रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५ ) भरतजी कहते हैं—‘गुरु पितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भल जानीं ॥ उचित कि अनुचित किये बिचारू । जाइ धर्म सिर पातक भारू ।।' महाराज की आज्ञा को तो अनुचित कहा ही नहीं जा सकता ८१२ पहले दशरथ ने कहा था ज्येष्ठ को ही राजा बनने का अधिकार है और अब भरत से राजा बनने को कहा जा रहा है, यह कहना अनुचित है, क्योंकि सामान्य नियम की विशेष नियम द्वारा बाध्यता सिद्ध है ८१३ कैकेयी के लोभग्रस्त होने पर भी महाराज लोभग्रस्त नहीं । यदि पहले वर प्रदत्त न होता तो महा- राज कदापि कैकेयी के दबाव से प्रभावित न होते ८१४ राम और भरत कोई भी ऐसे नहीं जो गुरु वसिष्ठ के वचनों में सन्देह करें ८१४ मर्यादापालक राम सूर्यवंश की परम्परा की किसी बात को अनुचित कैसे कह सकते हैं ? उनका “जनमे एकसंग सब भाई” आदि कथन का तात्पर्य भक्तों के मन की कुटिलता हरण में है ८१५ राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते ८१५ भरत ने किसी भी धर्मव्याख्या के प्रति अपनी असम्मति प्रकट नहीं की ८१५ भरत के राज्य न करने से भरत पर किसी दोष की सम्भावना भी नहीं । भरत राज्य करते तो दोष न होने पर भी उसका कोई बड़ा महत्त्व न था । महत्त्व तो भरत के त्याग का ही है ८१६ धर्म का नया अर्थ किसी को भी मान्य नहीं, धर्म में तर्क का भी कोई आदर नही । भगवान् राम, कृष्ण, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि कोई भी धर्मनिर्माता नहीं हो सकते ८१६ उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं राज्य उपयोग के लिए होता है । यथेष्ट विनियोग-क्षमता ही सत्त्व है ८१७ उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं भूमि का राजा लोग दान करते ही हैं । श्रीराम ने तथा उनके पूर्व पुरुषों ने भी किया था ८१७ वरदान देनेवाला यदि मुकरता है तो उसका सत्यभङ्ग होता है । कोई भी प्रतिग्रहीता वचनबद्ध न होने पर प्रतिग्रह के लिए बाध्य नहीं ८१८ चित्रकूट-यात्रा का तात्पर्य—भगवान् राम से यह स्वीकार करा लेना कि वे अयोध्या के वास्तविक स्वामी हैं, यह कथन भी गलत है, क्योंकि उनका धर्म-विरुद्ध बात स्वीकार करना कदापि सम्भव नहीं ८१९ भगवदाराधन बुद्धि से निःसङ्ग होकर वेदोक्त कर्म करता हुआ मानव सर्वकर्मनिवृत्तिरूप ब्रह्मात्मज्ञान प्राप्त कर लेता है । विविध फलों की श्रुति तो कर्मों में रुच्युत्पादनार्थ है ८२० सत्पुरुषों के समागम तथा सच्छास्त्रों के अभ्यास से स्वाभाविक रागद्वेष मिटाकर प्रकृतिपारतन्त्र्य मिटाना चाहिए, तभी पुरुषार्थ को अवकाश मिलता है, भगवत्कृपा तो सर्वोपरि है ही ८२० श्रीराम का कैकेयी और महाराज के सम्मुख कथन—परमपूज्य पिताजी के लिए जो भी प्रिय किया जा सकता है वह सब प्राणों का त्याग कर करने के लिए मैं कृतसङ्कल्प हूँ । पिताजी की शुश्रूषा तथा उनके आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण नहीं ८२१ कैकेयी की वरप्राप्ति का पूर्ववृत्तान्त ८२२ कैकेयी के पिता ने कैकेयी का विवाह महाराज के साथ इस शर्तपर किया था कि इससे जो पुत्र होगा वही राज्य का भागी होगा ८२२ राम की परमोत्कृष्ट पितृभक्ति ८२३ उनके आज्ञापालन में अविचलता ८२३ लक्ष्मण द्वारा महाराज के प्रति कुछ विरुद्ध रुख प्रकट करने पर राम द्वारा लक्ष्मण की भर्त्सना ८२५ 9