रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२ ) लङ्का की स्थिति ७२८ निगमागमसार मानस का प्रत्येक पद पापराशिनाशी एवं अकाट्य ७२९ महाभारत केवल इतिवृत्त ही नहीं ज्ञानमय प्रदीप है ७३३ भगवान् व्यास की तुलना सामान्य इतिहासकारों से करना अन्याय ७३५ इतिहास का वास्तविक स्वरूप ७३५ इतिहास और पुराण पञ्चम वेद ७३६ यदि पाठक इतिहास का अभिप्राय न समझें तो वह इतिहास का दोष नहीं ७३९ महाभारत का अध्ययन अन्तःकरण-शोधक ७४५ वाल्मीकिरामायण के एक-एक अक्षर में महापातक दूर करने की क्षमता व्यासादि सम्मत होने से तदन्तःपाती रावणचरित भी पापनाशक ७४६ राम का ऐतिहासिक स्वरूप मानना दलदल में फँसना नहीं, न मानना ही नास्तिकता के दलदल में फँसना है ७४३ राम ब्राह्मणों के उपासक ७५० राम जातिपाँति नहीं मानते थे, कहना सत्य का अपलाप ७५१ जिस सम्बन्ध में पूर्ण परिचय न हो उस सम्बन्ध में प्राणी को अनधिकार चेष्टा नहीं करनी चाहिए ७५३ पार्वती और परमेश्वर में श्रद्धा और विश्वास का आरोप ७५३ धर्म और ब्रह्म वेदैकवेद्य ७५४ कोई भी प्रमाण प्रत्यक्ष का स्थान नहीं ले सकता, कहना सर्वथा असंगत ७५५ वेदोपनिषत् शास्त्राचार्योपदेश से संस्कृत निर्मल मन या एकाग्रमनःसहकृत उपनिषद्-महावाक्य ही ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन ७५५ असम्भावना आदि दोषों के कारण निर्दोष प्रमाण से उत्पन्न प्रमाज्ञान भी यदा कदा निरर्थक ७५६ तर्क, बुद्धि, श्रद्धा आदि का वास्तविक अर्थ। मा० मु० के लेखक द्वारा प्रदर्शित अटकल पच्चू अर्थ भिड़न्तभिड़ाना मात्र ७५७ संस्कृत पर मिथ्या आक्षेप ७६० तुलसीरामायण बन जाने पर भी जनता को कथा चाहिए, फलतः मूल वेद, वाल्मीकिरामायण, महाभारत, भागवत आदि के स्थान में मानस की कथा चल पड़ी ७६१ देववाणी परम पवित्र एवं पुण्यजनक है, यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है ७६२ वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार न करने पर ब्रह्मसाक्षात्कार वैसे ही असम्भव जैसे नेत्रों के बिना रूपसाक्षात्कार ७६४ श्रीराम ने वर्णाश्रमधर्म का पालन और उपदेश करते हुए गीध, कोल, भिल्ल, किरात आदि से मैत्री कर उनका परम कल्याण किया था ७६४ तुलसी के निर्मल पवित्र भावपर जो उन्हें वर्णाश्रम धर्म पर छीटाकसी करनेवाला बताना चाहते हैं उन वक्ताओं से जनता का त्राण ईश्वर करे ७६५ समाज ने किसी पर कोई चीज लाद दी, यह कथन निष्प्रमाण ७६५ वाल्मीकि, व्यास, भवभूति और कालिदास के काव्यों एवं तुलसी के “गिराग्राम्य सियाराम जस” के तारतम्य का प्रयास व्यर्थ ७६६ ऊँचे से ऊँचे वेदान्तवेद्य ब्रह्म का निरूपण कर उसे शिवजी अवधपति कहते हैं ७६९