रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) एक ब्रह्म भगवान् ही परम सत्य हैं तद्भिन्न सब मोहमूलक ८४५ श्रीराम परमार्थ सत्य हैं, उनसे भिन्न सब अपरमार्थ। व्यावहारिक या सीमित सत्य ८४५ प्रतिज्ञामात्र से वस्तुसिद्धि नहीं होती, उसके लिए प्रमाण अपेक्षित है, आन्तर वर्ण व्यवस्था, किसी विशेष गुण का सदा सब में स्थायी रूप से अस्तित्व विनिगमक न रहने के कारण, असम्भव ८४६ वाजपेय यज्ञ में ब्राह्मण और क्षत्रिय का अधिकार, राजसूय में केवल जन्मना क्षत्रिय का अधिकार और वैश्यस्तोम में वैश्य का इन सबका गुण और वृत्ति से सम्बन्ध नहीं ८४६ विद्या, तप और योनि तीनों होने से मुख्य ब्राह्मण, विद्या और तप न होने केवल जाति ब्राह्मण ८४६ शास्त्र में साङ्कर्य महान् दोष माना गया है। यदि वृत्ति से ही ब्राह्मणादि वर्ण माने जायें तब तो ब्राह्मण पति-पत्नी में भी समय-समय पर वृत्ति एवं गुणों का परिवर्तन होने के कारण प्रतिलोम सङ्करों की सृष्टि सम्भव ८४६ वेद मन्त्रानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः भगवान् के मुख, बाहु, ऊरु और पैर से उत्पन्न हैं ८४७ छान्दोग्योपनिषद् में श्वयोनि सूकरयोनि के समान ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि, वैश्ययोनि और शूद्रयोनि का वर्णन किया गया है। जैसे श्वयोनि या शूकरयोनि पाने पर जब तक वह शरीर रहता है जाति नहीं बदलती वैसे ही ब्राह्मणादि जातियों में भी यावद्देह जाति रहती है ८४७ हनुमान् पर रावण के बगीचे के फल खाने पर चौर्य का आरोप नहीं हो सकता, क्योंकि युद्ध ठन जाने पर एक राजा का दूसरे राजा की प्रभुसत्ता अस्वीकार करना वैध है ८४३ रावण का मुख्य प्रश्न था - तू कौन है, किसके बल पर तूने बन उजाड़ा और किस अपराध पर राक्षसों को मारा। हनुमान् ने उसका उचित उत्तर दिया ८४८ भगवान् वामन ने बलि की सम्पत्ति, जो उसे विजय द्वारा प्राप्त थी, दान लेकर इन्द्र को प्रदान की। यदि बलि की उसमें प्रभुसत्ता नहीं थी तो दान लेने की अपेक्षा क्यों हुई ? ८४९ जैसे स्वामी द्वारा प्रदत्त वस्तु का सेवक स्वामी होता है वैसे ही अपने कर्मों द्वारा और जैव मार्ग दाय, जय, क्रय आदि द्वारा प्राप्त सम्पत्ति का स्वामी जीव भी है ८४९ भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ इत्यादि वचनों से यह नहीं समझना चाहिए कि श्रद्धा और विश्वास ही भवानी और शङ्कर हैं, उनसे अतिरिक्त भवानी-शङ्कर नहीं हैं ८४९ श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण के लिए जीव, ब्रह्म और माया का दृष्टान्त दिया गया है, वस्तुतः जीव, ब्रह्म तथा माया या विधु, बुध और रोहिणी रूप ही राम, सीता और लक्ष्मण नहीं हैं ८४९ द्वाविंश अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल महाभारत और पाश्चात्य विद्वान् ८५१-८९९ वेदादि प्रमाणों के आधार पर कृष्ण वस्तुतः परब्रह्म थे, उन्हें किसी ने ब्रह्मपद प्रदान नहीं किया ८५४ भाषा की दृष्टि से वेदकाल-आधुनिक दृष्टि में ८५४ वस्तुतः वेद, उपनिषद् सब अनादि और अपौरुषेय ८५४ लोकमान्य के अनुसार वैशम्पायन ने जनमेजय को गीतासहित भारत सुनाया ८५४ लोकमान्य के दृष्टिकोण से महाभारतकाल-निर्णय ८५५ बौद्धधर्म ८५६