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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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गार्डेन को राजा की सिधाई पर मन में हँसी आई। उत्तर दिया, 'नही तो सरकार। वादी प्रतिवादी अपने-अपने गवाह वकीलो द्वारा पेश करते हैं। वकील लोग कानून जानते हैं। वे अपने कानूनी ज्ञान द्वारा अदालत की सहायता, ठीक निर्णय पर पहुँचाने मे, करते हैं। यह हमारे देश की संस्था है।' राजा को हँसी आ रही थी। होठो तक आई, परन्तु उन्होने उसको प्रकट नही होने दिया। बोले, 'वकील क्या गवाहो को पेश करने का काम मुफ्त में करते हैं?' गार्डेन ने अभिमान के साथ कहा, 'हमारे देश में पहले वकील लोग मुफ्त में यह काम करते थे, परन्तु अब पारिश्रमिक लेने लगे हैं। और इस देश में तो वे लोग करारी रकमें लेते हैं।' 'तब कही लोग न्याय प्राप्त करने की आशा कर पाते है,' राजा खूब हँसकर बोले, 'भाडे के लोगो को बढाने की यह सस्था आप लोग इस देश में किस प्रयोजन से ले आये?' हिन्दुस्थान के प्रति गार्डेन के भीतरी मन में दबी हुई घृणा उभर पडी। बोला, 'आपके देश की न्याय प्रणाली की विषमता मुझको भी मालूम है। उसी अपराध के लिये ब्राह्मण पर एक रुपया दण्ड, ठाकुर पर पचास, बनिये पर पाचसौ और गरीब शूद्र का हाथ पैर कट। सरकार कानून सब के लिये एकसा होना चाहिये।' राजा को इस तर्क ने ज़रा ज़ेर किया। परन्तु उनको एक व्यङ्ग सूझा। बोले, 'इस कानून ज़ाब्ते के द्वारा आपके इलाको में जनता को न्याय कितने समय में मिल जाता है?' गार्डेन ने शीघ्र उत्तर दिया, अपराध वाले मामलो में दो एक महीने लग जाते हैं और दीवानी मामलो में एकाध साल।' राजा फिर हँसे। कहा, 'हमारे यहा तो तुरन्त न्याय होता है। मैं तो दो-एक दिन से ज्यादा नही लगाता। दीवानी और अपराधी मामलो का कोई भेद नही करता। पञ्चायतो के निर्णय को सर्वमान्य मानता हू।