रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( २५ ) भरतजी कहते हैं—‘गुरु पितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भल जानीं ॥ उचित कि अनुचित किये बिचारू । जाइ धर्म सिर पातक भारू ।।' महाराज की आज्ञा को तो अनुचित कहा ही नहीं जा सकता ८१२ पहले दशरथ ने कहा था ज्येष्ठ को ही राजा बनने का अधिकार है और अब भरत से राजा बनने को कहा जा रहा है, यह कहना अनुचित है, क्योंकि सामान्य नियम की विशेष नियम द्वारा बाध्यता सिद्ध है ८१३ कैकेयी के लोभग्रस्त होने पर भी महाराज लोभग्रस्त नहीं । यदि पहले वर प्रदत्त न होता तो महा- राज कदापि कैकेयी के दबाव से प्रभावित न होते ८१४ राम और भरत कोई भी ऐसे नहीं जो गुरु वसिष्ठ के वचनों में सन्देह करें ८१४ मर्यादापालक राम सूर्यवंश की परम्परा की किसी बात को अनुचित कैसे कह सकते हैं ? उनका “जनमे एकसंग सब भाई” आदि कथन का तात्पर्य भक्तों के मन की कुटिलता हरण में है ८१५ राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते ८१५ भरत ने किसी भी धर्मव्याख्या के प्रति अपनी असम्मति प्रकट नहीं की ८१५ भरत के राज्य न करने से भरत पर किसी दोष की सम्भावना भी नहीं । भरत राज्य करते तो दोष न होने पर भी उसका कोई बड़ा महत्त्व न था । महत्त्व तो भरत के त्याग का ही है ८१६ धर्म का नया अर्थ किसी को भी मान्य नहीं, धर्म में तर्क का भी कोई आदर नही । भगवान् राम, कृष्ण, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि कोई भी धर्मनिर्माता नहीं हो सकते ८१६ उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं राज्य उपयोग के लिए होता है । यथेष्ट विनियोग-क्षमता ही सत्त्व है ८१७ उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं भूमि का राजा लोग दान करते ही हैं । श्रीराम ने तथा उनके पूर्व पुरुषों ने भी किया था ८१७ वरदान देनेवाला यदि मुकरता है तो उसका सत्यभङ्ग होता है । कोई भी प्रतिग्रहीता वचनबद्ध न होने पर प्रतिग्रह के लिए बाध्य नहीं ८१८ चित्रकूट-यात्रा का तात्पर्य—भगवान् राम से यह स्वीकार करा लेना कि वे अयोध्या के वास्तविक स्वामी हैं, यह कथन भी गलत है, क्योंकि उनका धर्म-विरुद्ध बात स्वीकार करना कदापि सम्भव नहीं ८१९ भगवदाराधन बुद्धि से निःसङ्ग होकर वेदोक्त कर्म करता हुआ मानव सर्वकर्मनिवृत्तिरूप ब्रह्मात्मज्ञान प्राप्त कर लेता है । विविध फलों की श्रुति तो कर्मों में रुच्युत्पादनार्थ है ८२० सत्पुरुषों के समागम तथा सच्छास्त्रों के अभ्यास से स्वाभाविक रागद्वेष मिटाकर प्रकृतिपारतन्त्र्य मिटाना चाहिए, तभी पुरुषार्थ को अवकाश मिलता है, भगवत्कृपा तो सर्वोपरि है ही ८२० श्रीराम का कैकेयी और महाराज के सम्मुख कथन—परमपूज्य पिताजी के लिए जो भी प्रिय किया जा सकता है वह सब प्राणों का त्याग कर करने के लिए मैं कृतसङ्कल्प हूँ । पिताजी की शुश्रूषा तथा उनके आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण नहीं ८२१ कैकेयी की वरप्राप्ति का पूर्ववृत्तान्त ८२२ कैकेयी के पिता ने कैकेयी का विवाह महाराज के साथ इस शर्तपर किया था कि इससे जो पुत्र होगा वही राज्य का भागी होगा ८२२ राम की परमोत्कृष्ट पितृभक्ति ८२३ उनके आज्ञापालन में अविचलता ८२३ लक्ष्मण द्वारा महाराज के प्रति कुछ विरुद्ध रुख प्रकट करने पर राम द्वारा लक्ष्मण की भर्त्सना ८२५ 9
( २६ ) भरत की महिमा अपने आप में लोकोत्तर ८२५ चित्रकूट की प्रथम सभा में वस्तुस्थिति का वर्णन करते हुए गुरु वसिष्ठ महाराज की सबकी राय जानने की इच्छा ८२५ मुनिवर वसिष्ठ की चित्रकूट की प्रथम सभा की वाणी नीति, परमार्थ और स्वार्थ से युक्त थी ८२६ गुरु वसिष्ठजी के वचनों की महत्ता ८२६ राम और लक्ष्मण अयोध्या लौट जाँय उनके बदले भरत और शत्रुघ्न वन जाँय, मुनि की यह बात भरत को अति प्रिय लगी ८२७ मुनि ने धर्म, नीति, गुण और ज्ञान के निधान राम से कहा जिससे पुरवासियों, माताओं और भरत का हित हो वही करें ८२७ सब उपाय आपके हाथ में है, प्रसन्नता से आपकी आज्ञा का पालन करने और सत्य बोलने में सबका हित, यह राम का कथन ८२८ भरत की गुरुभक्ति से भगवान् राम को अपार हर्ष भरत के कथनानुसार कार्य करने में सबकी भलाई है यह राम को स्वीकार ८२८ भरत का गुरु की आज्ञा पाकर गुरु और अपने इष्टदेव की सन्निधि में अपने हृदय की दीनता भरे भावों को अभिव्यक्त करना ८२९ राम द्वारा भरत की सराहना ८२९ राम के सम्बन्ध में कौशल्या की दृष्टि और ही विलक्षण ८३० कौशल्या का सन्देश सुनकर श्रीजनकजी द्वारा भरत के व्यवहार की अत्यन्त श्लाघा ८३० श्रीजनकजी की दृष्टि में महाराज दशरथ की आज्ञा में कोई दूषण नहीं ८३१ “राखि राम रुख धरम ब्रत पराधीन मोहि जानि । सबके सम्मत सर्वहित करिय प्रेम पहिचानि ॥” इस कथन से भरत की दृष्टि स्पष्ट ८३१ भरत को किसी नये धर्म, पन्थ का प्रचार अभीष्ट नहीं था । महाराज दशरथ और महर्षि के वेदादिशास्त्रसम्मत सिद्धान्त से भिन्न उनका कोई सिद्धान्त नहीं ८३१ भरत के चित्रकूट सभा में उक्त—‘प्रभु पित मात सुहृद गुरु स्वामी ।' आदि वचन गङ्गाजलवत् निर्मल, निष्छल तथा परम पवित्र ८३१ भरत के परम पवित्र दैन्यपूर्ण भक्तिसुधासमुद्र में नयी धर्मव्याख्या का स्थान ही कहाँ ? ८३२ श्रीराम ने—‘तात भरत तुम्ह धर्म धुरीना । लोकवेदविद प्रेम प्रवीना ।।' जो कहा वह उनके अनुरूप ही है ८३२ गुरु, पिता, माता और स्वामी की आज्ञा का पालन करना सब धर्मों का आधार ८३३ उक्त आज्ञा का तुम भी पालन करो और हमसे भी पालन कराओ ८३३ प्रभु की प्रेमामृत समुद्रमयी वाणी सुनकर सम्पूर्ण समाज स्नेह-शिथिल और समाहित एवं भरत को परम-सन्तोष ८३३ गोस्वामीजी के मानस में महाराज दशरथ के प्रति महर्षि वसिष्ठ, भरद्वाज, मन्त्रिपरिषद्, परिजन एवं पुरजन सहित भरत तथा श्रीराम की परम श्रद्धा प्रकटित ८३३ वेद अनन्त ईश्वर के निःश्वास रूप होने से ईश्वरांश ८३४
( २७ )
शतकोटिरामायण की मान्यता तुक्कों द्वारा स्थापित नहीं किन्तु पुराणों द्वारा स्थापित ८३५ पुराण वेदों का विभाजन नहीं, वेदों का उपबृंहण है ८३५ आठ प्रकार के ब्राह्मणों में आनेवाले इतिहास और पुराण तो वेद ही हैं, किन्तु छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित इतिहास-पुराण विष्णु, पद्म आदि पुराण हैं ८३५ वेदों में ही इन्द्र शब्द का एक अर्थ परमेश्वर भी है, अन्यत्र देवता विशेष इन्द्र है। प्रथम की शक्ति निःसीम और द्वितीय की सीमित ८३५ "इदमित्थं कहि जात न सोई" यह अर्धाली ब्रह्म का अवतार क्यों होता है, इस अंश के लिए है ८३६ वेद सर्वज्ञ ईश्वर के निःश्वास होने से सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं ८३८ गोस्वामीजी वेद-वेदान्त सिद्धान्त के घेरे में रहकर गर्व का अनुभव करते हैं। श्रीराम उनकी दृष्टि में परम सत्य हैं, पूर्ण सत्य हैं ८३८ 'कोउ कह सत्य झूठ कह कोऊ' का वास्तविक अर्थ है—कुछ लोग जगत् को सत्य (अत्यन्ताबाध्य) कहते हैं। कुछ झूठ बन्ध्यापुत्र तथा खपुष्पवत् अत्यन्त
( २८ ) एक ब्रह्म भगवान् ही परम सत्य हैं तद्भिन्न सब मोहमूलक ८४५ श्रीराम परमार्थ सत्य हैं, उनसे भिन्न सब अपरमार्थ। व्यावहारिक या सीमित सत्य ८४५ प्रतिज्ञामात्र से वस्तुसिद्धि नहीं होती, उसके लिए प्रमाण अपेक्षित है, आन्तर वर्ण व्यवस्था, किसी विशेष गुण का सदा सब में स्थायी रूप से अस्तित्व विनिगमक न रहने के कारण, असम्भव ८४६ वाजपेय यज्ञ में ब्राह्मण और क्षत्रिय का अधिकार, राजसूय में केवल जन्मना क्षत्रिय का अधिकार और वैश्यस्तोम में वैश्य का इन सबका गुण और वृत्ति से सम्बन्ध नहीं ८४६ विद्या, तप और योनि तीनों होने से मुख्य ब्राह्मण, विद्या और तप न होने केवल जाति ब्राह्मण ८४६ शास्त्र में साङ्कर्य महान् दोष माना गया है। यदि वृत्ति से ही ब्राह्मणादि वर्ण माने जायें तब तो ब्राह्मण पति-पत्नी में भी समय-समय पर वृत्ति एवं गुणों का परिवर्तन होने के कारण प्रतिलोम सङ्करों की सृष्टि सम्भव ८४६ वेद मन्त्रानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः भगवान् के मुख, बाहु, ऊरु और पैर से उत्पन्न हैं ८४७ छान्दोग्योपनिषद् में श्वयोनि सूकरयोनि के समान ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि, वैश्ययोनि और शूद्रयोनि का वर्णन किया गया है। जैसे श्वयोनि या शूकरयोनि पाने पर जब तक वह शरीर रहता है जाति नहीं बदलती वैसे ही ब्राह्मणादि जातियों में भी यावद्देह जाति रहती है ८४७ हनुमान् पर रावण के बगीचे के फल खाने पर चौर्य का आरोप नहीं हो सकता, क्योंकि युद्ध ठन जाने पर एक राजा का दूसरे राजा की प्रभुसत्ता अस्वीकार करना वैध है ८४३ रावण का मुख्य प्रश्न था - तू कौन है, किसके बल पर तूने बन उजाड़ा और किस अपराध पर राक्षसों को मारा। हनुमान् ने उसका उचित उत्तर दिया ८४८ भगवान् वामन ने बलि की सम्पत्ति, जो उसे विजय द्वारा प्राप्त थी, दान लेकर इन्द्र को प्रदान की। यदि बलि की उसमें प्रभुसत्ता नहीं थी तो दान लेने की अपेक्षा क्यों हुई ? ८४९ जैसे स्वामी द्वारा प्रदत्त वस्तु का सेवक स्वामी होता है वैसे ही अपने कर्मों द्वारा और जैव मार्ग दाय, जय, क्रय आदि द्वारा प्राप्त सम्पत्ति का स्वामी जीव भी है ८४९ भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ इत्यादि वचनों से यह नहीं समझना चाहिए कि श्रद्धा और विश्वास ही भवानी और शङ्कर हैं, उनसे अतिरिक्त भवानी-शङ्कर नहीं हैं ८४९ श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण के लिए जीव, ब्रह्म और माया का दृष्टान्त दिया गया है, वस्तुतः जीव, ब्रह्म तथा माया या विधु, बुध और रोहिणी रूप ही राम, सीता और लक्ष्मण नहीं हैं ८४९ द्वाविंश अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल महाभारत और पाश्चात्य विद्वान् ८५१-८९९ वेदादि प्रमाणों के आधार पर कृष्ण वस्तुतः परब्रह्म थे, उन्हें किसी ने ब्रह्मपद प्रदान नहीं किया ८५४ भाषा की दृष्टि से वेदकाल-आधुनिक दृष्टि में ८५४ वस्तुतः वेद, उपनिषद् सब अनादि और अपौरुषेय ८५४ लोकमान्य के अनुसार वैशम्पायन ने जनमेजय को गीतासहित भारत सुनाया ८५४ लोकमान्य के दृष्टिकोण से महाभारतकाल-निर्णय ८५५ बौद्धधर्म ८५६
( २९ ) जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म वैदिक धर्म के पुत्र ८५७ गीता और ईसाई ८५७ बाइबिल-काल ८५९ सर विलियम जोन्स, जनरल प्रिंसेप आदि पाश्चात्य विद्वानों का मेगस्थनीज की पुस्तक में लिखित सैण्ड्राकोट्स को मौर्य्यचन्द्रगुप्त और उसकी राजधानी पालीबोथ्रा को पाटलिपुत्र मानकर महाभारत- युद्धकाल को १७०० वर्ष पीछे हटाना भ्रम ८६० पालीबोथ्रा नगरी पाटलिपुत्र और सैण्ड्राकोट्स चन्द्रगुप्त का अपभ्रंश न हो ८६० वायुपुराण के अनुसार दशक-पुत्र उदायी ने ई० पू० १३१३ में कुसुमपुर बसाया ८६० पालिबोथ्रा हेराक्लीज द्वारा ई० पू० ३०८२ में बसाया गया ८६१ पालिबोथ्रा का राजा सैण्ड्राकोट्स पौराणिक मौर्य्यचन्द्र गुप्त नहीं हो सकता । सैण्ड्राकोट्स का शासन- काल मौर्य्यचन्द्र गुप्त के शासन से ११८० वर्ष पीछे ८६१ जोन्स के वक्तव्य के समर्थन में खोज निकाले गये गुहाभिलेखों तथा स्तम्भाभिलेखों का अशोक के होना भी अनिश्चित ८६१ अशोकवर्धन का राजत्वकाल विक्रम संवत् पूर्व १३९६ से विक्रम सं० पूर्व १३७० तक २६ वर्ष है ८६१ अन्तियोकस, तुरमय ये नाम भारत के पश्चिमोय राज्यों के हैं, जो वारुण भारत के पञ्चगण नाम से महाराज सगर के पूर्वकाल से प्रसिद्ध हैं ८६२ इन्हीं का उल्लेख तथाकथित अशोक शिलालेख के दूसरे पाँचवें और तेरहवें विज्ञापनों में है ८६२ पाश्चात्यों के मतानुसार भारतीय ज्योतिष ज्ञान की महास्थूल गणना वेदाङ्गज्योतिष से भी स्थूल ८६२ सिद्धान्तगणित का ज्ञान भारत का यूनान से प्राप्त ८६२ ययाति के पुत्र तुर्वसु से यवन हुए। इस तरह ययाति के पौत्र यवनों के वंशधर यवन हैं, यूनानी नहीं, राजा बाहुपर हैहयादि राजाओं के आक्रमण के समय पञ्चगणाधिपति यवन भी उनके साथ थे ८६३ महाराज सगर ने पितुशत्रुभूत पञ्चगणों को पराजित किया। उनके शरणागत होने पर उन्हें धर्म- भ्रष्ट तथा आर्यसंस्कृतिविहीन कर निर्वासित कर दिया ८६३ यवनों का नाम देखकर उन्हें यूनानी समझना अत्यन्त भ्रांति ८६३ भारतीय कालगणना की सृष्टि के आदि से अन्त तक समान स्थिति ८६३ चान्द्र, सावन, और सौर भेद से मास तथा संवत्सर तीन प्रकार के होते हैं ८६३ भारतीय विद्वानों ने नक्षत्रमण्डल के १२ विभाग कर १२ राशियों और सात वारों का ज्ञान यूनान से सीखा, पाश्चात्यों का यह कथन सर्वथा निराधार ८६४ संक्रान्तियों का अयन, विषुव, षडशीति तथा विष्णुपद नामों से वर्णन महाभारत में वर्तमान ८६५ पञ्चाङ्गों में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण यह ज्योतिषपञ्चाङ्ग प्रसिद्ध ८६५ पञ्चाङ्गों के अनुसार आज से २०२९ वर्ष पूर्व विक्रम संवत् तथा ५०७३ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर संवत् एवं कलिसंवत्सर का आरम्भ धृतराष्ट्र के दिवंगत होने के अनन्तर युधिष्ठिरशासनकाल में ही महाभारत का निर्माण हुआ संवत् ९७७ में शिशुपालवध काव्य के टीकाकार वल्लभदेव ने महाभारत-श्लोक-संख्या सवा लक्ष कही है सवा लक्ष संख्या हरिवंशसहित महाभारत की समझनी चाहिये राजशेखर, आनन्दवर्धन, दण्डी, बाण, जयादित्य, कालिदास आदि कवि एवं विद्वानों ने अपने अपने ग्रन्थों में महाभारत की चर्चा या स्मरण किया है
( ३० ) जयादित्य से प्राचीन कुमारिल ने व्यास और उनके श्लोक का स्मरण किया है ८६७ धर्मकीर्ति ने भी भारत की चर्चा की है ८६७ भर्तृहरि, सुबन्धु एवं योगभाष्यकार द्वारा अपने-अपने ग्रन्थों में महाभारत के श्लोक उद्धृत ८६७ महाराज सर्वनाथ के संवत् १९१-२१४ तक के उपलब्ध शिलालेखों एवं ताम्रलेख में महाभारत के एक लाख श्लोक मान्य ८६७ उनसे भी प्राचीन शबरस्वामी तथा वात्स्यायन द्वारा महाभारत-श्लोक उद्धृत ८६७ स्कन्दस्वामी से पूर्ववर्ती आचार्य दुर्ग द्वारा निरुक्त-भाष्य में महाभारत-श्लोक उद्धृत ८६८ सन् ५७ ई० में हुए लङ्कावतार सूत्र के चीनी अनुवाद में उद्धृत श्लोकों में व्यास और महाभारत का नाम ८६८ वररुचि के वाररुच निरुक्त समुच्चय में 'इति व्यासवचनम्' वर्णित ८६८ बृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य के समय महाभारत विद्यमान था ८६८ अतएव उसके अनुवादभूत कथासरित्सागर में महाभारत की कई कथाओं का उल्लेख ८६८ विक्रमादित्यस्थापित संवत् के सम्बन्ध में शङ्का-समाधान ८६८ विक्रमसंवत्, शकसंवत्, सन्संवत् तथा गुप्तसंवत् भी प्रारम्भिक शताब्दियों में तत्तत् न.मों के रूप में उत्पन्न ८७० मेरुतुङ्गाचार्य ने विचारश्रेणी नामक अपने ग्रन्थ में उज्जयिनी का वर्णन करते हुए कहा है कि महावीर-निर्वाण ईसवीय सन् के प्रारम्भ से ५२७ वर्ष पूर्व हुआ था : उसके ५७० वर्ष बाद शकों का उन्मूलन कर मालव के राजा विक्रमादित्य का उदय होगा ८७१ विक्रमादित्य की पण्डितभूयिष्ठा परिषत् एवं धन्वन्तरि आदि नवरत्नों का वर्णन तथा उनमें से कतिपय के ग्रन्थों का परिचय ८७१ वराहमिहिर का काल, पञ्चतन्त्र के फारसी भाषा में अनुवाद का काल एवं प्रचलित शकसंवत् से अतिरिक्त शकसंवत् का साधन ८७२ वराहमिहिर विरचित पञ्चसिद्धान्तिका का काल ८७२ उसकी परीक्षा पं० सुधाकर द्विवेदी द्वारा प्रचलित शकसंवत् में ४२७ घटाने से की तो वार ठीक नहीं निकला । प्रसिद्ध गणितज्ञ श्रीवेङ्कटाचार्य ने ईस्वी पूर्वभावी शक को ही शक शब्द से लेकर परीक्षण किया तो सब ठीक निकला ८७३ वराहमिहिर का जन्मकाल ८७४ पुष्पमित्र के पुरोहित महाभाष्यकार पतञ्जलि ने प्राचीन नाटक का श्लोक उद्धृत किया है जो महाभारत-श्लोक से मिलता है ८७४ 'कालः पचति भूतानि' इत्यादि महाभारत का श्लोक पा० सू० ३।३।१६७ के महाभाष्य से उद्धृत ८७४ चरकसंहिता में विष्णुसहस्रनाम का विधान है ८७५ विष्णुसहस्रनाम में 'रामो विरामो विरतः' राम का नाम है, अतः राम और रामायण अतिप्राचीन ८७५ विष्णुगुप्त के अर्थशास्त्र में महाभारत की छायावाले श्लोकों का अस्तित्व, उनसे भी प्राचीन, पाणिनि ने महाभारत तथा तत्सम्बन्धी शब्दों की सिद्धि की है, अतः उनसे महाभारत प्राचीन ८७५ आश्वलायन के गुरु शौनक महाभारत-युद्ध के ३०० वर्ष पश्चात् दीर्घ सत्र कर रहे थे । आश्वलायन गृह्यसूत्र में भारत और महाभारत दो नाम है कौषीतकिगृह्यसूत्र में महाभारत का नाम आया है । इससे निश्चित है महाभारत युद्ध के पश्चात् ३०० वर्षों के भीतर महाभारत प्रख्यात था ८७५
( ३१ ) बेबर आदि का महाभारत में यवन शब्द देखकर महाभारत सिकन्दर के आगमन के बाद का कहना भ्रम है। यवन शब्द यूनानियों के अर्थ प्रयुक्त नहीं ८७५ महाभारत में प्राचीन पुरुषों का उल्लेख होने और आधुनिकों को उल्लेख न होने से महाभारत की प्राचीनता सिद्ध ८७६ भास के नाटक बालचरित में कृष्णलीलाओं तथा गोपियों का उल्लेख होने से भास के पूर्व महाभारत की कथाएँ प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी थीं, यह सिद्ध ८७६ बौधायनगृह्यसूत्र में विष्णुसहस्रनामस्तव का उल्लेख तथा 'पत्रं पुष्पं फलं तोयमम्' आदि गीता- श्लोक का उल्लेख होने से ईस्वी सन् से अति प्राचीन बौधायन गृह्यसूत्र से भी महाभारत प्राचीन ८७६ अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग परीक्षणों से महाभारत ५००० वर्ष प्राचीन सिद्ध ८७६ महाराज जनमेजय केताम्रशासन पत्र से श्रीरामपूजा हजारों वर्षों से प्रचलित एवं भारत की हजारों वर्ष प्राचीनता सिद्ध बुद्ध के पश्चात् ईसा से पूर्व तीसरी शती में रामायण का निर्माण हुआ, यह पाश्चात्य कल्पना असङ्गत ८७७ चालुक्य वंशीय महाराज पुलकेशिन् द्वितीय के ऐहोल नामक पर्वतीय क्षेत्र में स्थित जैन मन्दिर में उत्कीर्ण शिलालेख से महाभारत-संग्राम का यही समय सिद्ध है। उसमें महाभारत युद्ध के ३७३५ वर्ष बीतने पर यह शिलालेख ५५६ शकाब्द में उत्कीर्ण हुआ लिखा है ८७८ पुराणों की मान्यता ८७८ बौद्धपरम्परा में बुद्धनिर्वाण के विषय में अनेक मतभेद ८८० वेदों में रामायणसम्बन्धी व्यक्तियों के उल्लेख ८८० भारतीय दृष्टिकोण से काल का पैमाना ८८१ सत्ययुग-काल का परिमाण ८८२ त्रेतायुग-काल का ,, ,, द्वापरयुग-काल काल का ,, ,, कलियुग-काल का ,, ,, ब्रह्मा का इस संवत् २०२९ तक का काल ८८३ रामायण के अनुसार समुद्र-मन्थन ११ करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था ८८३ शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत। भागवत के अनुसार अजनाभ नाम से पहले प्रसिद्ध इस देश का ऋषभ-पुत्र भरत के नाम से भारत नाम हुआ। कल्पभेद से दोनों पक्ष सत्य ८८३ वृत्रवध होने के बाद सतयुग में तारकामय देवासुरसंग्राम हुआ, उसमें वृहस्पति देवताओं के सहायक थे, अतः वृहस्पति को ई० शती २-४ के मध्य मानना अत्यन्त असंगत ८८४ वैवस्वत मन्वन्तर की सन्धि में उत्पन्न बौधायन, आपस्तम्ब आदि प्राचीन भृगु, पुलस्त्य आदि सप्तर्षि त्रेतायुग में उत्पन्न उन्हें वेदमन्त्र बिना बुद्धि और प्रयत्न के अपने आप अनायास प्रस्फुरित ८८४ प्रथम त्रेता में अत्रिपुत्र सोम, सोमपुत्र बुध और बुधपुत्र पुरूरवा हुए ८८५ त्रेता में ही परशुराम का आविर्भाव हुआ ८८६ २४ वें त्रेता में पुरोहित वसिष्ठ के साथ दशरथ-पुत्र राम विष्णु के अवतार रावणवधार्थ होंगे ८८६ महाभारत केवल व्यास निर्मित ८८६ सुमन्तु, जैमिनी, वैशम्पायन, पैल, सूत्र, भाष्य, भारत और महाभारत धर्माचार्य हैं ८८८
( ३२ ) आस्तिकों की दृष्टि में महाभारत का अतिशयित महत्त्व ८८९ व्यासजी ने ६० लाख श्लोकों की दूसरी भारत-संहिता रची, जिसकी विभिन्न लोकों में विभिन्न लक्ष संख्या विभिन्न लोगों ने सुनायी ८९० वर्तमान समय में उपलभ्यमान लक्ष श्लोकात्मक ग्रन्थ ही महाभारत है। वही भारत या जयनामक इतिहास है और वह व्यासकृत ही है ८९० भारतीय संस्कृति में प्रत्यक्ष और अनुमान से अतिरिक्त आगम भी प्रमाणत्वेन मान्य ८९० वेद के उपबृंहणार्थ आर्षज्ञानसम्पन्न त्रिकालज्ञ विष्णु भगवान के अवतार व्यास द्वारा महाभारत विरचित ८९१ सर्वज्ञकल्प भगवान् व्यास द्वारा आर्ष विज्ञान से अतीत और अनागत का वर्णन ८९१ श्रीगणेशजी ने शर्त के साथ एक लक्षश्लोकात्मक महाभारत लिखा ८९२ तीन वर्षों के निरन्तर प्रयत्न से महाभारत की रचना हुई ८९२ लक्षश्लोकात्मक महाभारत विष्णु के अवतार सर्वज्ञ व्यास द्वारा विरचित, इस सम्बन्ध में विविध पुराण वचनों का उल्लेख ८९४ महाभारत का जयेतिहास नाम पड़ने का कारण ८९६ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, के उपदेश के साथ पूर्ववृत्तों का वर्णन ही इतिहास है ८९७ महाभारत-निर्माण का काल निर्णय ८९७ परिशिष्ट ( १ ) रामापासना ९०३ परिशिष्ट ( २ ) उद्धृत ग्रन्थों की अनुक्रमणिका ९५९
संकेत-सूची अग्निपु० } अग्निपुराण अ० पु० } अथ० सं० } अथर्वसंहिता अथर्वसं० } अ० रा० अध्यात्मरामायण अ० शा० अर्थशास्त्र आप० सू० आपस्तम्बसूत्र आ० रा० आनन्दरामायण ईशा० उ० ईशावास्योपनिषद् उ० रा० च० उत्तररामचरित ऋ० सं० ऋग्वेदसंहिता ऐ० ब्रा० ऐतरेयब्राह्मण क० उ० } कठोपनिषद् कठ० उ० } काम० नीति० कामन्दकीयनीतिशास्त्र कम्ब० रा० कम्बरामायण काव्यप्र० काव्यप्रकाश का० मा० का० के० मा० } काशीकेदारमाहात्म्य काशी० के० मा० का० सं० } काठकसंहिता काठ० सं० } कूर्म० पु० कूर्मपुराण कौ० गृ० सू० कौशिकगृह्यसूत्र कौ० उ० कौषीतकि उपनिषद् कौ० ब्रा० कौषीतकिब्राह्मण ग० पु० गरुड़पुराण गी० गीता गो० ब्रा० गोपथब्राह्मण गौ० रा० गौड़ीयपाठ रामायण गौ० सू० भा० गोतमसूत्र-भाष्य छा० उ० छान्दोग्योपनिषद् जै० सू० जैमिनिसूत्र त० सं० रा० तत्त्वसंग्रहरामायण ताण्ड्यम० ताण्ड्यमहाब्राह्मण तार० उ० तारसारोपनिषद् तै० आ० तैत्तिरीय आरण्यक तै० उ० तैत्तिरीयोपनिषद् तै० ब्रा० तैत्तिरीयब्राह्मण तै० सं० तैत्तिरीयसंहिता दु० स० दुर्गासप्तशती दु० स० मू० दुर्गासप्तशतीमूर्तिरहस्य दे० भा० देवीभागवत ना० प्र० पत्रिका नागरीप्रचारिणी पत्रिका ना० शा० नाट्यशास्त्र नृ० उ० ता० नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् नृसिं० पु० नृसिंहपुराण नै० नैरुक्तवचन प० पु० } पद्मपुराण पद्म० पु० } पा० गृ० सू० पारस्करगृह्यसूत्र पा० सू० पाणिनिसूत्र पु० सू० पुरुषसूक्त प्र०उ० प्रश्नोपनिषद् प्र० वार्तिक प्रमाणवार्तिक बुद्ध० च० } बुद्धचरित बु० च० } वृ० उ० बृहदारण्यकोपनिषद् वृह० ना० पु० बृहन्नारदीयपुराण वृह० पु० बृहद्धर्मपुराण वृ० सं० बृहत्संहिता ब्रह्मवै० } ब्रह्मवैवर्तपुराण ब्र० वै० पु० } ब्र० पु० ब्रह्मपुराण ब्र० सू० शा० भा० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य
( २ ) भ० गी० भगवद्गीता | रा० मा० रामचरितमानस भा० ⎫ | ला० श्रौ० सू० लाट्यायनश्रौतसूत्र भाग० ⎬ भागवतपुराण | लि० पु० लिङ्गपुराण भा० पु० ⎭ | वा० प० वाक्यपदीय भा० टी० भागवतटीका श्रीधरी | वायुपु० वायु पुराण म० ⎫ | वा० रा० वाल्मीकिरामायण मनु० ⎭ मनुस्मृति | वा० रा० दा० पा० वाल्मीकिरामायण दाक्षि- मत्स्यपु० ⎫ | णात्य पाठ म० पु० ⎭ मत्स्यपुराण | वा० रा० प० पा० वाल्मीकिरामायण पश्चि- महाभा० पु० महाभागवतपुराण | मोत्तरीय पाठ म० भा० ⎫ | गौ० पा० गौडीय पाठ महाभा० ⎭ महाभारत | विष्णुध० पु० विष्णुधर्मोत्तरपुराण मा० मु० मानसमुक्तावली | विष्णु० ⎫ मा० सं० माध्यन्दिनसंहिता | विष्णुपु० ⎭ विष्णुपुराण मी० द० मीमांसादर्शन | विष्णुस्मृ० विष्णुस्मृति मु० उ० मुण्डकोपनिषद् | श० ब्रा० शतपथब्राह्मण मू० रा० मूलरामायण | शा० भा० शाङ्करभाष्य मै० सं० मैत्रायणीसंहिता | शु० नी० शुक्रनीति यजुःसं० ⎫ शुक्लयजुर्वेदसंहिता | श्वे० उ० श्वेताश्वतरोपनिषद् शुक्लयजुः० ⎭ | श्लो० वा० श्लोकवार्तिक या० स्मृ० याज्ञवल्क्यस्मृति | सीता उ० सीतोपनिषद् र० वं० ⎫ | सौ० पु० सौरपुराण रघुवं० ⎬ रघुवंश | स्कन्दपु० स्कन्दपुराण रघु० ⎭ | हनु० चा० हनुमानचालीसा रा० उ० ता० रामोत्तरतापिनो | हनु० ना० हनुमन्नाटक रा० पू० ता० रामपूर्वतापिनो | ह० वं० पु० हरिवंशपुराण रा० ता० रामतापनी |
(चित्र-फलक: श्रीराम दरबार — प्रभु श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण जी एवं श्री हनुमान जी) 38. RAM LAKSHMAN...
गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस
ॐ रामायणमीमांसा प्रथम अध्याय परब्रह्मस्वरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य सौन्दर्यसारसर्वस्वं माधुर्यगुणबृंहितम् । ब्रह्मैकमद्वितीयं तत् तत्त्वमेकं द्विधा कृतम् ॥ वेदादिशास्त्रसंवेद्यं सीतारामस्वरूपकम् । सरहस्यं सतां सेव्यमद्भुतं प्रणमाम्यहम् ॥ श्रीसीता-राम का अनुपम ऐश्वर्य श्रीसीता और श्रीराम अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के अधिष्ठान स्वप्रकाश परब्रह्मस्वरूप हैं। वे ही सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि बाह्य ज्योतियों तथा श्रोत्र, नेत्र, मन, बुद्धि, चित्त, जीव, दैवत आदि आन्तर ज्योतियों के भी ज्योति हैं। वे ही ईश्वर के ईश्वर, ब्रह्मा के ब्रह्मा, ज्ञान के ज्ञान, आनन्द के आनन्द तथा अनुपम अचिन्त्य अनन्त कल्याण गुणगणों के निधान हैं और सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य, सौशील्य, आभा, प्रभा, शोभा, कान्ति, शान्ति प्रभृति दिव्य गुणों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी-समुदायों से सेव्य, अतएव अनन्त लक्ष्मियों की भी लक्ष्मी हैं— “सूर्यस्यापि भवेत्सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्त्त्याः कीर्त्तिः क्षमा-क्षमा ॥” (वा० रा० २।४४।१५) । श्रीसीता प्रेमसारसर्वस्व राम की सौन्दर्यसारसर्वस्व श्रीसीता-राम का स्वरूप सुषमाकामधेनु के सौन्दर्य-पयोराशि से जनित नवनीत से निर्मित है। म्रदिमा की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के चरणकमल कमल से भी कोटिगुण अधिक सुकोमल हैं। वह म्रदिमा की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी अपने लोकोत्तर सुकोमल हस्तारविन्द से श्रीसीता के चरणारविन्द का स्पर्श करने में अपने पाणिपङ्कज को कठोर समझ कर सकुचाती है। श्रीतुलसीदासजी के अनुसार सीता अनुपमेय हैं। ज्ञान-विज्ञान की अधिष्ठात्री राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी भी अनेक कारणों से श्रीसीता की उपमानश्रेणी में नहीं आ सकतीं। श्रीमहालक्ष्मी के प्राकट्य के लिए क्षीरसमुद्र का मन्थन करना पड़ा था। तदर्थ मन्दराचल को मन्थानदण्ड बनाना पड़ा था। मन्दराचल को धारण करने के लिए भगवान् को कच्छपावतार धारण करना पड़ा था। वासुकि नागरूपी रज्जु से मन्दराचल को निबद्ध कर देवताओं, दानवों तथा स्वयं श्रीविष्णु को मन्थन करने का आयास करना पड़ा था, तब महालक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ था, पर आनन्दसिन्धुसार-सर्वस्व भगवान् राम के माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री राघवेन्द्र-प्राणेश्वरी श्रीसीता के उपमान के लिए वह पर्याप्त नहीं है। हाँ, यदि क्षीरसागर के बदले छविसुधा-सागर हो और पाषाणमय
२ रामायणमीमांसा प्रथम मन्दराचल के स्थान में शृङ्गाररूप मन्दराचल हो और उसका आधारभूत कच्छप भी परम रूपमय हो, वासुकि नाग के स्थान में शोभामयी रज्जु हो और मन्थन करनेवाले देवता आदि के स्थान में साक्षात् आधिदैविक काम ही स्वयं अपने पाणिपद्म से मन्थन का कार्य करें तो इस विधि-विधान से जो अलौकिक लक्ष्मी प्रकट होगी वही कथञ्चित् श्रीसीता का उपमान बन सकती है। विजयलक्ष्मी, साम्राज्यलक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, माधुर्यलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी प्रभृति सब लक्ष्मियाँ अनायास ही वहाँ उपस्थित हो जाती हैं जहाँ श्रीसीता के कृपाकटाक्ष-लेश का उन्मेष होता है। अनुपम प्रेम, अनुपम सौन्दर्य एक दूसरे से अभिन्न हैं। प्रेमसार-सर्वस्व राम हैं एवं सौन्दर्यसार-सर्वस्व श्रीसीता हैं। राघवेन्द्र-हृदयेश्वरी श्रीसीता के अरुण चरणारविन्द की अरुण रज ही श्रुति-सीमन्तिनीजनों के सीमन्त का सिन्दूर है अर्थात् श्रीसीता के चरणारविन्दों की रज से ही श्रुतियाँ सौभाग्यशालिनी होती हैं। श्रीसीता राम की महाशक्ति एवं सर्वस्व हैं सीतोपनिषद् में कहा है, अनेकरूपा श्रीसीता के अनुग्रह से वेद एवं वेदवेद्य परमात्मा सौभाग्यशाली होते हैं। जैसे शीतलता, मधुरता एवं पवित्रता ही गङ्गा के प्रवाह का सार है तथा मधुरिमा अमृत का सर्वस्व है, वैसे ही आनन्द- सिन्धु सुखराशि श्रीराघवेन्द्र के माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी ही सीता हैं। यद्यपि श्रीसीता और राम दोनों परस्पर अभिन्न प्रेमसौन्दर्यसार हैं; उनमें चन्द्र तथा चन्द्रिका का एवं भास्कर तथा प्रभा का जैसा अभेद सम्बन्ध है। अमृतसिन्धु का उसके माधुर्य से विप्रयोग की कल्पना असम्भव है। श्रीसीता और राम का सम्बन्ध तो पूर्वोक्त उदाहरणों से भी अत्यधिक घनिष्ठ है, वह कैसे विच्छिन्न हो सकता है। फिर भी श्रीसीताजी राम की अनन्य भक्ति एवं अनन्य सेवा स्वरूप होने के कारण संप्रयोग-विप्रयोगात्मक उद्बुद्ध उभयविध शृङ्गाररससार-सर्वस्वस्वरूपा हैं। यही कारण है कि उनका जहाँ अखण्डरूप से श्रीराम के साथ नित्य सम्बन्ध है, वहीं उनका श्रीराम के साथ चिर-विप्रयोग भी परिलक्षित होता है। विप्रयोग शृङ्गार का महत्त्व रसिकों की दृष्टि में संप्रयोग शृङ्गार से कहीं अधिक है। तभी तो किसी ने कहा है— “सङ्गमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न सङ्गमस्तस्य ।” सङ्गम और विरह का वरदान मिल रहा हो तो भक्त विरह का वरदान माँगेगा, सङ्गम का नहीं; क्योंकि सङ्गम से प्रियतम का सम्मिलन सीमित होता है, परन्तु विरह में तो प्रियतम ही सर्वत्र सर्वरूप से अन्तःकरण, अन्तरात्मा, प्राणों तथा रोम-रोम में निरन्तर मिलते रहते हैं। उसी की अनुभूति श्रीराम इस प्रकार करते हैं— कुवलय विपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥ जे हित रहे करत तेई पीरा। उरग-स्वास सम त्रिविध समीरा॥ तत्त्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ सो मनु रहत सदा तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥ (रा० मा० ५।१४।२-४) लोक में जो उत्कण्ठा प्रिय के विप्रयोग में होती है वह संयोग में नहीं होती, पर प्रियतम के बिना उस उत्कण्ठा का रसास्वादन ही नहीं होता और जब प्रियतम हैं तब वह उत्कण्ठा नहीं होती। इसी दृष्टि से श्रीसीता-राम में सर्वदा सर्वाङ्गीण सम्मिलन-संश्लेष रहने पर भी औपाधिक विश्लेष की अभिव्यक्ति होती है जिसमें प्रियतम की उपस्थिति से भी उत्कट उत्कण्ठा अनुभूत होती है और उत्कट उत्कण्ठा के साथ ही साथ प्रियतम का पूर्ण परिष्वङ्ग प्राप्त होता है। उत्कण्ठापूर्ण परिष्वङ्ग ही पूर्ण भक्ति है, वही पूर्ण सेवा है, वही प्रभु-प्राप्ति का साधन है एवं वही फल भी है। वही सीता है, वही श्रीराम का हृदय है और वही लोकोत्तर माधुर्य है। “श्रीराम” इस महामन्त्र में ‘श्री’ शब्द से श्रीसीता का ही उल्लेख हुआ है। ‘श्री’ शब्द का “श्रयति इति श्रीः” इस व्युत्पत्ति से सेवा करनेवाली
अथाऽयं परब्रह्मरूप सीताराम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ३ श्रीसीता महालक्ष्मी का नाम ही 'श्री' है। भावार्थक प्रत्यय करने पर भी श्रीशब्द का अर्थ सेवा एवं भक्ति है। उत्कट उत्कण्ठापूर्वक मन, बुद्धि, चित्त एवं अन्तःकरण तथा अन्तरात्मा का तन्मयतापूर्ण प्रियतम-परिष्वङ्ग ही 'सेवा' है, वही 'श्री' सीता हैं। वही “श्रीयते सर्वगुणैर्या सा श्रीः” के अनुसार सकल-कल्याणों की अधिष्ठात्री शक्तियों द्वारा सेव्या और वन्दनीया हैं। कान्ति, शान्ति, आभा, प्रभा, शोभा आदि सभी दिव्य शक्तियाँ उस श्रीसीता की सेविकाएँ हैं। “श्रीयते हरिणापि या सा श्रीः” के अनुसार श्रीराम भी उसी श्रीसीता की सेवा एवं आराधना करते हैं। आत्माराम का स्वरूपमाधुर्य ही आत्मा है। उसमें आसमन्तात् रमण करना ही आत्माराम की आत्मारामता है। आत्मा ही परप्रेमास्पद होता है। आत्मज्ञों का वही सेव्य है। आनन्दसिन्धु राम का माधुर्यसारसर्वस्व सीता ही आत्मा है। वही परप्रेमास्पद है, वही परम सम्भजनीय एवं परम वरेण्य राम का स्वरूपभूत भर्ग है। ऐश्वर्य की दृष्टि से भी अद्भुतरामायण के अनुसार श्रीनारद के उपदेश से श्रीराम ने सीता की ध्यान, स्तुति, स्तोत्र आदि द्वारा आराधना की थी और सदा ही करते रहते हैं। माधुर्य की दृष्टि से सीता श्रीराम की विशुद्ध अन्तरात्मा हैं। ऐश्वर्य की दृष्टि से सीता ही श्रीराम के ऐश्वर्य का मूलमन्त्र महाशक्ति हैं। शक्ति के बिना ब्रह्म में अनन्तब्रह्माण्डोत्पादकत्व, सर्वपालकत्व, सर्वसंहारकत्व आदि कुछ भी नहीं हो सकता है। तभी तो अध्यात्मरामायण में श्रीसीता ने कहा है—"सृष्टि, स्थिति आदि तथा शिवधनुर्भङ्ग, रावण-वध आदि सब कार्य मैं ही करती हूँ। श्रीराम तो सर्वथा निर्विकार, कूटस्थ चिदानन्दघनमात्र हैं।" अभिन्नरूप श्रीसीता-राम की सेवा-शिक्षाप्रदानार्थ भिन्नरूपता इसी तरह श्रीसीता श्रीराम की सेविका हैं 'श्री' हैं, शोभा हैं और वही श्रीराम की सेवा हैं, आराधना हैं एवं मूर्तिमती अलभ्य, दुर्लभ, भक्तसर्वस्व भक्ति हैं। वही श्रीराम की ऐश्वर्यशक्ति हैं, महाशक्ति हैं, महालक्ष्मी हैं और वही सीता सर्वगुणों की सेव्या तथा आराध्या हैं। वही श्रीराम की आराधनीया हैं एवं वही श्रीराम के स्वरूपभूत माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री परप्रेमास्पदरूपा श्रीराम की आत्मा हैं। इस तरह यद्यपि सीता ही राम हैं, राम ही सीता हैं इसमें किञ्चिन्मात्र भी अन्तर नहीं है तथापि “सेवक-सेव्य भाव बिनु भव न तरिय उरगारि” (रा० मा० ७।११९ [क]) के अनुसार वही अभिन्न होते हुए भी उपासना, आराधना तथा सेवा की शिक्षा देने के लिए सीता-राम दो रूपों में प्रकट हैं। “कृष्णश्चैव बृहद्वलः” (वा० रा० ६।११९।१५) के अनुसार श्रीराम ही श्रीकृष्णरूप में प्रकट हुए हैं और उस स्थिति में श्रीसीता की मुख्य शक्ति श्रीकृष्ण-प्राणेश्वरी श्रीराधा के रूप में प्रकट होती हैं। अन्य शक्तियाँ रुक्मिणी आदि के रूप में प्रकट होती हैं। श्रीराम ही यथावसर महाकामेश्वर के रूप में प्रकट होते हैं। उस समय श्रीसीता की अभिन्न शक्ति ही कामेश्वराङ्कनिलया राजराजेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी के रूप में प्रकट होती है। श्रीराम ही जब अनन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक सर्वविधाता बनते हैं तब श्रीसीता ज्ञान-विज्ञान की अधिष्ठात्री महासंवित् सरस्वती बन जाती हैं। जब श्रीराम विश्वपालक विष्णुरूप में व्यक्त होते हैं तब श्रीसीता ही अनन्त ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री महापालिनी, महालक्ष्मीरूप में प्रकट होती हैं। श्रीसीता रघुकुलकमल-दिवाकर श्रीराम की प्रभा तथा रामचन्द्र की चन्द्रिका हैं। आनन्दसिन्धु श्रीराम में वह माधुर्यसार-सर्वस्व हैं। अध्यात्मरामायण के अनुसार जितने पुरुषवाचक शब्द हैं उनका अर्थ श्रीराम है जितने स्त्रीवाचक शब्द हैं उनका अर्थ श्रीजनकनन्दिनी 'जानकी' ही है। श्रीसीता मूल- प्रकृति ही नहीं किन्तु वह चित्स्वरूप परमतत्त्व भी हैं— “यो ह वै श्रीपरमात्मा नारायणः स भगवान्” “कलातीता भगवती सीतेति चित्स्वरूपा” (तार० उ० पा० ३)
४ रामायणमीमांसा प्रथम सर्वनियन्ता परमेश्वर का अस्तित्व अवश्य मान्य है दिन के पहले रात एवं रात के पहले दिन होता है। बीज के पहले अङ्कुर एवं अङ्कुर के पहले बीज का होना अनिवार्य है। इसी प्रकार सोने के पहले जागना और जागने के पहले सोना होता है, सृष्टि के पहले प्रलय, प्रलय के पहले सृष्टि एवं कर्म के पहले जन्म, जन्म के पहले कर्म का होना अनिवार्य है। जन्ममूलक देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहङ्कार आदि की हलचल ही कर्म है। लोक में शुभ कर्म का शुभ फल एवं अशुभ कर्म का अशुभ फल होता है। संसार में आकस्मिक कोई वस्तु नहीं होती, कार्यकारणभाव सर्वत्र ही स्पष्टरूप से देखा जाता है। मेज, घट, प्रासाद, मोटर, वायुयान, राकेट आदि सभी विलक्षण कार्यों का निर्माण किसी ज्ञानवान्, इच्छावान् तथा क्रियावान् चेतन द्वारा ही देखा जाता है। ठीक इसी प्रकार वृक्ष, भूमि, भूधर, चन्द्र, सूर्य, सागर आदि का निर्माण भी किसी ज्ञानवान्, क्रियावान् तथा चेतन के द्वारा ही सम्भव है। हाँ, लौकिक छोटे-छोटे कार्य अल्पशक्ति, अल्पज्ञ चेतन जीव के द्वारा निर्मित होते हैं, परन्तु विश्व-प्रपञ्च का निर्माण अल्पज्ञ अल्पशक्ति जीव द्वारा सम्भव नहीं; अतः उसके निर्माण के लिए सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर स्वीकार्य होते हैं। लोक में भी अचेतन देह आदि या अचेतन कर्म स्वयं अपना फल नहीं दे सकते हैं, उनका फलदाता चेतन राजा आदि ही होता है। उसी प्रकार जीवों के कर्मों का फल भी स्वयं कर्म नहीं दे सकते। जड़ प्रकृति भी फल देने में समर्थ नहीं है। जीव चेतन होने पर भी जब अपने एक जन्म के कर्मों एवं उनके फलों को नहीं जानता है तब अन्य अनेक जन्मों के कर्मों को कैसे जान सकेगा ? उसमें फल देने की भी क्षमता नहीं है, अतः अनन्त ब्रह्माण्डों तथा एक ब्रह्माण्ड के अनन्त जीवों एवं एक जीव के अनन्त अनन्त कर्मों तथा उनके विचित्र फलों को जाननेवाला और तदनुसार फल देने की क्षमता से सम्पन्न सर्वशक्तिमान् सर्वनियन्ता परमेश्वर का अस्तित्व अवश्य ही मानना होगा। संसार का सञ्चालन नियमों पर ही आदृत है। सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, शुक्र आदि ग्रहों की गति और उदय-अस्त सभी नियमित हैं। यदि उनकी गति अनियमित हो तो वे आपस में ही टकराकर विश्व-विप्लव उपस्थित कर सकते हैं। समुद्र का ज्वार-भाटा तथा विभिन्न चेतना-चेतन पदार्थों के गुण और स्वभाव नियमित परिलक्षित होते हैं। कल्प, युग, वर्ष, पक्ष, दिन, प्रहर, दण्ड की कौन कहे क्षण-क्षण का हिसाब-किताब प्रकृति में नियत है। नियमों का पालन भी तभी हो सकता है जब उनके पीछे कोई सावधान नियामक शासक होता है। इस दृष्टि से भी सब प्राकृतिक नियमों का व्यवस्थापक, पालक एवं नियामक सर्वज्ञ सर्वेश्वर अत्यावश्यक है। अपौरुषेय वेद ही परमेश्वर का शाश्वत संविधान है इस तरह अनादि जीव, जगत् आदि सभी संसार एवं उसके अनादि प्राकृतिक नियमों के व्यवस्थापक सर्वनियन्ता, सर्वज्ञ तथा सर्व-शक्तिमान् प रमेश्वर की सत्ता स्वीकार किये बिना कोई भी व्यवस्था नहीं चल सकती; अतः जैसे लोक में शासक, शिष्ट (शासित) और शासनविधान (कॉस्टीट्यूशन) आवश्यक होते हैं, वैसे ही समष्टि विश्व-प्रपञ्च में भी जीव एवं जगत् शासित हैं, परमेश्वर उनका शासक है और वेदादि शास्त्र ही शासन-विधान हैं। लौकिक शासित, शासक आदि सादि होते हैं; अतः उनका संविधान भी सादि होता है, पर विश्व-प्रपञ्च की दृष्टि से अनादि जन्म-कर्म का आधार होने से जीव अनादि है एवं विश्व-निर्माता नियामक भी अनादि है; अतः उसका संविधान वेदादि भी अनादि है। इसी दृष्टि से वैदिक सनातन हिन्दू-धर्म और दर्शन के सिद्धान्तानुसार वेद अनादि, अपौरुषेय और नित्य कहा जाता है। ऋग्वेद के "वाचा विरूपनित्यया" (ऋ० सं० ८।७५।६) इस मन्त्र में वेदवाणी को नित्य कहा गया है। सर्वप्राचीन विधान-विशेषज्ञ मनु ने वेद-वाक्यों से विश्व-प्रपञ्च का निर्माण एवं वेदों से ही धर्म का ज्ञान माना है—
अध्याय परंब्रह्मरूप सीताराम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ५ “वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ।” ( मनु १।२१ ) “प्रमाणं परमं श्रुतिः ।” ( मनु २।१३ ) व्यासजी ने भी “शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्” (ब्र० सू० १।३।२८) से वेद को नित्य कहा है । किसी कर्ता के द्वारा कोई भी कार्य ज्ञानपूर्वक ही होता है और ज्ञान या विचार के साथ कोई न कोई भाषा भी होती है । इस दृष्टि से विश्व-निर्माण के अव्यवहित पूर्व में होनेवाले ईश्वरीय ज्ञान की भाषा वैदिक भाषा ही है । अर्थात् ईश्वरीय ज्ञान वैदिक शब्दों से अनुविद्ध ही होते हैं । वाक्यपदीय के अनुसार कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं होता जिसमें सूक्ष्मरूप में शब्दों का सम्पर्क न हो— “न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।” ( वा० प० १।१२३ ) सभी ज्ञान शब्द से सम्बद्ध ही होते हैं— “अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥” ( वा० प० १।१२३ ) “अत एव च नित्यत्वम्” ( ब्र० सू० १।३।२९ ) इत्यादि सूत्रों द्वारा वेद को अनादि एवं नित्य कहा गया है । “मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।” ( आप सू० ) इस आपस्तम्बसूत्र के तथा व्यास, जैमिनि आदि के अनुसार मन्त्र-भाग तथा ब्राह्मण-भाग वेद कहा जाता है । आरण्यक तथा उपनिषदों का भी अन्तर्भाव ब्राह्मणग्रन्थों में ही है । कुछ उपनिषदों का अन्तर्भाव मन्त्र-भाग में है । इस तरह मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ये सभी वेद हैं । वेदों का स्वतःप्रामाण्य पुरुष-निर्मित ग्रन्थों में पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों से उनके दूषित होने की सम्भावना होती है; क्योंकि पुरुषमात्र में प्रायः उक्त दोष सम्भावित होते हैं । अतएव पौरुषेय ग्रन्थों का प्रामाण्य तभी होता है जब उनके मूल पुरुष का आप्तत्व निश्चित हो जाय । अपौरुषेय वेद तो स्वतः समस्तपुरुषदोषशङ्कारूपी कलङ्क से विरहित होने के कारण स्वतःप्रमाण हैं । सामान्यतः प्रत्यक्षादि प्रमाण भी अपनी उत्पत्ति में कारण की अपेक्षा रखते हैं, पर अपने स्वार्थबोधनरूप कार्य में अन्य की अपेक्षा न रखने से वे भी स्वतःप्रमाण माने जाते हैं । कारणदोष एवं विषय-बाध से उनका अप्रामाण्य होता है । पित्तादि कारणदोष के ज्ञान से “पीतः शङ्खः”, “तिक्तः गुडः” इस ज्ञान का अप्रामाण्य होता है । एवं शुक्ति में “नेदं रजतम्” इस बाध-ज्ञान से “इदं रजतम्” ज्ञान का अप्रामाण्य होता है । जो लोग एक प्रमाण के प्रामाण्य के लिए अन्य प्रमाण की अपेक्षा मानते हैं उनके मत में अनवस्थादोष अनिवार्य है । यदि किसी अन्तिम ज्ञान को स्वतःप्रमाण मानना ही है तो प्रथम को ही स्वतःप्रमाण क्यों न माना जाय ? जो लोग यह समझते हैं कि प्रथम जल-ज्ञान के प्रामाण्य का निश्चय संवादी ज्ञान अर्थात् स्नान, पान आदि सफल प्रवृत्ति-ज्ञान से होता है; उसमें सन्देह का अवकाश नहीं है, वे लोग भ्रान्त हैं, क्योंकि स्वप्न के स्नान, पान आदि ज्ञान तथा रमणी-रमणादि संवादी ज्ञान में भी संशय होता ही है । इस तरह वैदिक वाक्य स्वार्थ- बोधक होने से स्वतःप्रमाण हैं । अपौरुषेय होने से उनमें कारण-दोष का ज्ञान नहीं होता । अग्निहोत्र और स्वर्ग का कार्य-कारणभाव अलौकिक होने से उसका बाधक ज्ञान भी नहीं होता; अतः कारणदोष, बाधज्ञान आदि न होने से उसका स्वतःप्रामाण्य अकाट्य ही है । वेदावतार वाल्मीकिरामायण का अकुण्ठ प्रामाण्य अन्य सभी पौरुषेय ग्रन्थों में कारण-दोष की सम्भावना बनी रहती है । उनमें वेदमूलकत्व तथा पुरुष के आप्तत्व के ज्ञान से ही प्रामाण्य होता है । वाल्मीकिरामायण, महाभारत, मन्वादि-धर्मशास्त्र, पुराण आदि का प्रामाण्य
६ रामायणमीमांसा प्रथम उनके वेदमूलक होने से है; क्योंकि वे सब वेद के व्याख्यानरूप ही हैं। मनु, व्यास आदि के अनुसार वेद अनादि हैं। आधुनिक इतिहासकारों की दृष्टि से भी ऋग्वेद संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक है। वाल्मीकिरामायण वेदों का अवतार तथा वेद-व्याख्यानरूप ही है, यह पुराण का उद्घोष है— “वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना ।।” ( वा० रा० १।१।१ ) वेदवेद्य परमेश्वर श्रीराम के अवतीर्ण होने पर वेद ही प्राचेतस महर्षि से रामायण के रूप में प्रकट हुए । वाल्मीकि-रामायण का भी यही मत है कि वेद के उपबृंहणार्थ महर्षि ने लव-कुश को रामायण ग्रन्थ पढ़ाया— “वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।” ( वा० रा० १।४।६ ) इस तरह मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, मन्वादि धर्मशास्त्र, पुराण, षड्दर्शन, आगम आदि सभी सनातनधर्मियों के मान्य ग्रन्थ हैं तथा हिन्दी, मराठी आदि विविध भाषाओं में लिखित रामचरित- मानस, भावार्थरामायण, ज्ञानेश्वरी-गीता आदि ग्रन्थ भी वेदमूलक होने से ही प्रमाण हैं । श्रीसीतारामचरित्र की वेदमूलकता श्रीसीता एवं श्रीराम का चरित्र मन्त्ररामायण, पूर्वोत्तरतापनीयोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा मुक्ति- कोपनिषद् आदि में स्पष्टरूप से वर्णित है । इसी प्रकार मन्त्ररामायण में रामकथा का विस्तार से वर्णन है । सीतोपनिषद् में सीता का माहात्म्य वर्णित है । पचासों अन्य उपनिषदों में भी श्रीराम की वन्दना है । वाल्मीकि रामायण में श्रीसीताराम-चरित्र विस्तारपूर्वक वर्णित है । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, अद्भुतरामायण, महाभारत, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि में भी श्रीराम का चरित्र वर्णित है । इन सब में वेदों का महत्त्व, श्रीराम की परमेश्वरस्वरूपता तथा श्रीसीता का महाशक्ति या राम का स्वरूप होना स्पष्टरूप से वर्णित है । ऋग्वेद-दशममण्डल के तिरानवेवें सूक्त में श्रीरामका राजा के रूप में स्पष्ट वर्णन है । वाल्मीकिरामायण में श्रीसीता-राम का यथार्थ वर्णन “प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः । चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ।।” ( वा० रा० १।४।१ ) भगवान् वाल्मीकि ने राम के राज्यसिंहासनासीन होने के पश्चात् रामचरित रामायण का निर्माण किया । वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामायण ग्रन्थ श्रीरामचन्द्र के समय का लिखा हुआ है । यह तथ्य मूलरामायण के प्रश्नोत्तर से भी स्पष्ट है । वहाँ प्रश्न किया गया है । को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।।” ( मू० रा० १।१।२ ) इस प्रश्न में ‘साम्प्रतम्’ से वर्तमान-काल में विशिष्ट गुणसम्पन्न पुरुष के सम्बन्ध में प्रश्न किये गये हैं । उत्तर में अतीत तथा वर्तमान की अनेक घटनाओं के सम्बन्ध में तथा भविष्य की घटनाओं के सम्बन्ध में क्रियाओं का प्रयोग किया गया है । जैसे— “इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः । नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी ।।” ( मू० रा० १।१।८ ) “स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन् ।” ( मू० रा० १।१।२४ )
अध्याय परब्रह्मरूप सीता-राम का वेदमूलक लोकोत्तर माहात्म्य ७ “न पुत्रमरणं केचिद् द्रक्ष्यन्ति मनुजाः क्वचित् ॥” ( मू० रा० १।१।९१ ) “चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति ॥” ( मू० रा० १।१।९६ ) इन उत्तरवाक्यों में श्रीराम वन गये । राम-राज्य में कोई पुत्र-मरण नहीं देखेगा । राम चारों वर्गों को अपने-अपने धर्मों में नियुक्त करेंगे । इस प्रकार विभिन्न काल की क्रियाओं का स्पष्ट निर्देश है । इन प्रमाणों के आधार पर सिद्ध होता है कि वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ राम के समकाल का ही है; अतः श्रीसीताराम के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण ही मुख्य प्रमाण है । वाल्मीकीय रामायण के अनुसार साक्षात् ब्रह्माजी ने कहा—महर्षे ! मेरी प्रेरणा से ही “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्” इस श्लोक के रूप में रामायण ग्रन्थ तुम्हारे मुख से प्रकट हुआ है । तुमने धर्मात्मा श्रीराम का चरित्र नारदजी के मुख से जैसा सुना है, वैसा वर्णन करो । श्रीराम के चरित्र का, रहस्य, गुप्त, प्रकट जो भी वृत्त
चौबीस हजार श्लोकों, पाँच सौ सर्गों, छह काण्डों तथा उत्तरकाण्ड के रूप में सीताचरित्र रामायण का निर्माण वाल्मीकि ने किया और वेदार्थ में परिनिष्ठित सीता-पुत्र कुश और लव को वेद का उपबृंहण करने के उद्देश्य से यह ग्रन्थ पढ़ाया। इससे सिद्ध होता है कि यह रामायण श्रुति-तात्पर्यविषयीभूत परम तत्त्व का ही प्रतिपादन करनेवाला ग्रन्थ है— “स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥” (वा० रा० १।४।६) यह रामायण सीता का महान् चरित्र है। यह शृङ्गार, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक, वीर आदि विविध रसों से युक्त है। गान्धर्व-तत्त्वज्ञ स्वरसम्पन्न, परम रूपवान् कुश और लव ने वीणा-वादन के साथ इसका गायन कर अभ्यास किया। इनके गान से ऋषि-महर्षि भी विस्मित होकर साधु साधु कहने लगते थे और सन्तुष्ट होकर कमण्डलु, कुठार आदि पुरस्कार के रूप में देने लगते थे। वे अपने दिव्य गायन से सबके शरीरों, अङ्गों, मनों एवं हृदयों तथा कानों को आह्लादित करते थे (वा० रा० १।४)। इतना ही नहीं कुश और लव को पढ़ाकर उस रामायण ग्रन्थ के परीक्षार्थ महर्षि ने तत्कालीन जनता में उसे प्रचारित भी कराया। अधिकांश अयोध्यावासियों के समक्ष जो घटनाएँ घटी थीं, उनके सामने उन घटनाओं का वर्णन हुआ और अयोध्यावासियों की दृष्टि में यह ग्रन्थ अक्षरशः परम सत्य सिद्ध हुआ। वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीविष्णु भगवान् ही राम के रूप में अवतीर्ण हुए हैं; वाल्मीकिरामायण में यह स्पष्ट उल्लेख है कि महाद्युति, शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले विष्णु आये (वा० रा० १।१५।१६)। देवताओं ने कहा—हे विष्णो ! आप अपने को चतुर्धा विभक्त कर मनुष्यरूप में अवतीर्ण हों तथा प्रवृद्ध लोककण्टक रावण को मारें (वा० रा० १।१५।२१,२२)। तब सुरश्रेष्ठों द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान्, व्यापक नारायण श्रीरामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए (वा० रा० १।१७)। भगवान् विष्णु पुत्र-भाव को प्राप्त हुए। उत्तम ग्रह और नक्षत्रों के उदित होने पर श्रीकौशल्या ने 'सर्व- लोक नमस्कृत जगन्नाथ परमेश्वर' को रामरूप में प्रकट किया। जो सर्व शुभ लक्षणों से युक्त एवं विष्णु के शुद्ध लक्ष्यार्थ- स्वरूप अर्ध भाग हैं और वही इक्ष्वाकुवंश-वर्धन श्रीराम हैं (वा० रा० १।१८।१०,११)। विश्वामित्र का कहना है—सत्यपराक्रम परब्रह्मरूप राम को मैं जानता हूँ और जो तपोनिष्ठ लोग हैं वे भी जानते हैं। महातेजा वसिष्ठ भी श्रीराम को उसी रूप में पहचानते हैं (वा० रा० १।१९।१४,१५)। ये मूर्तिमान् धर्म हैं, वीर्यवानों में सर्वाधिक बुद्धिसम्पन्न (सर्वज्ञ) तथा तपस्या के परम लक्ष्य हैं। ये विविध अस्त्रों को जानते हैं। सचराचर त्रैलोक्य में भक्तिहीन जन इन्हें नहीं जानते और न जानेंगे (वा० रा० १।२१। १०,११)। श्लेषालङ्कार से विश्वामित्र की भी उक्त श्लोकों में स्तुति है। महातेजा गौतम ने अहल्या के साथ विधिवत् श्रीराम की पूजा की और अपने तप में लग गये (वा० रा० १।४९।२१,२२)। परशुराम ने कहा था—त्रैलोक्यनाथ ! आपने जो मुझे पराजित किया है इससे मैं आप को मधुहन्ता मधुसूदन समझता हूँ। स्वर्गादि लोकों का दान करना या उन्हें प्रतिबद्ध करना ईश्वर का ही कार्य है (वा० रा० १।७६।१७-१९)।