्ञा करके रावण ने सीता को लौटाना हठपूर्वक अस्वीकार कर दिया है। उदीच्य पाठ के अनुसार उसका नाम नन्दा था। जानकीपरिणय में उसका अनला नाम उल्लिखित है। रावण ने राम का मायामय शीर्ष दिखलाया था। किन्तु सरमा ने सीता के पास आकर रावण के छल-कपट का रहस्य प्रकट किया था। सरमा ने सीता को यह शुभ समाचार दिया