भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( ३० ) जयादित्य से प्राचीन कुमारिल ने व्यास और उनके श्लोक का स्मरण किया है ८६७ धर्मकीर्ति ने भी भारत की चर्चा की है ८६७ भर्तृहरि, सुबन्धु एवं योगभाष्यकार द्वारा अपने-अपने ग्रन्थों में महाभारत के श्लोक उद्धृत ८६७ महाराज सर्वनाथ के संवत् १९१-२१४ तक के उपलब्ध शिलालेखों एवं ताम्रलेख में महाभारत के एक लाख श्लोक मान्य ८६७ उनसे भी प्राचीन शबरस्वामी तथा वात्स्यायन द्वारा महाभारत-श्लोक उद्धृत ८६७ स्कन्दस्वामी से पूर्ववर्ती आचार्य दुर्ग द्वारा निरुक्त-भाष्य में महाभारत-श्लोक उद्धृत ८६८ सन् ५७ ई० में हुए लङ्कावतार सूत्र के चीनी अनुवाद में उद्धृत श्लोकों में व्यास और महाभारत का नाम ८६८ वररुचि के वाररुच निरुक्त समुच्चय में 'इति व्यासवचनम्' वर्णित ८६८ बृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य के समय महाभारत विद्यमान था ८६८ अतएव उसके अनुवादभूत कथासरित्सागर में महाभारत की कई कथाओं का उल्लेख ८६८ विक्रमादित्यस्थापित संवत् के सम्बन्ध में शङ्का-समाधान ८६८ विक्रमसंवत्, शकसंवत्, सन्संवत् तथा गुप्तसंवत् भी प्रारम्भिक शताब्दियों में तत्तत् न.मों के रूप में उत्पन्न ८७० मेरुतुङ्गाचार्य ने विचारश्रेणी नामक अपने ग्रन्थ में उज्जयिनी का वर्णन करते हुए कहा है कि महावीर-निर्वाण ईसवीय सन् के प्रारम्भ से ५२७ वर्ष पूर्व हुआ था : उसके ५७० वर्ष बाद शकों का उन्मूलन कर मालव के राजा विक्रमादित्य का उदय होगा ८७१ विक्रमादित्य की पण्डितभूयिष्ठा परिषत् एवं धन्वन्तरि आदि नवरत्नों का वर्णन तथा उनमें से कतिपय के ग्रन्थों का परिचय ८७१ वराहमिहिर का काल, पञ्चतन्त्र के फारसी भाषा में अनुवाद का काल एवं प्रचलित शकसंवत् से अतिरिक्त शकसंवत् का साधन ८७२ वराहमिहिर विरचित पञ्चसिद्धान्तिका का काल ८७२ उसकी परीक्षा पं० सुधाकर द्विवेदी द्वारा प्रचलित शकसंवत् में ४२७ घटाने से की तो वार ठीक नहीं निकला । प्रसिद्ध गणितज्ञ श्रीवेङ्कटाचार्य ने ईस्वी पूर्वभावी शक को ही शक शब्द से लेकर परीक्षण किया तो सब ठीक निकला ८७३ वराहमिहिर का जन्मकाल ८७४ पुष्पमित्र के पुरोहित महाभाष्यकार पतञ्जलि ने प्राचीन नाटक का श्लोक उद्धृत किया है जो महाभारत-श्लोक से मिलता है ८७४ 'कालः पचति भूतानि' इत्यादि महाभारत का श्लोक पा० सू० ३।३।१६७ के महाभाष्य से उद्धृत ८७४ चरकसंहिता में विष्णुसहस्रनाम का विधान है ८७५ विष्णुसहस्रनाम में 'रामो विरामो विरतः' राम का नाम है, अतः राम और रामायण अतिप्राचीन ८७५ विष्णुगुप्त के अर्थशास्त्र में महाभारत की छायावाले श्लोकों का अस्तित्व, उनसे भी प्राचीन, पाणिनि ने महाभारत तथा तत्सम्बन्धी शब्दों की सिद्धि की है, अतः उनसे महाभारत प्राचीन ८७५ आश्वलायन के गुरु शौनक महाभारत-युद्ध के ३०० वर्ष पश्चात् दीर्घ सत्र कर रहे थे । आश्वलायन गृह्यसूत्र में भारत और महाभारत दो नाम है कौषीतकिगृह्यसूत्र में महाभारत का नाम आया है । इससे निश्चित है महाभारत युद्ध के पश्चात् ३०० वर्षों के भीतर महाभारत प्रख्यात था ८७५