रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) भरत की महिमा अपने आप में लोकोत्तर ८२५ चित्रकूट की प्रथम सभा में वस्तुस्थिति का वर्णन करते हुए गुरु वसिष्ठ महाराज की सबकी राय जानने की इच्छा ८२५ मुनिवर वसिष्ठ की चित्रकूट की प्रथम सभा की वाणी नीति, परमार्थ और स्वार्थ से युक्त थी ८२६ गुरु वसिष्ठजी के वचनों की महत्ता ८२६ राम और लक्ष्मण अयोध्या लौट जाँय उनके बदले भरत और शत्रुघ्न वन जाँय, मुनि की यह बात भरत को अति प्रिय लगी ८२७ मुनि ने धर्म, नीति, गुण और ज्ञान के निधान राम से कहा जिससे पुरवासियों, माताओं और भरत का हित हो वही करें ८२७ सब उपाय आपके हाथ में है, प्रसन्नता से आपकी आज्ञा का पालन करने और सत्य बोलने में सबका हित, यह राम का कथन ८२८ भरत की गुरुभक्ति से भगवान् राम को अपार हर्ष भरत के कथनानुसार कार्य करने में सबकी भलाई है यह राम को स्वीकार ८२८ भरत का गुरु की आज्ञा पाकर गुरु और अपने इष्टदेव की सन्निधि में अपने हृदय की दीनता भरे भावों को अभिव्यक्त करना ८२९ राम द्वारा भरत की सराहना ८२९ राम के सम्बन्ध में कौशल्या की दृष्टि और ही विलक्षण ८३० कौशल्या का सन्देश सुनकर श्रीजनकजी द्वारा भरत के व्यवहार की अत्यन्त श्लाघा ८३० श्रीजनकजी की दृष्टि में महाराज दशरथ की आज्ञा में कोई दूषण नहीं ८३१ “राखि राम रुख धरम ब्रत पराधीन मोहि जानि । सबके सम्मत सर्वहित करिय प्रेम पहिचानि ॥” इस कथन से भरत की दृष्टि स्पष्ट ८३१ भरत को किसी नये धर्म, पन्थ का प्रचार अभीष्ट नहीं था । महाराज दशरथ और महर्षि के वेदादिशास्त्रसम्मत सिद्धान्त से भिन्न उनका कोई सिद्धान्त नहीं ८३१ भरत के चित्रकूट सभा में उक्त—‘प्रभु पित मात सुहृद गुरु स्वामी ।' आदि वचन गङ्गाजलवत् निर्मल, निष्छल तथा परम पवित्र ८३१ भरत के परम पवित्र दैन्यपूर्ण भक्तिसुधासमुद्र में नयी धर्मव्याख्या का स्थान ही कहाँ ? ८३२ श्रीराम ने—‘तात भरत तुम्ह धर्म धुरीना । लोकवेदविद प्रेम प्रवीना ।।' जो कहा वह उनके अनुरूप ही है ८३२ गुरु, पिता, माता और स्वामी की आज्ञा का पालन करना सब धर्मों का आधार ८३३ उक्त आज्ञा का तुम भी पालन करो और हमसे भी पालन कराओ ८३३ प्रभु की प्रेमामृत समुद्रमयी वाणी सुनकर सम्पूर्ण समाज स्नेह-शिथिल और समाहित एवं भरत को परम-सन्तोष ८३३ गोस्वामीजी के मानस में महाराज दशरथ के प्रति महर्षि वसिष्ठ, भरद्वाज, मन्त्रिपरिषद्, परिजन एवं पुरजन सहित भरत तथा श्रीराम की परम श्रद्धा प्रकटित ८३३ वेद अनन्त ईश्वर के निःश्वास रूप होने से ईश्वरांश ८३४