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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( २४ ) वेद और शास्त्र ही धर्म और ब्रह्म के स्वरूप के प्रतिपादक ८०१ अधर्म के कारण ही अशुद्ध अन्तःकरण में वासना और स्वार्थ का अधिकार ८०१ ‘श्रुति पुराण बहु कहेउ उपाई’ चौपाई का इतना ही अर्थ है कि भगवदनुग्रह के बिना केवल श्रुति और पुराणों के बताये हुए उपायों के अनुष्ठान में अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं ८०२ श्रीराम की तरह ही भरत भी शास्त्रानुयायी तथा परम धर्मनिष्ठ ८०३ गुरु वसिष्ठ के निर्णीत धर्म पर कुचोद्य करना सर्वाधिक दुर्बुद्धिका लक्षण ८०३ महर्षि वसिष्ठ चक्रवर्ती दशरथ महाराज को परम धार्मिक एवं सत्य के रक्षक मानते हैं ८०३ मानसमुक्ता० का लेखक अपने ज्ञानगुमान में उन्मत्त होकर श्रीराम के पूर्वज हरिश्चन्द्र की भी छीछालेदर करता है ८०४ महर्षि वसिष्ठ का धर्मसम्मत ही कथन है कि महाराज ने तुमको राज दिया है उनके वचन को सत्य बनाना तुम्हारा कर्तव्य ८०४ श्रीदशरथ परमभक्त तो थे ही तभी तो राम की विरहाग्नि में उन्होंने प्राण त्याग दिये ! इस दृष्टि से दशरथ के सदृश दशरथ ही ८०५ यद्यपि बड़े भाई के रहते छोटे भाई का राजा होना अनुचित है तथापि पिता के अनुसार राजा बनने में भरत को कोई दोष नहीं ८०५ ‘अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पितु बैन’ इत्यादि वचन भी निर्विवाद हैं ८०५ ‘पितु सुरपुर सियराम वन करन कहहु मोहि राज’ इत्यादि वचनों में भरत के निष्कपट हृदय के भावों की स्पष्ट अभिव्यक्ति ८०७ वे कहते हैं, कोई मनुष्य भूतादि ग्रहों से गृहीत हो, उसपर उसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो, उसपर भी उसे वारुणी पिला देना क्या उसका उपचार है ? ८०८ मेरी इच्छा यही है कि मैं राम के पास जाऊँ उनकी शरण ही मेरा सर्वस्व है ८०९ विवेक के समुद्र गुरु महाराज भी मुझे राजतिलक देने की बात करते हैं, विधाता के विमुख होने पर सब मानो विमुख हो गये ८०९ भरत राम के मूर्त्तिमान् प्रेम ही हैं किसी पामर प्राणी की ही अपनी जड़ता से उनके प्रति कुटिलता की शङ्का हो सकती है ८०९ वसिष्ठ जैसे महापुरुष महाराज दशरथ की प्रशंसा कर रहें कि महाराज दशरथ के तुल्य न कोई हुआ न है और न होगा ८१० धर्मशास्त्र के अनुसार रामप्रेम में मृत्यु होना प्रेम की पराकाष्ठा है ८११ धर्म रूढ़िगत वाक्यों से नहीं वेदवाक्यों से सिद्ध होता है ८११ गुरुदेव ने कहीं भी रूढ़िगत वाक्यों की दुहाई नहीं दी ८११ महाराज दशरथ के लिए शराबी स्वामी का दृष्टान्त नहीं दिया जा सकता, उन्हें आवेशजन्य भावना ग्रस्त भी नहीं कहा जा सकता एवं उन्हें काम, क्रोध या ममता से ग्रस्त भी नहीं कहा जा सकता ऐसी स्थिति में उनकी आज्ञा स्वीकार करने में धर्म का उपहास होगा यह कैसे कहा जा सकता है ? ८११ ऊँची धर्मनिष्ठा में आज्ञापालन सर्वोपरि धर्म है। क्या इन दो पंक्तियों का कोई खण्डन कर सकता है— ८१२ परशुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मात लोक सब साखी ॥ ८१२