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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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६२ झाँसी की रानी आपके इलाकों में यदि पुलिस की गफलत या लापरवाही से चोरी इत्यादि हो जावे तो आप पुलिस को कोई दण्ड देते हैं ?' 'हा सरकार', गार्डन ने उत्तर दिया, 'बरखास्त कर देते हैं, तनज्जुल कर देते हैं ।' राजा ने उत्तेजित होकर कहा, 'इससे जनता को क्या लाभ होता होगा ? मै तो ऐसे मामलो में गफलत करने वाली पुलिस से चोरी का नुकसान भरवाता हूँ ।' गार्डन बोला, 'तब जनता पर पुलिस की धाक नही रह सकती । लोग उसकी बिलकुल परवाह नही करते होगे । ऐसा शासन बहुत दिनो नही टिक सकता सरकार ।' राजा और भी उत्तेजित हुये । उन्होने कहा, 'साहब, जनता पर मेरी धाक होनी चाहिये, न कि मेरे अफसरों की । वह राज्य भी बहुत समय तक नही टिक सकता जो कर्मचारियो ओर पुलिस की धाक पर आश्रित हो । मै तो अपने अपराधी कर्मचारियो को 'लोहे की मछली के 'कोडे से ठोकता हूँ ।' गार्डन खिसिया गया । बोला, 'सरकार अनियंत्रित सत्ता बहुत बुरी चीज़ है । इस परिपाटी के मानने वाले चाहे जो कुछ मनमाना कर बैठते हैं । आपने बनारस में एक विचारे राजेन्द्र बाबू को अकारण पिटवा दिया । हमारे पोलिटिकल विभाग को जवाब देते-देते मुसीबत आई ।' राजा को बनारस वाली घटना की स्मृति के साथ-साथ यह भी याद आ गया कि इसी पोलिटिकल विभाग की इजाजत मिलने पर झाँसी राज्य के बाहर कदम रख पाया था । 'अशिष्टता को दण्डित करने में में कभी नही चूकता', राजा ने कहा, 'फिर चाहे में कही होऊँ—अपने राज्य में होऊँ चाहे राज्य के बाहर ।' उसी समय उनको खुदाबख्श और उसके सम्बन्ध वाला प्रसङ्ग याद आ गया ।