रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३ ) रघुकुलमणि आदि राम के असाधारण नाम ७७० रामादि अवतारों के जन्म और कर्म दिव्य ७७० कार्य अकार्य की व्यवस्था में शास्त्र प्रमाण ७७१ सत्य बोलना परमधर्म है, यदि सत्य से किसी गौ या ब्राह्मण की हत्या होती हो तो गोहत्या तथा ब्रह्महत्या रोकने के लिए झूठ बोलना उचित ७७२ सहस्रों ललनाओं के पातिव्रत्य-भङ्ग का हेतु वृन्दा का पातिव्रत्य अधर्मप्राय ७७७ कुब्जा-कृष्ण-प्रसङ्ग का रहस्य जीव का भगवान् के साथ रमण ७७९ हरिश्चन्द्र पर मा०मु० के लेखक का दोषारोपण निरर्थक ७८२ विश्वामित्र के सम्बन्ध में उक्त लेखक की अनेक अनर्गल कल्पनाएँ ७८३ वसिष्ठ के सम्बन्ध में भी लेखक की अनेक लोगों की तरह विविध दुष्कल्पनाएँ ७८३ दाक्षायणी के सम्बन्ध में भी कतिपय अनर्गल प्रलाप ७८४ वेद समुद्रवत् गम्भीर और अगाध एवं सर्वसाधारण के लिए अगम्य ७८५ गुरुपरम्परा से ही वेदों का अध्ययन कर्तव्य मनमाने ढङ्ग से नहीं ७८७ वेदपरम्परा किसी नदी या गङ्गा के तुल्य भी मान्य नहीं ७८७ वेदों की आनुपूर्वी का किसी कल्प में परिवर्तन नहीं, वेद अनादि और अपौरुषेय ७८७ पौरुषेय इतिहास-पुराणों में आनुपूर्वी में परिवर्तन होने पर भी उनके विचार और सिद्धान्त अनादि ही रहते हैं ७८८ नामापराधराहित्य का अभाव ही नामजप से सिद्धि न मिलने के कारण ७८९ वेद और पुराणों को नीचा दिखाने की दुश्चेष्टा से तुलसी या मानस की प्रतिष्ठा बढ़ेगी नहीं, प्रत्युत घटेगी ७९१ वेद, रामायण और मानस समन्वय एवं वेदों से एकमात्र भगवान् ही वेद्य ७९१ परमात्मा के विकार होने से इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि का प्रतिपादन परमात्मा का ही प्रतिपादन ७९२ इन्द्रादि देव ईश्वर के ही अंश हैं, उनका ऐश्वर्य निस्सीम नहीं ७९२ भगवच्चरणपङ्कज में समर्पण बुद्धि से किये जा रहे कर्मों से बुद्धि शुद्ध होने पर निष्काम उपासना में मन की एकाग्रता होती है ततः ब्रह्मात्मसम्बन्धी आवरणभङ्ग होने पर ब्रह्मसाक्षात्कार होता है ७९४ रामायण के राम और भागवत के कृष्ण, विष्णुपुराण के विष्णु एवं शिवपुराण के शिव कारणब्रह्म ७९४ वेदों में ब्रह्म का महत्त्वपूर्ण स्थान है, वही ब्रह्म विष्णु, राम और कृष्ण हैं ७९५ हरिश्चन्द्र सत्यवादिता के प्रतीक रूप में सर्वमान्य ७९५ हरिश्चन्द्र के जीवन का दूसरा पक्ष निम्नतम भावों एवं दुर्बलताओं का परिचायक-मा० मु० ७९५ हरिश्चन्द्र का आख्यान पुत्रेष्टियाग का अर्थवाद है। उसका पुत्रेष्टियाग की प्रशंसा में ही तात्पर्य है, अतः उसपर उक्त दुष्कल्पनाएँ असम्भव ७९८ विश्वामित्र ने तपस्या द्वारा केवल अपने को ही नहीं, अपने पिता, पितामह और प्रपितामह को भी ब्राह्मण बना दिया। तपस्या से सब कुछ सम्भव ८०० बाल्मीकि, नारद और अगस्त्य ने अपनी-अपनी जन्म-कथा अपने मुँह से कही है, ऐसी स्थिति में अन्तिम स्थिति का ही स्वरूप देखना चाहिये पूर्वरूप देखना व्यर्थ है ८०० मर्त्य-शिक्षण के लिए अवतीर्ण भगवान् ने धर्म के सम्बन्ध में शास्त्र को ही प्रमाण माना है ८०० वेदविरुद्ध भगवान् की भी वाणी अमान्य जैसे बुद्धवाणी ८०१