झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ८६ राजा का चेहरा तमतमा गया । परन्तु उन्होंने अपने को संयत करके कहा, 'जब जैसा अपराध और अपराधी सामने आवे, वैसा उसको दण्ड देना चाहिये ।' गार्डन ने भाप लिया कि राजा ने अपने उठे हुये क्रोध को भीतर का भीतर घसा लिया है । बोला, 'सरकार को शायद मालूम होगा हमारे यहाँ के एक बहुत बडे विद्वान ने हिन्दुस्तान भर के लिये एक ही दंडविधान* प्रस्तुत कर दिया है । वह बहुत विशद और न्यायपूर्ण है । जितने दंड रक्खे गये हैं कोई भी अमानुषिक नही ।' 'क्या रियासतो में भी उस विधान को जारी किया जावेगा ?' गार्डन ने तत्काल उत्तर दिया, 'नही सरकार । रियासतो को अपना निज का प्रबन्ध अपनी व्यवस्था के अनुसार करने का अधिकार है ।' राजा एक क्षण सोचकर बोले, 'हमारी सन्धियो में यह अधिकार सुरक्षित है ।' सन्धि के शब्द पर गार्डन के मन में तुरन्त खटपट उठी, परन्तु उसने खुशामद के ढङ्ग को अधिक अच्छा समझकर कहा, 'परन्तु सरकार हमारे सम्राट और भारत के गवर्नर-जनरल को उस दिन बहुत अच्छा लगेगा, जब सब रियासतो में एक ही प्रकार का न्याय, एक ही कानून और एक ही तरह की अदालतो की स्थापना हो जाय । इसमें सरकार कोई हर्ज भी नही है । नरेशो का बोझ भी बहुत हलका हो जावेगा और, जनता ज्यादा चैन की साँस लेने लग जावेगी ।' राजा ने प्रश्न किया, 'आपके राजाधिराज को बहुत अधिकार होगे ?' गार्डन असमन्जस में पड गया । परन्तु उससे अपने को उबार कर बोला, 'हमारे राजाधिराज ने अपना अधिकार पन्चायत को दे दिया है । वह पंचायत कानून बनाती है । शासन करती है ।' *लार्ड मैकाले का इण्डियन पीनल कोड (भारतीय दंड विधान) ।