झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० झांसी की रानी
राजा—'पंचायतें तो हमारे यहाँ गांव-गांव में हैं। इन पचायतो के फैसले को रद्द करने की कोई भी राजा बात नहीं सोचता। ये पंचायतें अपने-अपने गाव का सभी तरह का प्रबन्ध भी करती हैं। हमारे कर्मचारी उसमें कोई दखल नही देते। केवल बडे बडे मामले मुकद्दमे मेरे सामने आते हैं। उनको नाना—भोपटकर शास्त्री की सलाह से निबटाता हूँ। गार्डन—'इसमें, सरकार, सहूलियत होने पर भी तरतीब, नियम-सयम जाब्ते-कायदे की कमी है और अन्याय होने की ज्यादा गुञ्जायश है।' राजा—'आपके देश में क्या पंचायतें नहीं हैं?' गार्डन—'युग बीत गये, जब थीं। उनका रूप बदल गया है। न्याया- धीश को सम्मति देने और मामले का निर्धार न्याय कराने में पचायत सहयोग देती हैं। इस पंचायत के सहयोग के बिना मुकद्दमा नही होता।' राजा—'हमारे देश की पंचायते तो इससे भी बढकर समर्थ हैं। राज्य लोट-पोट जाते हैं, परन्तु पंचायतें अमर रहती हैं।' गार्डन को हिन्दुस्तानी पञ्चायतों का यह वर्णन बहुत खटका। अपने क्षोभ को थोडा-बहुत दबाकर उसने कहा, 'अपढ-कुपढ लोगो की पञ्चायतो के ढङ्ग मैले कुचैले ही हो सकते हैं, सरकार। अदालतो की सफाई और निखार को पचायते कैसे पा सकती हैं?' 'बङ्गाल मदरास में आपकी अदालतें पचायतो के सहयोग से न्याय निर्णय करती हैं या यों ही?' राजा ने प्रश्न किया। गार्डन का मन ज़रा सिटपिटाया। परन्तु 'उसने बेधड़की के हठ के साथ उत्तर दिया, 'पंचायतो की मदद तो नही ली जाती, परन्तु हिन्दू- मुसलमानो के दीवानी झगडो को सुलझाने के लिये पडित और मोलवियो की सलाह ली जाती है। अपराधो के मामले अदालत के अफसर स्वयं ही निर्धार करते हैं।' 'स्वयं !' राजा ने आश्चर्य के साथ कहा, 'स्वयं ! सो कैसे ?' गार्डन ने जवाब दिया, 'गवाहो और वकीलो की मदद से।' राजा ने पूछा, 'हर अदालत में एक-एक वकील रहता होगा ?'