भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( २९ ) जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म वैदिक धर्म के पुत्र ८५७ गीता और ईसाई ८५७ बाइबिल-काल ८५९ सर विलियम जोन्स, जनरल प्रिंसेप आदि पाश्चात्य विद्वानों का मेगस्थनीज की पुस्तक में लिखित सैण्ड्राकोट्स को मौर्य्यचन्द्रगुप्त और उसकी राजधानी पालीबोथ्रा को पाटलिपुत्र मानकर महाभारत- युद्धकाल को १७०० वर्ष पीछे हटाना भ्रम ८६० पालीबोथ्रा नगरी पाटलिपुत्र और सैण्ड्राकोट्स चन्द्रगुप्त का अपभ्रंश न हो ८६० वायुपुराण के अनुसार दशक-पुत्र उदायी ने ई० पू० १३१३ में कुसुमपुर बसाया ८६० पालिबोथ्रा हेराक्लीज द्वारा ई० पू० ३०८२ में बसाया गया ८६१ पालिबोथ्रा का राजा सैण्ड्राकोट्स पौराणिक मौर्य्यचन्द्र गुप्त नहीं हो सकता । सैण्ड्राकोट्स का शासन- काल मौर्य्यचन्द्र गुप्त के शासन से ११८० वर्ष पीछे ८६१ जोन्स के वक्तव्य के समर्थन में खोज निकाले गये गुहाभिलेखों तथा स्तम्भाभिलेखों का अशोक के होना भी अनिश्चित ८६१ अशोकवर्धन का राजत्वकाल विक्रम संवत् पूर्व १३९६ से विक्रम सं० पूर्व १३७० तक २६ वर्ष है ८६१ अन्तियोकस, तुरमय ये नाम भारत के पश्चिमोय राज्यों के हैं, जो वारुण भारत के पञ्चगण नाम से महाराज सगर के पूर्वकाल से प्रसिद्ध हैं ८६२ इन्हीं का उल्लेख तथाकथित अशोक शिलालेख के दूसरे पाँचवें और तेरहवें विज्ञापनों में है ८६२ पाश्चात्यों के मतानुसार भारतीय ज्योतिष ज्ञान की महास्थूल गणना वेदाङ्गज्योतिष से भी स्थूल ८६२ सिद्धान्तगणित का ज्ञान भारत का यूनान से प्राप्त ८६२ ययाति के पुत्र तुर्वसु से यवन हुए। इस तरह ययाति के पौत्र यवनों के वंशधर यवन हैं, यूनानी नहीं, राजा बाहुपर हैहयादि राजाओं के आक्रमण के समय पञ्चगणाधिपति यवन भी उनके साथ थे ८६३ महाराज सगर ने पितुशत्रुभूत पञ्चगणों को पराजित किया। उनके शरणागत होने पर उन्हें धर्म- भ्रष्ट तथा आर्यसंस्कृतिविहीन कर निर्वासित कर दिया ८६३ यवनों का नाम देखकर उन्हें यूनानी समझना अत्यन्त भ्रांति ८६३ भारतीय कालगणना की सृष्टि के आदि से अन्त तक समान स्थिति ८६३ चान्द्र, सावन, और सौर भेद से मास तथा संवत्सर तीन प्रकार के होते हैं ८६३ भारतीय विद्वानों ने नक्षत्रमण्डल के १२ विभाग कर १२ राशियों और सात वारों का ज्ञान यूनान से सीखा, पाश्चात्यों का यह कथन सर्वथा निराधार ८६४ संक्रान्तियों का अयन, विषुव, षडशीति तथा विष्णुपद नामों से वर्णन महाभारत में वर्तमान ८६५ पञ्चाङ्गों में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण यह ज्योतिषपञ्चाङ्ग प्रसिद्ध ८६५ पञ्चाङ्गों के अनुसार आज से २०२९ वर्ष पूर्व विक्रम संवत् तथा ५०७३ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर संवत् एवं कलिसंवत्सर का आरम्भ धृतराष्ट्र के दिवंगत होने के अनन्तर युधिष्ठिरशासनकाल में ही महाभारत का निर्माण हुआ संवत् ९७७ में शिशुपालवध काव्य के टीकाकार वल्लभदेव ने महाभारत-श्लोक-संख्या सवा लक्ष कही है सवा लक्ष संख्या हरिवंशसहित महाभारत की समझनी चाहिये राजशेखर, आनन्दवर्धन, दण्डी, बाण, जयादित्य, कालिदास आदि कवि एवं विद्वानों ने अपने अपने ग्रन्थों में महाभारत की चर्चा या स्मरण किया है