भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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८८ झांसी की रानी राजा के मुँह से भी निकला, 'बचो !' परन्तु तलवारे उस मस्त हाथी की गति का निरोध नही कर सकती थी । इतने में एक ओर से बर्छा लिये एक सिपाही हाथी पर दौड पडा और उसने बर्छे के प्रहार से हाथी की प्रगति को लौटा दिया । राजा को उस सिपाही ने प्रणाम किया । राजा ने नाम पूछा । उसने बतलाया, 'इमामअली । काजी हू सरकार, सांटमारी भी करता हूँ ।' राजा ने कहा, 'शाबाश काजी । इनाम मिलेगा ।' इमामअली बोला, 'सरकार के चरणो में बना रहू और बाल बच्चो का पालन-पोषण होता जावे यही सेवक के लिये गनीमत है ।' राजा ने पारितोषक में कुछ जमीन लगाने की घोषणा की और वह गार्डन के साथ किले के महल में चले गये । जब दोनो दीवानखाने में बैठ गये तब भी गार्डन के मन में वह हाथी वाली घटना घूम रही थी । वह बोला, 'सरकार, इनाम रुपये की शकल में दिया जाना चाहिये । इस तरह भूमि लगाते चले जाने से राज्य में चप्पा भर भी न बचेगी !' राजा ने कहा, 'तब झांसी राज्य में बहादुर ही बहादुर नज़र आवेंगे !' गार्डन को इस असङ्गत उत्तर से सन्तोष नही हुआ । बोला, 'इस देश में जो कुछ देखता हूँ सब अति के दर्जे पर । थोडे से बहुत धनवान और बहुत से निर्धन । बिरला ही अत्यन्त धर्मनिष्ठ और बहुत से कीडो- मकोडो से ज्यादा सडी जिन्दगी बिताने वाले ! किसी को जमीनें और जागीरें । छोटे-बडे सब तरह के कामो के लिये और बहुतेरो को हलके से हलके अपराधो के लिये अङ्गहीन करने की सजा ! बिच्छुओ से कटवाने का दण्ड !'