भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 602

अध्याय सुन्दरकाण्ड ५२५ आकार के छोटे बन्दर का रूप था। उसी रूप को धारण कर हनुमान् लङ्का में प्रवेश करते हैं— “सूर्ये चास्तं गते रात्रौ देहं संक्षिप्य मारुतिः । वृषदंशकमात्रोऽथ बभूवादभुतदर्शनः ॥” ( वा० रा० ५।२।४७ ) वृहद्धर्मपुराण ( पू० ख० अ० २०१२ ), पद्मपुराण ( वंगीय पाठ १८४२ पृ० ११२६ ) आदि में बिडाल के रूप में ही हनुमान् का लङ्का-प्रवेश कहा गया है। रामचरितमानस के अनुसार मशक के समान रूप धारण कर हनुमान् ने लङ्का-प्रवेश किया— “मशक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥” ( रा० मा० ५।३।१ ) सम्भवतः लङ्का के मच्छर भी छोटे बन्दरों के तुल्य रहे होंगे । उत्तरपुराण ( ६८।२९८ ) में भ्रमरतुल्य रूप धारण कहा गया है। रामकियेन ( अ० २४ ) के अनुसार राक्षसरूप धारण करके हनुमान् ने लङ्का-प्रवेश किया था । अध्यात्मरामायण ( ५।३।२० ) के अनुसार चटक पक्षी के तुल्य बन्दर होकर वे प्रविष्ट हुए थे । आनन्दरामायण ( ८।७।२९ ) के अनुसार छोटे बालक के रूप में वे सीता के सामने प्रकट हुए थे। धनञ्जयकृत गणकचरित्र के अनुसार हनुमान् क्रमशः भ्रमर, बिडाल तथा ज्योतिषी का रूप धारण करते हैं । कई कथाएँ कल्पभेद से संगत हो सकती हैं। लङ्कादेवी वाल्मीकिरामायण ( दाक्षिणात्य पाठ प्रक्षेप ३।२०-५१ ) के अनुसार लङ्कादेवी राक्षसी के रूप में हनुमान् को रोक लेती है । हनुमान् से पराजित होकर वह कहती है, स्वयंभू ने कहा है कि तुम्हारी पराजय के बाद राक्षसों का विनाश होगा । अध्यात्मरामायण ( ५।१।५७ ) में वह कहती है आज बहुत दिनों के बाद मुझे संसार-बन्धन से मुक्ति देनेवाली राघव की स्मृति हुई है । उनके भक्त का अति दुर्लभ सत्संग मिला है। मैं धन्य हूँ । आनन्दरामायण ( १।९।२१ ) में लङ्कादेवी हनुमान् से सीता के रहने के स्थान का रहस्य प्रकट करती है। रामचन्द्रिका ( १३।४४ ) के अनुसार हनुमान् से पराजित होने के बाद वह ( सुन्दरी नारी ) हो जाती है । रामदूत हनुमान् का दर्शन पाकर उसके मन में भी भक्तिभावना उत्पन्न हुई हो यह असम्भव नहीं है । तभी रामचरितमानसकार ने भी इसे स्वीकार किया है— “तात मोर अति पुण्य बहूता । देखिउँ नयन राम कर दूता ॥” ( रा० मा० ५।३।४ ) तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला इक अंग । तुलै न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥” ( रा० मा० ५।४ ) “प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कोसलपुर राजा ॥” ( रा० मा० ५।४।१ ) पउमचरियं के अनुसार लङ्कासुन्दरी के साथ हनुमान् रात भर प्रेमक्रीड़ा करते हैं । यह वाल्मीकिरामायण आदि से स्पष्टतः विरुद्ध ही है । बृहद्धर्मपुराण ( अध्याय २० ) के अनुसार चण्डिकादेवी लङ्का में निवास करती थी । शिवावतार हनुमान् उनसे लङ्का त्याग देने की प्रार्थना करते हैं । सीता के अपमान के कारण वह लङ्का त्याग देती हैं। लङ्का में सीता की खोज वाल्मीकिरामायण में कहा गया है कि हनुमान् ने मुख्य राक्षसों के महलों में तथा रावण के अन्तःपुर में सीता की खोज की ( सर्ग १०,११ ) । फिर अशोकवन में चले गये । परन्तु परवर्ती कथाओं में वे विभीषण से भेंट