रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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शतकोटिरामायण की मान्यता तुक्कों द्वारा स्थापित नहीं किन्तु पुराणों द्वारा स्थापित ८३५ पुराण वेदों का विभाजन नहीं, वेदों का उपबृंहण है ८३५ आठ प्रकार के ब्राह्मणों में आनेवाले इतिहास और पुराण तो वेद ही हैं, किन्तु छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित इतिहास-पुराण विष्णु, पद्म आदि पुराण हैं ८३५ वेदों में ही इन्द्र शब्द का एक अर्थ परमेश्वर भी है, अन्यत्र देवता विशेष इन्द्र है। प्रथम की शक्ति निःसीम और द्वितीय की सीमित ८३५ "इदमित्थं कहि जात न सोई" यह अर्धाली ब्रह्म का अवतार क्यों होता है, इस अंश के लिए है ८३६ वेद सर्वज्ञ ईश्वर के निःश्वास होने से सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं ८३८ गोस्वामीजी वेद-वेदान्त सिद्धान्त के घेरे में रहकर गर्व का अनुभव करते हैं। श्रीराम उनकी दृष्टि में परम सत्य हैं, पूर्ण सत्य हैं ८३८ 'कोउ कह सत्य झूठ कह कोऊ' का वास्तविक अर्थ है—कुछ लोग जगत् को सत्य (अत्यन्ताबाध्य) कहते हैं। कुछ झूठ बन्ध्यापुत्र तथा खपुष्पवत् अत्यन्त